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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Inspirational

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

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गोकर्ण की कथा

गोकर्ण की कथा

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श्रीमद्भागवत महापुराण में अनेक कथाएं लिखी हुई हैं जो हमें हमारे जीवन दर्शन में अनेक बातें सिखाती हैं । हमें उन कथाओं को अवश्य पढ़ना चाहिए । आज गोकर्ण की कथा पढ़ते हैं । बहुत प्राचीन काल की बात है । तुंगभद्रा नदी के तट पर एक अनुपम नगर बसा हुआ था । उस नगर में एक आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहता था । उसकी एक बहुत सुंदर पत्नी थी जिसका नाम धुन्धुली था । जीतना तेजस्वी, ज्ञानी , धार्मिक, सत्यवादी और सदाचारी आत्मदेव ब्राह्मण था , उतनी ही दुष्ट, हठी , क्रूर , कृपण और झगड़ालू किस्म की उसकी पत्नी धुन्धुली थी । यह भी एक अजब संयोग है कि एक देवता स्वरूप व्यक्ति को आसुरी प्रवृत्ति वाली पत्नी मिली । संभवतः भगवान व्यक्ति की परीक्षा ले रहे हों ? पर जो भी है , वह ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ सुख और प्रेम पूर्वक रह रहा था । 

दोनों दम्पत्ति बड़े आराम से रह रहे थे लेकिन आत्मदेव को एक चिंता सदैव सताती थी । उसके कोई पुत्र नहीं था । पुत्र के बिना वह "पितृ ऋण" कैसे चुकाये ? बस, इसी बात की चिंता उसे खाये जा रही थी । इस चिंता के कारण उसका जीना बहुत मुश्किल है गया था । 

एक दिन उस गांव में एक महात्मा पधारे । आत्मदेव उन महात्मा के दर्शनों के लिए चला गया । आत्मदेव ने महात्मा को दण्डवत प्रणाम किया और अपना दुख व्यक्त किया कि उसके कोई पुत्र नहीं है और पुत्र के बिना जीवन बेकार है । महात्मा ने उसे खूब समझाया कि ये पत्नी, पुत्र आदि संबंध मनुष्य के लिए बंधनकारी हैं जो कि मनुष्य के पतन का कारण बनते हैं और इस बंधन के कारण व्यक्ति की "मुक्ति" भी नहीं होती है । 

जब बुद्धि पर अज्ञान का पर्दा पड़ जाता है तब व्यक्ति का विवेक नष्ट हो जाता है । धन , दौलत, स्त्री , पुत्र, पद , प्रतिष्ठा ये सब बंधनकारी हैं जो कि माया मोह की देन हैं और इनके कारण मनुष्य इन 84 लाख योनियों में भटकता फिरता है मगर मनुष्य फिर भी नहीं मानता है और उसका मन उसे भोग विलासों की ओर ही ले जाता है । सात्त्विक मनुष्य इनसे दूर रहकर स्वयं में ही रमण करता है और इस भवसागर से पार हो जाता है । महात्मा के समझाने पर भी जब आत्मदेव नहीं माने और पुत्र के लिए अड़ गये तो महात्मा ने उसे एक फल दे दिया और कहा "इसे अपनी पत्नी को खिला देना । इस फल से एक देव तुल्य पुत्र की प्राप्ति होगी" । 

आत्मदेव ने वह फल लाकर अपनी पत्नी को दे दिया और कहा दिया कि "इसे खा लेना । इसके खाने से एक बहुत गुणी पुत्र का जन्म होगा" । 

उसकी पत्नी धुन्धुली बहुत डरपोक किस्म की औरत थी । उसने सोचा कि यदि उसने वह फल खा लिया तो इससे उसका पेट बाहर निकल आयेगा । इससे वह न तो चल फिर सकेगी और न ही भाग सकेगी । यदि उस अवस्था में उसके घर पर डाकुओं ने हमला कर दिया तो वह भाग भी नहीं पायेगी । डाकू उसे पकड़ कर मार डालेंगे । वह मरने से बहुत डरती थी । वह यह भी जानती थी कि प्रसव पीड़ा बहुत कष्टप्रद होती है । उसमें जान भी जा सकती है । इससे वह बहुत चिंतित हो गई । 

इन्हीं दिनों धुन्धुली की बहन उससे मिलने आई । धुन्धुली ने अपनी चिंता अपनी बहन को बताई तो उसकी बहन ने एक सुझाव दिया । उसने धुन्धुली से कहा 

"मैं भी अभी गर्भवती हूं । ऐसा करना , इस फल को तो गाय को खिला देना और मस्त रहना । इन नौ महीनों में घर के अंदर ही रहना और एक महीने बाद घोषित कर देना कि मैं गर्भवती हूं । कपड़े थोड़े ढीले पहनना और लोगों से दूर रहना जिससे किसी को शक न हो । जब मेरे पुत्र होगा , मैं उसे आपके घर भेज दूंगी फिर उसे अपना पुत्र बता देना । मैं ऐसे बहाना बना दूंगी कि मेरा पुत्र तो मरा हुआ पैदा हुआ है । बस, आपका काम बन जायेगा" । 

जब अज्ञान का पर्दा पड़ता है तब आदमी इस प्रकार की बातों में आ जाता है । धुन्धुली भी अपनी बहन की बातों में आ गई । उसने वह फल अपनी गाय को खिला दिया और उसने आत्मदेव ब्राह्मण से कह दिया कि उसने वह फल खा लिया है । आत्मदेव संतुष्ट हो गया । 

धीरे धीरे समय बीतता चला गया । सात महीने बाद उसने अपनी बहन को देखभाल करने के बहाने से अपने पास बुला लिया । धुन्धुली ऐसे रहने लगी जैसे कि वह गर्भवती हो । 

ठीक समय पर धुन्धुली की बहन के एक पुत्र हुआ जिसे धुन्धुली ने ले लिया और उसकी बहन ने इस तरह स्वांग बनाया कि उसका बेटा मरा हुआ पैदा हुआ है । दोनों बहनों की बात पर किसी ने भी अविश्वास नहीं किया । 

कुछ समय पश्चात उस गाय के भी एक पुत्र हुआ जो देखने में देवतुल्य था । बस उसके कान गाय के कान जैसे थे । आत्मदेव ने इसे भगवान की लीला समझा और उसका पुत्रवत पालन करने लगा । आत्मदेव ने गाय के पुत्र का नाम "गोकर्ण" और अपने पुत्र का नाम "धुन्धुकारी" रख दिया । 

दोनों पुत्र बड़े होने लगे । गोकर्ण बहुत विद्वान, बुद्धिमान और शास्त्रों का ज्ञाता बन गया जबकि धुन्धुकारी एक राक्षस जैसा बन गया । वह चोरी , डकैती , लूटपाट , हिंसा, व्यभिचार सब खोटे काम करने लगा । उसके कर्म देखकर आत्मदेव को महात्मा की बातें याद आ गईं कि संतान भी बंधनकारी होती है । आत्मदेव ने इस "बंधन" से छूटने के लिए "संन्यास" का मार्ग अपना लिया और मोक्ष की प्राप्ति कर ली । 

धुन्धुकारी अब अपनी मां के साथ मारपीट करने लगा । वह पैसों के लिए मां को मारता था । मां जब उसे पैसे दे देती तो वह उन्हें शराब, जुआ , सट्टा, वेश्यावृत्ति आदि में व्यय कर देता था । उसे पैसों की और जरूरत होती तो वह अपनी मां पर और अधिक अत्याचार करता था । उसके अत्याचारों से तंग आकर एक दिन उसकी मां ने अपने घर के सामने स्थित एक कुंए में छलांग लगा दी और वह उसमें डूबकर मर गई । 

अब धुन्धुकारी मौज मस्ती के साथ रहने लगा । अब वह आजाद पंछी की तरह आजाद हो गया था । 

वह भोग विलास में डूब गया । उसने अपने घर को वेश्याओं का अड्डा बना दिया । वह पांच पांच वेश्याओं को अपने घर में ले आया और उनमें लीन हो गया । वेश्याओं को तो उसकी दौलत से प्रेम था, उससे नहीं । उनकी मांग बढ़ती जा रही थी और उनकी मांग की पूर्ति करने के लिए धुन्धुकारी की चोरी और डकैती भी बढ़ने लगी । 

एक दिन वेश्याओं ने सोचा कि धुन्धुकारी तो एक डकैत है, डकैती करता है । यह कभी न कभी तो पकड़ा जायेगा । जब यह पकड़ा जाएगा तब राजा के सिपाही हमें भी पकड़ लेंगे और कारागृह में डाल देंगे । 

तब उन्होंने एक योजना बनाई । जैसे ही धुन्धुकारी अपने घर आया , पांचों वेश्याओं ने उसे पकड़कर एक रस्सी से बांध दिया । उसका गला घोंटने का प्रयास किया लेकिन वे सफल नहीं हो पाईं । तब उन्होंने गर्म लाल सुर्ख कोयले उसके मुख में डाल दिये । उनसे उसका मुंह जल गया और वह मर गया । मरने के बाद उसे नीचे गड्ढा खोदकर गाड़ दिया और पूरा धन बटोरकर वे पांचों वेश्याऐं भाग गईं । 

धुन्धुकारी की आत्मा भटकती रही और उसे प्रेत योनि मिली । गोकर्ण तो बचपन में ही ज्ञान के लिए संन्यासी बन गया था । जब वह ज्ञानी बनकर अपने गांव आया तो गांव वालों ने उससे श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा सुनाने को कहा । गोकर्ण ने उनका अनुरोध मान लिया और सोने के लिए रात्रि में अपने घर आ गया । घर में धुन्धुकारी प्रेत योनि में रह रहा था । उसने अपने भाई को पहचान लिया लेकिन प्रेत योनि में शरीर का कोई आकार नहीं होने के कारण गोकर्ण को उसके होने का कोई अहसास नहीं हुआ । धुन्धुकारी उसे अलग अलग वेश जैसे कभी हाथी कभी शेर कभी राक्षस आदि बनाकर डराने लगा लेकिन गोकर्ण तो भगवान का भक्त था और भक्त कभी किसी से डरता नहीं है इसलिए गोकर्ण भी नहीं डरा । तब गोकर्ण ने अपनी अंजुली में पानी लेकर उसे अभिमंत्रित कर उस पानी को उस पर छोड़ दिया तो धुन्धुकारी अपने मूल स्वरूप में आ गया और उसने रो रोकर अपनी दुखभरी कहानी सुनाई । तब गोकर्ण ने उसे गया गंगा स्नान कराने की बात की लेकिन धुन्धुकारी ने कहा कि उसके पाप इतने अधिक हैं कि गंगा स्नान कराने से भी उसका उद्धार नहीं होगा । 

अगले दिन गोकर्ण ने बड़े बड़े संत महात्माओं से इसका निदान पूछा तो उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ सुनाने से इस अधम का उद्धार हो सकता है । गोकर्ण ने अगले दिन से पूरे गांव को श्रीमद्भागवत महापुराण कथा कहनी आरंभ कर दी । धुन्धुकारी भी एक बांस के अंदर खाली जगह में बैठ गया । 

एक दिन की कथा समाप्ति पर उस बांस की एक गांठ चटक गई । इस प्रकार रोजाना एक एक गांठ चटकने लगी । सात दिनों के बाद वह बांस पूरा चटक गया और धुन्धुकारी को लेने के लिए भगवान के धाम से एक विमान आया और सबके सामने भगवान के दूत धुन्धुकारी को अपने विमान पर लेकर जाने लगे । तब गोकर्ण को बहुत आश्चर्य हुआ कि कथा तो सबने सुनी लेकिन भगवतधाम केवल धुन्धुकारी को क्यों मिला ? 

तब भगवान के दूतों ने कहा "श्रद्धा और भाव यही दो कारण हैं जिनसे ऐसा हुआ है । कथा तो सबने सुनी लेकिन बाकी सबमें न तो श्रद्धा थी और न ही भाव था । जबकि धुन्धुकारी ने न केवल उस कथा को सुना अपितु उसका मनन चिंतन किया और उसी में रमण भी किया । उसी का यह परिणाम है । कथा के केवल सुनने मात्र से ही उद्धार नहीं हो जाता बल्कि उसे आत्मसात करने पर फल मिलता है । 

गोकर्ण ने अगले वर्ष फिर पूरे गांव को वहीं कथा सुनाई और फिर सबके लिए भगवान ने विमान भेजे । 

इस कथा का सार यह है 

1. नाते रिश्ते अशाश्वत और बंधनकारी हैं । इनमें मोह नहीं रखना चाहिए। आसक्ति केवल भगवान में होनी चाहिए । एक मंत्र हमें हमेशा याद रखना चाहिए " हे नाथ ! हे मेरे नाथ ! मैं आपको भूलूं नहीं। हे नाथ ! हे मेरे नाथ ! मैं केवल और केवल आपका हूं" । 

2. धुन्धुली ने जिस तरह महात्मा की वाणी पर अविश्वास किया और भयवश वह फल गाय को खिला दिया , उसी का परिणाम था कि वह एक देवतुल्य पुत्र से वंचित हो गई और एक दुष्ट पुत्र के कारण उसे आत्महत्या करनी पड़ी । पुत्र वह जो अपनी सात पीढ़ियों को तार दे न कि आत्महत्या का कारण बने । 

3. भगवान में श्रद्धा होनी चाहिए। जब तक श्रद्धा का भाव नहीं होगा , कथा सुनने, कीर्तन करने , माला फेरने , नाम जपने आदि से कुछ नहीं होगा । श्रीमद्भागवत महापुराण की बातों को जीवन में उतारने से ही कल्याण होगा, अन्य किसी से नहीं। 


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