हरे भरे भारत की नींव
हरे भरे भारत की नींव
आदर्श ने रोशनी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखने से पहले रोशनी को भव्य एवं सुंदर दृश्य/स्थान दिखाने का वचन दिया था। रोशनी ने इसे स्वीकारा और कहा कि वह अपने भारत के भीतर ही इसे देखना चाहेगी ।
१५ अप्रैल २०४० को, आज ही के दिन, आदर्श और रोशनी को वास्तव में कुछ विशेष और अनोखा मिला। और पता हैं कैसे ?
सभी क्रांतियों की तरह यह धीरे-धीरे वर्षों तक बढ़ता रहा और एक विशिष्ट दिन को, बहुत ही पावन अवसर पर पौधों के साम्राज्य को उसके अधिकार प्राप्त हो ही गये। उस प्रसिद्ध तिथि पर, याने २१ मई, २०२० को, हाँ हाँ, ठीक उसी दिन... जब आदर्श ने रोशनी को विवाह का प्रस्ताव दिया, सर्वोच्च न्यायालय ने अध्यादेश एवं दो टूक निर्देश जारी करें। वृक्षों के अधिकारों के बारे में। और उन अधिकारों का उल्लंघन करनेवाले दोषी नागरिकों पर अभियोग चलाने का बहुत बड़ा निर्णय भी पारीत करा गया। कुछ के लिए यह अविश्वसनीय था। यद्यपि न्यायिक अधिकारियों की आलोचना और उपहास किया गया, फिर भी वे दृढ़ रहे। उन्होंने सभी को याद दिलाया कि एक समय था जब महिलाओं के पास कोई अधिकार नहीं थे और उन्हें संपत्ति माना जाता था, एक समय था जब दासों/गुलामों के पास कोई अधिकार नहीं था और उन्हें संपत्ति माना जाता था, एक समय था जब घरेलू जानवरों के साथ दुर्व्यवहार किया जा सकता था - लेकिन अब नहीं । पहले, वृक्षों को व्यक्तिगत संपत्ति माना जाता था, और उनकी अमूल्य धरती सेवा sadaiv उपेक्षित ही रही ।
इस नये प्रकार के जीवन को समझना और जीना एक बड़ी चुनौती थी - उन कई चीजों के बारे में जो अभी भी लकड़ी के फाइबर से बने थे? हमारे विनिर्माण प्रगति के होते हुए भी, कई वस्तुएं थी जिन्हें सिंथेटिक्स द्वारा प्रतिस्थापित नही किया जा सकता था। बांसुरी, तबला, सितार जैसी अनेक संगीत साधन केवल एक उदाहरण थे।
समय की आवश्यकता को समझते हुए, आदर्श और रोशनी ने शादी करने से पहले २० वर्षों तक इस संदर्भ में अथक प्रयास करने का निर्णय लिया। जब संस्कृति बदलती है, कई समायोजन और विवरण का अवलोकन करना होता हैं। अंततः यह माना और जान लिया गया कि वृक्षों को, मानव भलाई के लिए उपयोग करने के लिए तभी स्वीकार्य माना जायेगा जब वृक्षों को नागरिक वनहिन या बंजर जमीन पर हरा भरा कर उनको पत्तों को लहरा पायें ।
हमें फसलों को जंगली वृक्षों से अलग करने की आवश्यकता थी। कुछ वर्षों के विरोध और अदालती मामलों के बाद, एक नई शब्दावली विकसित की गई। वृक्ष खेत, वे स्थान थे जहाँ पेड़ों को उनके फाइबर के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। फसल काटने पर उनके स्थान पर नए पेड़ लगाए गयें। नैतिक रूप से यह एक आदर्श समाधान नहीं था, परंतु काटे गए पेड़ों को उनके द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए आदर और सम्मान दिखाया गया । वृक्ष खेत के विपरीत वृक्ष वन थे। वृक्ष वन से कटाई करना कड़ाई से गैरकानूनी बन गया। इन स्थानों को पृथ्वी के फेफड़े माना और जाना जाने लगा। शुध्द वायु के श्वसन से मिलने वाले स्वास्थ्य लाभों के लिए अधिकांश लोग वृक्षवन से होकर गुजरने लगे। विद्यालय के स्थानों और पाठ्यक्रमों को पुनर्गठित किया गया ताकि सभी छात्र सप्ताह में न्यूनतम एक दिन वृक्ष वन में बिता सके। २०२५ में योजनाबद्ध अंतरिक्ष मिशन को भंग कर दिया गया और उस दिशा में निर्देशित धन का उपयोग नई वन सेना के लिए किया गया।
भारत सरकार की इस शाखा ने सारे विद्यालयों के पुनर्गठन के लिए भुगतान किया, वृक्ष वनों के लिए भूमि खरीदी, और वृक्ष वनों को नष्ट करने वाले प्रत्येक नागरिक/संस्था पर मुकदमा चलाया। वन बल के मानव दूरभाष प्रचालक, दिन या रात के किसी भी समय तुरंत प्रत्युत्तर देने लगे। वन बल में नौकरी के लिए युवक/युवतीयां में आकर्षण अत्याधिक बढ़ा, और कई लोग (जिनमें अधिकांश वरीष्ठ नागरीक हैं) बिना वेतन के वनबल में स्वेच्छा से काम करने लगे । हर जिले में सुलभ, संरक्षित वृक्षवनों को स्थापित या विकसित किया गया, जहा सामन्य जन के लिए वृक्षवन का दौरा करना, दूरदर्शन/मोबाईल के प्रयोग के विरूध्द एक बड़ा विकल्प बनकर उभरा ।
हालांकि, रोशनी इन सब के लिए आशावादी थी, लेकिन अभी भी आवश्यक धन के बारे में आशंकित थीं। क्रांति से पहले, लगभग सभी स्थानीय पार्कों में पूर्ण २४/७ सीसीटीवी / अभिगम/ सुरक्षा का अभाव था। २०२५ के बाद, सभी राज्य पार्कों को उनकी प्राकृतिक स्थिति में संरक्षित किया जाना आरंभ हुआ ।
क्रांति से पहले, वन्य भूमि के मालिकों को वार्षिक संपत्ति कर का भुगतान करना पड़ता था। क्रांति के बाद जिन लोगों के पास वृक्ष वन थे उन पर कोई संपत्ति कर नही थोपा गया । इसके बदले वृक्ष खेतों की भूमि पर करों को दोगुना किया गया, जो इनसे कमा रहे थे।
अन्य देश भारत के इस आधुनिक एवं विस्तृत प्रयास की लगातार समीक्षा कर रहे थे। वैज्ञानिकों को स्वच्छ नदीयां/जलमार्ग, जैव विविधता के पुनरुत्थान और स्वस्थ जनमानस के सकारात्मक परिणामों की सूचना प्राप्त होने में अधिक समय नहीं लगा। आधी सदी से वनों के वैश्विक नुकसान की निगरानी कर रहे संयुक्त राष्ट्र ने वृक्ष अधिकारों के इस नए चलन पर चर्चा करने के लिए एक विशेष सम्मेलन बुलाया। उस अधिवेशन में, यह बताया गया कि नपाई प्रारंभ होने के पश्चात पहली बार वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर स्थिर रहा है। वृक्ष वन के लिए पार्यावरणीय पर्यटन अब एक बहुत बड़ा आर्थिक संचालक बन गया। पृथ्वी पर लगभग हर देश से चार्टर्ड उड़ानें और पैकेज टूर द्वारा, भारत के वृक्ष वनो का आनंद लेने, बडी संख्याओं में यात्री आने लगे । अधिकांश नगर पालिकाँए अतिरिक्त आय कमाने लगी। उन कस्बों के पास, जो कभी पुराने-वृद्ध-वनों से नहीं जुड़े थे, उल्लेखनीय रूप से अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। भारत, डेढ़ सदी पहले तक जो हरियाली और वनों का अधिनायक था - अन्य देशों के साथ अंततः "वृक्ष अधिकार क्रांति" फिर विश्व भर में फैल गई। वैज्ञानिकों के पूर्वानुमानों के विरूद्ध वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड स्तर में कमी इतनी कम मात्रा में हो पाना असंभव था, परंतु सीओ२ स्तरों में वास्तविक गिरावट, इस क्रांति के पश्चात पाई गयी ।
वातानूकुलन यंत्र और रेफ्रिजरेटर की कम आवश्यकता पाई गई। अब, २०४० में, हम "अंतर्राष्ट्रीय वन वर्ष" को एक बार फिर से मना रहें हैं । २०२० में वृक्ष के अधिकारों के प्रति कुछ लोगों की अलौकिक, सीमित, स्वार्थ-संकुचन की कल्पना भी करना, आज कठीन है।
हालांकि, आदर्श और रोशनी का योगदान यहां नगण्य था, परंतु एक बहुत बड़े परिवर्तन को क्रियान्वीत, सम्मति प्रदान, प्रचार, प्रसार करने से, अत्याधिक लोगों को प्रभावित किया और शिक्षित लोगों के मनों और विचारों में मौलिकता के पाठ बढ़ायें।
आज, २०४० में एक कसक सी हैं भारतीय मनों में, कि, यह हम और २० वर्ष पहले क्यों नही कर पायें ।
