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Charumati Ramdas

Fantasy

4  

Charumati Ramdas

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बुरातिनो - 10

बुरातिनो - 10

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10

डाकू बुरातिनो को पेड़ से लटकाते हैं 

लेखक: अलेक्सी तल्स्तॉय 

अनुवाद: चारुमति रामदास 

 

थकान के मारे बुरातिनो मुश्किल से पैर उठा रहा था, जैसे शरद ऋतु में मक्खी खिड़की की सिल पर चलती है.

अचानक अखरोट के पेड़ की टहनियों के बीच से उसने एक ख़ूबसूरत लॉन देखा और उसके बीचोंबीच – एक छोटा सा, चांद की रोशनी में चमकता हुआ, चार खिड़कियों वाला घर देखा. खिड़की के पल्लों पर सूरज, चांद और तारे बनाए गए थे. चारों तरफ़ बड़े बड़े आसमानी रंग के फूल खिल रहे थे.

पगडन्डियों पर साफ़ बालू बिछी हुई थी. झरने से पानी की पतली धार फूट रही थी, उसमें एक धारियोंवाली गेंद नाच रही थी.

बुरातिनो चौपाये की तरह पोर्च पर चढ़ गया. उसने दरवाज़ा खटखटाया. घर में शांति थी. उसने और ज़ोर से टकटक की, - हो सकता है, घर में लोग गहरी नींद में हों.

इस समय जंगल से फिर से डाकू उछलकर आये. वे तालाब में तैर कर आये थे, उनके बदन से पानी की धाराएं बह रही थीं. बुरातिनो को देखकर छोटे कद वाला डाकू बिल्ली की तरह दबी आवाज़ में फुफकारने लगा, ऊंचावाला लोमड़ी की तरह भौंकने लगा...

बुरातिनो हाथों-पैरों से दरवाज़ा भडभडा रहा था:

“मदद करो, मदद करो, भले आदमियों!...”    

तब छोटी खिड़की से एक घुंघराले बालों वाली, अच्छी और ऊपर को उठी हुई नाक वाली, ख़ूबसूरत लड़की ने सिर बाहर निकाला.

उसकी आंखें बंद थीं.

“बच्ची, दरवाज़ा खोलो, डाकू मेरा पीछा कर रहे हैं!”

“आह, क्या बकवास है!” बच्ची ने अपने सुन्दर मुंह से उबासी लेते हुए कहा. “ मैं सोना चाहती हूँ, मैं अपनी आंखें नहीं खोल सकती...”

उसने हाथ ऊपर उठाए, उनींदेपन से बदन को खींचा और खिड़की में छुप गई.

 बुरातिनो निराशा से नाक के बल रेत पर गिर गया और उसने मुर्दा होने का नाटक किया.

डाकू उछलकर उसके पास आये:

“आहा, अब हमसे दूर नहीं जा सकते...”

 कल्पना भी नहीं की जा सकती, कि बूरातिनो को मुँह खोलने पर मजबूर करने के लिए उन्होंने क्या क्या नहीं किया. यदि पीछा करते हुए उन्होंने अपनी पिस्तौल और चाकू न गिरा दिया होता, - तो इस जगह पर ही अभागे बुरातिनो के किस्से को ख़त्म किया जा सकता था.

आख़िर में डाकुओं ने उसे उल्टे टांगने का फैसला किया, पैरों पर रस्सी बांधी, और बुरातिनो चीड़ के पेड़ की टहनी से लटक गया... वे चीड़ के पेड़ के नीचे बैठे, अपने गीले कपड़े फैलाकर, और इंतज़ार करने लगे, कि कब उसके मुंह से सोने के सिक्के बाहर निकलते हैं...

सुबह तेज़ हवा चलने लगी, चीड़ के पत्ते शोर मचाने लगे. बुरातिनो हिल रहा था, टहनी की तरह. डाकू गीले कपड़ों में बैठे बैठे उकता गए...

“लटके रहो, दोस्त, शाम तक,” उन्होंने कड़वाहट से कहा और रास्ते पर किसी सराय को खोजने निकल पड़े.


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