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Nitin Kumar

Children

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Nitin Kumar

Children

संस्कारों का मायाजाल

संस्कारों का मायाजाल

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एक मासूम युवक बीच रस्ते में तख्ती लटकाए बैठा था । शकल से परेशान और हालत से बेजार और बेरोजगार प्रतीत हो रहा था । तख्ती पर बड़े अक्षरों में लिखा था "मुझे क्षमा करे मेरी आधी ही गलती हैं" ।

सैकड़ो लोग उसे या उसकी गले की तख्ती पढ़े या पढ़े बगैर आगे बढ़ गए । कुछ ने हम दर्दी दिखाई कुछ ने नजर अंदाज किया ।

एक ने जाकर पूंछ ही लिया, "बाकी आधी गलती किसकी?"

उसने कहा, संस्कार का नाम लेकर मेरी मां ने मुझे अंधविश्वास के पाठ पढ़ाए, मनगढ़न प्यारी और अपनी सी - परी कथाओं से नसीब के पाठ सिखाए, अपने पैरो पर खड़ा होने के गुर सिखाते सिखाते मेरे प्रश्नों के उत्तर कभी नही दिए।

पिता की सवेरे सवेरे वाली संस्कारी बाते न जाने क्यों शाम होते होते शराब, तंबाकू और हिंसा से लथपथ हो जाती थी । 

पडोसियो के संस्कारी आयोजन जो प्रातः सुंदर वातावरण और कर्णप्रिय संगीत से शुरू होते थे, भेड़ चाल सी लचक लाकर फूहड़ से संगीत या शोर शराबे के भीड़ में कब परिवर्तित हो जाते थे, पता ही न चलता था । 

और फिर, जो भी सवेरे सुनाया जाता था उसके विपरीत कार्यों का सीधा प्रक्षेपण आंखो के सामने घट जाता था । लगभग रोज । रात को मां - बहन का उद्धार और उनका गालियों में धड़ल्ले से प्रयोग सवेरे वाली ज्ञान और महिमा मंडन के बिलकुल विपरीत होता था ।

सवेरे जिस आत्मीयता से पिछले रात का कचरा साफ किया जाता था न जाने क्यों फिर से सुबह के संस्कारों को भुलाकर दूसरे कल की सफाई का सामान जुटाया जाता था ।

समाप्त 

इस लड़के को तनिक भी एहसास नहीं हैं की उसका इस्तेमाल किया गया हैं सीढ़ी के रूप में । कोई प्रभावी उसके पीठ पर खड़े होकर उसे रौंद कर आगे बढ़ गया हैं, और उस लड़के को पता तक नहीं चला । 

और उसका हौसला फिर से भीड़ ने बढ़ाया " जो नसीब में लिखा हैं वो ही होगा" यह बार बार कहकर ।

क्यों शिक्षा, बाहरी सफाई, आपसी सौहार्द, सबकी सेहत, पर्यावरण संरक्षण, भाईचारा, अमन, आदर इत्यादि, संस्कारों की परिभाषा या दायरे में नहीं आते ?

जीवित जीवन


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