बुरातिनो - 8
बुरातिनो - 8
8
‘तीन मीनार’ सराय में
बुरातिनो, लोमड़ी अलीसा और बिल्ला बज़ीलियो पहाड़ से नीचे उतरे और चलते रहे, चलते रहे – खेतों से होकर, अंगूरों की बगिया से, चीड़ के पेड़ों के झुरमुट से होकर, समुद्र के किनारे पर आये और फिर से समुद्र से वापस मुड़े, उसी चीड़ों के झुरमुट से, अंगूरों की बगिया से...
पहाड़ी पर बसा छोटा सा शहर और उस पर चमकता सूरज कभी दायें दिखाई देते, तो कभी बाएं...
लोमड़ी अलीसा गहरी सांस लेते हुए बोली:
“आह, इतना आसान नहीं है ‘मूर्खों के देस” में पहुँचना, सारे पंजे झड जायेंगे...”
शाम होते होते उन्हें रास्ते के किनारे पर एक पुराना घर दिखाई दिया, सपाट छत वाला और उसके प्रवेश द्वार पर एक तख्ती टंगी थी:
“तीन मीनार सराय”
सराय का मालिक मेहमानों का स्वागत करने के लिए उछलकर बाहर आया, अपने गंजे सिर से टोपी उतारी और झुककर अभिवादन किया, भीतर आने के लिए कहा.
“हम सूखी पपड़ी खा सकते हैं,” लोमड़ी ने कहा.
“कम से कम ब्रेड की पपड़ी ही दे देते,” बिल्ली ने दोहराया.
सराय में गए, भट्टी के पास बैठे, जहां सीखों पर और भगौनों में हर तरह की चीज़ें, भूनी जा रही थीं.
लोमड़ी बार बार होंठ चाट रही थी, बिल्ले बज़ीलियो ने मेज़ पर पंजे रख दिए, थके हुए थोबड़े को – पंजों पर, - और एकटक खाने की तरफ़ देखने लगा.
“ई, मालिक,” बुरातिनो ने शान से कहा, “हमें ब्रेड की तीन पपड़ियाँ दीजिये...”
मालिक अचरज से पीछे की ओर गिरते गिरते बचा, कि इतने ख़ास मेहमान इतनी छोटी चीज़ मांग रहे हैं.
“खुशमिजाज़, होशियार बुरातिनो आपसे मज़ाक कर रहा है, मालिक,” – लोमड़ी खिखियाई.
“वह मज़ाक कर रहा है,” बिल्ला बुदबुदाया.
“तीन ब्रेड की पपड़ियां दें, और उनके साथ वह बढ़िया भुना हुआ भेड़ का बच्चा,” लोमड़ी ने कहा, “और वह छोटा सा हंस का पिल्ला, और एक जोड़ी कबूतर सींख पर भुने हुए, और, हाँ, कुछ लिवर भी...”
“सबसे मोटी कार्प के छह टुकडे,” बिल्ले ने ऑर्डर दिता, “और कच्ची छोटी मछली स्नैक्स के लिए.”
संक्षेप में कहें तो, उन्होंने वह सब कुछ ले लिया, जो भट्टी में था: बुरातिनो के लिए सिर्फ ब्रेड की पपड़ी बची.
लोमड़ी अलीसा और बिल्ले बज़ीलियो ने सब कुछ हड्डियों समेत गटक लिया. उनके पेट फूल गए, थोबड़े चमक रहे थे.
“घंटा भर आराम कर लेते हैं,” लोमड़ी ने कहा, - “और ठीक आधी रात को निकल पड़ेंगे. मालिक, हमें जगाना न भूलना...”
लोमड़ी और बिल्ला दो मुलायम बिस्तरों पर लुढ़क गए, खर्राटे लेने लगे और सीटी बजाने लगे. बुरातिनो कुत्तों के कूड़े के ढेर पर कोने में दुबक गया....
उसे गोल-गोल सोने के पत्तों वाले एक छोटे से पेड़ का सपना आया...जैसे ही उसने हाथ बढाया...”
“ऐ, सिन्योर बुरातिनो, टाईम हो गया, आधी रात हो गयी है...”
दरवाज़े पर खटखटाहट हो रही थी. बुरातिनो उछला, उसने आंखें मलीं. बिस्तर पर न तो बिल्ला था, ना ही लोमड़ी, - वह खाली था.
मालिक ने उसे समझाया:
“आपके आदरणीय मित्र जल्दी ही उठ गए, ठंडी पाईं खाकर ताज़े तवाने हो गए और चले गए...”
“क्या मेरे लिए कोई सन्देश दे गए हैं?”
“बिल्कुल दे गए हैं, - कि आप, सिन्योर बुरातिनो, एक भी पल बर्बाद किये बिना जंगल की तरफ़ वाले रास्ते पर भागें...”
बुरातिनो दरवाज़े की ओर उछला, मगर मालिक देहलीज़ पर खड़ा था, आँखें सिकोड़ रहा था, हाथ कमर पे रखे था:
“और डिनर के पैसे कौन देगा?”
“ओय,” बुरातिनो चीखा, “कितना?”
“पूरा एक सोने का सिक्का...”
बुरातिनो उसके पैरों के पास से खिसकना चाहता था, मगर मालिक ने डंडा पकड़ लिया, - उसकी ब्रश जैसी मूंछें, कानों के ऊपर वाले बाल भी खड़े हो गए.
“पैसे दे, कमीने, वर्ना तुझे खटमल की तरह मसल दूंगा!”
पांच में से एक सोने का सिक्का देना ही पडा. हताशा से हांफते हुए बुरातिनो ने उस नासपीटी सराय को छोड़ दिया.
रात अंधेरी थी, - ये तो कम ही था, - काजल की तरह काली थी. चारों ओर हर चीज़ सो रही थी. सिर्फ बुरातिनो के सिर पर खामोशी से उल्लू स्प्लूश्का उड रहा था.
मुलायम पंख से उसकी नाक को छूते हुए, स्प्ल्यूश्का ने दुहराया:
“यकीन न करना, यकीन न करना, यकीन न करना!”
वह गुस्से से रुक गया:
“तुझे क्या चाहिए?”
“बिल्ले और लोमड़ी पर यकीन न करना...’
“तू भी ना!...”
वह आगे भागा और सुनता रहा कि कैसे स्प्ल्यूश्का उसके पीछे चिल्लाया:
“इस रास्ते पर डाकुओं से बच कर रहना.”
