बुरातिनो - 9
बुरातिनो - 9
9
डाकू बुरातिनो पर हमला करते हैं
अनुवाद: चारुमति रामदास
आसमान के किनारे पर हरे रंग का प्रकाश दिखाई दिया, - चांद निकल रहा था.
सामने नज़र आ रहा था काला जंगल.
बुरातिनो और जल्दी चलने लगा. उसके पीछे पीछे भी कोई और तेज़ी से चलने लगा.
वह भागने लगा. उसके पीछे पीछे बेआवाज़ छलांगें लगाते हुए कोई और तेज़ी से उछलने लगा.
वह मुडा.
दो लोग उसका पीछा कर रहे थे – उन्होंने सिरों पर बोरे पहने थे, जिनमें आंखों के लिए छेद बने हुए थे.
उनमें से एक, जो कद में छोटा था, चाकू घुमा रहा था, दूसरा, जो ऊंचा था, हाथ में पिस्तौल पकड़े था, जिसकी नली चौड़ी होती गई थी, चोंगे की तरह...
“आय-आय!” बुरातिनो चीखा और, हिरन की तरह, काले जंगल की तरफ़ लपका.
“रुक, रुक!” डाकू चिल्ला रहे थे. हालांकि बुरातिनो बेहद डर गया था, मगर फिर भी उसने अंदाज़ लगा लिया, - मुंह में सोने के चारों सिक्के ठूंस लिए और रास्ते से मुड़कर जामुन के पेड़ों की बागड़ की तरफ़ लपका...मगर तभी दो डाकुओं ने उसे पकड़ लिया...
“बटुआ या ज़िंदगी!”
बुरातिन जैसे समझ नहीं रहा था, कि उससे क्या चाहते हैं, सिर्फ नाक से जल्दी जल्दी सांस लेने लगा. डाकू उसे गर्दन पकड़कर झकझोर रहे थे, उनमें से एक पिस्तौल से धमका रहा था, दूसरा जेबें तलाश रहा था.
“तुम्हारे पैसे कहां हैं?” लंबा वाला गरजा.
“पैसे, कमीने!” छोटा वाला फुफ़कारा.
“छोटे छोटे टुकड़े कर दूंगा!”
“सिर काट दूंगा!”
डर के मारे बुरातिनो इतना कांपने लगा, कि सोने के सिक्के उसके मुंह में झनझनाने लगे.
“तो, यहाँ हैं पैसे!” डाकू चीखे. “उसके मुंह में हैं पैसे...”
एक ने बुरातिनो को सिर से पकड़ा, दूसरे ने - पैरों से. उसे उछालने लगे. मगर उसने और भी कसकर दांत भींच लिए.
उसे पैरों से उल्टा करके, डाकू उसका सिर ज़मीन पर पटकने लगे. मगर उस पर इसका भी कुछ असर न हुआ.
वह डाकू, जो कद में छोटा था, जूते की चौड़ी नोक से उसके दांत खोलने की कोशिश करता रहा, लगभग खोल ही दिए थे, ...बुरातिनो ने चालाकी दिखाई – पूरी ताकत से उसके हाथ को काट लिया...मगर यह हाथ नहीं, बल्कि बिल्ली का पंजा था. डाकू जंगलीपन से चिल्लाया. बुरातिनो पलट गया, छिपकली की तरह, बागड़ की ओर भागा, कांटेदार झाड़ी पर कूदा, कांटों पर पतलून और जैकेट के टुकड़े छोड़कर, दूसरी तरफ रेंग गया और जंगल की तरफ़ भागा.
जंगल के किनारे पर डाकुओं ने फ़िर से उसे पकड़ लिया. वह उछला, हिलती हुई एक डाल को पकड़कर पेड़ पर रेंग गया. डाकू – उसके पीछे. मगर सिर पर पहनी हुई थैलियाँ उनके काम में बाधा डाल रही थीं.
ऊपर तक चढ़ने के बाद, बुरातिनो झूलकर बगल वाले पेड़ पर कूद गया.
डाकू – उसके पीछे पीछे.
मगर दोनों के हाथ वहीं छूट गए, और वे धड़ाम से धरती पर गिर पड़े.
जब तक वे कराहते और खुजाते रहे, बुरातिनो पेड़ से फिसला और भागने लगा, पैरों को इतनी तेज़ी से आगे बढ़ाते हुए कि वे आंखों से ओझल हो गए.
चांद के प्रकाश में पेड़ों की लंबी लंबी छायाएँ पड़ रही थीं. पूरा जंगल धारियों वाला हो गया था...
बुरातिनो कभी छाया में खो जाता, कभी उसकी सफ़ेद टोपी चांद की रोशनी में चमक जाती.
इस तरह वह तालाब तक आया. शीशे जैसे पानी के ऊपर चांद लटक रहा था, जैसे गुड़ियों के थियेटर में था.
बुरातिनो दाईं ओर झुका – कीचड़ था. बाईं ओर – कीचड...और पीछे टहनियां फिर से चरमरा रही थीं.
“पकड़ो, पकड़ो उसे!...”
डाकू क़रीब आ गए थे, वे गीली घास से ऊंचे कूद रहे थे, जिससे बुरातिनो को देख सकें.
“वो रहा!”
उसके सामने पानी में कूदने के अलावा कोई और चारा नहीं था. इसी समय उसने सफ़ेद हंस को देखा, जो किनारे के पास सो रहा था, सिर पंख में छुपाये. बुरातिनो तालाब में कूदा, डुबकी लगाई और हंस के पंजे पकड़ लिए.
“गों, गों” – जागते हुए, हंस कुडकुडाया, “ये कैसा भद्दा मज़ाक है! मेरे पंजों को चैन से पड़े रहने दो!”
हंस ने अपने विशाल पंख फैलाए, और उसी समय, जब डाकुओं ने बुरातिनो के पानी से बाहर निकलते हुए पैरों को पकड़ लिया था, हंस बड़ी शान से तालाब से उड़ा.
दूसरे किनारे पर बुरातिनो ने उसके पंजे छोड़ दिए, अपना बदन फडफडाया, उछला और काई के ढेरों से होते हुए, बांस के झुरमुटों से होते हुए सीधे बड़े चांद की ओर भागा – टीलों के ऊपर.
