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बुढ़ापा

बुढ़ापा

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ओह! कितनी गर्मी है सुनीता अपने घर में प्रवेश करती है, बैंक का काम निपटना था, सो जाना पड़ा वरना  इतनी गर्मी में! "नेवर" कहती हुई सोफे पर कुछ समय के लिए आँखे बंद कर पड़ी रही। क्षणिक विश्राम कर वह जैसे ही पानी की बॉटल ले पानी पिने ही वाली थी, उसकी नजर डायनिंग टेबल पर रखे पतीले पर पड़ी जिसमे छाछ रखी थी, बस पारा गरम हो गया।

पति को कह गई थी कि मैं बैंक जा रही हूँ, आप नाश्ता कर छाछ फ्रिज में रख देना, किन्तु पतीला जस का तस वहीं रखा था पति पर गुस्से की फुहार, "आपको मैं कहकर गई थी की छाछ फ्रिज में रख देना गर्मी का दिन है खट्टी हो जाएगी" उसकी झुंझलाहट चालू थी एक काम नहीं होता।

उसके पति रमेश ७० पार करने वाले हैं, बुढ़ापे की बहार उसपर पत्नी के गुस्से की फुहार कुछ उग्र होते हुए शयन-कक्ष से बाहर आकर हर वक्त किट-किटअगर छाछ बाहर पड़ी रह गई तो कौन सा गुनाह हो गया जब देखो तब मेरी कमजोरियां गिनाने में ही लगी रहती हो, सुनीता चुप हो जाती है, चूँकि इसी में भलाई है, वर्ना बात बढ़ जायेगी।

शाम को बेटी जो शादी-शुदा है, पास में ही रहती है प्रतिदिन ऑफिस से आकर उनकी तबियत की खोज खबर ले लेती है, और वहीं  से अपने घर चली जाती है। उसके आते ही सुनीता ने सुबह के कहासुनी की चर्चा, की तेरे पापा सुनते ही नहीं, मैं कहाँ-कहाँ पहुंचु। बेटी ने प्यार से कहा मम्मी खट्टी छाछ की कढ़ी बना लेना सुनीता हस पड़ी , और कहने लगी वो तो अब मैं कर ही लूंगी।

दूसरे दिन खाने की टेबल पर सुनीता ने जब खाना परोसा रमेश ने कहा, वाह ! कढ़ी बनी है मजा आ गया, चटकारे ले लेकर उन्होंने खाया।

शाम जब बेटी आई तो उन्होंने कहा,तेरी माँ ने बहुत अच्छी कढ़ी बनाई है, तू भी थोड़ा खा ले। उनका वह निर्दोष और निर्मल मन देख सुनीता सब भूल गई।

रात  सोते वक्त सुनीता के पैर में दर्द होने लगा, वह दर्द से कराह रही थी। रमेश जो दूसरी तरफ मुँह फेरे सो रहे थे, धीरे से पूछा बाम लगा दूं? दर्द ज्यादा हो रहा है, सेंक करने के लिए गरम पानी कर दूं क्या? यह कहते हुए उन्होंने पलटकर सुनीता की ओर देखा, और तुरंत उठकर पैन-किलर दी और गर्म पानी करने को किचन की ओर लपके, यह कहते हुए सारा दिन भाग-दौड़ करती हो, काम तो होता रहेगा, आराम कर लिया करो। हाथ में गर्म पानी की थैली देते हुए कहा, मुझसे अब बाहर का काम होता नहीं है। सारा काम तुम्हे ही करना पड़ता है, घर बाहर दोनों तरफ तुम्हे ही देखना पड़ता है। मुझे, बहुत दुःख होता है क्या करूं? देर रात तक वे सुनीता की बगल में ही बैठे रहे और उसका दर्द कम करने की चेष्टा करते रहे। उसके दर्द से रमेश को असहनीय पीड़ा हो रही थी आखिर "जीवन संगिनी जो है " 

सुनीता यह सब देख सोचने लगी, मैं भी क्या हूँ बेचारे एक समय था, जब उनके मुँह से निकला नहीं की मैं वो बनाकर खिलाती थी और आज, कितने दिन बाद कढ़ी बनाई और वह भी कैसे वह हस पड़ी।

न जाने और भी खट्टी-मिट्ठी प्यार भरी तकरार को याद  करते हुए वह निद्रा देवी के आगोश में कब समां गई पता ही न चला। प्रातः जब वह उठी, गरमा-गरम चाय लिये रमेश खड़े थे। उन्होंने कहा मुँह धो लो, दोनों चाय पीते हैं। 

निःस्वार्थ भाव के साथ दोनों ने सारी गलतियों को गले लगाते हुए, हसते हुए कहते हैं कि, ये हमारा कसूर नहीं है, अपने बुढ़ापे का है जो हमें निकम्मा बनाने पर तुला है। दिन पर दिन हम पर हावी होता जा रहा है, बुढ़ापे को हमने बहुत ही प्रेम से अपनाया, किन्तु यह बुढ़ापा अपनी हरकत से बाज ही नहीं आता। आये दिन कोई न कोई नए फ़साने खड़े कर देता है। गर हम अपनी जवानी को याद करने की चेष्टा करते हैं, मसलन कृत्रिम तरीके से बाल काला कर लेते हैं तो वह कुछ दिनों मे मुँह उठाये वापस आ जाता है। हमने उसे अपनाया किंतु वह कदापि हमारी जवानी को अपना न सका।

बुढ़ापा हमसे सब छीन रहा है, हमारा शरीर निष्क्रिय हो रहा है, हमारी सारी इच्छायें, भावनायें, संवेदनाये सभी धूमिल कर रहा है। किन्तु फिर भी उसे मान सम्मान, इज्जत सब चाहिये।

रमेश सुनीता को कहते हैं, देखो तो बुढ़ापा अपना ताज हमारे सिर पर रख कैसा इतरा रहा है, मेरा बस चले तो इस बुढ़ापे की तो ऐसी तैसी।

सुनीता ने रमेश से कहा, क्या बात लेकर बैठ गये अब तो यह बुढ़ापा जोंक बनकर हमारे शरीर से चिपक गया है।अब तो यह जब तक शरीर रूपी चक्की में टांके हैं ,"हमारी छाती में मूंग दलते रहेगा।"

यह सुनकर रमेश खिल-खिलाकर हंसने लगे और सुनीता भी हस पड़ी, आखिर उन्होंने बुढ़ापे को अपने पर हावी जो न होने दिया वरना यह,"बुढ़ापा तो द्वन्द ही करा देता।"


                                                                                                


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