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Kamal Chandra

Fantasy

3  

Kamal Chandra

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एक थी निम्मो

एक थी निम्मो

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     स्कूल जाते पल्लवी पलट पलट कर देख रही थी कि, आज वह क्यों नहीं दिख रही, कहाँ होंगी, रोज तो इसी खटिया पर बैठी मुझे देख मुस्कराती थी। आज क्योँ नहीं दिख रही??? जैसे अनेक प्रश्न मन में उठ रहे थे कि, अचानक से वह आ धमकी....

ऐ, थारो के नाम से ? उसने पूछा।

पल्लवी नाम है मेरा।

अच्छा, जे मैं तन्ने पल्लो कहूँ सूं ?

नहीं, माँ कहती है नाम नहीं बिगड़ते किसी का भी।

अच्छा, पर ये कैसा नाम है?

 क्योँ इसमें क्या खराबी दिखती है? और तुम्हारा नाम क्या है?

निम्मो, म्हारे तो यो निम्मो, सल्लो, कम्मो, विम्मो ही राखें ।

ठीक है होते होंगे, मुझे स्कूल को देर हो रही है, लौट के बात करते हैं।

      कह कर पल्लवी आगे बढ़ गईं, रास्ते भर सोचती गईं, कैसी है यह और इसका नाम निम्मो? यह भी कोई नाम है भला? 

    शाम स्कूल से लौटते समय निम्मो फिर आ धमकी।

निम्मो - थे म्हारे से दोस्ती करोगे ?

पल्लवी - हाँ, करूंगी अगर तुम मुझे पल्लो नहीं कहोगी।

    दोनों खिलखिला कर हँस पड़ी। अब ये रोज का नियम बन गया l स्कूल आते जाते दोनों मिलतीं बातें करती, हँसतीं - खिलखिलाती और अपनी राह पकड़ लेती।

       ये थी निम्मो और पल्लवी की दोस्ती, जो समय के साथ गहराती जा रही थी। अब पल्लवी स्कूल से लौटते समय उसके डेरे पर उसकी माँ से भी मिल लेती थी। निम्मो के पास बहुत ही प्यारा बकरी का बच्चा भी था, एकदम सफ़ेद, लम्बे लम्बे कानों वाला भोला कहते थे सभी उसे।

एकदिन पल्लवी ने पूछा, अरे निम्मो - ये तो बताओ तुम लोग ऐसे डेरे में क्योँ रहते हो, घर पर क्योँ नहीं?

निम्मो - भाई बात यो से हम तो महाराणा प्रताप के वंश के सूं, हम यूँ ही रहें से । पल्लवी ने देखा उनका घर बैलगाडी के नीचे या पास में खींचे तम्बू में ही था। सारा दिन वे लोग लोहे के कुल्हाड़ी, भाला, फरसा, कढ़ाई, तवा, चिमटा बनाते और बेचते थे। एक जगह टिक कर भी नहीं रहते थे। यही थी उनकी जीवन शैली।

       पल्लवी ने अपनी माँ को भी बताया तब उन्होंने उसे समझाया कि, इन्हें ही बंजारे, शहरिये, खाना बदोश, कहते हैं। ये सब अपनी जगह पर था। पर दोनों की दोस्ती खूब जमने लगी।

      पल्लवी हैरान रह गईं जब निम्मो ने अपने होनेवाला दूल्हे से मिलवाया। देख पल्लवी - यो म्हारो बींद से सुमेर सिंह, अगले बरस म्हारा ब्याह हो जावेगा । थे आओगे न???

पल्लवी - हाँ हाँ क्यों नहीं, कह कर पल्लवी भी जोर से हँस दी।

        पल्लवी के स्कूल में फैंसी ड्रेस कॉम्पटीशन था, उसने तय किया कि, वह निम्मो ही बनेगी। निम्मो की माँ से बात हुई, वह भी राजी हो गईं, कॉम्पटीशन वाले दिन निम्मो के लिए बनाई गईं नई ड्रेस लाल काली रंग की लहंगा चोली और चुनरी उन्होंने पल्लवी को दी पहनने को,और बहुत से गहने भी दिए, निम्मो को उसके साथ स्कूल भेजा जिसने उसके बालों की खूब सारी चोटीयाँ की फिर सारी चोटियां मिला कर ऊपर बहुत कस कर बाँध दीं। बोरला पहनाया, हाथों में सीप के खूब सारे कड़े भी पहनाये। साथ ही उसे पहले से दिया गया डॉयलॉग याद करवाती जा रही थी। तैयार होने के बाद निम्मो ने पल्लवी से कहा - चल भाई पल्लवी ईव सुना तो सही, और पल्लवी शुरू हो गईं......

पल्लवी - राम राम बाई सा, म्हारो उरे काम जंच जागो के ? जे नई जंचे तो मैं म्हारे देस जाऊँ।

निम्मो - अरे वाह भई अब ऐसी ही बोलियो तू स्टेज पर।

           और जब पल्लवी कॉम्पटीशन में पहला स्थान पाई तो सबसे अधिक ख़ुशी निम्मो को हुई।

       एक दिन जब निम्मो के साथ भोला नहीं दिखा तो पल्लवी ने पूछा कि, अरे निम्मो आज भोला कहाँ है? वह बहुत ही भोले पन से हँसते हुए

अपने पेट को पीटने लगी, पल्लवी की आँखों से आँसू निकलने लगे, सहम गईं थी निम्मो।

निम्मो - ईव थाने के होयो , हम तो इसीलिए बकरी, मुर्गे पालें ही ये बेरा कोणी, थे रोन लागे। अच्छा भाई दुःखी न हो, जे तुम कहो तो मैं न खाउं अब आगे से, और सच में उसने माँसाहर खाना छोड़ दिया। यूँ ही एक वर्ष बीत गया। पल्ल्वी का 12th बोर्ड आ गया, निम्मो की शादी हो गईं, वह अपनी ससुराल कोटा आ गईं। शादी से पहले जब पल्लवी अपनी माँ के साथ जा कर उसके लिए चांदी की सिंदूर दानी लाई हुई , देने जिसे देख वह ख़ुशी से उछल पड़ी और तुरंत अपने बक्से में रख लीँ, और पल्लवी को उसने अपनी चांदी की हरे नग जड़ी अंगूठी पहना दी। निशानी देकर दोनों प्यारी सखीयाँ गले मिल रो पड़ी। फिर मिलने का वादा कर अलग अलग राह पकड़ ली।

         पल्लवी ने 12th अच्छे नंबरों से पास कर PMT क्लियर कर शहर के विख्यात मेडिकल कॉलेज़ में दाखिला पा पढ़ाई में व्यस्त हो गईं, कुछ समय बाद शहर भी छूट गया।

    समय का पहिया तीव्र गति से चला। अब पल्लवी 15-16 साल की नवयौवना नहीं रही, एक जिम्मेदार और शहर की प्रतिष्ठित स्त्री रोग विशेषज्ञ, दो प्यारी बेटियों की माँ और उच्च सरकारी ओहदे पर असीन अधिकारी की पत्नी है।

      आज बेटी निया के स्कूल में भी फ़ैसी ड्रेस कम्पटिशन है, वह भारत माता बनी है। सफ़ेद साड़ी, चमकीला मुकुट, सागर सी फैली अथाह केशराशि, गले में मोती की माला, हाथ में देश का ध्वज तिरंगा, नेपथ्य में देश का मानचित्र अद्भुत अनुभूति थी पल्लवी की निया को इस रूप में देखने की।

        और पल्लवी को याद आ गईं निम्मो। कहाँ होंगी, कैसी होंगी?? जानने की अकूत तृष्णा जाग उठी। बहुत बेचैन हुई सोचने लगी कि, काश मेरे पास भी डिस्कवरी चैनल जैसे खोजी पत्रकार होता, जो नेशनल जिओ ग्राफ़ी पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर छपी हरी आँखों वाली गुलबानों को 20 साल बाद भी अफगानिस्तान के शरणार्थी केम्प में ढूंढ़ निकालता है। एकबार फिर निम्मो ज़ेहन में आईं और चली गईं।

      एक दिन रोज की तरह पल्लवी क्लिनिक पर मरीज देख रही थी कि, बाहर रिशेप्शन पर उठते शोर ने ध्यान खींचा। कोई महिला तेज आवाज़ में कराहती हुई बोल रही थी, रे डाक्टर मन्हें तो मार ग्यो, ये आजकाल के छोरा छोरी तो देख के कोणी चालें। घणो इसरा करी थम जा, थम जा, वो मनयों कोणी। म्हारी कोहणी तोड़ दी।

रिशेप्सनिस्ट ने कहा ठीक है बैठो नाम बताओ, मैं डॉक्टर को बुलाती हूँ, और तेज आवाज़ में क्लिनिक गूंज उठा निम्मो0000 और हिल गईं पल्लवी, दौड़ कर बाहर आई, देखा, एक बंजारन बात कर रही है। वही काले लाल कपड़े, अधेड अवस्था, अध पके बाल, पैरों में नुकिले मोज़ड़ी। पल्लवी अपने आप को संयत नहीं रख सकी। निम्मो कहकर गले लगा लिया वह भी समझ गईं। फिर यादों और दोस्ती की त्रिवेणी बह निकली। कुछ नियंत्रित होते ही पल्लवी उसे केबिन में लाई बिठाकर देखा निम्मो की कोहनी के ऊपर घाव था , तुरंत , उपचार कर मानसिक संबल के लिए मल्टीविटामिन की टेबलेट देकर पानी का ग्लास थमाया।

पल्लवी - ये कैसे लगा निम्मो?

निम्मो - ईब तन्ने मैं के बताऊँ, सड़क पार करी तो इक छोरा मार ग्यो।

पल्लवी - चलो कोई बात नहीं ज्यादा नहीं बस छोटा सा घाव ही हैं, पट्टी कर दी जल्दी आराम पड़ जायेगा।

निम्मो - चल कोई नई, मैं ठीक सूं।

पल्लवी - बस निम्मो दो - चार पेशेंट और देख लूँ, फिर घर चलते हैं।

निम्मो - ठीक से मैं बैठी हूँ, थे थारो काम निपटा लो।

       और आधे घंटे बाद.....

पल्लवी - अच्छा चलो अब घर चल के ही आराम से बात करते हैं।

         अगले आधा घंटे में ही दोनों सहेलियाँ कार में खिलखिलाती हुई चल पडी। कार आलीशान बंगले के सामने रुकी, अंदर कदम रखते निम्मो सकुचा रही थी। पल्लवी उसका हाथ पकड़ कर अंदर ले आई। ड्राइंग रूम के भव्य सोफे पर बिठा कर रसोई में चाय का बोलने गईं, इधर कॉलेज़ से से लौटी पल्लवी की बड़ी बेटी रिया निम्मो को बैठा देख विस्तृष्णा से अजीब स मुंह बना माँ, भी न जाने किस किस को घर ले आती है???

बडबडाते हुऐ निम्मो को अनदेखा कर भीतर चली गईं। निम्मो को शायद अहसास हो चुका था, वह सोच ही रही थी कि, पल्लवी बड़ी सी ट्रे में न जाने क्या क्या नाश्ता लेकर कमरे में दाखिल हुई, अब चैन से बैठ कर बात करते हैं कहती हुई निम्मो के पास आ बैठी, पर निम्मो का चैन तो जा चुका था। अनमनी सी चाय जैसे तैसे गले

उतारी। चलने को तैयार हुई।

पल्लवी - चलो, मैं तुम्हें छोड़ देती हूँ कह कर कार की चाबी उठाई।

निम्मी - अरे, नहीं नहीं मैं चली जाउं से सारा दिन तो यूँ ही घूम घूम के फेरी लगावें ।

पल्लवी - नहीं तुम बैठो मुझे भी तुम्हारा घर देखना है सभी से मिलना है।

निम्मो - अच्छा बाबा चलो।

        रास्ते में भी निम्मो बस हाँ - न में ही जबाब दे रही थी, पल्लवी भी समझ नहीं पा रही थी कि, अचानक निम्मो को क्या हो गया?

निम्मो के घर वही डेरा ही था, पहुंच कर निम्मो ने सुमेर सिंह और दो बेटों से मिलवाया। बच्चों ने खम्मा घणी कहते बहुत सम्मान से पल्लवी कर पैर छुए। सुमेर भी दौड़कर खाट बिछा कर दरी ला बिछा दिया। सभी से मिलकर पल्लवी को बहुत ख़ुशी हुई, पल्लवी ने सभी को अगले दिन घर खाने का न्यौता दिया, और कहा कि, मैं खुद तुम लोगों को लेने आउंगी क़ह कर विदा ले चल दी।

          अगले दिन पल्लवी जब लेने पहुंची तो निम्मो फिर उसके जीवन से जा चुकी थी। आस पास के लोगों ने बताया कि, सुमेर सिंह बहुत सुबह ही अपने परिवार सहित दूसरे शहर चला गया है। पल्लवी की दोस्ती मान अपमान की भेंट चढ़ गईं थी। ठगी खड़ी किंकर्तव्यविमूढ़ सी पल्लवी शून्य को निहारती खड़ी रह गईं। हाथ आई बचपन की दोस्ती रेत की तरह फिसल गईं।



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