Raj Verma

Drama


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Raj Verma

Drama


धर्म

धर्म

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रोम-रोम दर्द में डूबा जा रहा था। जरा सी नींद लगती तो अंड-बंड सपना आने लगता है। नींद का खुलना मतलब पीड़ा से अंग अंग का सिहर उठना। कहाँ-कहाँ लगी है और कितनी लगी है, ये तब मालूम हो जब गर्दन हिले डुले। जरा भी हाथ पैर हिलाने से वह कराह उठता मुँह से सिर्फ आह निकलता। जब भी आँख खोलने का प्रयास करता, हर बार सामने बैठी स्त्री मुस्कराती दिखाई देती। वह हर वक्त मुस्कराती रहती है या मेरी आँख खुलते ही मुस्कराती है, यह समझने की कोशिश में बार-बार आँख बंद हो जाती। शायद दर्द निवारक या नींद की दवा का असर था।

नींद गहराती जा रही थी। वह देख रहा था बप्पा का गुस्से से भरा दुखी चेहरा। वे नाराज़ थे, दुखी थे या गुस्से में थे वह समझ नहीं पा रहा था। घर गृहस्थी की गाड़ी में जुते हुए बप्पा का मुस्कराता चेहरा ही हमेशा उसने देखा था। संतोष से भरे बप्पा को अपने जीवन से कोई शिकायत कभी थी ही नहीं। तबही त ऊं बेर-बेर कहत रहे – “ सब दूर के ढोल आहीं बेटा। अपनी मिटटी से कटी के कोऊ सुखी नाही रहा। तूं कही मत जा। गाँव-जवार के लोग जौन पुस्त-दरपुस्त सुख-दुःख में भागी रहे हैं उन्हीं छोड़ के कोऊ जात है का ? इहाँ सब अपने लोग हैं। अपनी धरती छोड़ के तू कहूँ मत जा लाला।” बप्पा घर परिवार के प्रति आपन धर्म निभावत रहे। लेकिन हमई हते कि बप्पा के दिल से निकरी आवाज नहीं सुनि सके।

उनखी आवाज़ हम सुनत कईसे। रामखेलावन की मेहरिया साँझ-सकारे हरे-हरे नोट कमाने का सपना दिखाकर हमरी अक्ल पे पर्दा डाल दिहे रही। वो हमेशा अपने पति के बारे में कहती- “ देखत नाही मुरलिया के बाप को। छह-आठ महिना में जब भी गाँव आवत है करिया चश्मा लगाये, स्त्री-पुरुष सब वहिका देखत रही जात हैं। तब गाँव मा हमारी इज्जत भी बढ़ जात। तहूँ काहे नहीं जाते दिल्ली कमाने।” वो यह भी कहती रहती थी कि जब हम परदेश में खूब रुपैया कमाने लगेंगे, तभी वो अपनी सुंदर बहिन का रिश्ता हमसे करेगी। उसकी अच्छी-अच्छी बातन में आइके हम बप्पा की बात नहीं माने।

उसकी सब बात हमको ठीक लगती। हम का करें। बचपन से देखत आये हैं अम्मा को थेगडी लगी लुगरिया में परिवार की जिम्मेदारी उठावत। अउर बप्पा के बेवाई से फटे गोड़ उनखे सुख समृद्धि की सगरी कहानी हमेशा बांचत फिरत हैं। सोवत-जागत हमार बस एक ही सपना था – कुछ भी करके पैसा कमाना और उनकी मदद करना। इकलौता बेटवा होवें के कारण यही हमार धर्म होवत है। जो भी कर सकता करके देख लिया। जब मन में पूर्ण विश्वास हो गया कि गाँव में रहिके हमार सपना पूरा नाहीं हो सकत। तब हम भी उठाकर चल दिए अपनी आठवीं पास की अंकसूची ( आठ पास तक पढ़े-लिखे हैं , अपने आप पर विश्वास था ) और एक जोड़ी कपडा, जिसे हम कल ही धोये थे। बप्पा की चिरौरी का हम पर कोई असर नाही पड़ा। हमरे कान में लालच की ठेपी (ढक्कन) पड़ी रही अउर आँखिन पे नोटन के परदा। हम कोउ की नाहीं सुनें। अम्मा की आँखिन से निकरा आंसू हम आज तक नाहीं बिसरे। लागि रहा मानो कल की ही बात है।

चार महिना से शहर में भटक रहा हूँ। यहाँ पेट की भूख के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ा। कभी बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन में सामान ढोया। कभी होटल में जूठे बर्तन मांजा। लेकिन ये सब करने से केवल पेट बड़ी मुश्किल से भरता था। अम्मा – बप्पा की मदद के लिए पैसा कहाँ से पाता। अब हर समय मन में विचार आता कि क्यों न गाँव लौट जाऊं। परन्तु बप्पा के चेहरे पर दिन प्रतिदिन बढ़ रही झुर्रियां और कोल्हू के बैल कि नाई दिन भर के काम के बाद अम्मा की थकी देह याद आते ही दिल कहता कि कुछ दिन रुककर भाग्य थोड़ा और आजमा लीन जाए।

पूरा शरीर टीस रहा था। देह का पोर-पोर दर्द की नदी में डुबकी लगाता प्रतीत होता। शोर सुनकर आँख खुली। नेता टाइप के कुछ सफ़ेद कुर्ताधारी लोगों के साथ हाथ में माइक लिए पत्रकारों और अन्य लोगों का हुजूम था। वह नीम बेहोशी में चीख पड़ा – “मत मारो, छोड़ दो मुझे। मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूँ।” सामने बैठी महिला पास आई और उसका हाथ पकड़कर बोली –“घबराओ मत, तुमको कोई कुछ नहीं कर रहा। शुक्र है ऊपर वाले का,तुम्हें होश आ गया।” उसने आँखें बंद कर लिया। उस दिन का सारा दृश्य बुरे स्वप्न कि भांति मानस पटल पर घूमने लगा था। दिन भर की थकान के पश्चात् वह अन्य दिनों की भांति ही स्टेशन के पास वाले पुल के नीचे आकर सोया था। नींद अभी ठीक से आई भी न थी कि शोर उमड़ा ‘मारो-मारो, स्साले को। देखो ये बढ़ी हुई दाढ़ी।’ लोगों ने पीटना शुरू कर दिया। वह भागने लगा। भागता जा रहा था। कहाँ, किधर, कितनी दूर, कुछ याद नहीं। तभी देखा सामने से हाथों में लाठी,फरसा, लोहे की रॉड लिए सैकड़ो लोग उसकी ओर चले आ रहे हैं। फिर आवाज गूंजी – ‘ मारो-मारो। देखो कलाई पर बंधा हुआ कलावा।’ भागते भागते उसके शरीर की शक्ति क्षीण हो चुकी थी। आँखों के आगे अँधेरा छा गया। वह गिर पड़ा था।

बहुत प्रयास के पश्चात् उसने फिर आँख खोला। सामने वही महिला मुस्करा रही थी। स्फुट स्वर में उसके मुंह से फूटा – “ मैं कहाँ हूँ ? आप ?” शायद वह चेहरे को पहचानने की कोशिश कर रहा था। लेकिन नजरें स्पष्ट तौर पर पहचानने से इंकार कर रही थीं। “ तुम अस्पताल में हो। तीन दिन पहले तुम पर जानलेवा हमला हुआ था। मैं ही तुमको यहाँ लेकर आई हूँ।” उसके मन में उमड़ रहे प्रश्नों को पढ़ते हुए उस महिला ने आगे बताया – “ मैं कोई नहीं हूँ। देश और दुनियां में जहाँ लोग अपनी शिक्षा, संपत्ति और अन्य विशेषताओं के कारण जाने जाते हैं। ऐसे में सचमुच मैं कोई नहीं हूँ क्योंकि मेरे पास अपने परिचय में बताने के लिए इस तरह का कुछ भी नहीं है।” भर आई नज़रों को भरसक छुपाने की कोशिश करते हुए उसने बताया – “दिन भर भीख मांगने के बाद वहीं बरगद के पेड़ के नीचे आकर सो जाती हूँ, जहाँ तुम गिरे थे। पेट की आग को मिटाने के बाद दिन के दौरान सभ्य समाज के मुखौटाधारी लोग अँधेरा होते ही तन की प्यास बुझाने के लिए रात भर वहीं मुझे नोचते खशोटते हैं।” कहते-कहते महिला का चेहरा तमतमाने लगा था।

“ क्या उन लोगों ने आपको नहीं मारा ? उसने पूछा।

“ मुफ्त में उपलब्ध पराई नारी के आगोश में आने और शराबखाने के अंदर घुसने से पूर्व ही धर्म के ठेकेदार अपना दिखावटी चोला उतारकर फेंक देते हैं। वहां उनका कोई धर्म नहीं होता। मंदिर पर लहराते ध्वज, मस्जिद की दीवारों पर बने चाँद- सितारे को देखकर,कभी धर्म-चक्र या अहिंसा-हस्त तो कभी क्रास को देखकर उनका धर्म जागता है। कभी-कभी तो खंडा और ओंकारा भी उनको धार्मिक बनने में सहायता करते हैं। पौधों का खुशनुमा रंग हरा और किन्शुकी का मनमोहक रंग देखकर भगवा का खयाल आता है।” महिला हांफने सी लगी थी। “ उनका धर्म जाग उठता है, भीड़-धर्म। एक ऐसा धर्म जिसका कोई धर्म नहीं होता।”

“ आप किस धर्म से हैं ? आपका धर्म क्या है ? आप कैसे बच गईं ?” उसने जानना चाहा था।

“ उस दिन मुझे जाने क्या सूझा कि मैं बड़ी मुश्किल से तुमको यहाँ ले आई। तब शायद यही मेरा धर्म था। क्योंकि सिर्फ यही रास्ता मुझे दिखाई दे रहा था। और कुछ भी नहीं। बाकी...।” वह घृणा से मुस्कराकर बोली – “ हमारा क्या,भूखे को जिसने जो दिया खा लिये। भूख और भूखे का धर्म न होता है न दिखता है।” उसके चेहरे पर रुलाई फूटी पड़ रही थी।

“ हमला धर्म वाले लोगों पर होता है बाबू। और हमारे जैसों का कोई धर्म नहीं होता न।” महिला का कंठ अवरुद्ध हो गया।

एक या अनेक धर्मों के हजारो लोग जब भीड़ के रूप में एकत्र होते हैं तब उनका एक ही धर्म होता है, भीड़ - धर्म। स्त्री, पुरुष, कसूरवार या बेकसूर, मरनेवाला कौन है,किस जाति,धर्म, सम्प्रदाय का है इस बात से उनको कोई सरोकार नहीं होता। सिर्फ लूटना, मारना यही काम होता है।


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