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Sahil Tanveer

Drama


2.5  

Sahil Tanveer

Drama


इफ़्तार

इफ़्तार

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आरिफ जब ऑफिस पहुंचा तो उसके चेहरे पर मायूसी साफ -साफ झलक रही थी। एक तो गर्मी ऊपर से ऊपरवाले का बड़ा इम्तेहान रोज़ा। आज सेहरी भी नहीं की थी उसने। क‌ई बार तो उसका जी करता वह रोज़ा छोड़ दे, पर वह अपने आस‌पास के लोगों को देखता। जिस मोहल्ले में वह रहता वहाँँ सभी मुस्लिम थे। यहाँँ का बच्चा - बच्चा रोज़ा रखता। ऑफिस जहाँँ पर था वहाँँ लगभग सभी हिन्दू थे जो रोज़ा रखने वालों को श्रद्धाभाव की नज़रों से देखते। उनके हिसाब से रोज़ा तोड़ना महापाप होता है। खैर, किसी ने उसे बताया कि नीचे वाले ऑफिस में इफ्तार पार्टी का आयोजन है। वह मन ही मन बहुत खुश हुआ और अल्ल्लाह का शुक्रिया अदा करने लगा। बेशक, अल्लाह बहुत मेहरबान है ! वह जानता था कि आज मेरे पास इफ़्तार तक के पैसे नहीं हैं और उसने इफ्तार का इक जरिया बना दिया। आज का रोज़ा अब उसे बहुत आसान लगने लगा लेकिन वक्त उतना ही मुश्किल। खुशबू नाक के रास्ते खाली पेट तक जाती और मिजाज़ गदगद हो जाता । समय थोड़ा और आगे बढ़ा, घड़ी ने शाम के छः बजाए। ऑफिस बिल्डिंग के बाहर चार चक्के वाली चमचमाती गाड़ियां आकर रुकने लगी और चमकते-दमकते लोग लोग ऑफिस की शान ओ शौकत को बढ़ाने लगे। जो भी हज़रत यहाँँ आ रहे थे सभी के सभी कौमी एकता का सुबूत पेश कर रहे थे। धीरे - धीरे हिन्दू-मुस्लिम और अन्य धर्मों के लोग एक दस्तरखान पर बैठकर दस्तरखान की ज़ीनत को बढ़ाने लगे। अपने ऑफिस के बाहर सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी पर तैनात आरिफ अपनी तिरछी नज़रों से नीचे वाले ऑफिस में हो रही सारी एक्टिविटी का जायज़ा ले रहा था। शाम साढ़े छः बजे उसका ऑफिस टाइम ओवर हुआ। सोचा कि क्यूं ना अब इफ्तार करके ही वह अपने घर जाए। चेहरे पर खुशी के भाव लिए वह नीचे वाले ऑफिस पहुंचा जहां इफ्तार का आयोजन था। चारों तरफ लज़ीज़ ही लज़ीज़ पकवान दिखाई दे रहे थे। जीभ लपलपा गई। दस्तरखान पर लगे पकवानों के एक सिरे पर वह बैठने ही वाला था कि उसकी नज़रें उसी ऑफिस के मोटू मैनेजर जुनैद से टकरा गई। जुनैद की नज़रों में एक हिकारत भरी थी जिसे आरिफ भांप गया। उसने अपने अगल-बगल के लोगों को देखा, फिर अपने आप को गौर से देखा। अपने कपड़े देखे, उसे आभास हुआ कि वह एक बहुत बड़ी गलती करने जा रहा था। अच्छा हुआ कि ऐन वक़्त पर जुनैद सर ने पार्टी स्टैंडर्ड बता दिया। वह चुपके से अपनी नज़रें सबसे बचाते हुए ऑफिस से बाहर निकल गया। उसने अपनी जेब टटोली, कुल 25 रूपए पड़े थे जिसमें उसे अपने घर भी जाना था। उसने हिसाब लगाया 10 रूपए बस का किराया और पांच रूपए फटफट का और...अब ले देकर बचे 10 रूपए जिसमें उसे इफ्तार करना है। मस्जिद का एक पल उसे ख्याल आया कि वो मस्जिद चला जाए लेकिन अगले ही पल उसके सामने वो मंज़र आ गया जो पिछले साल उसके साथ गुजरा था, मस्जिद में ढेरों सारे इफ्तार के सामान आए थे। लंबा चौड़ा दस्तरखान लगा था और बहुत सारे लोग दस्तरखान पर बैठे थे। लंबे दस्तरखान के बगल में एक छोटा सा दस्तरखान लगा था जहां कुछ ही लोग बैठे थे। उसने वहीं जाकर बैठना मुनासिब समझा। जब वह वहाँँ बैठने लगा तो वहाँँ लोगों ने उसे उठा दिया कि जाओ तुम वहाँँ उन लोगों के दस्तरखान पर बैठो वहीं तुम लोगों के इफ्तार का इंतज़ाम है। पता चला कि वो लोग मस्जिद के ही स्टाफ थे जो मस्जिद में आए सबसे लज़ीज़ खानों को अपने सामने परोस कर बैठे थे और इफ़्तार सामान उन लोगों के खाने भर से कहीं ज्यादा था। खुदा के घर में वो फिर से ज़लील नहीं होना चाहता था इसलिए मस्जिद जाने का प्लान उसने कैंसल कर दिया। उसने इधर - उधर अपनी नज़रें बचाकर दौड़ाई, चारों तरफ़ महंगी ही महंगी चीज़ें थी। दस रूपए में भला उसे क्या मिल सकता था ! अचानक उसकी नज़र केले के एक ठेले पर पड़ी। काफी मोल - तोल करने के बाद उससे दस के तीन केले लिए। कुछ देर बाद मगरिब के आज़ान की धीमी आवाज़ दूर से आती सुनाई दी। दुआ पढ़ कर वह केला खाने ही वाला था कि उसे आभास हुआ कि कोई उसके पैरों को खींच रहा है, उसने अपनी नज़रें नीची की, देखा तो दो बच्चे उसके पैरों को खींच रहे हैं और खाने का सवाल कर रहे हैं। वह गुस्से से आगबबूला हो उठा। वह अपने पैरों को झकझोर कर उनसे खुद को अलग करने ही वाला था कि कुछ तस्वीरें उसके ज़ेहन में चलचित्र की भांति चलने लगी और वह अचानक से रुक गया...।


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