Gopesh Dubey

Drama Horror


2.2  

Gopesh Dubey

Drama Horror


🌺एक सौ का नोट 🌺

🌺एक सौ का नोट 🌺

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 एतिहासिक कस्बा बिस्कोहर ।इसी कस्बे से लगभग सटा हुआ मेरा गांव फूलपुर राजा ।बिस्कोहर से फूलपुर जाने के लिए एक विशाल बाग से होकर गुजरना पडता है।बाग मे सप्ताह के प्रत्येक मंगलवार को साप्ताहिक बाजार ( ग्रामीण हाट) लगने के कारण उस बाग का नाम मंगलबाजार ही पड गया है ।बिगडते बिगडते अब उस बाग का वर्तमान नाम मंगरबजरिया हो गया है।इस बाग मे वर्तमान स्थिति की अपेक्षा आज के 15-20 वर्षो पहले अनगिनत, बहुत ही घने, मोटे- मोटे और ऊंचे- ऊंचे बृक्षों की श्रृखलाबद्ध कतारें हुआ करती थीं ।इन विशालकाय बृक्षों की विशालता एवं मजबूती देख कर लगता था कि वे अपनी शतकीय पारी कब की खेल चुके होगें ।बाग इतना घना था कि दिन मे सूर्य की तपती दोपहरी मे भी उसके अन्दर अंधकार छाया रहता था।रात मे उधर से आने जाने वाले लोग बहुत ही बच बचाकर निकलने का प्रयास करते ।वैसे मेरे गांव जाने के और रास्ते भी थे परन्तु उन रास्तो पर घूम के जाने के कारण उनकी दूरी बहुत बढ जाती थी ।जिन्हे बहुत जल्दी होता वही लोग मंगलबाजार से जाना पसंद करते क्योंकी बाग को पार करते ही हमारा गांव था।शाम होते ही मंगलबाजार चोरों लुटेरों और बदमाशों का शरणगाह बन जाता था ।बचपन मे मैने सुना था कि मंगलबाजार मे बहुत से हत्याकांड ,राहजनी और छिनैती जैसी घटनाएं हो चुकी थी । मैने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके खाली बैठकर नौकरी ढूँढने की अपेक्षा घर के व्यवसाय मे हाथ बटाना ही उचित समझा ।कई छोटे मोटे मेरे परिवारिक व्यवसाय थे ।जिसमे एक मिनी बस हुआ करती थी ।जिसका आल यूपी परमिट था।जो सुबह 6बजे बिस्कोहर से इटवा, इटवा से बांसी होते हुए नवसृजित जिले सिद्धार्थ नगर लगभग 10 बजे तक पहुंच जाया करती थी।और फिर एक फेरा सिद्धार्थ नगर से बांसी, बांसी से सिद्धार्थ नगर लगाकर साम 4 बजे सिद्धार्थ नगर से वापस चलकर रात 8 बजे तक वापस बिस्कोहर आ जाया करती थी । इसी मिनी बस के संचालन की जिम्मेदारी मेरे हाथो मे सौंप दी गई ।मुझे कुछ दिन के बाद मिनीबस के व्यवसाय मे मजा आने लगा था ।

   एक बार सोमवार के दिन जब मै सबेरे मिनीबस पर पहुंचा ही था कि बस के क्लीनर ने एक बुरी खबर सुनाई ।उसने बताया की आज बस का कंडक्टर नही आने वाला ।मैने देखा बस मे कोर्ट कचहरी वाली सवारियां ठसाठस भरी बस के चलने का इंतजार कर रहीं हैं ।मैने क्लीनर को कंडक्टरी करने के लिए उकसाया ।परन्तु उसने खुद के नया होने और सवारियों के अधिक होने की बात कहकर कंडक्टरी करने मे असमर्थता जताई ।मेरा चिंतित होना लाजिमी था ।मैने अपने ड्राइवर, कल्लू जो मेरे गांव का ही था,को बुलाकर अचानक आई समस्या से निपटने के लिए बिचार विमर्श कर ही रहा था की गोरा चिट्टा, छरहरे बदन का लगभग 35 या 40 वर्ष का लम्बा, साफ सुथरे कपड़े पहने एक व्यक्ति मेरी तरफ लपकता हुआ आया ।आते ही सलाम ठोका "छोटे भैया नमस्कार !" मैने जवाब मे सिर हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया ।वह बोलता रहा "मेरा नाम मेराज है, आपका कंडक्टर आया नहीं है, चिंता की कोई बात नहीं है।मेरी बांसी मुंसिफी मे एक मुकदमे मे पेसी है ।बस 10 मिनट का समय दे दीजिएगा, वकील से मिलकर वापस आ जाऊंगा ।आज दिन भर कंडक्टर का काम मै कर दूंगा ।" मैने उत्सुकतावश उसकी तरफ देखा।मेरी मनोभावो को चतुरता से ताड़ कर वह बोला "बिस्कोहर से बलरामपुर रूट पर चलने वाली बसों पर मैने कई बार कंडक्टरी की है ।मुझे आप नही जानते परन्तु बड़े भैया मुझे अच्छी तरह से जानते हैं ।हमलोगों का साथ उठना बैठना है ।" मैने प्रश्नवाचक दृष्टि से कल्लू की तरफ देखा ।कल्लू ने सिर हिलाकर सहमति जताई ।अंधा क्या चाहे, दो नयना ,जो मुझे मेराज के रूप मे मिल चुका था। मेराज तुरंत बस मे चढ़कर सवारियों को ब्यवस्थित करने लगा ।मिनी बस सवारियों से ठसाठस भरी अपने गंतव्य की ओर रवाना हो चुकी थी ।भीड़ अधिक होने के कारण बस मे शोरगुल बहुत अधिक हो रहा था स्टाफ सीट पर बैठा में मेराज के कार्य का अध्ययन कर रहा था ।वह अपना काम बहुत ही निपुणता से कर रहा था ।हंस हंस कर सवारियों से बातें करते हुए किराया वसूलना, सवारियों को प्रेम से चढाना और उतारना ऐसा लग रहा था कि वह पेशेवर कंडक्टर हो ।मुझे उसका काम पसंद आने लगा था।मेरी चिंता का समापन हो चुका था ।बस सिद्धार्थ नगर पहुंची सभी सवारियों के उतरने के बाद मिनीबस को स्टैंड पर खड़ी करने के बाद मेराज ने सारी आमदनी मेरे हाथ मे थमाते हुए बोला "कैसी रही छोटे भैया ?" मैने उसके काम का तारीफ किया ।फिर हम सभी लोगो ने होटल पर जाकर एक साथ चाय नाश्ता किया ।इस बीच वह मुझसे बात करने का कोई मौका गवाना नहीं चाहता था ।मुझे मिनीबस का टैक्स जमा करने आर टी ओ कार्यालय जाना था ।इसलिए बांसी के लिए नम्बर लगवाकर ,बस की सारी जिम्मेदारी मेराज को सौंपकर मै वहां से आर टी ओ कार्यालय के लिए रवाना हो गया ।

   साम को जब मै बस स्टैंड पर लौटा, उससे पहले ही मेरी मिनीबस बांसी से वापस आ चुकी थी।मुझे देखते ही मेराज तुरंत दौड़ कर होटल से 

मेरे लिए चाय लेकर आया ।मैने कहा "इसकी क्या आवश्यकता थी?"वह बड़े प्रेम से बोला "आप थके होगें, चाय पीजिए,"और उस फेरे की आमदनी मुझे पकडा दिया ।मैने पैसे गिनकर जेब मे रख लिए ।नियत समय पर बस वापस बिस्कोहर के लिए चल दी ।इस बीच मेराज पूरी तन्मयता से अपने कार्य मे लगा रहा ।बीच-बीच मे जब वह खाली होता तो मेरे पास आकर इधर-उधर की बातें करने लगता ।ज्यादातर उसकी बातों मे उसके बडबोले पन की बातें रहतीं थी ।चूकी पढा़ई लिखाई के चक्कर मे मुझे अक्सर बाहर ही रहना पडा था इसलिए मै यहां के लोगों को बहुत कम ही जानता पहचानता था ।मेरा परिवार एक दबंग परिवार माना जाता था इसलिए जिसे मै नहीं पहचानता वे भी मुझे पहचानते थे।मेराज से बातचीत करते करते मै उस से पूरी तरह से उससे घुल मिल गया था ।हम बिस्कोहर पहुंच कर बस को स्टैंड पर खडा करके हिसाब किताब करके सभी स्टाफ का बेतन आदि देकर बस को लाॅक करके घर की ओर रवाना होने वाले थे की मेराज बोल उठा "छोटे भैया, बहुत मेहनत किया हूं, थकान लग गयी है, थकान उतारने के लिए कुछ और पैसे दो ना।" मै उसकी बात समझ गया था ।जेब से 50 रुपये निकाल कर उसे हंस कर पकडाते हुए कहा "मेराज, तुमने आज मेरी बहुत मदद की ।"वह चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए बोला "इसमे मदद की क्या बात है, आप भी मेरे छोटे भाई जैसे हो।वैसे एक बात बताऊँ आप मुझे अच्छे लगे।अगर मेरे लायक कोई काम पडे तो बेझिझक मुझे याद करना ।यहीं बगल मे मेरा घर है ।अच्छा बडे भैया से मेरा नमस्ते कहना ..."कहते हुए वह वहां से चला गया ।

    मै वहां से बडे भैया के पास गया वे मेरा ही इंतजार कर रहे थे ।हमलोग एक साथ अपने गांव के लिए रवाना हो गए ।रास्ते मे भैया ने पूछा "आज की आमदनी कैसी रही ?" चूकी आज की आमदनी बहुत अच्छी थी सो खुश होकर मैने उन्हें सुबह से लेकर शाम तक सारी बातें उन्हें बता दीं ।मेराज का नाम सुनते ही वे चौंक गए और बिस्मय पूर्वक बोले "क्या मेराज तुम्हारे साथ था ? आज पुलिस उसे पकड़ने के लिए छापे मार रही है ।बिना जाने तुमने उसे अपने साथ क्यो रखा ? " मै भैया से कुछ बोल न सका ।उनकी बातें सुनकर मै सकपका गया था।आखिर हिम्मत करके मैने उनसे पूंछ ही लिया "आखिर उसे पुलिस क्यों ढूंढ रही है?" भैया आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए बोल पडे "अच्छा तो तुम उसके बारे मे कुछ नहीं जानते ।सुनो मै तुम्हें बताता हूँ- मेराज यहां का टाॅप मोस्ट वॉन्टेड अपराधी है ।उसके ऊपर हत्या के प्रयास सहित राहजनी, ठगी, लूटपाट और आतंक फैलाने जैसे अनगिनत मुकदमे दर्ज हैं । दूर दूर तक उसके दहशतगर्दी की चर्चा होती है ।लोग उससे डरते हैं ।वह बहुत ही क्रूर इंसान है ,दया नाम की चीज उसमें है ही नहीं ।कहते हैं उसका कोई सगा नही होता है।अभी हाल ही मे मंगलबाजार मे दिन मे ही एक किसान से उसने 50000 रूपये छीन कर फरार हो गया था ।किसी बस की बैट्री और स्टेपनी चोरी करके बेंच लिया ।कल की बात है एक नयी नवेली दुल्हन के नाक से नथनी और कान से सोने की बाली झपटकर भाग गया है ।दुल्हन के नाक और कान फट गए हैं ।वह अस्पताल मे एडमिट है ।इसी लिए पुलिस उसे ढूंढ रही है।मै आश्चर्यचकित सा भैया की तरफ देखता रह गया ।भैयामेरे चेहरे पर आते जाते भावों को देखकर समझ गये की मेरे ऊपर क्या बीत रही है ।वे मुझे सांत्वना देते हुए बोले "कोई चिंता की बात नहीं है, मै सब देख लूंगा ।परन्तु तुम आज के बाद उससे कोई संबध मत रखना ।उससे ऐसे व्यवहार करना जैसे तुम उसे जानते ही नहीं ।"मैने हामी मे सिर्फ सिर हिला दिया।

    मै घर पहुंच कर जैसे तैसे खाना खाकर बिस्तर पर लेट गया ।शरीर में थकान होने के बावजूद नीद मुझसे कोसों दूर थी ।रह रह कर मेराज का हंसता मुस्कुराता चेहरा सामने आ जा रहा था ।उस मुस्कुराहट के पीछे छिपी क्रूरता की कल्पना से हीमेरा मन खिन्न हो जा रहा था।मै सोच सोच कर हैरान हो रहा था कि आज का दिन मैने एक दुर्दांत अपराधी के साथ साथ बिताया ।मै सोच रहा था किसी के चेहरे मोहरे या उसके पहनावे को देखकर उसके व्यक्तित्व का निर्धारण नही किया जा सकता ।यही सब सोचते सोचते पता नही कब नींद ने मुझे अपने आगोश मे ले लिया ।

   माँ की आवाज से मेरी नींद टूटी ।समय ज्यादा हो गया था।जैसे तैसे फटाफट तैयार होकर मै घर से निकल रहा था कि माँ की आवाज कानो मे सुनाई दी "चाय तो पीता जा....."परन्तु मै कहां रुकने वाला ।जल्दी में मैने मंगलबाजार का रास्ता चुनकर उसे पार करके बस स्टैंड पर ना जाकर बिस्कोहर तिराहे पर आ गया।देर हो चुकी थी ।कल्लू बस लेकर तिराहे पर मेरा इंतज़ार कर रहा था ।मै लपककर स्टाफ सीट पर बैठ गया ।बस अपने गंतव्य की ओर चल दी ।मैने अपने कंडक्टर से कहा की समय मिले तो किसी होटल पर बस रुकवाना क्योंकी मुझे चाय पीना है।बस सवारियों से आज भी ठसाठस भरी थी ।शोरगुल भी हो रहा था।इटवा के आगे मझौवा चौराहे पर कंडक्टर ने बस रुकवाया ।और मेरे पास आकर बोला भैया चलो चाय पी लो ।बस के रुकते ही सभी सवारियाँ भी चाय पीने के लिए नीचे उतर गयीं ।हमलोग भी वहीं पडी एक बेंच पर बैठ गए ।होटल वाला चाय नमकीन आदि देकर चला गया।कंडक्टर ने मुझे बताया की भैया तीन स्टाफ पुलिस के हैं ।पुलिस स्टाफ अक्सर मेरी बस से यात्रा किया करते थे ।उनका किराया नहीं लेने की हिदायत भैया द्वारा दी गई थी ।पुलिस वालो का बराबर आना जाना लगा रहने के कारण अधिकतर मुझसे परिचित हो गये थे ।एक परिचित पुलिसवाला मेरे पास आया ।मैने गर्मजोशी से हाथ मिलाकर उसका अभिवादन किया ।और चाय वाले से उसके लिए भी चाय लाने को कहा ।पुलिस वाले ने अपने साथी को भी चाय पीने के लिए नीचे बुलाया और चाय वाले से दो चाय और लाने को कहा ।दूसरा पुलिस वाला नीचे उतरा तो मैने एक अकल्पनीय नजारा देखा ।उसके हाथ मे हथकड़ी की रस्सी थी ।उसके पीछे दोनो हाथों मे हथकडी लगाए लंगडाते- लंगडाते मेराज चला आ रहा था ।उसके चेहरे पर दुख और व्याकुलता के भाव थे ।चेहरा पीला पड़ गया था ।बाल बिखरे और कपडे गंदे हो गये थे ।वह दर्द से कराह रहा था ।पुलिस वाले ने डांट कर उसे नीचे बैठ जाने का आदेश सुनाया ।मैने देखा की वह भरभराकर गिरते हुए नीचे बैठ गया ।पुलिस वाला मेरी बगल मे बेंच पर ही बैठ गया ।मेराज ने मुझे देखकर हाथ उठाकर नमस्ते किया ।मैने उसके प्रति कोई प्रतिक्रया नही व्यक्त की।चाय वाला दो और चाय लाकर मेरे सामने मेज पर रख गया ।पुलिस वाले ने एक चाय उठा कर उसे पकडाते हुए हेय दृष्टि डालकर बोला "ले पी सा....."और दूसरी चाय उठा कर खुद पीने लगा ।मेराज चाय के छोटे छोटे घूंट लेने लगा ।सभी यात्री चाय पीकर अपनी अपनी सीट पर बैठने लगे थे ।मै भी चाय वाले को पैसे देने के लिए उठा ही था की मेराज कराहते हुए मुझसे बोला "छोटे भैया एक बंडल बीडी और एक माचिस दिला दो ।"ना चाहते हुए भी मै उसके आग्रह को ठुकरा न सका ।होटल के बगल मे स्थित पान की गुमटी से एक बंडल बीडी और एक माचिस लेकर उसकी गोंद मे उछाल दिया ।पहला पुलिस वाला मेरे पास आकर बोला "इस कमीने को कुछ नही देना चाहिए था भैया ।यह दया दिखाने के काबिल नहीं है ।साले ने जीना हराम कर दिया था।अब यह गया साल छः महीने के लिए अंदर ।अब क्षेत्र मे शांति रहेगी ।उत्पात मचा के रख दिया था सा .....ने "गालियों से नवाजते हुए पुलिस वाला उसे अंदर बस मे चढाने की कोशिश करने लगा ।भीड अधिक होने के कारण वह मेरे पास ही खडा हो गया ।पुलिस वाले अपनी सीट तक जाने के लिए रास्ता बना रहे थे ।मौका पाकर वह मुझसे फुसफुसाया "छोटे भैया आपके पास से जा रहा था तभी इन लोगों ने मुझे पकड लिया ।बहुत मारा है इन लोगो ने ।सारे पैसे भी छीन लिए ।पूरी रात भूखा रखकर पीटते रहे ।हो सके तो मुझे सौ रूपये उधार दे दीजिए ।माँ कसम वापस आते ही मै आपके सौ रूपये वापस कर दूंगा ।"इतना कहकर वह फफक फफक कर रोने लगा ।मैने ऐसा प्रदर्शित किया कि जैसे मैने उसकी बातों को सुना ही न हो ।तब तक पुलिस वालों ने उसे खींच कर उसकी सीट पर बैठा दिया ।मुझमें भी उसके प्रति घृणा के भाव जागृत हो गये थे ।मै उसकी तरफ देखना भी नहीं चाह रहा था ।बस मे बैठा वह मेरे लिए भार लग रहा था ।मै चाह रहा था कितनी जल्दी बांसी आये और पुलिस इसको लेकर बस से उतर जाये । आखिर इंतजार की घड़ियां समाप्त हुईं ।बांसी बस रुकी पुलिस वाले मेराज को लेकर उतरने को हुए ।मैने भी पलट कर उस ओर देखा ।वह आग्रह भरी याचक दृष्टि से मेरी तरफ देख रहा था ।मेरी नजरें उसकी नजरों से मिलते ही मै एकअनजानी अदृश्य शक्ति के वशीभूत हो अपने जेब से एक सौ रूपये का नोट निकालकर मेरे पास से होकर जा रहे मेराज के जेब मे ठूंस दिया ।मैने सुना वह कह रहा था "आपका एहसान जिंदगीभर नहीं भूलुंगा।" वे बस से उतर चुके थे ।मैने बस की खिडकी से झांक कर देखा वह मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था ।उसके मुस्कुराहट मे कुटिलता साफ झलक रही थी ।उसकी कुटिल मुस्कान मेरे हृदय को चीर गयी थी ।मै अपने अचानक लिए गए निर्णय पर शर्मसार हो रहा था ।मै पश्चाताप की अग्नि मे जल रहा था ।परन्तु अब किया क्या जा सकता था? अब पछताए होत क्या जब चिडिया चुग गयी खेत ।उस दिन भी वह मेरे विचारों मे आकर मुझे व्यथित करता रहा ।कुछ दिनो बाद मै इस घटना को एकदम भूल चुका था।

लोक सभा चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी थी ।प्रथम दो चरणो का चुनाव सम्पन्न करा कर अर्धसैनिक बल ,पैरा मिलिट्री फोर्स और बी एस एफ के जवानो का तीसरे चरण का शांतिपूर्ण मतदान कराने हेतु मेरे जिले मे पदार्पण हो चुका था।छोटी गाडियों का अधिग्रहण शुरू हो चुका था ।मेरी मिनीबस का अधिग्रहण भी अर्धसैनिक बलों द्वारा आज शाम को कर लिया गया ।अर्धसैनिक बल के कमाँडर ने मुझे बताया की आप की गाडी चुनाव तक के लिए अधिग्रहित की जा रही है आप अपनी गाडी के साथ केवल एक ड्राइवर को रख सकते हैं ।आज आप जाइए कल आकर लाॅग बुक वगैरह की फार्मेल्टीज पूरा कर लीजिएगा ।मैने कल्लू को खर्च के लिए पैसे वगैरह देकर उसे अच्छी तरह से समझा कर कंडक्टर और क्लीनर को साथ लेकर घर वापसी के लिए सड़क पर आकर साधन का इंतजार करने लगा ।लगभग सारी छोटी गाडियों का अधिग्रहण होने से यातायात के साधनों मे भारी कमी हो गई थी ।इक्का दुक्का गाडियां ही रोड पर दिखाई पड रहीं थी ।यात्री भी परेशान दिखाई दे रहे थे ।बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के बाद एक रोडवेज की बस मिली ।भीड बहुत अधिक थी ।जैसे तैसे हम लोग बस मे सवार हो गए ।साम के पांच बज रहे थे ।लगभग एक घंटे बाद हम बांसी पहुंचे ।वहां स्टैंड पर बहुत सी सवारियां बस का इंतजार करते हुए दिखे ।बस स्टैंड पर कोई बस नहीं थी ।दो घंटे केबाद एक बस आयी जो पहले ही ठसाठस भरी थी तिल फेंकने की जगह उसमे न थी ।बस का कंडक्टर मेरे पास आकर आग्रह के स्वर मे बोला "भैया चलना हो तो बस के ऊपर छत पर चढ जाइए ।अब कोई बस पीछे नहीं है ।आगे चलकर सवारियां के उतरने से जगह खाली होगी तो मै आपको बुलाकर नीचे बिठा लूंगा ।"मुझे उसका सुझाव अच्छा लगा, समय भी काफी हो रहा था ।मै बस की छत पर चढ गया ।हम तीनों के छत पर चढने से और कई लोग भी बस की छत पर चढ गये ।लगभग 10 बजे हम लोग इटवा पहुंचे ।इटवा स्टैंड पर भी कोई गाडी नहीं थी ।हम लोगों को भूख लगी थी इसलिए पहले हम तीनो ने पेटपूजा करना उचित समझा ।एक होटल मे हम लोगो ने भोजन किया ।इतने मे मेरा परिचित जीप वाला , जो बिस्कोहर ही जा रहा था , मुझे देखकर रुक गया ।उसने मुझसे पूछा "भैया बिस्कोहर चलना है क्या?"मैने कहा बहुत ही अच्छे समय पर आप मिले हो ।हां चलना है ।"हम लोग जीप मे सवार हो गये ।बातें करते हुए हम आगे बढ रहे थे, समय अधिक हो जाने से सड़क एकदम सूनसान सा पड़ा था ।एक दो गाडियां ही रास्ते मे मिली ।कंडक्टर का घर रास्ते मे था ।उसका घर आने पर वह जीप से उतर गया ।जीप जब बिस्कोहर तिराहे पर पहुंची तो मैने जीप वाले से जीप रुकवा लिया।जीप रुकते ही मेरे क्लीनर ने कहा "भैया काफी रात हो गयी है ।आप इस मंगलबाजार वाले रास्ते से ना जाकर मेन मार्केट वाले रास्ते से घूम कर घर जाएं ।थोडा दूर पडेगा मगर सुरक्षित तो रहेगा ।" मैने उससे कहा "डरने की कोई बात नहीं, तुम लोग जाओ मै आराम से चला जाऊंगा" मेरे क्लीनर ने मेरे साथ चलने को कहा ।परन्तु मैने उसे मना कर दिया ।जीप वाले ने आग्रह किया "भैया इतनी रात को घर मत जाइए, मेरे घर रुक जाइए, सबेरे उठ कर चले जाइएगा "मै नहीं माना, उन्हें समझाया की कोई डरने की बात नहीं है।रोज तो आता जाता रहता हूँ ।मैने जीप वाले से क्लीनर को उसके घर उतारने की हिदायत देकर पूछा "समय क्या हुआ है?"मेरे क्लीनर ने जवाब दिया "पौने एक हुए हैं भैया "और वे मुझे छोड़कर चले गये ।

     जीप की गड़गड़ाहट की आवाज जब तक सुनाई दी मै वहां खडा रहा ।उसके बाद मै आगे बढ गया ।चांदनी अपने शबाब पर थिरकी हुई थी ।परन्तु जीप के जाने के बाद वातावरण जैसे एकाएक शांत हो गया था । अब मुझे अपने अकेलेपन का एहसास हुआ । कहीं दूर कुत्तों के भौकने की आवाजें आ रही थी ।मै उन्हीं आवाजों के सहारे आगे बढ गया ।मेरे पाँव अपने आप तेजी से आगे बढने लगे जल्द ही मै मंगलबाजार के बाग मे घुसने वाली पगडण्डी के मोड पर पहुंच गया ।मै बाग के अंदर घुसने को उद्धत हुआ ही था की अचानक सियारों के हुक्का हुआं हुआं की तेज आवाज ने मुझे डरा दिया ।मैने अपने पैर वापस खींच लिए ।मुझे अपनी गलती का एहसास होने लगा था ।मै सोच रहा था कि जीप वाले और अपने क्लीनर की बात न मानकर मैने बहुत बडी गलती कर दी है।परन्तु अब मै वापस भी तो नहीं जा सकता था।मरता क्या न करता ।वहीं पर उगे एक बेहये का मोटा डंडा तोड़कर हाथ मे लेकर अगल-बगल घुमाता मै बाग मे घुस गया ।बाग में घुप्प अंधकार था ।कहीं कहीं जहां पेड़ो मे पत्तियां कम थीं वहीं चांदनी पत्तियों से छन कर जमीन पर छिटककर अंधकार को को भगाने का असंभव प्रयास कर रहीं थीं ।वैसे मै अनगिनत बार इस रास्ते से आता जाता रहा हूँ ।यहां दिन मे ही झींगुरों की आवाजें सुनाई देती थीं पर मैने कभी इनपर ध्यान नहीं दिया ।परन्तु आज जैसे झींगुरों की आवाजे बहुत तीव्र हो गयी थी ।यही झनझनाहट की जोरदार आवाजें बाग को भयानक और भयावह बना रही थीं ।उल्लूओं की काच कूच काच कूच की आवाजें मेरे बचे खुचे साहस को खत्म करने पर उतारू थे ।मै लगभग दौडने की तेजी से चलकर बाग को पार कर ही रहा था तभी मुझे अपने आगे कुछ सरसराहट की और सूखे पत्तियों के चरमराहट की आवाज सुनाई दी ।मेरी गति मे अप्रत्याशित इजाफा हो गया था ।मै आधा से ज्यादा बाग को पार कर चुका था ।शेष भाग को जल्द से जल्द पार कर लेना चाह रहा था तभी एक कडकदार और भारी-भरकम आवाज मेरे कानो मे पडी "ठहर जाओ वहीं पर!"उसकी बिपरीत दिशा से भी उससे अधिक तेज आवाज आई "आगे मत बढना "मै निस्तेज सा वहीं ठिठक गया ।जिस अनहोनी आशंका से मै ग्रसित था वह घटना मेरे सामने घटित हो रही थी ।मै बहुत डर गया था ।तभी मेरे पीछे से आवाज आई "कौन हो ? " मै पीछे घूमना चाह रहा था ।पर जैसे मुझे सांप सूंघ गया हो, मेरे शरीर मे शक्ति नहीं रह गयी थी ।

मेरा जबान सूख गया था ।मै उसे अपना परिचय देना चाह रहा था पर मेरे मुख से शब्द नही निकल पाए ।इतना आभास हो गया था वे तीन थे।पत्तो से छनकर आने वाली चांदनी मे धुंधली छबि दो लोगो की दिख रही थी वे मेरे अगल-बगल खड़े थे एक मेरे पीछे था ।मेरे दाहिने खडे आदमी ने मुझे पकड कर झकझोरा और झुझलाते हुए कडका "कौन है तू? क्यो नहीं बोलता ? " मैने अपने आपको संभालते हुए बोलने के लिए मुंह खोला ही था की एक आकृति सामने से आकर मेरे पास ठिठक गयी ।मुझे लगा की वह मुझे पहचानने का प्रयास कर रहा है।फिर वह बडे प्रेम से बोला "कौन? छोटे भैया आप" मेरे मुँह से बोल फूटे "मेराज.....!" इतने मे मेराज कडकदार आवाज मे गुर्राया "आदमी नहीं पहचानते तुम लोग ।भाग जाओ यहां से ।इन्हे कुछ हुआ तो अनर्थ हो जाएगा । चलो भागो यहां से दुबारा दिखाई मत पडना।"उसकी धमकी का प्रभाव तुरंत हुआ ।वे एक तरफ को चले गए सूखे पत्तों की चरमराहट उनके वहां से चले जाने का संकेत दे रही थी।मेराज बोला "चलो मै आपको घर तक छोड देता हूँ " मै उसके पीछे पीछे चल पडा ।वह फिर बोला "जमाना बहुत खराब है,ज्यादा रात होने पर कहीं रुक जाया कीजिए ।" मैने लम्बी हामी भरी ।बाग के बाहर आकर मै बोला "अब मै चला जाऊँगा, मेराज!तुम जा सकते हो "वह बोला "अच्छा, आप जाइए और हां बडे भैया से मेरा नमस्ते कहना ।" इतना कहकर वह पुनः उसी बाग मे खो गया । मेरे बदन मे थरथराहट अभी भी बरकरार था।धीरे धीरे अपने को सामान्य करते हुए मै घर पहुँचा ।दरवाजा पिताजी ने खोला और लगे डांटने "इतनी रात को चलते हो ।तुम्हें डर नहीं लगता ।किसी दिन ठोकर खाओगे तब मेरी बातो की कीमत मालुम होगी ।" मै भाग कर अपने कमरे मे जाकर बिस्तर मे घुस गया ।आज फिर मेराज का चेहरा मेरी आंखो मे घूम रहा था ।उसके एहसान के कारण मेरे हृदय मे उसके प्रति सम्मान जाग गया था ।उसे जो 100 रूपये देना मुझे उस समय कचोट रहा था आज वह निर्णय मुझे गौरवान्वित कर रहा था ।कोई लाख उसे अपराधी या दयाहीन कहे परन्तु इस समय मेरे लिए किसी देवता से कम नहीं था।इन्ही बिचारों के बीच कब नींद आई पता ही नहीं चला ।

    सुबह आंख खुली तो सबसे पहले ईश्वर को धन्यवाद दिया। पूरा बदन दर्द कर रहा था।उठने का मन नहीं कर रहा था ।परन्तु मिनीबस का लाॅग बुक बनवाना था और कल्लू के कपडे भी लेजाने थे ।अनमने मन से उठ कर मै तैयार होकर भैया को अधिग्रहण की सारी बात बताई ।परन्तु कल रात की घटना का चर्चा तक किसी से नहीं किया ।कल्लू के घर से उसके कपड़े लेकर मै बस स्टैंड पर पहुंचा ।वहां कोई बस नही थी ।स्टैंड पर ही कई लोग मिल गये ।सभी के साथ स्टैंड के एक होटल पर चाय पीने के लिए बेंच पर बैठ गया ।इधर-उधर की बातें हो रहीं थीं ।हम चाय पीते पीते बस का इंतजार करने लगे ।इतने मे एक 16-17 वर्ष का एक सुंदर नवयुवक मेरे पास आकर बोला "छोटे भैया आप ही हो?" मैने उत्सुकतावश कहा "हां मै ही हूँ ।बोलो क्या काम है?"नवयुवक ने अपने जेब से एक 100 रूपये का नोट निकालकर मुझे पकडाते हुए बोला "चाचा जी मै मेराज का पुत्र हूं ।अब्बा जब से जेल से छूट कर आए थे तब से कई बार मुझसे कहे की आपके सौ रूपए ,जो शायद उन्होने आप से उधार लिए थे, आपको दे दूँ" मैने मुस्कुराते हुए उससे कहा "तुम्हारे अब्बा ने कल रात मे वे रूपये मुझे वापस कर दिए हैं ।"यह कहकर मै उस नोट को वापस उसे पकडाने लगा ।वह बोला "रूपये ले लीजिए चाचा जी, अब्बा कह रहे थे की भैया रूपये वापस नहीं लेंगे ।परन्तु मैने वापस करने की कसम खाई है ।यह रूपये उन्हें जरूर वापस कर देना ।यह समझिए की उनकी यह अंतिम इच्छा थी।" मै चौंक कर उसकी तरफ एक टक देखते हुए बोला "क्या बकवास कर रहे हो ? "बह बोलता गया "शायद आपको नही पता ।अब्बा का इंतकाल हुए लगभग 15 दिन हो गये हैं ।पुलिस वालों ने उन्हें बहुत मारा पीटा था ।जेल मे इलाज न हो पाने के कारण उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई थी ।जेल से घर आने के बाद इलाज चल रहा था । स्वास्थ्य मे कुछ सुधार हो भी रहा था ।15 दिन पहले वह साम को घर से निकले थे ।रात मे घर नहीं आए ।सुबह उनकी लाश मंगलबाजार मे......"मै हतप्रभ सा शून्य को निहार रहा था । उसके आगे के शब्द मेरे कानो तक नहीं पहुंच रहे थे ।तेज हवा चल पडी थी । मेरे हाथ मे पकडा सौ का नोट बडी तेजी से फड़फड़ा रहा था।

   


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