बंधन तोड़ता प्रेम
बंधन तोड़ता प्रेम
कहानी - बंधन तोड़ता प्रेम
चेतावनी
प्रस्तुत रचना पूर्णतः काल्पनिक है। इस कहानी के सभी पात्र भी पूरी तरह से काल्पनिक हैं। यह कहानी केवल मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है और इसका किसी धर्म, संप्रदाय या जाति से कोई संबंध नहीं है। कहानी का कोई भी हिस्सा किसी वास्तविक घटना, व्यक्ति या स्थान से मेल नहीं खाता।
लेखक की ओर से
प्रिय पाठकों, यह मेरी पहली कहानी है, जो प्रेम के विषय पर आधारित है। यह कहानी जहां एक ओर प्रेम के प्रति मेरे दृष्टिकोण को उजागर करती है, वहीं दूसरी ओर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच के भेद को भी दिखाती है। मुझे उम्मीद है कि मेरी पहली रचना को आपका प्यार मिलेगा।
धन्यवाद।
ये कहानी हर उस प्रेमी और प्रेमिका के मान
जो किसी ऐसे व्यक्ति से प्रेम कर बैठा है,
जिसका उसके स्तर से कोई संबंध नहीं है।
ये कहानी हर उस व्यक्ति के नाम
जिसने प्रेम को उसके सबसे सुंदर और शाश्वत रूप में ही अपनाता है।
ये कहानी हर उस प्रेमी के नाम
जो अपने प्यार के लिए सारी दुनिया से लड़ सकता है।
ये कहानी हर उस प्रेमिका के नाम
जो अपने प्रेमी के साध जीवन बिताने के लिए हर संघर्ष करने की ताकत रखती है।
ये कहानी हर उस प्रेमी युगल के नाम
जो अपने प्रेम को संसार के हर बंधन से आज़ाद करा सकता है।
ये कहानी हर उस व्यक्ति के नाम
जिसने प्रेम किया है।
आँचल कुमारी “अश्वी”
भाग - एक
अनकहा प्रेम
कहा जाता है कि प्रेम संसार की सबसे सुंदर और पवित्र भावना है। यह वह भावना है, जो हमें सबसे महान और भाग्यशाली महसूस कराती है। किसी के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान पाना, उसकी आत्मा में अपना नाम दर्ज करवाना और किसी के दिल में एक विशेष जगह बनाना, निस्संदेह किसी भी बड़े पुरस्कार से बड़ा सम्मान है।
इसी सोच के साथ अपने जीवन में प्रेम की तलाश में जीने वाला 26 वर्षीय अबीर वर्मा, जो मध्यम वर्गीय परिवार से है। उसका कद थोड़ा लंबा, रंग गेरुआ, और व्यक्तित्व ऐसा कि कोई भी आसानी से उसकी ओर आकर्षित हो जाए। स्वभाव से वह शांत, समझदार और परिपक्व है। सूरत सामान्य, पर दिलकश मुस्कान जो एक पल में लुट ले। अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद, वह एक खाद्य उत्पाद निर्माण कंपनी में अकाउंट डिपार्टमेंट में काम करता है। उसकी मेहनत और ईमानदारी के कारण, वह अपने ऑफिस में सभी का प्रिय बन चुका है।
अबीर का परिवार छोटा है - माँ, पापा और वह। हर दिन अपने अच्छे भविष्य की उम्मीद लिए वह सुबह-सुबह घर से निकलता है। बस की भीड़ में खड़ा होकर भी, उसके चेहरे की मुस्कान बरकरार रहती है। कार्यालय में सहकर्मी और मालिक सभी उसे पसंद करते हैं। उसकी दिनचर्या बहुत ही व्यवस्थित है - काम के बाद, वह अपने माता-पिता के साथ वक्त बिताता है, घर के कामों में हाथ बंटाता है और अपनी शायरी में खो जाता है।
हालांकि, पिछले कुछ समय से अबीर का मन किसी अन्य दिशा में भटकने लगा है। उसकी ज़िन्दगी में एक उलझन आ गई है। उसे महसूस हो रहा है कि किसी के प्रति उसकी भावनाएँ कहीं न कहीं गहरी हो रही हैं, लेकिन वह इन्हें शब्दों में नहीं ढाल पा रहा।
वैसे तो वह हमेशा खुश रहता है, पर पिछले कुछ दिनों से उसका मन जैसे किसी मानसिक लड़ाई में उलझा हुआ है। वह अपने काम में माहिर है, चुटकी में हिसाब-किताब कर लेता है, जैसे कम्प्यूटर पर बस जादू करता हो। लेकिन हाल ही में वह काम पर ध्यान नहीं दे पा रहा, इसका कारण उसकी मानसिक अशांति और तनाव है। और इसका कारण है, उसकी छुपी हुई भावनाएं, जो सही व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाई हैं। इसके पीछे ढेरों कारण हैं।
वह खुद को किसी तरह संभाल रहा है, लेकिन आज भी उसका मन जैसे युद्ध के मैदान में खड़ा हो, जहां प्यार और सामाजिक प्रतिष्ठा एक-दूसरे के सामने हैं। और वह अपनी सोच में डूबा हुआ काम कर रहा था, जब अचानक किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
अबीर ने पलटकर देखा, सामने उसका सहकर्मी और बचपन का मित्र राघव खड़ा था, जो उसे दोपहर के खाने के लिए ले जाने आया था।
राघव थोड़े गुस्से में बोला, "हां भाई, आज फिर भूख हड़ताल करने का मन है तेरा?"
अबीर ने बे मन से कहा, "यार, तू खाना खा ले, मेरा बिल्कुल मन नहीं है।"
अब कहानी में आगे बढ़ने से पहले, राघव का परिचय देना जरूरी है। राघव और अबीर एक ही स्कूल से पढ़े थे। समय के साथ उनकी दोस्ती गहरी होती गई, जो कॉलेज में भी बनी रही, और अब भी बहुत मजबूत है। दोनों पास-पास ही रहते हैं और पारिवारिक संबंध भी अच्छे हैं। दोनों ने साथ ही इस दफ्तर में काम किया था। राघव अबीर के बनाए हिसाब-किताब को चेक करके कंपनी के मैनेजर को देता है, और हर दिन दोनों साथ में खाना खाते हैं। पिछले कुछ दिनों से अबीर का व्यवहार कुछ बदल सा गया था, और राघव को यह समझ में नहीं आ रहा था कि अबीर खाना क्यों नहीं खा रहा है। वह जानता था कि अबीर काम में कुछ गलतियां कर रहा है, पर वह कुछ नहीं कहता, बस उसे ठीक कर देता। राघव समझदार है, पर आज वह ज़िद करने वाला है।
"यार, चल न भाई," राघव ने कहा।
"नहीं यार, बहुत काम है, तू जा," अबीर ने मुंह कम्प्यूटर की ओर घुमाते हुए कहा।
"नहीं, बाद में करना, अभी खाने का वक्त है," राघव ने दूसरा दांव चला और अबीर का चेहरा अपनी तरफ मोड़ा।
"राघव, बात माना कर यार," अबीर ने चिढ़कर कहा।
"तू मेरी बात नहीं मानता, तो मैं क्यों मानूं?" राघव अब भी प्रयास कर रहा था।
"देख, मेरा मन नहीं है, तू जा!" अबीर की बातों से राघव का संयम टूट गया। अचानक उसने अबीर की कलाई एक हाथ से पकड़ ली और दूसरे हाथ से उसका टिफिन उठा लिया। अबीर उसकी इस प्रतिक्रिया से चौंका, और एक नज़र राघव को देखा। लेकिन राघव के चेहरे पर दिख रहे भाव यह बता रहे थे कि वह अभी नहीं मानेगा। अबीर जानता था कि राघव आमतौर पर शांत रहता है, पर गुस्से में अपनी ही करता है। इसीलिए वह विरोध न कर सका और बिना कुछ कहे उसके पीछे-पीछे बाहर निकल गया। राघव और अबीर दफतर में बनी चाय की दुकान पर पहुँचे।
राघव ने सामने वाली कुर्सी पर बैठते हुए अबीर को बैठने का इशारा किया।
"अरे नवल भाई!" राघव ने सामने से आते दुकानदार को बुलाया।
"जी भाई, कैसे हो?" नवल ने मुसकुराते हुए कहा।
"मस्त, तुम कैसे हो?" राघव ने मुस्कुरा कर पूछा।
"सब बढ़िया है, पर अबीर भाई को क्या हुआ है? वह बहुत चुप हैं?" नवल ने हैरान होते हुए पूछा।
"अरे, वो थोड़े बीमार हैं, तबीयत ठीक नहीं है," राघव ने बात को टालते हुए कहा।
नवल चहकते हुए बोला, "अरे ऐसी बात है! मैं कड़क चाय बनाकर लाता हूं, सब ठीक हो जाएगा।"
फिर वह अपनी छोटी रसोई में चला गया। अब राघव ने अबीर को देखा और कहा, "अबीर, क्या हुआ है तुझे? तू इतना चुप क्यों है? देख, मैं जानता हूं कि कुछ तो चल रहा है, तेरे मन में। अब मुझे सच-सच बताना, कोई झूठ नहीं।"
अबीर जैसे भावों के बहाव में बह गया। वह अचानक से खड़ा हुआ और राघव को साथ चलने का इशारा कर दुकान के पीछे बने खाली बैंच की ओर बढ़ गया। राघव थोड़ा चौंका, पर वह बस उसके साथ चलता रहा। बैंच पर बैठकर अबीर ने सिर अपने घुटनों में छिपा लिया। राघव का दिल जैसे धक से हुआ। पर उसने खुद को संभालते हुए अबीर के पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ रखा और उसका चेहरा अपनी ओर मोड़ा।
आज पहली बार राघव ने अपने दोस्त की आँखों में आंसू देखे थे। अबीर का भोला चेहरा आंसुओं में डूबा हुआ था। उसके मन का गुब्बार आंखों से बह निकला था। समाज में यह एक नियम है जिसकी दुहाई अक्सर दी जाती है कि पुरुषों में संवेदनाएं नहीं होतीं, वे नहीं रोते, लेकिन यह सच नहीं है। वे भी दुखी होते हैं, वे भी भावुक होते हैं। बस समाज ने उन्हें इस तरह ढाल दिया है कि वे खुद में सिमट जाते हैं। राघव की भी यही स्थिति थी, पर अबीर को संभालना था। राघव ने अबीर को अपनी मजबूत बाँहों में समेट लिया और धीरे-धीरे उसे शांत करने की कोशिश करने लगा।
अंत में, अबीर ने अलग होकर अपनी आँखें पोंछते हुए राघव को देखा। राघव ने मुसकुराते हुए उसे अपनी बात कहने का इशारा किया।
"मुझे... मुझे किसी से प्यार हो गया है," अबीर ने एक ही सांस में सारी बात कह दी।
राघव को यह सुनकर ऐसा लगा कि अबीर पूरी बात नहीं कह रहा, और कुछ छिपा रहा है। फिर भी उसने पूछा, "कौन? कहाँ? कैसे? तुझे मुझे बताना ज़रूरी नहीं लगा?"
अबीर ने गहरी सांस ली और कहा, "वो ऊपर वाले डिपार्टमेंट में है।"
"कौन?" राघव ने पूछा।
"अरे, वो जो रोज़ महंगी गाड़ी से आती है, लंबी बालों वाली।"
"अच्छा, नव्या कश्यप!" राघव ने समझते हुए कहा।
अबीर थोड़ा झेंपते हुए बोला, "हां, नाम तो मुझे ठीक से नहीं पता, पर..."
"नाम भी नहीं पता, पर तुझे प्यार हो गया? राघव ने चुटकी लेते हुए कहा।
अबीर बस शांत बैठा रहा, और राघव ने चुटकी लेते हुए कहा, "वाह! ये तो बढ़िया था, बहुत लंबी छलांग लगाई है।" मुझे बताया भी नहीं।
अबीर ने सिर झुकाकर कहा, "माफ़ कर दे यार, मैं खुद में उलझा हुआ था, तो तुझे क्या बताता?"
राघव को अब समझ में आ गया कि वह अपनी ठिठोली से अबीर को चोट पहुंचा चुका था। वह उसके पास बैठकर बोला, "कोई बात नहीं भाई, मुझे भी माफ कर दे।"
अबीर ने हल्का सा धक्का देते हुए हंसी में कहा, "बस हो गया, अब चल। भूख लगी है मुझे, तेरी बातों से पेट नहीं भरेगा।"
राघव मुसकुराते हुए बोला, "हां, मेरे औघड़ प्रेमी, चल, तेरा खाया-पिया सब बह निकला है, चल!"
कहकर दोनों वापस दुकान पर पहुंचे, और नवल चाय लेकर आया। मुसकुराते हुए वह बोला, "तुम दोनों कहां निकल गए थे? मैं चाय बना रहा था, राह देख रहा था।"
अबीर ने मुसकुराते हुए कहा, "माफ़ी भाई, थोड़ी देर काम में लग गए थे, आप चाय लाओ, बहुत मन कर रहा है!"
नवल बोला, "चलो, आप दोनों ने आखिर कुछ कहा। सही कहते हैं, दोस्त हर परेशानी को भुला देते हैं।"
अबीर और राघव चाय लेकर बैठ गए, और तभी राघव ने कहा, "क्या नव्या भी तुझे चाहती है?"
अबीर असमंजस में चुप हो गया, और राघव को चुप रहने का इशारा किया। तभी नवल चाय लेकर आया और मुसकुराते हुए बोला, "लो भाई चाय पी लो"
अबीर और राघव दोनों ने एक साथ धन्यवाद कहा, और नवल चला गया। दोनों ने चुपचाप खाना खत्म किया और फिर अपनी-अपनी जगह पर काम में लग गए। अबीर को काम की धुन में समय का पता ही नहीं चला। बाहर शाम का गुलाबी रंग आकाश में फैलने लगा था, लेकिन अबीर अब भी कम्प्यूटर पर ध्यान लगाए था।
सच बात तो यह है कि प्रेम में डूबे हुए दिल को दुनिया की कोई सुध नहीं रहती। बस, वह अपने प्रेमी की एक झलक पाने के लिए सौ बहाने ढूँढता है। यही सोचते हुए, राघव जाने कब अबीर के पास आ खड़ा हुआ। उसने अबीर के सिर पर हाथ रखा और मुसकुराया। लेकिन कुछ देर में फिर उसके संयम का बांध टूट गया और उसने अबीर को झकझोर दिया। अचानक अबीर घबरा गया, और एकटक राघव को देखने लगा, फिर हल्के गुस्से में बोला,
"तूने तो डरा ही दिया मुझे! बच्चे की जान लेगा क्या?"
राघव हंसी में बोला, "अरे मेरे शेर, अब तू बच्चा कहां रहा? बेटा, प्रेम बड़े लोगों का काम है।"
अबीर झेंप कर रह गया, तो राघव ने ताना कसते हुए कहा, "भाई, नव्या की यादों से बाहर आकर समय देख?
अबीर ने दीवार पर लटकी घड़ी में समय देखा तो शाम के 6:30 बज रहे थे। वह सकपकाया सा खड़ा हो गया और राघव से मिन्नत करते हुए बोला "यार, ध्यान ही नहीं दिया मैंने। देर हो रही है, चल चलते हैं।"
राघव मुस्कुरा कर बोला, "हां, देर तो हो गई है। सब चले गए, बस हम दोनों ही हैं, और बाहर खड़ा गार्ड राम दयाल है।"
अबीर झेंपते हुए बोला, "अरे बाप रे! चल, वरना रात यही बितानी होगी।"
राघव बस मुस्कुरा दिया, और दोनों दफ्तर से बाहर निकल कर सीधे बस स्टैंड की ओर चल पड़े। रास्ते में राघव ने देखा कि अबीर अभी भी शांत है, तो उसने अबीर को टोका
"अबीर?"
अबीर ने कोई उत्तर नहीं दिया। राघव ने फिर ज़ोर से कहा, "अबीर? सुन रहा है तू?"
अबीर चल तो रहा था, लेकिन अपनी कल्पनाओं में नव्या का हाथ थामे कहीं दूर जा रहा था। अचानक राघव की आवाज़ से वह हड़बड़ा गया और संभलते हुए बोला,
"हां... हां, क्या बोल रहा था?"
राघव चिढ़ते हुए बोला, "यार, मैं यहां हूं और तू जाने कहां खो गया था।"
अबीर मुस्कुरा कर बोला, "नहीं, कहीं नहीं। तू पूछ, क्या पूछना है?"
राघव ने पूछा, "क्या तुझे पता है कि नव्या के मन में तेरे लिए क्या है?"
अबीर थोड़ा सोचते हुए बोला, "नहीं।"
राघव ने तंज़ करते हुए कहा, "ऐसे करेगा तू प्रेम? जब तुझे कुछ नहीं पता।"
अबीर परेशानी होते हुए बोला, "तो क्या करूँ?"
राघव ने समझाते हुए कहा, "भाई, उसके मन को टटोलना ज़रूरी है, ताकि बात आगे बढ़ सके।"
अबीर उलझ गया, "तो फिर क्या करना है? यह भी बता दे।"
राघव थोड़ा सोचते हुए बोला, "चल, अभी घर चलते हैं, कल सुबह बात करेंगे। तब तक मैं कुछ सोचता हूं।"
इन्हीं सब बातों में दोनों बस स्टैंड पर पहुँच गए। राघव का ध्यान अब भी अबीर पर था। वह साफ देख पा रहा था कि अब अबीर और भी ज़्यादा परेशान है।
करीब पंद्रह मिनट बाद बस आई, और दोनों बस में चढ़ गए। मुश्किल से एक जगह बनी और वे खड़े हो गए। बस चली, और धीरे-धीरे अपने रास्ते पर बढ़ने लगी। अबीर खिड़की से बाहर देख रहा था, और राघव उसे देख रहा था। तभी अचानक अबीर के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान आ गई। उसकी आँखों में चमक थी, और दिल में हजारों उम्मीदें पल रही थीं। राघव को समझ नहीं आया कि यह अचानक क्या हुआ। फिर उसने खिड़की के बाहर देखा, और उसे समझ में आ गया। सड़क के दूसरी ओर, नव्या अपनी कार में बैठी, भुट्टा खा रही थी।
अब राघव को अबीर के बदले हुए मिज़ाज का कारण समझ में आ गया। वह चुटकी लेते हुए बोला, "आह, तो यह बात है! सामने नव्या जी हैं, तभी जनाब मुस्कुरा रहे हैं?"
अबीर मुस्कुरा दिया, और बस जैसे ही आगे बढ़ी, वह नव्या की यादों में खो गया। उसी मनोदशा में घर पहुंच गया।
प्रिय पाठकों, अब कहानी की नायिका नव्या को भी जान लिया जाए, जिसके पीछे अबीर मौहब्बत के अजनबी रास्तों पर निकल पड़ा है। नव्या का पूरा नाम नव्या कश्यप है। उम्र 23 वर्ष, गोरा रंग, उचित कद-काठी और लंबे काले घने बालों वाली। बड़ी गहरी आँखें, जो किसी को भी अपनी ओर खींच लें। गुलाबी होंठ और हिरण सी सुंदर गर्दन, कुल मिलाकर एक खूबसूरत चेहरा। वह शहर के एक संपन्न व्यक्ति गिरीश कश्यप की इकलौती संतान है। और उसी दफ्तर में काम करती है, जहाँ अबीर और राघव भी काम करते हैं। वह अबीर और राघव से जूनियर है। नव्या के परिवार की संपन्नता के बावजूद वह मेहनती और ईमानदार है, और चित्रकारी का शौक रखती है। ख़ास बात यह है कि वह केवल अपने प्रिय लोगों का ही चित्र बनाती है। वह कभी अमीर और गरीब में अंतर नहीं करती। वह उस उम्र के पड़ाव पर है, जहाँ प्रेम और भावनाओं के बारे में उसकी सोच और कल्पनाएं आकार ले रही हैं। और यह और भी दिलचस्प है कि वह पहले से किसी से एकतरफा प्रेम करती है। अब सवाल यह है कि वह कौन है, और अब नव्या और अबीर की कहानी किस मोड़ पर जाएगी? क्या अबीर अपने प्रेम से नव्या को अवगत करवा पाएगा? सभी सवालों के जवाब अगले अध्यायों में मिलेंगे।
भाग - दो
उलझनें और पहली मुलाकात
अब रात गहराने लगी थी, और अबीर अपने कमरे में बैठा था। राघव के सवाल ने उसे और भी बड़ी दुविधा में डाल दिया था। वह यह जानना चाहता था कि नव्या के मन में क्या चल रहा है, लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसे पता लगाए। अपनी उधेड़बुन में खोया हुआ वह यही सब सोच रहा था कि अचानक कमरे का दरवाज़ा खुला, और उसकी मां हाथ में चाय की प्याली लेकर अंदर आ गई। अबीर के माथे की लकीरें उसकी चिंता की गवाही दे रही थीं। मां तो मां होती है, वह सब जान जाती है, चाहे आप कितनी भी कोशिश कर लें। अबीर की चिंता मां ने पल में भांप ली। वह पलंग पर बैठीं और बोलीं,
“बेटा, क्या हुआ है?”
अबीर, जो अपनी सोच में मग्न था, मां के अचानक पूछने पर सकपका गया। अगले ही पल उसने मुसकुराते हुए कहा, “हां मां, आप कब आईं?”
मां ने मापा-तुला जवाब देते हुए कहा, “बस पांच मिनट पहले। अब पहले मेरी बात का जवाब दो।”
अबीर ने अपनी कशमकश को मुस्कान के पीछे छुपाते हुए कहा, “कुछ नहीं मां, बस थकान है।”
मां ने चाय का कप उसे पकड़ाते हुए कहा, “ये चाय पी लो और सच-सच बताओ, तुम्हें क्या तंग कर रहा है?”
अबीर ने अपनी मुस्कान कायम रखते हुए कहा, “नहीं मां, आप चिंता मत करें।”
मां ने अविश्वास से पूछा, “सच?”
अबीर जानता था कि अगर मां ऐसे ही सवाल करती रहीं, तो वह सब जान ही जाएंगी। और तब वह बेवजह परेशान हो जाएंगी। उसने आखिरी कोशिश करते हुए कहा, “हां मां, सच। बस थोड़ा काम का दबाव है।”
मां ने अबीर के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “इतना बोझ मत लो, सब हो जाएगा।”
अबीर मुसकुराया, लेकिन उसकी मुस्कान में कुछ छुपा हुआ था। कुछ ऐसा, जो सिर्फ वही जानता था। खैर, रात किसी तरह बीती, और सुबह होते ही अबीर ने अपने सारे काम निपटाए। मां से शाम तक लौटने की बात कहकर जल्दी से दफ्तर के लिए निकल पड़ा। बस स्टैंड की ओर चलते हुए उसने राघव को फोन किया।
“हैलो राघव?”
राघव ने जवाब दिया, “हां भाई।”
अबीर ने फौरन कहा, “मैं निकल गया हूं, तू भी निकल जा।”
राघव ने मन ही मन चिढ़ते हुए कहा, “अरे भाई, इतनी जल्दी क्यों? अभी तो चालीस मिनट हैं!”
अबीर ने बहाना बनाते हुए कहा, “देख, रास्ते में जाम मिलेगा, कह नहीं सकते। देर हो जाएगी।”
राघव ने पल भर में बहाना पकड़ लिया और छेड़ते हुए बोला, “हां, औघड़ प्रेमी। रास्ते में नव्या जो दिखेगी, वह भी जल्दी आती है, न?”
अबीर ने बात टालते हुए कहा, “जल्दी आ।”
राघव ने फोन रखते हुए कहा, “बस, निकल रहा हूं।”
कुछ देर बाद राघव भी आ गया। अबीर उसे देखते ही मुसकुराया। दोनों बातें करते हुए बस का इंतजार करने लगे। जैसे ही बस आई, दोनों उसमें चढ़ गए। अबीर खिड़की के पास खड़ा हो गया, कल की तरह, और राघव उसके पीछे।
राघव चुप न रह सका और बोला, “भाई, बस कर न। मुझे भी देख, बाहर क्या देख रहा है?”
अबीर ने उसी सुर में कहा, “क्या देखूं, बता?”
अबीर की बात सुनकर राघव जल-भुन गया, पर अगले ही पल खुद को संभालते हुए बोला, “देख, तू प्रेम कर रहा है, तो कम से कम नव्या को समझने की कोशिश कर।”
अबीर सिर पकड़ते हुए बोला, “ओह, हां यार, बता क्या करें?”
राघव किसी गुरु की तरह शांत स्वर में बोला, “देख, नव्या और तेरा एक-दूसरे के सामने होना जरूरी है। एक बार तो मिलना ही चाहिए।”
असमंजस में अबीर अपना सिर खुजलाते हुए बोला, “सामने से? कैसे?”
राघव ने बड़ी अदा से आंखें मटकाते हुए कहा, “तेरे पास जितने कागज आते हैं, वह सब नव्या ही संभालती है। किसी हिसाब के बहाने मिल ले, बस!”
अबीर ने सोचते हुए पूछा, “अच्छा, आगे? क्या कहूं उससे?”
राघव ने उसे घूरते हुए कहा, “अब यह भी मैं ही बताऊं? तू बस औघड़ प्रेमी बना घूमेगा!”
अबीर झेंप गया। राघव ने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा, “चल, बता। कल जितनी भी बिक्री हुई, उसका पूरा हिसाब मिला?”
अबीर ने सोचा और कहा, “हां, शायद 11 कागज होने चाहिए थे। उनमें 2 कम हैं। वह शर्मा जी वाला हिसाब शायद बचा है।”
राघव जैसे किसी बड़ी जीत का ऐलान कर रहा हो, चहकते हुए बोला, “हां, ये हुई न बात! बस यही मौका है। आज नव्या से मिल, और बात कर।”
अबीर ने घबराते हुए कहा, “मुझे ही जाना है? वह भी तो आ सकती हैं, न?”
राघव अबीर की झिझक को भांप गया। उसने अबीर का हौसला बढ़ाते हुए कहा, “देख, प्यार किया है, तो सामना तो करना ही होगा। कब तक उसे देख-देखकर आहें भरेगा?”
बस जल्द ही दफ्तर के बस स्टैंड पर पहुंच गई। राघव ने अबीर को इशारा किया, और दोनों उतर गए। अबीर थोड़ा घबराया हुआ था, लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि शायद वह कुछ नया अनुभव करने जा रहा है।
तभी राघव ने उसे कोहनी मारकर कहा, “वो देख!”
अबीर ने इधर-उधर देखते हुए पूछा, “क्या?”
राघव ने उसका सिर पीछे घुमाकर कहा, “अरे, नव्या भी अपनी कार में हमारे पीछे है।”
अबीर ने पीछे मुड़कर देखा और जैसे अपनी जगह पर अटक गया। सफेद कुर्ता और गुलाबी दुपट्टा पहने नव्या ड्राइवर सीट पर बैठी धीरे-धीरे उनकी तरफ आ रही थी। उसकी मुस्कान जैसे कोई गुलाब खिल उठा हो। अबीर बस उसे देखता रह गया। तभी राघव ने टोका, “चल भाई, जब मिलेगा, तो जी भर के देखना।”
अबीर झेंपते हुए उसके साथ चल पड़ा, और पीछे-पीछे नव्या भी दफ्तर चली। अबीर और राघव अपने-अपने केबिन में पहुंचकर काम में लग गए।
लेकिन कहते हैं न, भविष्य का अनुमान लगाना मुश्किल होता है। जो कुछ आगे होने वाला था, वह राघव और अबीर की सोच से भी परे था।
जहां एक ओर अबीर भावनाओं में बहता जा रहा था, वहीं नव्या ने भी अबीर की आंखों को कई बार खुद पर पाया। हर बार उसे उन आंखों में कुछ ऐसा नजर आया, जो बहुत शुद्ध और सच्चा था। शायद वह भी अबीर के लिए उसी तरह की भावनाओं से गुजर रही थी।
सच तो यह था कि वह भी अबीर से एकतरफा प्यार करती थी। शायद उसी दिन से, जब उसने पहली बार उसे देखा था। उसके बाद से जैसे उसकी छठी इंद्री जाग उठी थी। अबीर के आसपास होने पर उसके गाल गुलाबी हो जाते, कनपटी गरम हो जाती, और दिल जैसे बाहर निकल आने को होता।
आज शायद भाग्य भी अबीर और नव्या को एक-दूसरे के सामने लाने के लिए तैयार था। लगभग एक घंटे बाद, नव्या अपने बैग के साथ दफ्तर के चेंजिंग रूम में गई। बाल संवारने, होंठों पर लाली लगाने और दुपट्टा सही करने के बाद बाहर आई।
अब जैसे उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा था। वह अबीर के केबिन की ओर बढ़ी। वहीं, अबीर को भी कुछ अजीब-सा महसूस हो रहा था। वह मुंह धोने के बहाने शौचालय चला गया। राघव मुस्कुरा दिया। अबीर बेखबर था कि भविष्य में क्या होने वाला है। बस खुद को नव्या से मिलने के लिए तैयार कर रहा था। उसने अपना चेहरा धोया, बालों में हाथ फिराया, और गहरी सांस लेकर अपने केबिन की ओर बढ़ गया। नव्या अबीर के केबिन के बाहर खड़ी हो गई। गहरी सांस लेकर उसने दरवाजे पर दस्तक दी। अंदर से आवाज़ आई,
“आ जाइए, दरवाजा खुला है।”
नव्या झिझकते हुए दरवाजा खोला और अंदर आ गई। राघव को ‘सुप्रभात’ कहा। राघव उसके अचानक आने से थोड़ा सकपकाया, फिर संभलकर बोला,
“वैरी गुड मॉर्निंग, नव्या। बैठिए।”
नव्या पास रखी कुर्सी पर बैठ गई। नीचे आंखें किए वह कमरे में इधर-उधर देख रही थी।
राघव ने उसकी घुमती नज़रें देखकर पूछा, “नव्या, क्या हुआ?”
नव्या हड़बड़ाकर बोली, “न... नहीं सर।”
राघव मुसकुराते हुए बोला, “कुछ ढूंढ रही हैं आप?”
नव्या ने गहरी सांस ली और कहा, “वो... अबीर सर।”
राघव मन ही मन हंसा और खुद से कहा, अरे, ये अचानक क्या हो गया? क्या होगा अब? हे प्रभु, अब आप ही लाज बचाइए! फिर सामान्य होकर बोला,
“वो अभी आ रहे हैं।”
नव्या ने खुद को शुभकामनाएं दीं। तभी दरवाजा खुला और अबीर जैसे अपनी जगह पर अटक गया। देखा, सामने नव्या कुर्सी पर बैठी थी।
राघव ने शरारती अंदाज में कहा, “अरे अबीर, कितनी देर कर दी। नव्या तेरा इंतजार कर रही है, आजा मिल ले।”
अब जैसे नव्या का सिर शर्म से धरती में गड़ गया और वह कुर्सी से उठ खड़ी हुई। अबीर भी थोड़ा शरमाते हुए अंदर आ गया। नव्या ने अपनी मीठी सी आवाज़ में पहल की, “गुड मॉर्निंग, सर।”
नव्या की मीठी आवाज़ सुनकर अबीर की जुबान जैसे तालू से चिपक गई थी। फिर भी उसने खुद को संभाला और गला साफ करके कहा,
“गुड मॉर्निंग, नव्या जी। बैठिए न।”
नव्या ने शायद अपने नाम के साथ पहली बार ‘जी’ सुना। उसने सिर उठाकर देखा तो सामने अबीर थोड़ा असहज था। अबीर ने खुद को संभालते हुए कहा,
“नव्या जी, मैं आपसे मिलने ही वाला था।”
नव्या का दिल तो जैसे उछलकर बाहर आ गया, क्योंकि वह खुद भी जुगाड़ लगा रही थी कि कैसे अबीर से मिले। इसीलिए उसने हिसाब के 11 कागजों में से बस 9 ही दिए, ताकि इसी बहाने मुलाकात हो सके। और अबीर भी उससे मिलना चाहता था, यह सुनकर तो उसका मन झूम उठा।
नव्या ने अपनी उमंगों को संभाला और शांत स्वर में बोली, “कुछ काम था, आपको मुझसे?”
अबीर की घबराहट कुछ कम हुई और उसने कहा,
“जी, मुझे लगता है कि शायद आपने गलती से मुझे आधा हिसाब दे दिया था। मुझे शाम को याद आया।”
नव्या मन ही मन हंसी और बोली, “माफ कीजिए, मुझे भी रात ही पता चला कि हिसाब के दो कागज मेरे पास ही रह गए थे।”
कहकर उसने अपने बैग से दोनों कागज निकालकर अबीर की ओर बढ़ा दिए। अबीर ने कागज थाम लिया। नव्या जैसे सम्मोहित हो गई थी। उसने कागज़ छोड़ा नहीं, और जैसे वक्त रुक गया। नव्या और अबीर एक-दूसरे को असमंजस में देख रहे थे। तभी राघव ने हंसते हुए दोनों को वर्तमान में खींच लिया।
अबीर अचानक से हड़बड़ा गया और नव्या कागज छोड़कर कुर्सी से उठ खड़ी हुई। जाते-जाते उसने पलट कर एक पल अबीर को देखा, फिर वह बाहर निकल गई। राघव ने अबीर को छेड़ा,
“ये क्या हो गया, भाई? ये खुद कैसे आ गई?”
अबीर खुद भी उलझ गया था। उसने नपा-तुला सा जवाब दिया, “पता नहीं, यार।”
राघव ने कहा, “भाई, मुझे लगता है कि...”
अबीर ने उसकी बात काटते हुए कहा, “राघव, चुप।”
अबीर ने उसे चुपचाप काम करने का इशारा किया और खुद भी व्यस्त हो गया।
असल में अबीर को एहसास हुआ कि कोई उन्हें कमरे के बाहर से सुन रहा है। इसीलिए उसने राघव को चुप करा दिया।
क्या सच में कोई कमरे के बाहर था? आखिर कौन था? इस सवाल का जवाब आगे मिलेगा।
भाग – तीन
बैरी प्रेम के
अबीर की आशंका सही थी। क्योंकि सच में एक लड़का, जो लगभग अबीर की उम्र का था, कमरे के बाहर खड़ा होकर अंदर से आने वाली आवाज़ों को ध्यान से सुन रहा था। प्रेम तो दो लोगों के बीच होता है, लेकिन बैर पूरे समाज से हो जाता है। इसीलिए हमारा समाज प्रेम के समर्थकों और विरोधियों में बंटा हुआ है।
यहां अबीर और नव्या का बैरी वही था, जो बातें सुन रहा था। उसके चेहरे के भाव तेज़ी से बदल रहे थे और होंठों पर शैतानी मुस्कान चमक रही थी।
यह है अरनव कपूर। दफ्तर की सभी लड़कियां उससे दूर रहती हैं। कारण है उसकी आंखों में छिपी वासना, जो हर लड़की के दिल में किसी अनहोनी की आशंका जगा देती है। अरनव के अनुसार, स्त्री केवल वासना की पूर्ति का साधन है। दफतर में कई बार उसके बारे में कई बातें सामने आ चुकी थी। वह उन लोगों में से है जो खुद के आगे किसी को कुछ नहीं समझते। अरनव, कपूर साहब की बिगड़ी संतान है और दफ्तर में सबसे सीनियर होने के कारण हर किसी को खुद से नीचे समझता है।
अबीर उसे बिल्कुल पसंद नहीं है क्योंकि दफ्तर में सभी लोग अबीर को पसंद करते हैं और अरनव से बचते हैं। पर अब उसकी नज़र नव्या पर है, और वह उसे भी अपनी इच्छाओं का शिकार बनाने की योजना बना रहा है। नव्या को उसके बारे में बहुत सी बातें पता हैं, इसीलिए वह उससे दूर ही रहती है।
खैर, अभी नव्या और अबीर की पहली मुलाकात हुई थी। दोनों ही बहुत उलझे हुए थे। जहां एक ओर अबीर को कुछ समझ नहीं आ रहा था, वहीं नव्या इस मुलाकात से बहुत खुश थी। उसके चेहरे की रौनक उसकी खुशी को बयां कर रही थी।
शाम होते ही सब लोग अपने-अपने रास्ते निकल पड़े। अबीर और राघव भी बस स्टैंड की ओर चल पड़े और नव्या अपनी कार में चली गई। अब अबीर अक्सर रास्ते भर खिड़की के बाहर देखता रहता और जब भी नव्या दिखती, हल्के से मुस्कुरा देता। राघव इसे देख कर चुपचाप मुस्कुरा देता।
आज भी यही हुआ, पर एक अप्रत्याशित घटना घट गई। जब नव्या की गाड़ी एक सिग्नल पर रुकी और बस भी उसी सिग्नल पर रुकी। पहली बार नव्या ने अबीर की आंखों को अपनी ओर उठते हुए देख लिया। अबीर सकपका गया और तुरंत सिर झुका लिया, जैसे दूर से ही माफी मांग रहा हो। नव्या अपने मुंह पर हाथ रख हल्के से हंसी। सिग्नल हरा होते ही दोनों अपनी-अपनी मंज़िल की ओर निकल गए। अबीर आज की घटना से दुविधा में था लेकिन उसने खुद को याद दिलाया कि काम बहुत है। वहीं नव्या भी अपने घर पहुंच गई।
नव्या का घर
नव्या का घर, जिसे घर कहना शायद कम होगा। वह एक विशाल कोठी थी, जिसे महल कहना गलत नहीं होगा। सफेद संगमरमर से बनी एक खूबसूरत इमारत, जहां दर्जनों लोग काम करते थे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नव्या के पिता इस महल के राजा थे और नव्या वह राजकुमारी, जिसे एक मध्यम वर्गीय युवक से प्रेम हो गया था।
जैसे ही नव्या ने बङे दरवाज़े पर पहुंच कर आवाज़ लगाई, मुसकुराते हुए कमल दादा ने दरवाज़ा खोला। उन्होंने हर दिन की तरह पूछा
"आपका दिन कैसा रहा, बेटी?"
नव्या ने हर रोज़ की तरह मुसकुराते हुए जवाब दिया,
"अच्छा था, दादा।"
नव्या गाड़ी पार्क करके अंदर चली गई। बैठक में उसके पिता अखबार पढ़ रहे थे और मां घड़ी देखते हुए शायद उसके लौटने का इंतज़ार कर रही थी।
नव्या चौखट से अंदर चली आई। वह कमरे में जाने के लिए मुड़ी, तभी मां ने उसे आवाज़ दी,
"नव्या? यहां आओ।"
नव्या ने बैग एक तरफ रखा और सोफे पर बैठ गई।
"कितनी देर कर दी आने में? ज़रा वक्त देखो!" मां ने टोका।
नव्या ने अपना पुराना जवाब दोहराया "मां, बाहर बहुत ट्रैफिक था, इसलिए देर हो गई।"
कुछ देर बाद नव्या अपने हल्के गुलाबी रंग की दीवारों वाले बड़े कमरे में पहुंची। वहां एक पलंग था और टेबल पर करीने से चित्रकारी का सामान रखा था। मेज़ के ठीक सामने एक बङी-सी अलमारी थी। कपड़े बदलने के बाद उसने कमरे में लगी घंटी बजाई।
कमला, जो रसोई में काम कर रही थी, तुरंत उसके कमरे के बाहर पहुंची।
"नव्या?"
"आ जाइए, दीदी।"
कमला अंदर आई और पूछा "बुलाया आपने?"
अंगड़ाई लेते हुए नव्या ने कहा "हां, चाय बना दीजिए।"
अब कमला को भी जान लिया जाए। 27 साल की कमला नव्या के घर में खाना बनाती और सफाई करती है। वैसे तो वह बस एक नौकरानी है पर नव्या की सबसे अच्छी दोस्त भी है। वह नव्या से चार साल बङी है। नव्या ने हमेशा कमला को बङी बहन का सम्मान दिया। दोस्त होने के साथ कमला उसकी राज़दार भी है। वह नव्या के बारे में सब जानती है।
कमला ने चाय और नाश्ता लाकर नव्या को दिया। नव्या मेज़ पर बैठी चित्रकारी कर रही थी।
"ये किसका चेहरा बना रही हो, नव्या?" कमला ने उत्सुकता वश पूछा।
नव्या शर्म से लाल हो गई। पर कमला को सब पता ही था। नव्या की मुसकान उसके दिल का हाल सुना रही थी। कमला नव्या की मुसकान को समझने की कोशिश कर रही थी। इस समय कमला बस उसकी दोस्त थी जो नव्या की मुसकान का कारण जानना चाहती थी। नव्या को एहसास हुआ की अब छुपाने का फ़ायदा नहीं है।
नव्या ने जवाब दिया "ये अबीर हैं।"
"कौन अबीर?" कमला की जिज्ञासा बढ़ी।
"दफ्तर में काम करते हैं।" नव्या ने कमला को एकटक देखते हुए जवाब दिया।
कमला मुसकुराई और कहा, "सिर्फ काम करते हैं? तो फिर उनका चेहरा क्यों बना रही हो?"
कमला की बात ने उसके मन की बात को जुबान पर आने पर मजबूर कर दिया। नव्या ने लंबी सांस ली और स्वीकार किया "मैं उनसे प्यार करती हूं।" कहते हुए उसके गाल गुलाबी हो उठे।
कमला ने और जानने की इच्छा जताई। नव्या ने मुसकुराते हुए अबीर के बारे में सब बताया। अंत में नव्या ने अपनी बात पुरी करते हुए कहा “उनकी आँखों में कुछ है जो बहुत शुद्ध है। जब भी उन्हें देखती हूँ, एक खिंचाव-सा महसूस होता है।“
कमला ने अंत में मुसकुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा,
"वक्त आने दो, सब पता चल जाएगा।"
अरनव का घर
उधर, अरनव शराब के नशे में चूर अपने कमरे में बैठा नव्या की तस्वीर देख रहा था। तस्वीर में नव्या पीले सुट में मुस्कुरा रही थी। अरनव के मन और नज़र में प्रेम कतई नहीं था, सिर्फ वासना थी। वह नव्या को हर कीमत पर पाना चाहता था। उसकी वासना उसके शब्दों में उतरी और उसने खुद से कहा “देखना एक दिन नव्या मेरी हो जाएगी और अबीर तुम कुछ नहीं कर पाओगे” वह शराब पी रहा था। जाने कब तक वह बङबङाता रहा। कुछ देर बाद शराब के नशे में धुत, वह फर्श पर गिर पड़ा।
आखिर क्या चल रहा है अरनव के मन में?
क्या नव्या अबीर के सामने अपने प्रेम का इज़हार कर पाएगी?
भाग – चार
बढ़ती नजदीकियाँ और जलन
दिन बीतते गए और नव्या और अबीर का एक-दूसरे के लिए प्यार परवान चढ़ने लगा। दोनों अपनी-अपनी उलझनों में थे, कि कैसे प्यार का इजहार किया जाए? पर अब संभवतः भाग्य भी उन्हें मिलाना चाहता है, क्योंकि नव्या ने कुछ दिन पहले ही अबीर का चित्र पूरा किया है, जो वह उसे देना चाहती है। वह योजना बना रही है, कि कैसे अबीर से दिल की बातें की जाए। वहीं राघव भी अबीर को बात आगे बढ़ाने के लिए कहता रहता है। वह देख चुका है कि नव्या के मन में भी कुछ है। जाने कितने दिनों के विचार-विमर्श के बाद अबीर ने तय किया है, कि बात दोस्ती से शुरू की जाए, ताकि नव्या असहज न हो। फिर सही वक्त आने पर उसे अपने प्रेम से अवगत करा देगा।
और अब थी, वह घड़ी जब अबीर और नव्या करीब आएंगे। राघव खुद ही पहल करने वाला है, आज दोपहर में वह नव्या को भी साथ में खाना खाने के लिए बुलाने की तैयारी में है। अबीर और राघव आज समय से पहले ही दफ्तर आ चुके हैं, और दोनों ही जल्दी से अपना काम निपटाने में लगे हैं। घंटे-घंटे बीते, जैसे-जैसे समय घट रहा था, अबीर की घबराहट बढ़ती जा रही थी। डर इस बात का था कि अगर नव्या को अच्छा न लगा, तो बस। और आखिर दोपहर के एक बजे और राघव ने एक हाथ से अबीर की कलाई और दूसरे हाथ में दोनों के खाने का डिब्बा उठाया और सीधे बाहर की दुकान की ओर चल दिया, वह आगे और अबीर उसके पीछे-पीछे। तभी अबीर ने उसे रोका
"मेरी तूफान मेल, रुक जा।"
"क्यों?" राघव ने रुकते हुए पूछा
"अरे सामने देख। वो नव्या..." अबीर कहने लगा। तभी राघव बात काटते हुए बोला
"ओ भाई नव्या को बाद में बुलाएंगे।"
अबीर चिढ़कर बोला, "देख वो वहां उस मेज़ पर वह बैठी है।"
राघव एकदम से रुका और बोला, "यही मौका है,वह अकेली ही है, जा बात कर।"
अबीर असमंजस में उसे देखने लगा, उसकी ऐसी प्रतिक्रिया पर राघव समझ गया कि अबीर अब भी घबरा रहा है।
"रहने दे औघड़ प्रेमी, मैं उसे लेकर आया, तु चल।
अबीर ने धीरे से कहा “भाई आराम से कोई, गड़बड़ मत करना।"
राघव बस मुस्कुरा दिया और नव्या की ओर बढ़ा और अबीर दुकान की तरफ।
राघव ने नव्या की मेज़ पर हाथ खटखटाया, और नव्या के देखते ही बोला, "नव्या आप अकेले ही खाना खाएंगी?"
नव्या अचानक राघव के आने से सकपकाई और दुपट्टे को संभालते हुए बोली, "जी मैं हर दिन अकेले ही खाना खाती हूं।"
राघव ने मुसकुराते हुए कहा "कभी-कभी साथ भी खाना चाहिए।"
नव्या को बात समझ नहीं आई, सो वह चुप रही। राघव ने मुस्कुरा कर कहा "मैं आपको मेरे और अबीर के साथ खाना खाने के लिए बुलाने आया हूं।"
नव्या ज़रा असहज हो गई, और राघव ने उसकी असहजता भांपते हुए कहा "अगर आप नहीं चाहतीं, तो मैं आप पर दबाव नहीं बनाऊंगा। वो रोज़ आपको अकेले खाते देख हम दोनों को अच्छा नहीं लगता, तो सोचा कि……. ठीक है। मैं जाता हूं, अबीर मेरा इंतजार कर रहा है।" कहकर वह चला गया। नव्या के मन से एक आवाज़ उठी "अरे कितने प्यार से बुलाने आए थे, सोचना क्या अबीर भी तो वहां होंगे।" कुछ सोचकर वह अपना बैग लेकर सीधे राघव के पीछे चल दी, जब तक वह दुकान के पास पहुंची, तब तक राघव अबीर के पास पहुंच गया और उसके पास बैठ गया। जाने दोनों में क्या बात हुई, पर अबीर का चेहरा मुरझा गया। तभी उसके पैरों की आहट से दोनों का ध्यान टूट गया, जहां राघव हैरान था, वहीं अबीर का चेहरा फिर से खिल उठा। वह बिना कुछ कहे नव्या की ओर बढ़ा। नव्या का दिल ज़ोर से धड़क उठा और वह एकटक अबीर को देखने लगी, अबीर ने उसके पास आकर अटकते हुए कहा "न. न…नव्या जी, आने के लिए शुक्रिया।
नव्या मुस्कुरा दी, अबीर ने उसे अपने पीछे आने के लिए कहा और मेज़ की ओर बढ़ा। राघव तो जैसे जड़ हो गया और मन में बोला “अभी तो बङी शर्म आ रही थी, और अब नव्या खुद आई तो सीधे उसके पास चल गया। सही कहते हैं, प्यार इंसान को बदल देता है। लीजिए साहब की सारी लाज-शर्म छू मंतर हो गई।“ पर तभी नव्या और अबीर साथ में खड़े उसके एकटक देखने लगे तो वह सकपकाया और कहा "बैठिए नव्या, भाई बैठ जा।" कहकर वह झटपट उठा और नवल को तीन चाय के लिए कह आया।
अब तीनों एक ही मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे थे, राघव सहज था, पर नव्या और अबीर एक-दूसरे से आंखें मिलाने में कतरा रहे थे। वहीं अरनव दुकान के एक कोने में खड़ा तीनों को देख रहा था, और मन ही मन जल रहा था। इस सबसे बहुत दूर और अनजान राघव ने ही बात शुरू की और कहा
"तो शुरू करें?"
संयोग से नव्या और अबीर ने साथ ही कहा, "हां ज़रूर।" राघव हंस पड़ा और दोनों ने अपना सिर झुका लिया।
राघव ने छेङते हुए कहा "बस कीजिए आप दोनों, अब खाना है या बस यूं ही बैठना है?"
अबीर ने नव्या को देखते हुए कहा “चलें शुरू किया जाए, वरना बस समय निकल जाएगा।"
नव्या ने हां में सर हिलाया। तीनों साथ ही खाना खाने लगे, तभी नवल एक तश्तरी में तीन गिलास चाय ले आया। नव्या को देखकर चौंका, पर बिना कुछ कहे लौट गया। राघव ने चाय का गिलास उठाया और अबीर को इशारा किया। अबीर ने एक गिलास नव्या की ओर बढ़ा दिया, जिसे नव्या ने मुस्कुरा कर थाम लिया और उत्सुकता से चाय की चुस्की ली। राघव ने कहा
"यहां आसपास जितने दफ्तर है उन सब में, सबसे अच्छी चाय यही मिलती है।"
नव्या ने उत्सुकता से पूछा "सच?"
राघव मुसकुराया "हां, पीकर देखिए!"
नव्या ने की चुस्की ली और बोली "चाय तो सच में बहुत अच्छी है।“
राघव ने अबीर को ज़ोर से कोहनी मारी, और बात करने का इशारा किया। जिसपर अबीर मुस्कुरा दिया, और धीरे से पूछा
"आप यहां पहली बार आई हैं??"
नव्या के मुंह से अनायास ही निकला "हां, आपके लिए।"
राघव और अबीर दोनों चौंके, और एक साथ बोले
"क्या कहा आपने अभी?"
नव्या ने मन ही मन खुद को डांटा और बात को घुमाते हुए कहा "मेरा मतलब, आप दोनों के साथ, बुलाने के लिए धन्यवाद।"
अबीर ने मुसकुराकर कहा "ओह, कोई बात नहीं।"
राघव ने आंखें मटकाते हुए कहा "आप जब चाहें, हमारे साथ खाना खा सकती हैं।"
“प्रेम क्या चाहे, बस प्रिय का साथ” चाहे जैसे मिले। नव्या भी यही चाहती थी। उसने तुरंत प्रस्ताव स्वीकार किया और तीनों बातें करते हुए खाना खाते रहे।
दिन बीतते गए और अब अक्सर राघव नव्या और अबीर साथ ही खाना खाते। हर मुलाकात में अबीर और नव्या की सारी लाज और झिझक मिटती गई। और वे एक-दूसरे को जानने-समझने लगे। और एक-दूसरे का फोन नंबर ले लिया।
दिन बीतते गए और अब अक्सर राघव, नव्या और अबीर साथ ही खाना खाते थे, और हर बार अबीर और नव्या की सारी लाज, दुविधा मिटती गई। वे एक-दूसरे को जानने समझने लगे। वहीं अरनव अब अबीर से बहुत चिढ़ने लगा, और नित नई योजनाएं बनाता था, किस तरह अबीर और नव्या को करीब आने से रोका जाए। वहीं इस प्रपंच से दूर अबीर और नव्या जाने कब एक-दूसरे के दोस्त बन बैठे। मित्रता गहरी हो गई, और राघव बस उन्हें देखकर मुसकुराता रहता था। वह समझता था कि अबीर नव्या को बहुत चाहता है, इसीलिए कभी नव्या पर बुरी नज़र नहीं डाली।
क्या अबीर और नव्या का रिश्ता दोस्ती से प्यार का सफर तय कर सकेगा? आखिर अब अरनव क्या करेगा? और कब अबीर और नव्या एक-दूसरे के लिए अपने प्यार का इजहार एक-दूसरे के सामने उजागर करेंगे?
भाग - पांच
ढाई अक्षर प्रेम के
नव्या और अबीर की दोस्ती को जाने कितना समय हो गया है, पर अगर गिना जाए तो शायद छः महीने। अब दोनों एक-दूसरे की हर पसंद और नापसंद को समझने लगे हैं, जैसे अबीर को तेज मसाले वाला खाना पसंद नहीं है, नव्या को गाने सुनने का शौक है और ऐसी ही की ढेरों बातें, अगर एक सूची बनाई गई तो उसका अंत संभव नहीं। अबीर ने इस दिन का बहुत इंतज़ार किया है। और आखिर आज अबीर अपने प्यार का इज़हार नव्या के सामने करेगा। आज जो भी होगा वही इस प्रेम कहानी का भाग्य निर्धारित करेगा। और वह नव्या की सोच से भी परे है। योजना राघव की है, जिसके अनुसार आज दोपहर में राघव नव्या को अपने साथ दुकान के पीछे लेकर जाएगा, जहां अबीर पहले से होगा और वही अबीर नव्या से अपने दिल की बात कहेगा।
अभी कुछ वक्त बाकी है, दोपहर होने में। इसीलिए अबीर और राघव अपने काम में लगे हैं। कहते हैं कि जब भी कुछ होने वाला हो तो हमारा मन हमें अगाह करता है। और आज वही नव्या के साथ हो रहा है। रह-रहकर उसका मन उसे आगाह कर रहा है। क्या होने वाला है? बस सब ठीक हो। यही प्रार्थना करती हुई वह काम कर रही थी। जाने कितनी देर तक वह काम करती रही, जब उसका फोन बजा। देखा तो राघव ने लिखा था
"नव्या खाने का समय हो गया है, आप आ रही है?"
नव्या ने फौरन हां कहा और अपना बैग लेकर सीधे दुकान की ओर चल दी। वह अकेली नहीं थी, उसके पीछे-पीछे अरनव भी छिपते-छिपाते चल रहा था। कुछ ही देर में वह दुकान के बाहर पहुंच गई, जहां राघव उसकी राह देख रहा था। उसे कुछ खटका और राघव के पास जाकर पूछा
"राघव सर आप यहां हैं, तो अबीर सर कहां है?"
राघव को कोई बहाना नहीं सूझ रहा था, कि वह नव्या से क्या कहे। उसने कुछ सोचकर कहा
"आइए मेरे साथ।"
नव्या को कुछ समझ नहीं आया। उसने पूछा “कहां?"
राघव ने संभलते हुए कहा “आपको अबीर से मिलना है न?"
नव्या, राघव की बातों से उलझकर बोली “कहां हैं अबीर?” कहकर नव्या को अहसास हुआ कि आज पहली बार उसने “अबीर सर” नहीं बस “अबीर” कहा है। उसने सिर झुका लिया और राघव से पूछा "कहां हैं अबीर?"
"राघव ने अपनी बात दोहराई “मेरे साथ चलिए, अबीर के पास ले चलता हूं।"
कहकर वह पलट कर दुकान के बाहर निकल गया और नव्या उसके पीछे चल पड़ी। करीब दस मिनट बाद दोनों दुकान के पीछे बने बैंच के पास थे, जहां अबीर चक्कर काट रहा था। उसके माथे की लकीरें उसकी हालत की गवाही दे रही थी। राघव ने उसे पुकारा
"अबीर??"
अबीर ने देखा सामने नव्या राघव के साथ खड़ी है। राघव उसके पास आया और उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा “भाई मैंने अपना काम कर दिया। अब आगे देख लेना, घबराना मत, बात सीधे कहना और संयम रखना।"
अबीर मुस्कुरा दिया और राघव ने नव्या को छेड़ते हुए कहा, "नव्या मेरा दोस्त डरपोक है, तो आप उसे संभाल लीजिएगा और न मत कहिएगा।" कहकर वहां से फौरन निकल गया। अब अबीर और नव्या एक-दूसरे के सामने खड़े थे। ठंडी हवा में नव्या के बाल लहरा रहे थे। अबीर अपने दोनों हाथ पीछे बांधे खङा था, वहीं नव्या के मन में ढेरों सवाल थे। वह जानना चाहती थी कि आखिर राघव ने न कहने से मना क्यों किया? और ये अबीर क्या कहने में इतना डर रहे हैं। और आखिर उसने अपने मन की बात रखी और बिना रुके अबीर पर सवाल दागती चली गई।
"अबीर सर, ये हो क्या रहा है? और आप यहां क्या कर रहे है, राघव सर की बात का मतलब क्या है? क्या कहने वाले हैं आप? बताइए।"
अबीर नव्या के इतने सवालों से घबरा गया। अचानक पीछे पलट कर उसने लंबी और गहरी सांसें भरी। सामान्य होते ही वह पलट गया और नव्या की देख कर कहा
"नव्या जी, मैं आपके हर सवाल का जवाब अभी दूंगा।"
नव्या ने बस हां में सर हिलाया और अबीर की अगली बात सुनने के लिए तैयार हो गई। अबीर ने कहना शुरू किया "नव्या जी, आज मैं आपसे अपने मन की बात कहने यहां आया हूं। मुझे अपने डर पर काबू पाने में बहुत समय लग रहा था सो आपको बुलाने के लिए राघव को कहा। मैं…….. मैं.. अबीर के शब्द लड़खड़ाने लगे थे।
अबीर जितना ज्यादा समय, कहने में लगा रहा था, उतनी ही तेज़ी से नव्या का दिल धड़क रहा था। जाने क्यों उसे एक अलग सी उमंग का अनुभव हो रहा था। अबीर ने घुटनों पर बैठते हुए कहा
"नव्या जी, मैं आप से प्यार करता हूं।"
अबीर ने आखिरकार अपनी बात कह दी और नव्या अपनी जगह पर जम जैसे जम गई। दिल जैसे सीने से बाहर निकल आए, ऐसी स्थिति में वह बस खुद को संभाले खड़ी थी। अबीर ने एक गुलाब और एक ख़त नव्या की ओर बढ़ा दिया और जवाब के इंतज़ार में उसे देखता रहा।
नव्या ने प्रेम की पहली सौगात को बहुत भावहीनता से थाम लिया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या और कैसे कहे। कुछ देर उसने अबीर से कहा "अबीर सर, आप उठिए।"
नव्या की भावहीनता बाहरी प्रतिक्रिया थी। वास्तव में नव्या इस अप्रत्याशित घटना से जितनी हैरान थी, उतनी ही खुश भी। बस प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार नहीं थी।
वह वहां से निकल कर सीधे दफ्तर के मालिक के केबिन के पास जा पहुंची। इधर अबीर असमंजस में नव्या को जाते हुए देखता रहा। अरनव जो नव्या और राघव के पीछे यहां तक आ गया था, वह एक पेड़ की ओट से यह सब देखकर खुश हो रहा था। वहीं नव्या की स्थिति भी गंभीर थी। मन में भावनाओं का ऐसा सैलाब उठा कि वह खुद को बड़ी मुश्किल से संभाल पा रही थी। ऐसे में घर जाना उसे सबसे अच्छा उपाय लगा। उसने कमरे का दरवाजा खटखटाया, कुछ देर बाद भीतर से आवाज आई "आ जाइए"
नव्या ने कमरे का दरवाजा धीरे से खोला और अन्दर चली आई। जहां सामने करीने से सजी मेज़- कुर्सी पर दफ्तर का मालिक ललित बैठा कुछ सोच रहा था। नव्या को सामने देख वह कल्पनाओं के संसार से वापस वर्तमान में चला आया और कहा
“आइए नव्या, बैठिए"
नव्या ने बैठते हुए कहा “शुक्रिया सर।"
ललित ने पूछा “क्या बात है आप अचानक आईं, बस ठीक है ना?"
नव्या ने झिझकते हुए अपनी बात रखी “जी सर, सब ठीक है, क्या मुझे आज छुट्टी मिल सकती है?"
ललित ने सवाल किया “छुट्टी क्यों?"
नव्या का खुद से नियंत्रण छुटने लगा था। उसने खुद को संभालते हुए कहा “सर मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।"
ललित का ध्यान अब उसके चेहरे पर गया। नव्या का चेहरा लाल हो गया था। उसे लगा की यह लाली बुखार या किसी और कारण से आई थी। ललित को क्या पता की यह शर्म की लाली है। आखिर उसने मुसकुराकर कहा “ओह कोई बात नहीं, आप बेशक जा सकती हैं।"
नव्या वश मुसकुराते खङी हुई और कहा “शुक्रिया सर।"
नव्या सीधे कमरे के बाहर निकल गई। दफ्तर के मुख्य द्वार के बाहर आकर अपने घर पर फोन करके से ड्राइवर बुला लिया और इंतजार करने लगी। करीब आधे घंटे बाद उसका ड्राइवर आया, वह गाड़ी में बैठी और सीधे घर निकल गई। और वही अबीर अब राघव के साथ था। उसके कुछ नहीं खाया था। वह नव्या के बर्ताव से दुविधा में पड़ गया था, उसे नव्या की चिंता खाए जा रही थी। वहीं राघव भी अबीर को देख परेशान था। दोपहर से शाम घिर गई, पर अबीर के चेहरे की रौनक न लौट सकी। आज भी राघव और अबीर साथ ही घर जा रहे थे। आज अबीर बहुत शांत था, पर राघव को अब सच जानना था कि आखिर उसके जाने के बाद क्या हुआ था, जिससे अबीर इतना दुखी है। जब दोनों बस में चढ़े, तो रोज़ की तरह आज भी बहुत भीड़ थी। दोनों खिड़की के पास जाकर खड़े थे। आखिर राघव ने अबीर के कंधे पर हाथ रखा
जिससे अबीर का ध्यान टूट गया।
राघव ने पुकारा “अबीर?"
अबीर ने धीमी आवाज में जवाब दिया “हां बोल ना!"
राघव ने अपनी बाहें उसके गले के इर्द-गिर्द लपेटते हुए पूछा “भाई मेरे, क्या हुआ?"
अबीर ने मपा-तुला सा जवाब दिया “कुछ नहीं।"
राघव ने मुसकुराकर कहा “बेटा, तेरी रग-रग को जानता हूं मैं। तो मेरे सामने तेरा कोई झूठ नहीं चलेगा।"
अबीर ने छुपाने की कोशिश की ‘मैंने कहा ना, कुछ नहीं।"
राघव भी हठी था। अपनी बात पर अड़ते हुए बोला “मैं कह रहा हूं, कि तू कुछ छुपा रहा है।"
अबीर ने ना में सिर हिलाया।
राघव ने हल्के गुस्से में कहा “मैं आखिरी बार पूछ रहा हूं।"
अबीर जानता था कि राघव जो कहता है, वह कर ही देता है। और उससे कुछ भी छिपाना बेकार है। उसने राघव को सब सच बता दिया।
राघव ने पूरी बात सुनकर कहा "मैं समझ रहा हूं कि तेरे मन में क्या चल रहा है। पर एक बात हमेशा याद रखना। स्त्रियां दिल टूटने से, प्रिय को खोने से और अकेलेपन से बहुत डरती हैं। इसीलिए अचानक से किसी के प्यार पर विश्वास और स्वीकार नहीं कर पातीं। और प्यार के मामले में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। थोड़ा सब्र कर और नव्या को थोड़ा समय दे।"
कहकर राघव चुप हो गया और मन ही मन ईश्वर से कहा "हे प्रभु मैंने इसे तो समझा दिया, पर डर मुझे भी लग रहा है। कहीं नव्या का इंकार मेरे यार के चेहरे की रौनक न छीन ले। सब अच्छा करना।"
सारे रास्ते अबीर चुपचाप खिड़की के बाहर देखता रहा। और राघव भी चुप रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे। इसी तरह दोनों अपने-अपने घर चले गए। क्या नव्या अबीर के प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार करेगी? अब क्या करेगा अरनव?
भाग - छः
ढाई अक्षर प्रेम के - 2
उस दोपहर नव्या सीधे अपने घर चली गई। रास्ते भर वह सोचती रही कि क्या सब सही है? क्या अबीर सच में मुझसे प्यार करते हैं? या बस मुझे ही ऐसा लगता है? जाने कितनी बातें उसके मन में आती- जाती रही। घर पहुंच कर वह सीधे अपने कमरे में चली गई। वह जाकर सीधे बाथरूम में घुसी, जाने कितनी देर तक वह झरने के चलते पानी के नीचे खड़ी रही। जब मन ज़रा शांत हुआ तो वह बाहर आई, तो देखा कि कमला उसके कमरे में चाय और नाश्ता लेकर खड़ी थी।
इतिहास गवाह है कि नौकर चाहे मालिक के कितने भी करीब हो, पर मालिक और नौकर होने की खाई भर नहीं पाई। और कुछ यही स्थिति कमला की थी, भले ही नव्या ने हमेशा ही कमला का सम्मान किया। उसे अपने सामने बस दोस्त बनकर रहने के लिए कहा। पर कमला कभी उसकी अनुपस्थिति में तब तक नहीं बैठी, जब तक नव्या न आती। आज भी यही हुआ।
नव्या ने कमला को देखकर कहा, "दीदी, आपसे कितनी बार कहा है, कि अगर आप कमरे में मेरा इंतजार करती हैं तो पलंग पर बैठ जाया कीजिए।"
कमला ने मुसकुराकर कहा, "यह बस छोड़ो और यह बताओ कि इतनी जल्दी कैसे आ गई?"
नव्या ने कमला को अपने पास बैठाते हुए कहा, "दीदी घर में आप नौकर होंगी, पर मेरे लिए आप मेरी दोस्त हैं, मेरी सबसे अच्छी दोस्त। यह मालिक-नौकर वाली बातें मेरे साथ नहीं।"
कमला ने सहमति में सिर हिलाया और कहा "अच्छा ठीक है, अब मेरी बात का जवाब दो।"
नव्या ने बहाना बनाते हुए कहा "वो तबीयत ठीक नहीं थी, इसीलिए चली आई।"
कमला ने नव्या का माथा छूकर देखा और कहा, "सच कह रही हो?"
नव्या ने "हां।" कहकर चाय की चुस्की ली। गर्म चाय गले से उतरी तो मन में अबीर के साथ के साथ आज की मुलाकात याद आईं।
"ये क्या है नव्या?"
कमला के पूछने पर नव्या ने कमला की ओर देखा। वह अचानक सकपकाई, क्योंकि उसके बैग से अबीर का दिया गुलाब झांक रहा था। नव्या ने खुद से कहा, "अरे यार, मर गई। क्या करूं अब?"
नव्या को चुप देख कमला ने फिर से पूछा, "नव्या बताओ न, ये फुल कहां से आया?"
नव्या ने झिझकते हुए कहा "वो..वो ये मैंने खरीदा था....रास्ते में।"
कमला नव्या के हर लहज़े को भली-भाँति पहचानती थी। एक पल में उसे पता चल गया की नव्या झूठ बोल रही है। उसने नव्या से शरारत करने का सोचा
उसने चहकते हुए कहा
"सच में, चलो इसे बगीचे में लगाते हैं।"
कहकर वह कमरे से जाने लगी।
नव्या हड़बड़ा गई और खुद से बोली "हे भगवान अब चुप रही तो ये सच में ही मेरे प्यार की निशानी को बगीचे की धूप में झुलसा देंगी। इन्हें रोकना ही होगा"
नहीं ऐसा मत करना!" कहकर उसने कमरे का दरवाज़ा बंद करके कमला को बिस्तर पर बैठा दिया। और गुलाब उसके हाथ से ले लिया।
"क्या है, नव्या। एक फूल भी नहीं लगाने देती।" कमला ने चिढ़कर कहा और नव्या से मुंह फेर लिया।
नव्या को कमला की इस प्रतिक्रिया पर हंसी आ गई। उसे अच्छा लग रहा था कि आखिर कमला उससे दोस्त की तरह रूठ कर अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रही है।
नव्या ने कमला को मनाते हुए कहा, "आपको बगीचे में गुलाब लगाना है?"
कमला ने उसी सूर में कहा, "अब नहीं लगाना, रहने दो।"
"मैं फुल लाऊंगी, फिर लगा लिजिएगा" नव्या ने मिन्नत की।
"क्यों ये है तो?" कमला ने प्रतिवाद किया। नव्या ने अपने हथियार डाल दिए और गहरी सांस लेकर कहा, "आप इसे बगीचे में नहीं लगा सकतीं।"
"क्यों?" कमला ने पलट कर कहा।
अब नव्या धीरे से बोली, "अच्छा, आप किसी के प्यार की सौगात को धूप में झुलसा देंगी?"
कमला को बात कुछ हद तक समझ आई, तो उसने पूछा, "किसकी है ये सौगात?"
"मेरी है, दीदी।" नव्या ने मुस्कुरा कर कहा।
"क्या मतलब? साफ़-साफ़ बोलो," कमला का संयम चुर हुआ।
नव्या ने कहा, "आज अबीर ने मेरे सामने अपने प्यार का इज़हार किया, और सौगात में यह गुलाब और यह चिट्ठी दी।"
कमला मुसकुराई और आंखें मटकाते हुए कहा, "अच्छा, और यह चिट्ठी क्या है। प्रेम पत्र?"
नव्या का चेहरा गुलाबी हो उठा उसने जवाब दिया, "पता नहीं, मैंने खोला नहीं।"
अच्छा मैं जाती हूं, तुम इसे खोलकर पढ़ो।" कहकर कमला ने बर्तन उठाए और कमरे के बाहर हो गई।
नव्या ने दरवाज़ा बंद किया और पलंग पर बैठ गई, और सफ़ेद लिफाफे से एक कागज़ निकाला। क्या लिखा है इसमें? सोचकर उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। धड़कते दिल पर हाथ रख उसने कागज़ की तहों को खोला और पढ़ना शुरू किया, लिखा था:
“नव्या जी,”
“मैं अबीर, आज आपसे अपने प्यार का इज़हार करता हूं। मैं प्यार करता हूं आपसे। आज से नहीं जब से आपको देखा तब से करता हूं। अगर आपको मेरा प्रेम प्रस्ताव स्वीकार है, तो मुझे ज़रूर बताइए। और नहीं है, तब भी बताइए। ख़त के साथ एक चेन है। अगर आप उसे पहन लें, तो आपका आभारी रहूंगा। अगर प्यार की सौगात के रूप में नहीं तो दोस्ती की निशानी के रूप में उसे रख लिजिएगा। मैं आपके हर फैसले का सम्मान करता हूं। आपके जवाब का इंतजार रहेगा।“
“आपका औघङ प्रेमी”
“अबीर”
नव्या ने चिट्ठी पढ़ते हुए ही सोच लिया था, कि अब बस तलाश खत्म!
आखिर वह भी तो अबीर को चाहती थी, तो उसके प्यार को अपनाने में कैसी झिझक। उसने गुलाब को अपनी आंखों से लगाकर चूम लिया और चिट्ठी को सीने से लगा लिया। यह अबीर के प्यार को अपनाने की एक शुरूआत थी। उसकी आँखों में आँसू और अबीर का मुसकुराता चेहरा मन में उतर आया। तभी उसे चेन का ध्यान आया। लिफाफे में टटोलने पर उसे एक चांदी के रंग की चेन मिली, जिसमें एक छोटा सा दिल बना था।
कहते हैं, की प्रेम में पङी स्त्री का दिल छोटा होता है। उस दिल का एकमात्र अधिकारी बस उसका प्रियतम होता है। नव्या ने उस छोटे दिल को अपने दिल से जोड़ा, वो दिल जिसमें अबीर जाने कब बस गया था। उसने कुछ सोचकर चेन बैग में छुपा ली। जाने कब वह चिट्ठी को सीने से लगाए सो गई। शाम को जब वह उठी, पहले उसने चिट्ठी को अलमारी में कपड़ों के बीच में बड़े जतन से छुपा दिया। फिर वह अपने काम में लग गई। रात घिर गई थी। तब उसके मन में एक सवाल आया, कि अब उसकी बारी है, अबीर को अपने प्रेम से अवगत करवाने की। तो यह कैसे होगा?
इसी उधेड़बुन में उसने खाना खाया और अब उसे अबीर का मुसकुराता चेहरा याद आने लगा। अबीर के प्यार रंग उसपर छाने लगा। उसके गाल थोड़े और गुलाबी हो गए। किसी तरह वह देर रात तक सोचते हुए सो गई थी। कल जो भी होगा वो अबीर सपने में भी सोच नहीं सकता।
कुछ इसी तरह अबीर की रात भी काम में डुबे हुए कट ही गई। वह सो भी न सका बस झपकी ही ली कि फोन की घंटी से नींद टूटी। देखा तो राघव ने लिखा था, "भाई आज जल्दी निकलते हैं, क्योंकि आज शनिवार है। दिन चढ़ते भीड़ बढ़ जाएगी।"
"ठीक है, मिलते हैं।"
कहकर वह गुसलखाने में गया और करीब आधे घंटे बाद बाहर आया। आईने पर अपना चेहरा देखकर ठहर गया। रात की नींद पूरी न होने के कारण चेहरा थोड़ा बुझा सा था, और आंखें सूज गई थीं। एक झूठी मुस्कान लेकर वह कमरे के बाहर आया। मां ने मेज़ पर चाय रखते हुए पूछा, "ये क्या हुआ?"
अबीर ने अनजान बनते हुए पूछा, “क्या हुआ, मां?”
मां ने उसे घुरते हुए कहा “तेरे चेहरे को क्या हो गया है? रात सोया नहीं था?”
अबीर ने पुराना बहाना दोहरा “दिया वो काम था न, तो सो नहीं पाया। बस उसी से...”
मां, बात काटते हुए बोली “बस काम-काम-काम! जिंदगी के बारे में भी सोच लो।“
अबीर मां के ये ताने सुनकर मुस्कुरा दिया और खाने का डिब्बा लेकर निकल गया। रास्ते में उसने राघव को भी निकलने को कह दिया। करीब 10 मिनट बाद दोनों एक-दूसरे के सामने थे। राघव अबीर के चेहरे को देखकर समझ गया कि वह सारी रात नहीं सोया। तभी बस आ गई, और दोनों चुपचाप बस में अपनी जगह पर खड़े हो गए।
"क्या हुआ, मेरे औघड़ प्रेमी?" राघव ने मौका पाते ही अबीर को छेड़ा।
"कुछ नहीं यार," अबीर ने नपा-तुला सा जवाब दिया।
राघव, अबीर को हंसाने के लिए हल्की आवाज़ में गाने लगा, "आ मेरी जान, मैं तुझमें अपनी जान रख दूं। तेरे दिल में, मैं अपने अरमान रख दूं।"
अबीर अचानक ही मुस्कुरा दिया और बड़ी अदा से बोला, "सच में?"
राघव अबीर को मुसकुराते देख खुश हो गया और उसके कानों में फुसफुसाया, "हां मेरी जान। घर के बाद तू ही तो है।"
अबीर बस मुस्कुरा दिया और बातों में सफर कट गया।
उधर नव्या भी अपने घर से एक संकल्प लेकर दफ्तर चली आई थी। सब अपने-अपने काम में लगे थे। एक पल के लिए भी अबीर, नव्या की भावहीनता और उसका चले जाना भूल न पाया। उसने फैसला किया कि वह दोपहर में नव्या से मिलकर उससे माफ़ी मांग लेगा। वहीं नव्या ने सोच लिया था कि आज वह अबीर के सामने अपने प्यार का इज़हार करेगी।
देखते हैं, कौन किसके सामने झुकेगा?
किसी तरह दोपहर हुई। राघव और अबीर केबिन से निकले ही थे कि सामने से नव्या आती दिखाई दी। उसके चेहरे पर मिले-जुले भाव थे। राघव ने नव्या को हाथ हिलाकर अपनी ओर बुला लिया। तीनों साथ ही दुकान की ओर चल पड़े। अबीर, नव्या के मन को समझ नहीं पा रहा था और उससे आंखें चुरा रहा था। जैसे ही वे दुकान के पास पहुंचे, तभी हल्की सी आहट सुनाई दी, जैसे कोई उनके पीछे चल रहा हो। पर उनके पलटते ही वह कहीं हवा हो गया।
"कौन है वहां?" नव्या ने अचानक कहा।
राघव ने पूछा, "क्या हुआ, नव्या?"
नव्या ने यहां-वहां देखते हुए कहा “कोई है, यहां। कोई हमारे पीछे आ रहा था।“
अबीर ने सहज होकर कहा “कोई नहीं है, नव्या जी।“
नव्या ने नकारते हुए कहा “नहीं, कोई था।“
राघव ने मुसकुराते हुए बात संभाली “भ्रम हुआ होगा आपको।“
कहकर उसने दोनों को अंदर चलने का इशारा किया।
सब अंदर चले आए और अपनी नियत जगह पर बैठ गए। गहरी चुप्पी छाई हुई थी, जिससे राघव को कुछ होने का अहसास हुआ। उसने चुप्पी तोड़ते हुए नव्या से पूछा, "नव्या, आप कल जल्दी चली गई थीं?"
नव्या को एक पल में ही कल की घटना याद आ गई। वह असहज हो गई।
अबीर ने राघव को कोहनी मारी और चुप रहने का इशारा किया। राघव चुप हो गया।
नव्या ने बहुत सोचकर कहा, "हां।"
राघव ने गंभीरता से पूछा “क्या बात है, सब ठीक है न?”
नव्या ने सिर झुका लिया और धीरे से कहा “जी, बस तबीयत ठीक नहीं थी, इसीलिए...”
कहकर वह चुपचाप खाना खाने लगी।
अबीर का मन ग्लानि से भर उठा। कहीं न कही उसे लगने लगा था, की नव्या की इस हालत का ज़िम्मेदार वही है। उसके गले से निवाला नहीं उतरा। वह शांत बैठा रहा। राघव सब समझ गया था, पर क्या कहे, समझ नहीं पा रहा था। करीब पंद्रह मिनट बाद नव्या उठ खड़ी हुई। अबीर ने मौका पाते ही उसे रोका।
"नव्या जी, मेरी बात तो सुनिए"
नव्या को अचानक अहसास हुआ कि वह लोगों से घिरी हुई है। यहाँ बात करना सही नहीं होगा। उसने अबीर को अपने साथ चलने का इशारा किया। अबीर का मन कांप उठा। राघव ने उसे जाने का इशारा किया। नव्या के पीछे अबीर और उनके पीछे अरनव। दोनों दुकान के पीछे की ओर पहुंच गए, और अरनव पेड़ की ओट में छिप गया।
नव्या और अबीर एक-दूसरे के सामने खड़े हैं। हल्की हवा में नव्या का दुपट्टा और घने बाल लहरा रहे हैं। अबीर डर रहा है “आज तो गया। यार, थप्पड़ मार दिया तो? अगर किसी ने देख लिया तो क्या इज़्जत रह जाएगी? सुना है की लड़कियाँ बहुत ज़ोर से मारती हैं।“
आखिर अबीर हिम्मत करके बोला, "नव्या जी, सुनिए न?"
नव्या चुप थी।
असहाय हालत में अबीर ने हाथ जोड़कर कहा “मुझे माफ़ कर दीजिए। कल मैंने जो भी किया, नहीं करना चाहिए था। पर मेरा कहा हर शब्द सच था। फिर भी मैं आपके फैसले का सम्मान करता हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण हमारी दोस्ती खराब हो। हो सके तो, सब भूलकर मुझे माफ़ कर दीजिए।“
नव्या तो बहुत पहले ही अबीर के प्यार को अपने दिल में बसा चुकी थी। उसका मन मोम की तरह प्रेम अग्नि में पिघलने लगा। चुप रहना भारी पङने लगा था। वह तो कुछ और सोचकर आई थी, पर अबीर की ऐसी हालत देखकर उसे हँसी आ गई। आखिर उसने अपनी चुप्पी तोड़ी और अबीर को छेङते हुए कहा "मैं आपको कभी माफ नहीं करूंगी।"
अबीर का दिल डूबने लगा। पर हाथ अब भी जुड़े थे। अपने मन की बात रखते हुए अबीर ने कहा “पर, नव्या जी, मैं आप पर कोई दबाव नहीं बना रहा। स्वीकार करना या न करना आपकी इच्छा है।“
नव्या ने अपने मन की तमाम गंभीरता को चेहरे पर इक्ठ्ठा करते हुए कहा “माफ़ी चाहिए आपको?”
अबीर ने बात पुरी होते ही कहा “हां।“
नव्या के मन में शरारत आई। उसने उसी सूर में पूछा “तो मैं जो कहूं, आप करेंगे?”
अबीर के मन में सवाल उठा “अब क्या करवाएंगी ये?” वह खुद में ही गुनगुनाया "प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया?" अबीर ने कहा “हां, करूंगा।“
नव्या के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान छा गई। प्यार में बहुत ज़रूरी है की एक-दूसरे को करीब होने का एहसास कराया जाए। नव्या को अबीर का उसे “नव्या जी” कहना बहुत खटकता था। जब अबीर उसे नव्या “जी” कहता तब उसे वह खुद से बहुत दूर लगता था। वह चाहती थी अबीर उसे “नव्या” कहे। उसने अपनी इच्छा व्यक्त की "तो मुझे मेरे नाम से बुलाइए।"
अबीर ने फौरन कहा “नव्या जी।“
नव्या ने मन ही मन हंसते हुए कहा "जी, नहीं आता मेरे नाम में।"
अबीर को कुछ समझ नहीं आया। वह चुप रहा, जिसपर नव्या मुसकुराई और बोली
“सिर्फ नव्या कहिए।“
अबीर ने झिझकते हुए उसकी बात मान ली और पहली बार लड़खड़ाते हुए उसका नाम लिया “न...न...नव्या।“
नव्या का मन खिल उठा और वह बोली “ये हुई न बात। अब जब भी कहेंगे, तो सिर्फ़ नव्या कहिएगा।“
अबीर ने हल्के से मुसकुराते हुए सहमति जताई। पर वह नहीं जानता था की नव्या के मन में क्या चल रहा था। नव्या ने बैग से अबीर की दी हुई चेन निकाली और उसकी ओर बढ़ा दी। अबीर सकपकाया। उसे लगा कि नव्या चेन लौटाने वाली है।
अबीर ने धीमी आवाज में कहा “नव्या, इसे मत लौटाइए। उपहार लौटाया नहीं करते।“
नव्या ने सोचने का नाटक करते हुए कहा “हां, उपहार नहीं लौटाते। तो मैं क्या करूं?”
अबीर ने हथियार डालते हुए कहा “जो आप चाहें, बस लौटाइए नहीं।“
अब नव्या अबीर को और परेशान नहीं करना चाहती थी। नव्या ने शर्माते हुए अबीर को देखते हुए कहा “मेरी मदद कीजिए। चेन पहना दीजिए।“
अबीर का दिल तेज़ी से धङक उठा। उसे विश्वास नहीं हुआ। सच तो यह था की वह हमेशा ही अपनी झिझक के कारण लड़कियों से दूर रहा था। उसे नव्या से ऐसी कोई बात सुनने की उम्मीद न थी। डर यह भी था कहीं गलती से नव्या असहज न हो। उसने झिझकते हुए पूछा “क्या? मैं पहनाऊँ? पर”
नव्या ने आँखें सिकोड़ते हुए अबीर की कही बात उसी पर पलटते हुए कहा “अभी कहा आपने कि जो मैं कहूं, वो करेंगे आप।“
अबीर ने जवाब दिया “हां, कहा था।“
नव्या ने उसी तरह आदेश दिया “तो कीजिए और अपनी कही बात का मान रखिए“
अबीर के चेहरे पर शर्म की हल्की लाली उतर आई। उसने मिन्नत करते हुए कहा “नव्या, यह मुझसे नहीं होगा। कोई और काम है मेरे लिए?
नव्या एकटक अबीर के चेहरे पर छायी लाली देखते बोली “ठीक है, माफ़ी नहीं मिलेगी।“ कहकर उसने मुंह फेर लिया। बेचारा औघड़ प्रेमी, "मरता क्या न करता।" उसके लिए नव्या की नाराज़गी असहनीय होने लगी थी। झिझकते हुए उसने कहा, "अच्छा, ठीक है।"
सुनकर नव्या पलट गई, और आगे बढ़कर अबीर के जुड़े हाथों को नीचे किया। नव्या की अप्रत्याशित प्रतिक्रिया पर अबीर के दिल के सारे तार झनझना उठे। शरीर में तेज़ सनसनाहट दौड़ गई। उसने हिम्मत करके कहा, "लाइए, दीजिए।" नव्या ने चेन अबीर की ओर बढ़ा दी। बड़ी मुश्किल से अबीर ने चेन को उठाया, तो नव्या ने आगे बढ़ने का इशारा किया। अबीर की धड़कनें बढ़ने लगी थीं, पर उसने बड़ी सावधानी से नव्या को छूए बिना आंखें बंद करके चेन पहनाई। नव्या को अबीर की घबराहट पर हंसी आ रही थी। जाने कब वह अबीर की बाँहों के घेरे से निकलकर ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गई। अबीर अब भी आँखें बंद किए खङा था। आखिरकार उसने अबीर से कहा, "आंखें खोलिए, अबीर।" अबीर ने पीछे हटते हुए आंखें खोलीं, तो सामने नव्या घुटने पर बैठी उसे मुसकुराते हुए देख रही थी। अबीर को कुछ समझ नहीं आया। उसने पूछा, "क्या कर रही हैं आप?"
नव्या ने सारी हिम्मत बटोरकर कहा, "कुछ कहना है आपसे!"
अबीर उसकी ओर उसे उठाने के लिए बढ़ा और बोला "जरूर कहिए, पर पहले उठिए।"
नव्या ने ज़िद करते हुए कहा, "नहीं, पहले मेरी बात सुनिए।"
नव्या को किसी बच्चे की तरह जिद करते देख अबीर ने एकटक उसे देखने लगा। वह उसकी मासूमियत में खो गया। नव्या ने कहना शुरू किया, "अबीर, मैं….. मैं…"
वे भावनाएँ अबीर को भी महसूस होने लगीं। जो कल नव्या कल महसूस कर रही थी। वह बस खुद को संभाले खड़ा था। नव्या ने गहरी सांस ली और एक सांस में अपनी बात कह दी, "अबीर, मैं भी आपसे प्यार करती हूं। आज से नहीं, जब आपको देखा, तब से करती हूं। बस आपके अचानक कहने पर मैं भावनाओं में बह गई, और खुद को संभाल नहीं सकी। समझ नहीं आया क्या कहूँ, इसीलिए मैं चली गई थी। मुझे माफ़ कर दीजिए। मेरे कारण आप बहुत परेशान हुए।"
“कोई बात नहीं नव्या” अबीर ने मुसकुराते हुए कहा।
अबीर को तो जैसे दुनिया की सारी खुशियाँ मिल गईं थीं। उसने आगे बढ़कर नव्या को कंधे पकड़कर उठाया।
अबीर ने गंभीरता से कहा, “एक बात कहूँ?”
नव्या ने अबीर की गंभीरता को भांपते हुए पूछा, “हाँ, कहिए न।”
अबीर ने एकटक नव्या को देखते हुए कहना शुरू किया, “आप आज तो मेरे सामने झुक गईं, पर आगे से कभी मत झुकिएगा।”
“क्यों?” नव्या ने धीरे से पूछा।
अबीर हल्के से मुसकुराया और बोला, “क्योंकि मैं हर स्त्री को देवी का दर्जा देता हूँ, आपको भी। आप वह हैं, जो ईश्वर का अंश है। मेरी हैसियत नहीं कि परम शक्ति का अंश मेरे आगे झुके।”
नव्या खुद को मुसकुराने से रोक न सकी। दोनों एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे, और पास के पेड़ की ओट में छिपा अरनव उन दोनों को देख रहा था। वह नव्या को ऐसे देख रहा था, जैसे शेर के सामने से कोई शिकार छीन ले।
इस सबसे दूर, बेचारा राघव बैठे-बैठे थक गया था। वह उठकर सीधे बाहर आकर दोनों को खोजने लगा। कुछ सोचकर वह दुकान के पीछे पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि अबीर और नव्या एक-दूसरे को देख रहे थे। "ये क्या हो रहा है?" मन में सोचते हुए वह आगे बढ़ने लगा, लेकिन उसकी नजरें पेड़ पर अटक गईं। उसने देखा कि अरनव गुस्से में पेड़ के पीछे छिपा हुआ था और सब कुछ देख रहा था। राघव को कुछ खटका। उसने अरनव को टोका, “यहाँ क्या कर रहे हो तुम?”
अरनव उसके अचानक आने से सकपका गया और जल्दी से “कुछ नहीं” कहते हुए वहाँ से भाग निकला। अब राघव को अरनव पर शक हो रहा था, लेकिन वह उसे छोड़कर आगे बढ़ा। राघव के आने पर नव्या और अबीर दोनों हड़बड़ाकर नजरें चुराने लगे। राघव ने एक बार नव्या के गले में झूलती चेन को देखा और एक बार अबीर की मुस्कान।
वह मुसकुराते हुए अबीर के कंधे पर हाथ मारते हुए बोला, “इश्क मुबारक हो, दोस्त।”
अबीर बस मुस्कुरा दिया और उसे गले लगा लिया।
कुछ देर बाद अलग होकर उसने नव्या से कहा, “आपको भी इश्क मुबारक, नव्या।
अबीर ने मुसकुराते हुए कहा “पता है, संत कबीर कह गए हैं – ‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय।’ यहाँ पंडित नहीं होना चाहिए।”
राघव ने हैरानी से पूछा “यह दोहा कहां से सीख लिया?”
अबीर मुसकुराया और बोला “बस हो गया।“
नव्या ने उत्सुकता से पूछा, “तो क्या होना चाहिए?”
अबीर ने नव्या की गहरी आँखों में देखते हुए कहा, “ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो प्रेमी होय।”
नव्या ने मुसकुराकर सिर झुका लिया। इस पर राघव ने ठिठोली करते हुए कहा, “अच्छा, नव्या, अब मैं आपको भाभी कहूँ या नव्या?”
नव्या के गाल गुलाबी हो उठे। वह बस मुसकुराकर अबीर को देखने लगी। वह दिन बेहद खूबसूरत था। और क्यों न हो, अबीर और नव्या एक-दूसरे के हो गए थे।
लेकिन, क्या यह प्रेम कहानी अपने अंजाम तक पहुँच पाएगी? क्या अरनव के इरादे पूरे होंगे?
भाग - सात
चंद दिनों की दूरी
अब अबीर और नव्या, केवल सहकर्मी, दोस्त नहीं, बल्कि क़ायदे से प्रेमी और प्रेमिका हैं। दोनों एक-दूसरे के बारे में सब जान चुके हैं और उन्होंने अपने रिश्ते की मर्यादा को बचाए रखा। शरीर पर मन हारने के ज़माने में यहां आत्मिक प्रेम प्रबल था। पर अब संभवतः दोनों को कुछ दिन तक दूर रहना होगा। यही सब सोचकर अबीर आज थोड़ा उदास है। इन नौ महीनों में उसे नव्या की आदत सी हो गई है। नव्या उसके जीवन की गुनगुनी सी है, जिसके साये में वह खो जाना चाहता है। दुनिया की सारी परेशानियों, भाग-दौङ से बहुत दूर और नव्या के बेहद करीब। वो उसका हर रोज़ दफ्तर के रास्ते के बीच पड़ने वाले सिग्नल पर देखना, ढेरों सवाल करना, खाने के दौरान उसे अपने हाथों से निवाला खिलाना, शाम होते ही फिर मिलने का वादा करना, और एक असहज सवाल जिस पर अबीर हमेशा चुप हो जाता:
“अबीर, आप मेरे घर आकर पापा से मेरा हाथ कब मांगेंगे?”
ऐसा नहीं है कि अबीर नव्या को अपनी संगिनी नहीं बनाना चाहता। वह दिल-ओ-जान से नव्या को चाहता है। पर यह अमीर और मध्यम वर्ग की गहरी खाई, इतनी लंबी दूरी कैसे तय करे? क्या नव्या के पिता इस रिश्ते के लिए तैयार होंगे? मां-पापा को तो अभी कुछ बताया ही नहीं।
जाने कितने सवालों में घिरा अबीर दफ्तर के लिए तैयार हो रहा है। नव्या को सब बताना ज़रूरी है। और आज बता ही दूंगा। सोचकर वह तैयार हो गया, पर मन न होने का बहाना बनाकर नाश्ता नहीं किया और सीधे बस स्टैंड की ओर चल दिया।
तभी उसका फोन बजा, देखा तो राघव था। उसने फौरन फोन उठाया।
राघव ने फोन उठते ही पहला सवाल किया, "भाई, आज तूने फोन क्यों नहीं किया?"
अबीर ने बात टालते हुए कहा, "भूल गया था। तू जल्दी आ जा।"
राघव ने बिना कुछ कहे बस फोन रख दिया। करीब पंद्रह मिनट बाद दोनों सामने थे। राघव बस अबीर के चेहरे को देख रहा था। जाने कब बस भी आ गई थी, दोनों चुपचाप अपनी जगह पर खड़े थे। राघव से अबीर की चुप्पी कभी सहन नहीं हुई और आज भी यही हुआ। आखिर वह बोला:
"ओ भाई, सुन!!"
अबीर ने जवाब दिया, "बता भाई?"
राघव ने उसके चेहरे को देखते हुए कहा, "ये तेरे चेहरे को क्या हुआ?"
अबीर ने सच बता दिया, "कुछ नहीं, रात सोया नहीं। बस उसी का असर है।"
राघव ने भंवें उचकाते हुए पूछा, "क्यों नहीं सोया?"
अबीर के मन की उदासी चेहरे पर उतर आई। उसने कहा, "मुझे चार दिन के लिए घरवालों के साथ एक शादी में जाना है।"
राघव ने मुसकुराते हुए पूछा, "वाह, ये तो अच्छी बात है! दिक्कत क्या है?"
अबीर ने धीरे से कहा, "यार, नव्या से हर दिन मिलने की आदत हो गई है।"
राघव ने सुनते ही अबीर को छेड़ा, "ओह, क्या बात है, मेरे शेर! समझ सकता हूं। चार दिन में तुझे घड़ी-घड़ी उसकी चिंता होगी। तेरा शरीर वहां और आत्मा यहां रहेगी, है न?"
अबीर ने सहमति में सिर हिलाया और अपने मन की शंका ज़ाहिर की, "हां, यार। और वो अरनव…"
राघव समझ गया कि अबीर को अरनव के इरादे ठीक नहीं लगते। शक उसे भी है।
राघव ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा "मैं हूं न। मैं अपनी भाभी का ध्यान रखूंगा। चिंता न कर।"
अबीर ने सोचते हुए कहा “पर अरनव?"
राघव ने अबीर के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “मैं उसे नव्या के इर्द-गिर्द भी न भटकने दूंगा।”
अबीर मुस्कुरा दिया। वह हमेशा से खुद को भाग्यशाली समझता है—आखिर राघव जैसा दोस्त जो उसके पास है। राघव की इसी खूबी पर वह हर पल न्योछावर रहता है।
जाने कब बस रुक गई, अबीर का ध्यान कहीं और था। राघव ने उसे उतरने का इशारा किया। दोनों उतरकर दफ्तर की ओर चल पड़े। वहीं नव्या पहले ही पहुंच चुकी थी। वह धीरे-धीरे अबीर के पीछे चलने लगी। अचानक उसने अबीर की आंखों को अपने हाथों से बंद कर दिया।
अबीर हड़बड़ा गया। पर नव्या की पकड़ मजबूत थी। वह छूट न सका, लेकिन उसके हाथों की छुअन को वह अच्छी तरह पहचानता था। उसने अचानक उसका हाथ थाम लिया और पलट गया।
सामने नव्या सिर झुकाए मुस्कुरा रही थी, और राघव दोनों को देखकर ज़ोर-ज़ोर से हंस रहा था। अबीर और नव्या को राघव के साथ होने का अहसास हुआ। राघव के इस तरह हंसने से दोनों सकपका गए और दो कदम पीछे हट गए।
राघव ने हंसी रोककर कहा, "आह, दो प्रेमी हंसों का जोड़ा मेरे कारण घबरा गया। माफ़ी, हुज़ूर।"
अबीर ने उसे घूरते हुए कहा, “सारी लाज-शर्म घर छोड़ आया तू? ऐसे दो प्रेमियों को एक-दूसरे के करीब देख रहा है।”
राघव ने दूखी होने का नाटक किया, जिस पर नव्या मुस्कुरा दी। अबीर ने दोनों को चलने का इशारा किया। वह आगे और दोनों उसके पीछे-पीछे हंसते हुए चल पड़े। अबीर के चेहरे को देखकर इतना तो नव्या समझ गई थी कि कुछ ऐसा है, जो उसे परेशान कर रहा है।
जाने कब तीनों दफ्तर के दरवाज़े से अंदर आ चुके थे। नव्या ने सीधा सवाल दागा,
“अबीर, क्या हुआ है?”
अबीर ने संभलते हुए कहा, “कुछ नहीं, नव्या। आप जाइए।”
नव्या ने अड़ते हुए कहा, “मैं कहीं नहीं जा रही। मेरे सवाल का जवाब दीजिए।”
अबीर ने समझाते हुए कहा, “नव्या, बाद में बात करते हैं। अभी सब लोग हैं यहां।”
नव्या ने ज़िद जारी रखी, “कोई बात नहीं। मुझे फर्क नहीं पड़ता।”
अबीर ने मजबूर होकर उसे एक तरफ ले जाकर गंभीरता से कहा,
“नव्या, देखिए, आप चिंता मत कीजिए। सब ठीक है। मैं दोपहर में मिलूंगा आपसे।”
नव्या चिढ़ते हुए बोली, “झूठ बोल रहे हैं आप।”
अबीर चौंका और झिझकते हुए बोला, “कैसे पता आपको?”
नव्या ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “आप जब भी झूठ बोलते हैं, तो मुझसे नज़र नहीं मिलाते।”
अबीर अब हार गया। उसने स्वीकार करते हुए कहा,
“सही समझा आपने। पर नव्या, हम अभी आए हैं न, तो पहले काम करें? फिर आप जो कहेंगी, मैं करूंगा।”
नव्या ने सपाट लहज़े में पूछा, “सच?”
अबीर ने जवाब दिया, “हां। अब जाइए आप।”
नव्या ने अबीर की बात मान ली और अपने केबिन की ओर चल दी।
पर कहते हैं न कि एक बार मन में कोई शंका आ गई, तो जब तक उसका समाधान नहीं मिलता, तब तक शांति नहीं होती। और अगर चिंता, दुख और शंका को प्रेम के साथ जोड़कर देखें, तो जब दो लोग प्रेम करते हैं, तब अपने मन को भी दूसरे से जोड़ते हैं। एक को पीड़ा हो, तो दूसरे को बिना कहे उसका दर्द महसूस होता है।
कुछ ऐसी ही स्थिति नव्या की थी। अबीर के चेहरे पर छाई अनकही चिंता नव्या को पूरे समय सताती रही। वह अपनी जगह पर बैठी, पर बे मन से काम कर रही थी। उसका ध्यान बार-बार अबीर पर जा रहा था। वह बस चाहती थी कि जल्दी से दोपहर हो जाए, ताकि वह अबीर के पास जाकर उसके माथे को अपने माथे से सटाकर उसकी हर चिंता को खुद में समेट सके।
पर समय तो अपनी गति से चलता है। सोचते-सोचते और काम करते-करते चार घंटे बीत गए।
दोपहर में, नव्या अपने केबिन से निकली और सीधे अबीर के केबिन के बाहर पहुंच गई। उसने दरवाज़े पर दस्तक दी।
“अंदर आइए, दरवाज़ा खुला है,” राघव की आवाज़ आई।
पर नव्या ने फिर से दस्तक दी।
“आ जाइए,” राघव की आवाज़ फिर से आई।
नव्या अंदर चली आई, पर दोनों ही नहीं पलटे।
अबीर ने बिना पलटे फिर कहा, “कौन है?”
नव्या को अब थोड़ा गुस्सा आया। उसने मेज पर हाथ पटकते हुए कहा,
“आज आप दोनों भूख हड़ताल करेंगे क्या?”
नव्या के हाथ पटकते ही अबीर और राघव एक साथ पलटे। देखा, सामने नव्या खड़ी है। उसकी नाक गुस्से से लाल हो गई है। अबीर ने घड़ी में समय देखा। राघव ने उससे धीरे से कहा,
“अब क्या कर दिया तुने?”
अबीर ने समय देखा। दोपहर 1:30 बजे थे। मतलब, काफी देर हो चुकी थी। अबीर मन में बोला, “मर गया आज तो।”
नव्या दोनों को फुसफुसाते हुए देख कर बोली,
“चलें, भूख लगी है मुझे।”
दोनों उठे और नव्या के साथ चलते हुए दुकान के पीछे बने बेंच के पास पहुंच गए।
राघव ने ठिठोली करते हुए कहा,
“आप दोनों अपनी प्रेम लीला करें। मैं दूर बैठकर अपना खाना खाऊंगा।”
अबीर ने उसे घूर कर चुप रहने का इशारा किया। राघव कुछ दूर सामने बनी दूसरी बेंच पर बैठकर खाना खाने लगा। अब अबीर और नव्या अकेले रह गए। नव्या अबीर के सामने खड़ी थी। उसने कहा,
“आप दोनों ने देर क्यों की?”
अबीर ने मनाते हुए कहा, “अरे, गुस्सा न कीजिए। थोड़ा काम आ गया था।”
नव्या ने शरारत से मुस्कुरा कर कहा, “आपने अपना वादा तोड़ा। अब आप मेरी बात मानेंगे।”
अबीर नव्या की मासूमियत पर अपना दिल हार जाता है। उसने कहा,
“माफ़ी हुज़ूर। बताइए, क्या करूं?”
नव्या ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा, “क्या हुआ है? आप परेशान क्यों हैं?”
अबीर ने धीरे कहा, “वो, मैं अगले कुछ दिनों तक दफ्तर नहीं आ पाऊंगा।”
नव्या के चेहरे के भाव बदले। कुछ देर पहले जो चेहरा गुलाब की तरह खिला हुआ था, अब वहां ढेरों सवाल थे। उसने पूछा, “क्यों?”
अबीर ने सीधे-सीधे बता दिया, “रिश्तेदार की शादी है और मुझे मां और पापा के साथ जाना पड़ेगा।”
नव्या एकटक अबीर को देख रही थी। बात पूरी होते ही अबीर ने देखा कि नव्या बिल्कुल शांत थी। अबीर नव्या की चुप्पी से हमेशा डरता है। उसने उसे पास बैठाते हुए कहा, “क्या हुआ, नव्या? ऐसे चुप मत रहिए।”
नव्या अब भी बिल्कुल शांत थी। अबीर ने धीरे से उसका हाथ अपनी हथेलियों में भर लिया।
नव्या ने अपनी आँखें छलकने से पहले पोंछ लीं और धीमी आवाज़ में पूछा, “कितने दिन?”
अबीर ने उसकी आँखों की नमी देखते हुए जवाब दिया, “एक हफ्ता।”
नव्या ने खुद पर संयम रखते हुए कहा “इतना लंबा समय?”
अबीर को अब उसकी मनोदशा समझ आई, पर क्या कहे। उसने बस कह दिया “हां।”
नव्या ने आगे कुछ नहीं कहा, बस अबीर की ओर से मुंह फेर लिया। दूसरी ओर राघव दोनों को देखकर मुस्कुरा रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि ये दोनों क्या बातें कर रहे हैं।
अबीर मनाने की सारी तरकीबें भूल गया, याद रह गया तो केवल गाना। धीमी आवाज़ में गाने लगा:
"दिलबर मेरे, कब तक मुझे, ऐसे ही तड़पाओगे।
मैं आग दिल में लगा दूंगा, वो कि पल में पिघल जाओगे।"
नव्या दूसरी ओर देख रही थी, लेकिन अबीर के गाने के बोल उसके कानों से होते हुए दिल में उतरने लगे। आखिरकार उसने सिर उठाकर देखा तो अबीर उसके सामने खड़ा था। चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आंखों में गहरी उदासी झलक रही थी। नव्या ने अबीर का हाथ पकड़कर अपने पास बैठाते हुए कहा, "आग तो लगा दी है, आपने। अब और क्या बाकी है?"
अबीर उसकी इस बात से मन ही मन तड़प उठा और कहा:
"मैं मजबूर हूं, नव्या। मेरे अलावा कोई नहीं है घर में। जाना तो पड़ेगा।"
पहली बार नव्या को महसूस हुआ कि पुरुष होना भी आसान नहीं है। घर और बाहर सब देखना, कोई खेल नहीं। अपने मन को कड़ा बनाए रखना, अपनी भावनाओं को खुद में दबाए रखना, आसान नहीं होता। उसने अबीर के कंधे पर हाथ रखकर कहा, "मुझे माफ़ कर दीजिए। पर मैं उम्मीद करती हूं कि आप मेरी हालत समझ रहे हैं।"
अबीर ने मुसकुराकर कहा, "कोई बात नहीं, मैं समझता हूं। और हम दोनों एक ही कश्ती में सवार हैं।"
नव्या ने फिर पूछा, "अच्छा, आप कल ही जा रहे हैं?"
अबीर ने सहमति में सिर हिलाया और अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा, "हां। पर मुझे आपकी चिंता हो रही है।"
नव्या ने पूछा, "क्यों?"
अबीर के चेहरे के भाव उसकी चिंता की गहराई का ऐलान कर रहे थे। उसने बुझी सी आवाज़ में कहा,
"सब सही है, पर वो अरनव। मुझे उसके इरादे ठीक नहीं लगते। अगर मेरे पीछे आपके साथ कुछ हो गया, तो मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊंगा। मैं जीते जी मर जाऊंगा।" कहते-कहते अबीर की आँखें छलक पड़ीं।
नव्या के मन में आया कि अबीर को अपनी बाँहों में भर ले, उसका माथा चूम ले। इतनी चिंता, इतना सम्मान शायद ही घर के बाहर किसी ने किया था उसका। यह पहली बार था कि कोई उसे खोने के विचार से इतना डर गया था। नव्या का मन आखिरी बात पर अटक गया। उसने अबीर के मुंह पर अपनी हथेली रखते हुए कहा, "खबरदार! फिर कभी ऐसा मत कहिएगा। मैं बता रही हूं, कभी बात नहीं करूंगी आपसे।"
नव्या मुसकुराई और बोली, "चिंता क्यों करते हैं आप। कुछ नहीं होगा मुझे।"
अबीर ने फिर कहा, "पर नव्या? चिंता तो होगी न?"
नव्या ने अबीर के हाथों को अपनी हथेली में भर लिया और पहली बार उसके माथे को अपने माथे से छुआ। अबीर पहले तो पीछे हटने लगा, लेकिन नव्या की भोली-भाली आंखों की कैद में वह ऐसा नहीं कर पाया।
नव्या ने उसे रोकते हुए कहा, "बिल्कुल नहीं, माथा पीछे न कीजिए।"
अबीर ने असमंजस में कहा, "पर?"
नव्या ने होंठों पर उंगली रखकर कहा, "शश्श... चुप। अब मेरी बात सुनिए।"
अबीर ने कहा, "जी, कहिए।"
नव्या ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, "आप बेफिक्र होकर जाइए। मेरी चिंता न करें और..." कहकर नव्या रुक गई।
अबीर नव्या के समझाने के तरीके पर मुसकुराया और पूछा, "और क्या?"
नव्या ने सिर झुकाते हुए कहा, "आप जितनी जल्दी हो सके, आ जाइएगा। मैं रह नहीं पाऊंगी।"
अबीर ने मुसकुराते हुए कहा, "ज़रूर, मैं पूरी कोशिश करूंगा। अब हुज़ूर का गुस्सा ठंडा हो गया तो खाना खा लीजिए।"
नव्या ने मुसकुराते हुए पूछा, "आप नहीं खाएंगे?"
अबीर ने भी अदा से कहा, "आपकी इच्छा।"
नव्या ने अपने बैग से खाने का डिब्बा निकाला और अबीर को खिलाने लगी। अबीर बस उसे मुस्कुरा कर देख रहा था। अब तक नव्या ने एक भी निवाला नहीं खाया था। अबीर ने पूछा,
"बस मुझे खिला रही हैं? आप भी खाइए।"
नव्या ने उसे निवाला खिलाते हुए कहा, "बाद में खा लूंगी।"
अबीर समझ रहा था कि नव्या सुबह से भूखी थी। बाकी जो थोड़ी-बहुत खाने की इच्छा थी, वो भी उसके दुखी होने के कारण मर गई थी। उसने एक निवाला नव्या की ओर बढ़ाया और बोला, "नहीं, अभी खाना है।" नव्या ने मन ही मन अपने प्रेम की बलैयां लीं। दोनों जाने कब तक एक-दूसरे की आंखों में देखते हुए एक-दूसरे को खाना खिलाते रहे।
राघव, जो अब दोनों के सामने खड़ा था, मुस्कुरा रहा था। उसने मन ही मन प्रार्थना की, "हे ईश्वर, इन दोनों की जोड़ी सलामत रहे, हर बुरी नज़र से इनकी रक्षा करना।"
वह अबीर के पास खड़ा हो गया और बोला, "नव्या को खिलाया? मैं भी तो हूं यहां।"
अबीर सकपकाते हुए बोला, "राघव? कब से खड़ा है तू?"
राघव ने चुटकी लेते हुए कहा, "ज्यादा नहीं, जब से तुम दोनों खाने-खिलाने में गुम हो, तब से।"
राघव ने नव्या को देखकर कहा, "नव्या, चिंता न कीजिए, मैंने कुछ नहीं देखा।"
तो अबीर ने आपको सब बताया?”
नव्या ने सहमति में सिर हिलाया और कहा “हां। पर इनकी चिंता का क्या करूं?”
राघव ने घुटने के बल ज़मीन पर बैठते हुए कहा मैं हूं न। कुछ नहीं होगा नव्या।
अबीर ने राघव को अपने पास बैठाते हुए कहा,
“नव्या, बचपन से लेकर आज तक राघव और मैं दोस्त हैं। उसने दोस्ती का हर कर्तव्य निभाया है। इसी के साथ सारी शरारतें की, इसकी मजबूत बाँहों के सहारे सारे दुख झेले। मैं घर के बाद बस इस पर और अब आप पर विश्वास करता हूं। मेरे न होने पर ये आपका ध्यान रखेगा। यह है, इसीलिए आपको इसके भरोसे छोड़ रहा हूं। बस कुछ दिन,” कहते-कहते अबीर की आंखों के कोर भीगने लगे। और नव्या पहली बार अबीर की नम आंखों को देख रही थी। एक पल के लिए नव्या अबीर के जाने की बात भूल गई थी। अचानक उसे याद आया, उसकी आंखें भर आईं। उसने अपना सिर झुका लिया।
अबीर ने चिंता में पूछा, “क्या हुआ नव्या?”
नव्या ने आंसू पोंछते हुए कहा कुछ नहीं।
राघव को जाने क्यों लगा की अभी उसका यहाँ रहना ठीक नहीं होगा। वह बहाना बनाते हुए बोला, “यार, मुझे न पानी चाहिए और बोतल खाली है।” वह चला गया। नव्या सिर झुकाए खड़ी थी।
अबीर ने एक बार फिर से पूछा, “नव्या?”
नव्या ने धीरे से जवाब दिया “हां”
अबीर ने नर्मी से कहा “मेरी ओर देखिए।“
नव्या ने पलटकर जाते हुए कहा, “आप जाइए, मैं भी जा रही हूं।”
अबीर ने गाते हुए कहा “एक बार देख लीजिए, दीवाना बना दीजिए। जलने को तैयार हैं हम, परवाना बना दीजिए।” अबीर को गाते सुनकर नव्या के कदम ठिठक गए। उसके होंठों पर बरबस ही मुसकान आई। नव्या ने बिना पीछे देखे कहा “आप न, सारी तरकीबें पता है आपको, कि मैं रुठ न सकूं।“
अबीर उसके आकर खङा हो गया। उसने नव्या को कंधों से थाम लिया और धीरे से कहा “बेशक रुठिए,नखरे कीजिए, हमसे मुंह फेरिए, हक है आपका। आपको मनाना कर्तव्य है मेरा।“
अबीर ने फिर पूछा “आपकी आंखों में आंसू क्यों हैं?”
नव्या ने बात टालते हुए कहा “बस ऐसे ही।“
अबीर ने नव्या का चेहरा अपनी हथेलियों में भरकर कहा “आप ऐसे दुखी रहेंगी, तो मैं जा नहीं सकूंगा। मैं समझता हूं, आपकी हालत। पर मैं भी मजबूर हूं, एक हफ्ते दूर रहने के लिए मुझे आपकी मुस्कान चाहिए। ताकि मैं जल्दी वापस आ सकूं। बस ‘चंद दिनों की दूरी’ है।“
नव्या को बात समझ आई। उसने खुद को संभालते हुए कहा “मुझे पता है।” कहते-कहते उसकी आँखों से आँसू छलक पङे। अबीर ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आगे बढ़कर नव्या के गालों पर लुढ़कते आंसुओं को पोंछा। वह मुस्कुरा दिया, जैसे कह रहा हो “चिंता न कीजिए, मैं जल्दी आऊंगा।“ उसे देख नव्या हल्के से मुस्कुरा दी।
नव्या ने अचानक कहा, "एक विनती करूं? मानेंगे न?"
अबीर मुसकुराया और बोला, "विनती नहीं, इसे इच्छा कहिए। बताइए, क्या करना है?"
नव्या ने कहा, "शाम को घर जाने से पहले, क्या आप सिग्नल पर रुकेंगे? मेरे साथ भुट्टा खाने के लिए।"
अबीर ने मुसकुराकर सहमति में सिर हिलाते हुए पूछा "बस? और कुछ?"
नव्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "नहीं, आपके बिना रहने के लिए आपकी यादें चाहिए न।"
अबीर ने प्यार से कहा, "बस कीजिए न।"
नव्या ने हंसते हुए कहा, "अच्छा, मैं जाती हूं। आप भी जाइए। शाम को मिलते हैं।"
कहकर वह चली गई, और अबीर भी अपने काम में लग गया। शाम को निकलने से ठीक पहले, अबीर ललित के पास अपनी छुट्टी की अर्जी लेकर केबिन में गया। केबिन से बाहर आते ही उसने राघव को सामने खड़ा पाया।
राघव ने पूछा, "चलें?"
अबीर ने इधर-उधर देखते हुए कहा, "हां, लेकिन नव्या कहां है?"
राघव ने जवाब दिया, "नव्या तो चली गई होगी!"
अबीर ने चौंकते हुए कहा, "नहीं यार, मिलने की बात हुई थी हमारी।"
कहकर उसने नव्या की इच्छा राघव को बताई।
राघव ने सहमति जताते हुए कहा, "ठीक है।"
तभी अबीर का फोन बजा। देखा तो नव्या का मैसेज था, "अबीर, मैं पार्किंग में हूं। जल्दी आइए।"
अबीर को नव्या से अथाह प्रेम था, पर अपने और नव्या के बीच का अंतर उसके संकोच का कारण था। इसीलिए नव्या के कई बार कहने पर भी वह कभी उसकी कार में नहीं बैठा था। वह जब भी उसे साथ चलने के लिए कहती, अबीर हर बार “फिर कभी” कहकर टाल देता। आज भी यही हुआ। अबीर ने लिखा "आप निकल जाइए। मैं आता हूं।"
नव्या की ओर से इसके बाद कोई जवाब नहीं आया।
अबीर और राघव बस स्टैंड के लिए निकल गए। उनके पीछे-पीछे ही नव्या भी अपनी कार लेकर निकल पड़ी। करीब दस मिनट बाद, अबीर और राघव साथ बस का इंतजार कर रहे थे। तभी एक तेज़ आवाज़ ने दोनों का ध्यान खींचा...
"अबीर, तुम्हें क्या लगता है, नव्या तुमसे प्यार करती है? नहीं, वह बस तुम्हारे दिल से खेल रही है," सुनकर अबीर और राघव चौंक गए। उन्होंने सामने देखा तो अरनव खड़ा मुस्कुरा रहा था।
"बकवास मत करो, अरनव!" राघव ने गुस्से में कहा।
अबीर जानता था कि अरनव उसे पसंद नहीं करता। वह अबीर और नव्या के बीच फूट डालने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता था। इसलिए, अबीर ने कुछ नहीं कहा। राघव के गुस्से को देखकर उसने उसे रोका।
"चुप हो जा, राघव," अबीर ने राघव की कलाई पकड़कर कहा।
अबीर के धैर्य को देखकर अरनव के दिल में जलन की ज्वाला दहक उठी। उसने अबीर को उसका धैर्य को छोङने के लिए मजबूर करते के लिए मुसकुराते हुए कहा, "मैं सच कह रहा हूं। नव्या जैसी अमीर लड़कियों के लिए प्यार सिर्फ एक खेल है। जब परिवार से लड़ने की बारी आएगी, तो वह तुम्हें छोड़ देगी। वह किसी अमीर लड़के के साथ चली जाएगी, क्योंकि उसका बाप तुम्हें कभी स्वीकार नहीं करेगा। उसके बड़े-बड़े शौक तुम पूरे नहीं कर सकते। तुम्हारा क्या होगा? बस, एक बर्बाद आशिक बनकर भटकते रह जाओगे।"
अरनव की बात सुनकर अबीर का संयम टूट गया। शायद यह प्रेम का प्रभाव था। नव्या के लिए कोई ऐसी-वैसी बात वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था।
अबीर ने कड़े स्वर में कहा, "तुम्हें जो कहना है, मुझसे कहो। नव्या के लिए ऐसी-वैसी बात मैं सहन नहीं करूंगा।"
"जाओ, भोले प्रेमी," अरनव ने हँसते हुए कहा, "उसके साथ खुशी के कुछ पल बिता लो। उसके जाने के बाद जीने के लिए कुछ तो चाहिए न।"
यह सुनकर अबीर का गुस्सा भड़क उठा। उसने अरनव की कमीज़ का कॉलर पकड़ते हुए कहा, "देख, अरनव! आज तो बोल दिया, लेकिन अगर फिर से कुछ कहा, तो मैं जो करूंगा, वह तू सोच भी नहीं सकता।"
राघव अबीर की इस प्रतिक्रिया से हैरान रह गया। एक पल के लिए वह जड़ हो गया, लेकिन अगले ही पल उसने अबीर को अरनव से अलग किया।
"अबीर, क्या कर रहा है तू? छोड़ इसे," राघव ने गुस्से में कहा।
फिर उसने अरनव को चेतावनी देते हुए कहा, "आगे से दूर रहना।"
तभी बस आ गई। राघव ने अबीर को खींचकर बस में चढ़ाया और खुद भी चढ़ गया।
अबीर और राघव दोनों को नहीं पता था कि नव्या उनके पीछे बस स्टैंड तक आई थी और उसने सब देख लिया था। अचानक, नव्या के मन में शंका उठी, लेकिन उसने इसे अनदेखा कर दिया और सिग्नल की ओर चल दी। अबीर बाहर से तो मजबूत दिखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसके मन में तूफान मचा हुआ था। पूरे रास्ते दोनों चुपचाप रहे।
करीब आधे घंटे बाद बस सिग्नल पर रुकी। दोनों बस से उतर गए। अबीर ने इधर-उधर नव्या को ढूंढने की कोशिश की, तभी उसका फोन बजा।
अबीर ने फोन उठाया। दूसरी ओर नव्या थी।
"आप जहाँ हैं, मैं उस सड़क के दूसरी ओर खड़ी हूँ," नव्या ने कहा।
अबीर ने सड़क के दूसरी ओर देखते हुए जवाब दिया, "ठीक है, अभी आता हूँ।"
"ध्यान से सड़क पार कीजिए," नव्या ने चेतावनी दी।
"जी, हुज़ूर," अबीर ने मुसकुराते हुए कहा।
अबीर और राघव सड़क पार करके दूसरी ओर पहुँचे, जहाँ नव्या अपनी कार के बाहर खड़ी थी। दोनों उसके पास चले गए। नव्या ने उनकी ओर देखते हुए पूछा, "देर क्यों की?"
राघव कुछ कहने ही वाला था कि अबीर जल्दी से बोल पड़ा, "वो... वो बस देर से आई थी, न!"
नव्या ने अबीर का झूठ तुरंत पकड़ लिया।
वह बोली, "बस आई थी या अरनव आया था?"
"सच कह रहा हूँ," अबीर ने सफाई देने की कोशिश की।
नव्या ने झिड़कते हुए कहा, "अबीर, आपको क्या लगता है, आप नहीं बताएंगे तो मुझे पता नहीं चलेगा? मैं सब देख चुकी हूँ।"
अबीर नव्या की इस प्रतिक्रिया से हतप्रभ रह गया। दूसरी बार नव्या का गुस्सा देख वह थोड़ा चौंका। वह समझाते हुए बोला, "नव्या, जाने दीजिए न। वह कुछ भी बोलता है।"
नव्या ने गंभीर लहजे में पूछा, "आपके मन में कोई बात है?"
अबीर ने तुरंत जवाब दिया, "नहीं। मैं ऐसी किसी बात में आकर आपसे मुंह नहीं मोड़ सकता। पता है, मुझे आप पर उतना ही विश्वास है जितना नाव को हवा और पतवार पर होता है, जितना भक्त को भगवान पर और एक प्रेमी को अपनी प्रेमिका पर।"
नव्या मन ही मन खुश थी। वह सोच रही थी कि अबीर इतने तनावपूर्ण हालात के बावजूद उससे प्रभावित नहीं हुआ। उसका विश्वास मज़बूत हो गया की अबीर अपने प्यार के लिए लड़ने का साहस रखता है। वह सबकी तरह नहीं है।
अबीर और नव्या को वहीं छोड़कर राघव पास की दुकान से तीन भुट्टे बनवाकर लाया।
"लीजिए, नव्या!" कहते हुए उसने एक भुट्टा नव्या को दिया और दूसरा अबीर को। तीनों बातें करते हुए भुट्टा खाने लगे। लेकिन राघव का ध्यान कहीं और था।
नव्या ने खाते हुए कहा "अबीर, कल कब निकलना है आपको?"
अबीर ने जवाब दिया "सुबह पाँच बजे।"
नव्या ने मिन्नत करते हुए कहा, "मैं आपको छोड़ने चल सकती हूँ? न मत कहिएगा।"
अबीर ने सधी हुई आवाज़ में कहा "माफ कीजिए, पर इतनी सुबह, सुनसान सड़क पर...आप अकेले... आप नहीं चल सकतीं।"
नव्या के माथे पर लकीरें उभर आईं। "क्यों?" उसने सवाल किया।
अबीर ने समझाते हुए कहा "बात माना कीजिए। घर पर क्या बताएंगी? कहां जा रही हैं? आप नहीं आ सकतीं।"
नव्या की ज़िद्द जारी थी "पर..."
अबीर ने फिर कहा "मैं आपकी सारी बातें मानता हूँ, न? आप भी मेरी बात मान लीजिए।"
नव्या का चेहरा उतर गया। उसने धीमी आवाज़ में कहा, "पर मुझे लगा कि हम थोड़ा और समय साथ बिता सकेंगे। इसीलिए..."
नव्या की भोलेपन में कही बातें अबीर के दिल में सीधे उतर गईं। उसने आगे बढ़कर नव्या को अपने सामने खड़ा किया और बहुत गंभीरता से कहा, "नव्या, मेरी ओर देखिए!"
नव्या एकटक अबीर को देख रही थी।
अबीर ने कहना शुरू किया, "मुझे आपकी चिंता होती है, न। इसीलिए मना करता हूँ। मुझे भी आपका साथ प्रिय है, लेकिन मैं अपने लिए आपको किसी खतरे में नहीं डाल सकता। मैं जल्द ही आऊंगा। मेरा इंतजार कीजिएगा।"
नव्या ने कुछ नहीं कहा, बस हल्की मुस्कान के साथ अबीर की ओर देखा।
इसके बाद तीनों ने काफ़ी देर तक मस्ती की और फिर अपने-अपने घर चले गए।
लेकिन सवाल यह है कि क्या अबीर का नव्या पर विश्वास बना रहेगा? और सफर के दौरान उनकी कहानी किस दिशा में मुड़ेगी?
भाग - आठ
अबीर की यात्रा
रात को घर पहुँचकर, एक तरफ नव्या थकान से चूर और दुःख से परेशान थी। पिछले नौ महीनों में वह अबीर के साथ की आदी हो गई थी। कह सकते हैं कि अब नव्या के पास हर दिन दफ्तर जाने का एक विशेष कारण था—अबीर के साथ समय बिताना। यह प्रेम में उसका पहला विरह था, इसीलिए वह बेचैन थी।
कहते हैं, प्रेम में विरह का भी अपना ही रस होता है। इसका असर तब और बढ़ जाता है जब दोनों ओर विरह की अग्नि समान रूप से जल रही हो।
वहीं दूसरी तरफ, अबीर ने अपना सामान बाँध लिया था। माँ कमरे में ही खाना देकर चली गई थी। वह खाना खा रहा था, पर उसे नव्या की छवि दिखाई देने लगी—हँसती-मुसकुराती नव्या, उसकी ओर निवाला बढ़ाते हुए। अबीर ने खुद के सिर पर चपत लगाई और फोन उठाकर नव्या को मेसेज लिखा:
“नव्या, आपने खाना खाया?”
कुछ देर बाद जवाब आया: “जी, खाया, पर...”
अबीर: “पर क्या?”
नव्या: “आपकी याद आती रही।“
अबीर मन में बोला “हे भगवान ये सात दिन कैसे कटेंगे,” उसने जवाब दिया: “मुझे भी।“
नव्या: “बहुत देर हो गई है। सो जाइए, आपको कल निकलना भी है।“
अबीर: “हाँ, एक बात बताऊँ?”
नव्या: “हाँ?”
अबीर: “दूरियों में ही प्रेम की परख होती है।“
नव्या: “परख लीजिए, मैं तैयार हूँ।“
अबीर को लगा कि नव्या को यह बात बुरी लगी। उसने तुरंत लिखा:
अबीर: “मज़ाक कर रहा था”
नव्या का नपा-तुला सा जवाब आया “कोई बात नहीं।“
अबीर ने मनाने की गरज से कहा “माफ नहीं करेंगी, अपने अबीर को?”
नव्या का जवाब आया “मेरे अबीर बहुत अच्छे हैं, और अगर मैं उनसे ज़्यादा देर तक रूठ जाती हूँ, तो वह परेशान हो जाते हैं।“
अबीर ने राहत की सांस ली और लिखा “और मैं कह सकता हूँ कि मेरी नव्या मुझे बहुत चाहती हैं और मुझसे गुस्सा नहीं हो सकतीं।“
नव्या: “बस। जाइए, सो जाइए।“
अबीर: “आप भी।“
कहकर वह कल्पनाओं में खो गया और कब सो गया, उसे पता ही नहीं चला। सुबह चार बजे फोन की घंटी बजी, जिससे उसकी नींद टूट गई। वह तुरंत अपने नित्य कर्म में लग गया। उधर, माँ रसोई में खाना बनाने में व्यस्त थीं, और पापा आंगन में सामान रख रहे थे।
पाँच बजते ही अबीर दोनों कंधों पर सामान लादे घर के बाहर निकला। जैसे ही उसने बाहर कदम रखा, सामने राघव को कार से टिके मुसकुराते देख चौंक गया। माँ और पापा भी बाहर आ गए।
अबीर ने आश्चर्य से पूछा, “ओ भाई, तू यहाँ?”
उसके कुछ और कहने से पहले राघव बोल पड़ा, “मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ, यही पूछना है न? चल, सामान गाड़ी में रख, फिर सब बताता हूँ।“
अबीर ने सवाल किया, “ये गाड़ी किसकी है?”
राघव मुसकुराते हुए बोला, “मेरे चचेरे भाई की। तेरे लिए मांगी है। अब जल्दी सामान रख।“
यह कहकर राघव ने माँ और पापा के पैर छुए और उन्हें गाड़ी में बैठने को कहा। फिर उसने सामान रखने में अबीर की मदद की। सारा सामान गाड़ी में जमाने के बाद, राघव और अबीर आगे की सीटों पर बैठे, जबकि माँ-पापा पीछे बैठ गए।
गाड़ी में बैठते ही अबीर ने पूछा, “गाड़ी तू चलाएगा?”
राघव ने हँसकर जवाब दिया, “हाँ।“
अबीर ने मज़ाक में हाथ जोड़ते हुए कहा, “मैं आ रहा हूँ, प्रभु।“
राघव ने हल्के से अबीर के सिर पर मारते हुए कहा, “हां, और सुन ले, नव्या को ही नहीं, मुझे भी गाड़ी चलानी आती है।“
अबीर ने फुसफुसाते हुए कहा, “चुप! पिटवाएगा क्या?”
राघव मुस्कुरा दिया और गाड़ी चलाने लगा। थोड़ी देर बाद राघव ने पूछा, “तुझे जानना नहीं है कि मैं अचानक यहाँ कैसे आया?”
अबीर ने उत्सुकता से कहा, “हाँ, बता।“
राघव ने बताया, “मुझे पता था कि तू फिर से बस के चक्कर में पड़ेगा। इसलिए, कल दफ्तर के बाद मैं अपने चचेरे भाई से मिलने गया, उससे कार मांग ली और आज सुबह-सुबह यहाँ पहुँच गया। और…”
अबीर ने टोका, “और?”
राघव ने मुसकुराते हुए कहा, “तेरे लिए नव्या का एक मैसेज है, मेरे फोन में। देख ले।“
यह कहकर उसने अपना फोन अबीर को थमा दिया।
अबीर ने चुपचाप स्क्रीन पर नजर डाली। नव्या का मैसेज था:
“राघव, अबीर ने मुझे साथ आने से मना कर दिया है। आप उनके साथ जा रहे हैं न?”
राघव ने जवाब दिया था: “हाँ, जा रहा हूँ। अचानक पूछा आपने, सब ठीक है?”
नव्या ने लिखा था: “नहीं, बस अबीर की चिंता खाए जा रही है। अब आप जा रहे हैं, तो मुझे राहत मिली।“
अबीर ने मैसेज पढ़ा और बिना कुछ कहे फोन वापस कर दिया। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई। राघव ने उसकी मुसकान को देखकर पूछा “पढ़ लिया?”
अबीर ने कहा “हाँ।“
अबीर के मन में भावनाओं का तूफ़ान था। एक तरफ वह खुश था कि नव्या उसे इतना चाहती है और उसकी चिंता करती है। दूसरी ओर, पिछली शाम अरनव की कही बातें उसके दिमाग में गूँज रही थीं। दिल उन बातों को नकार रहा था, लेकिन दिमाग रह-रहकर नव्या को गलत ठहरा रहा था।
दिल और दिमाग की इस लड़ाई में अबीर उलझ कर रह गया। इसके बाद दोनों दोस्त चुप हो गए। रास्ता भी लगभग खत्म होने को था। सुबह अपने सुरमयी रंग में ढल रही थी। खिड़की के बाहर झाँकते हुए अबीर को आज की सुबह नव्या के चेहरे की तरह गुलाबी और खिली हुई लग रही थी।
अचानक राघव ने कार रोक दी।
गाड़ी के झटके से अबीर हड़बड़ा गया। उसने पलट कर देखा तो माँ पापा पीछे आराम से बैठे थे। माँ पापा के कंधे पर सिर टिकाए सोई हुई थीं, और पापा शांत भाव से आँखें मूंदे हुए थे। अबीर मुसकरा दिया। उसने खुद को नव्या के साथ ऐसे ही किसी सफर की कल्पना करते हुए पाया। पर उसने तुरंत अपने ख्यालों पर काबू पाया।
अबीर ने टोका, “भाई, इतनी तेज़ी से क्यों रुक गया?”
राघव ने सामने इशारा किया “सामने देख!”
अबीर ने सामने देखा और राहत की साँस ली। “अच्छा, पहुँच गए हम।“
सामने ही प्रताप नगर रेलवे स्टेशन की पीली इमारत खड़ी थी। उस पर सफेद बोर्ड लगा था, जिस पर लिखा था, ‘प्रताप नगर रेलवे स्टेशन’।
अबीर और राघव ने गाड़ी से सामान निकालना शुरू किया। इस बीच राघव ने माँ-पापा को जगा दिया। करीब दस मिनट बाद, कंधों पर सामान उठाए अबीर और राघव आगे चल रहे थे, जबकि माँ-पापा पीछे थे। स्टेशन काफी बड़ा था। हर तरफ लोग भाग-दौड़ कर रहे थे। कोई किसी को ढूँढ रहा था, किसी का सामान चोरी हो गया था, और कुछ लोग बिना टिकट ट्रेन में चढ़ने की फिराक में थे। इस भीड़भाड़ में वे प्लेटफार्म तक पहुँच गए।
राघव ने यहां-वहां देखते हुए पूछा “भाई, ट्रेन कितने बजे है?”
अबीर न टिकट निकालते हुए कहा “रुक, देखता हूँ। आठ बजे की है।“
राघव मुसकुराया और बोला “अभी तो साढ़े छह ही बजे हैं।“
अबीर ने पास की बेंच के पास सामान रखा और माँ-पापा को वहाँ बैठा दिया। फिर राघव के साथ सामने चाय की दुकान की ओर चल पड़ा।
राघव भी उसके पीछे चलते हुए बोला “अबीर, तुझे मेरी याद आएगी?”
अबीर ने कहा “हाँ, आएगी।“
राघव अबीर के चेहरे पर छाए दुख और चिंता को भीतर तक महसूस कर रहा था। उसने खुद से कहा “अभी तो सफर शुरू भी नहीं हुआ और जनाब का चेहरा अभी से उतर गया। पता नहीं अगले सात दिनों में क्या होगा?”
उसने फिर पूछा “और नव्या की?”
अबीर ने मायूसी से कहा “क्यों मेरे मन को कुरेदने में लगा है? मैं जितनी जल्दी हो सके, वापस आ जाऊँगा। मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है।“
राघव ने उसे हँसते हुए छेङा “ओह, तो औघड़ प्रेमी अभी सफर पर निकला भी नहीं, और लौटने की बात कर रहा है।“
अबीर ने उसे घुरते हुए कहा “तू नहीं समझेगा! किसी से प्यार होगा न, तब पता चलेगा। कहते हैं, जिस पर बीतती है, वही जानता है।“
बात करते-करते दोनों चाय की दुकान पर पहुँच गए। अबीर ने चार गिलास चाय के लिए दुकानदार से कह दिया।
राघव ने सहमति में जवाब दिया “हाँ, बात तो सही है।“
अबीर ने जेब से एक कागज़ निकालते हुए कहा “मेरा एक काम कर देगा?”
राघव मुसकुराते हुए कहा “हाँ, तेरे लिए कुछ भी कर सकता हूँ।“
अबीर ने कागज़ उसे देते हुए कहा “ये चिट्ठी नव्या को देनी है।“
राघव की छेड़खानी अब भी जारी थी “क्या है ये, प्रेम पत्र?”
अबीर ने धीरे से कहा “कुछ ऐसा ही समझ ले।“
राघव ने बङी अदा से अपने सीने पर हाथ रखते हुए कहा, “मोबाइल के ज़माने में, ये औघड़ प्रेमी प्रेम पत्र लिखता है! हाय!”
अबीर ने झेंपते हुए कहा “कुछ चीजें पुरानी ही अच्छी होती हैं। जो बात लिखने में है, वो मोबाइल पर टाइप करने में नहीं।“
राघव ने भी सहमति जताई “बात तो सही है।“
करीब बीस मिनट बाद, दुकानदार की आवाज़ आई, “साहब, चाय।“ उसने चार कप चाय एक तश्तरी में रखकर आगे बढ़ा दी। अबीर ने तश्तरी ली और राघव ने पैसे देते हुए पूछा, “अबीर, क्या सोच रहा है?”
अबीर ने टालते हुए कहा “कुछ नहीं। चल।“
राघव कुछ नहीं कह सका। वह जानता था कि शायद अरनव की कही बातें अबीर को सता रही थीं। दोनों बेंच के पास वापस पहुँचे। अबीर ने माँ-पापा को चाय के गिलास थमाए और एक गिलास राघव को पकड़ाया। फिर सबसे दूर जाकर अपने हाथ में चाय का गिलास थामे, गहरी सोच में डूब गया।
तभी राघव उसके पास आया और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला, “अरनव के बारे में सोच रहा है?”
अबीर को लगा जैसे किसी ने चोरी पकङ ली हो। उसने असमंजस में कहा “हाँ।“
राघव ने समझाया “मत सोच। वो जलता है तुझसे।“
अबीर ने चौंकते हुए पूछा “क्यों? मैंने क्या किया?”
राघव ने कहा – “तेरे शांत और अच्छे स्वभाव के कारण, सब चाहे लड़कियां हों या लड़के, तुझे पसंद करते हैं और…”
(कहते-कहते राघव चुप हो गया।)
अबीर ने उसके रुकते ही पूछा “और क्या?”
राघव ने गहरी सांस भरकर कहा “नव्या तुझसे प्यार करती है, और इसी वजह से अरनव सो बचती है, दूर रहती है।“
अबीर ने कुछ सोचते हुए पूछा “क्या वो नव्या को पसंद करता है?”
राघव ने ना में सिर हिलाकर कहा “नहीं, मुझे नहीं लगता। पर मैं कुछ पता लगाता हूं।“
अबीर ने पूछा “क्या पता लगाएगा?”
राघव ने जवाब दिया “अरनव की जन्म कुंडली निकालूंगा। देखते हैं, इसका इतिहास क्या है।“
जाने कब तक दोनों बातें करते रहे कि तभी प्लेटफॉर्म की छत पर लगे बड़े स्पीकर से आवाज़ आई:
“यात्री गण कृपया ध्यान दें, गाड़ी संख्या 24517, कंवरपुरा से चलकर, प्रताप नगर, जमुना पुरी से होकर बिलासपुर को जाने वाली, छत्रपति शिवाजी एक्सप्रेस, अपने निर्धारित समय 7 बजकर 50 मिनट पर प्लेटफॉर्म संख्या 3 पर आएगी। हम आपकी सुखद यात्रा की कामना करते हैं।“
घोषणा सुनकर राघव ने घड़ी देखी तो 7 बजकर 30 मिनट हो गए थे। राघव ने अबीर के कंधे थपथपाए, और कहा “किसी पर नहीं, पर अपने प्रेम पर तो विश्वास रख।“
राघव ने फिर पूछा “कौन सा डिब्बा है?”
अबीर टिकट देखते हुए बोला “पांचवां।“
“सीट नंबर?”
अबीर ने कहा “12, 13, 14।“
राघव ने यहां-वहां देखते हुए कहा “पांचवां डिब्बा, यही आएगा।“
अबीर ने सपाट लहज़े में कहा “तु चला जा।“
राघव ने गंभीरता से कहा “क्यों? भाई, मन भर गया तेरा मुझसे?”
अबीर ने फौरन कहा “नहीं यार, पर तू दफ्तर कब जाएगा?”
राघव ने मायूसी से कहा “तेरे जाने के बाद, मैं सीधे दफ्तर जाऊंगा।“
अबीर राघव की मायूसी को फौरन समझ गया। वह मुसकुराते हुए बोला “क्या हुआ? ये तेरे चेहरे पर दुख के बादल क्यों छाए हैं?”
राघव ने चेहरा घुमाते हुए कहा “कुछ नहीं।“
अबीर ने राघव के कंधे पर हाथ रखकर, उंगली से उसकी ठोड़ी को उठाया। वह चौंक गया। राघव की आंखों में हल्की नमी थी।
राघव ने आंखें पोंछते हुए कहा “चल, सामान उठा। देख, 7:45 हो गए।“
अबीर ने सामान उठाया और मां-पापा को पीछे आने को कहा।
स्टेशन की भीड़ में दो तरह के लोग थे: कहीं जाने की जल्दी में या कहीं पहुंचने की जल्दी में। पर आने वाली ट्रेन के लिए बहुत कम यात्री थे। अबीर ने सामान पांचवें डिब्बे के सामने रखा। राघव उसके पीछे ही था। तभी अचानक तेज आवाज़ के साथ घोषणा में ट्रेन आने की सूचना मिली।
करीब दो मिनट बाद प्लेटफॉर्म पर तेज धड़धड़ की आवाज़ के साथ ट्रेन आई। लोगों में हलचल बढ़ गई। कोई सामान गिन रहा था, तो कोई साथ वालों को ढूंढने में लगा था। ट्रेन का पांचवां डिब्बा सामने रुका। भीड़ कम थी, तो लोग भी शांति से चढ़ रहे थे। अबीर डिब्बे में चढ़ गया। राघव ने एक-एक करके सामान चढ़ा दिया। फिर अबीर ने मां का हाथ पकड़कर उन्हें चढ़ा लिया, और फिर पापा को। राघव भी चढ़ गया।
दोनों ने सब सामान उठाकर सीट के नीचे सरका दिया। मां-पापा को बैठाकर अबीर ने राघव से कहा:
“चल भाई, गाड़ी चलने वाली है।“
राघव ने आगे बढ़कर अबीर के मां-पापा के पैर छुए और अबीर के साथ दरवाजे की ओर चल दिया।
दोनों दरवाजे के पास खड़े थे, जब राघव ने कहा, “अभी 10 मिनट हैं। बड़ी जल्दी है मुझे भगाने की।“
अबीर ने संजीदगी से कहा “मेरी बात सुन!”
राघव ने उसकी ओर देखते हुए भंवें उचकाई।
अबीर के दिशा-निर्देश शुरू हुए “देख, नव्या को चिट्ठी दे देना। उनका ध्यान रखना, अरनव से दूर रखना। और कहना कि अपना ख्याल रखें।“
राघव ने मुंह फेरते हुए कहा “हाँ, कह दूंगा।“
अबीर ने उसे अपनी ओर घुमाया तो सामने राघव अपनी आंखों की नमी छिपा रहा था। अबीर ने उसे सीने से लगा लिया। दोनों एक-दूसरे के कंधों को भिगाने लगे।
राघव ने मुश्किल से रुलाई दबाते हुए कहा “तुझे बस नव्या की पड़ी है न? मैं तो जैसे हूं ही नहीं”
अबीर ने उसके सिर पर चपत लगाई “नहीं, ऐसा नहीं है।“
राघव ने मुंह बिचकाया “ऐसा है।“
अबीर ने प्यार से कहा “मैं तेरे लिए भी कुछ कहने वाला था, पर तूने पहले ही मुंह फेर लिया।“
राघव किसी बच्चे चहकते हुए बोला “बोल न!”
अबीर ने समझाते हुए कहा “तू भी अरनव से दूर रहना, लड़ना मत। और वक्त पर खाना खा लेना, समझा?”
राघव ने कमीज की बाजू मोड़ते हुए कहा “जैसे काम वो करता है न, मन करता है कि उसे उल्टा लटकाकर जी भर के पीट दूं।“
अबीर ने घुरकर कहा “राघव, चुप! मेरी बात याद रखना।“
राघव ने हंसकर सहमति जताई “ठीक है।“
ट्रेन चलने वाली थी।
“मैं उतरता हूँ।“ कहकर राघव उतर गया।
राघव ने धीरे से कहा “ध्यान रखना, और नव्या की चिंता मत करना। मैं हूँ न। कुछ नहीं होगा।“
अबीर मुसकुराया और बोला “पता है। गाड़ी ध्यान से चलाना।“
“जी हुजूर। और कोई बात?” राघव के पूछने पर अबीर ने ना में सिर हिला दिया।
राघव उतरकर प्लेटफॉर्म पर खड़ा हो गया। अबीर अब भी दरवाजे पर था। तभी ट्रेन का सिग्नल हरा हुआ और जोर की सीटी बजी। ठीक आठ बजे ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म छोड़ने लगी। राघव ने हाथ हिलाया। जवाब में अबीर ने भी मुसकुराकर हाथ हिलाकर विदा ली। गाड़ी ने गति पकड़ी और अबीर अपनी सीट पर लौट आया। मां उसे ही देख रही थीं। अबीर आकर खिड़की के पास बैठ गया। वह जाने कहां खोया था, जब मां ने उसे पुकारा “अबीर?”
अबीर ने हड़बड़ाकर जवाब दिया “हाँ मां।“
मां ने पूछा “राघव गया?”
अबीर ने बस हां में सिर हिला दिया।
“एक बात कहूं?”
मां की आवाज़ में गंभीरता साफ झलक रही थी। अबीर चुपचाप मां को एकटक देखने लगा।
मां ने कहा “देख, तेरी उम्र हो गई है। अब शादी कर ले। मेरी नजर में एक लड़की है।“
अबीर चौंका, पर खुद को संभालते हुए बोला, “मां, अभी नहीं।“
मां ने माथे पर सलवटें समेटते हुए पूछा “क्यों नहीं?”
अबीर ने रहस्यमयी ढंग से मुसकुराते हुए कहा “समय आने पर हो ही जाएगी।“
मां अबीर की मुस्कान देखकर कुछ सोचने लगीं। अचानक मां के चुप होने पर अबीर ने पूछा, “क्या हुआ मां?”
मां ने उसके मन की कोशिश की “कोई तुझे पसंद हो तो बता दे। मैं जाऊंगी तेरा रिश्ता लेकर।“
मां की बात ने अबीर के मन में चल रही लड़ाई को फिर से जगा दिया। उसने मन ही मन खुद से पूछा, “क्या मैं नव्या के लायक हूँ? और क्या होगा जब मेरी मां, जो बस अपनी जात-बिरादरी की दुहाई देती हैं, उन्हें पता चलेगा कि मैं जिनसे प्यार करता हूँ, उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है हमारी जात-बिरादरी या सामाजिक स्तर से? और सबसे बड़ा सवाल, क्या नव्या मेरे साथ सीमित सुविधाओं में खुश रह पाएंगी?”
जाने कब वह उलझनों में थक-हारकर सो गया। दोपहर 12 बजे अचानक उसकी जेब में रखा फोन बजा। फोन देखकर वह खड़ा हो गया। “मां, अभी आया,” कहकर वह दरवाजे के पास खड़ा हो गया और नव्या को फोन किया। दूसरी तरफ नव्या थी।
अबीर ने फोन उठते ही कहा “नव्या?”
नव्या ने जवाब दिया “हाँ, अबीर! कहाँ हैं आप?”
अबीर ने एक साथ कई सवाल पूछ लिए, “आप कहाँ हैं? सब ठीक है न? माफ कीजिए, भागदौड़ में आपसे बात नहीं कर पाया। नाश्ता किया था आपने?”
नव्या, पहले तो अबीर के इतने सवालों से एकदम से चौंक गई। अगले ही पल उसे अबीर की मनोदशा का अंदाज़ा हो गया। मन में वह खुद से बोली “हे ईश्वर क्या करूं मैं, इनकी चिंता का? पता नहीं, सात दिन कैसे रहेंगे। रह तो मैं भी नहीं पाऊंगी, पर।“
नव्या ने रोकते हुए “रुकिए। अबीर, शांत हो जाइए।“
अबीर ने संभलते हुए कहा “ओह, माफ कीजिए। आपकी चिंता हो रही थी, इसीलिए बस...”
नव्या की आवाज़ में आश्वासन था “चिंता मत कीजिए। मैं दफ्तर में हूँ। सब ठीक है। नाश्ता करके ही आई थी।“
अबीर ने राहत की सांस ली “बहुत अच्छे।“
नव्या ने भी पूछ लिया “आप ठीक हैं न?”
अबीर: “हाँ। राघव से मिलीं आप?”
नव्या: “अभी नहीं, दोपहर में मिलूँगी।“
अबीर: “ठीक है, आप काम कीजिए। मैं फिर फोन करूँगा।“
नव्या: “ठीक है।“
फोन रखकर अबीर दरवाजे से थोड़ा पीछे हटकर खड़ा हो गया। उसने सबसे पहले राघव को मैसेज लिखा:”भाई, तुम दोनों अपना ध्यान रखना। अरनव से दूर रहना।“
फिर उसने नव्या को मैसेज लिखा:”नव्या, आप राघव से मिल लीजिएगा और अपना ध्यान रखिएगा।“
इसके बाद वह फिर से अपनी सीट पर आ गया। सारी दोपहर वह बिना कुछ खाए सोता रहा।
क्या अबीर अपने मां-पापा को नव्या के बारे में बता पाएगा? मां और पापा की क्या प्रतिक्रिया होगी?
भाग – नौ
भाग्य की लीला
कहते हैं कि जब आपका मन किसी दुविधा में हो—क्या किया जाए, क्या न किया जाए की लड़ाई मे जब विवेक कमज़ोर पड़ जाता है, तब भाग्य आपको ऐसी स्थिति में डाल देता है जिससे आप अपने मानसिक द्वंद्व का अंत कर सकें और उचित निर्णय ले सकें।
कुछ ऐसा ही आज अबीर के साथ होने वाला था।
अबीर लगभग सारी दोपहर सोता रहा था। वह अब भी गहरी नींद में था, जब मां ने उसे उठाया। शाम के चार बज रहे थे। उठने के बाद वह सीधे डिब्बे के आखिर में बने बाथरूम में चला गया। लगभग 15 मिनट बाद, जब वह वापस आया, तो उसकी नज़र एक सीट छोड़कर बैठे परिवार पर ठहर गई।
वह परिवार बहुत अमीर था। एक बुजुर्ग थे। उन्होंने महंगा कुर्ता-पाजामा पहना हुआ था और गले में सोने की चेन पहनी थी, जो उनकी अमीरी दिखा रही थी। उनके साथ एक महिला थीं, जो महंगी बनारसी साड़ी पहने हुए थीं और बहुत गरिमामय लग रही थीं। उनके साथ एक मजबूत और लंबा लड़का था, जो शायद उनका बेटा था। परिवार में एक और लड़की भी थी, जो हाल ही में शादीशुदा लग रही थी। उसके हाथों में मेहँदी और मांग का सिंदूर उसकी हाल ही हुई शादी का सबूत थे। उसने नीली साड़ी पहनी हुई थी और वह इतनी खूबसूरत लग रही थी कि मानो कोई अप्सरा हो। शायद वह लड़का ही उसका पति था।
यह साफ झलक रहा था कि वे आर्थिक रूप से काफी संपन्न परिवार थे।
नीली साड़ी वाली लड़की के हाथों में शायद कोई डायरी थी, जिसे वह पढ़ रही थी। अचानक, उसने अबीर की ओर देखा। अबीर हड़बड़ा गया और खिड़की के बाहर देखने लगा, लेकिन उसे ऐसा महसूस होता रहा कि लड़की की नजरें लगातार उस पर टिकी हुई हैं।
धीरे-धीरे रात गहरी होने लगी। अबीर के मां-पापा खाना खाकर सो चुके थे, लेकिन अबीर की नींद गायब थी। एक तरफ उसे नव्या और राघव की याद आ रही थी, तो दूसरी ओर उस अनजान लड़की का बार-बार उसे देखना उसे बेचैन कर रहा था।
आखिरकार, अबीर ने सच जानने का फैसला किया। इससे पहले कि वह कुछ करता, वह अजनबी लड़की अपनी सीट से उठी। जाने क्यों, अबीर ने अपना सिर खिड़की की ओर घुमा लिया। लड़की के उठते ही उस बुजुर्ग महिला की खुरदरी आवाज़ आई।
"कहाँ जा रही हो? देख, तरुण, यह कहाँ जा रही है!"
तरुण नाम का वह लड़का ऊपरी सीट पर लेटा हुआ था। उसने गुस्से में लड़की की ओर देखा, जिससे वह घबरा गई और अटकते हुए बोली, "मम्मी, बाथरूम जा रही थी।"
महिला ने भुनभुनाते हुए उसे जाने का इशारा किया। लड़की चलते हुए अबीर की सीट के पास एक पल के लिए ठहर गई। अबीर एक पल के लिए घबरा गया। लड़की ने चुपके से एक कागज़ का टुकड़ा गोल बनाकर उसकी सीट पर फेंक दिया और जल्दी से बाथरूम की ओर चली गई।
रात के नौ बजे तक गहरी शांति पसर चुकी थी। उस शांति में भी अबीर का दिल असामान्य गति से धङक रहा था।
उसके जाते ही अबीर ने इधर-उधर देखा कि कोई उसे देख तो नहीं रहा था। फिर उसने धीरे से उस कागज़ के गोले को उठाया और उसे खोलकर पढ़ने लगा। कागज़ पर लिखा था:
"मुझे नहीं पता कि आप कौन हैं, पर आप पर विश्वास करने का मन हो रहा है। आपको देखकर लगता है कि आप इंसानियत को सबसे ऊपर रखते हैं। उसी इंसानियत का वास्ता देकर आपसे विनती करती हूं, कृपया मेरी मदद कीजिए।
एक अजनबी,
शालिनी।"
अबीर के मन में आखिरी के तीन शब्द—"मेरी मदद कीजिए" गूंजने लगे। साथ ही एक सवाल भी सिर उठाने लगा था: क्या यह लड़की किसी मुसीबत में है? और मुझे ही क्यों चुना? कुछ तो देखा होगा उसने। अबीर मन ही मन सोचने लगा, उसके भरोसे को तोड़कर कहीं उसे और बड़ी मुसीबत में न डाल दूं। जाने क्या सोचकर, उसने अगले पांच मिनट में शालिनी की परेशानी समझने और उसकी मदद करने का फैसला कर लिया।
वह लड़की, जिसका नाम शालिनी था, अबीर की ओर देख रही थी। अबीर ने आंखों के इशारे से पूछा, क्या हुआ है?
लड़की ने भी इशारों में जवाब दिया। उसने अपने साथ बैठे तीन लोगों की ओर इशारा किया और हाथ जोड़ लिए। अबीर कुछ समझ नहीं पाया। लड़की ने फिर से उन्हीं तीनों की ओर इशारा करते हुए अपनी गर्दन पर हाथ रखकर काटने का इशारा किया। अबीर उसकी इस प्रतिक्रिया पर चौंक गया। शायद वह कहना चाहती थी कि ये तीनों लोग मुझे जान से मार देंगे।
अबीर किसी पत्ते की तरह कांप उठा। उसका दिल जैसे उछलकर बाहर निकलने को था। वह सोचने लगा, आखिर मैं क्या मदद करूंगा? फिर भी, शालिनी की आंखों की नमी और उसकी गहरी उदासी को अनदेखा करना अबीर के लिए मुमकिन नहीं था।
तभी तरुण, जो शायद शालिनी का पति था, तेज़ आवाज़ में बोला, "क्या कर रही है? नींद नहीं आ रही तुझे? चल सो।"
तरुण का गुस्सा देखकर शालिनी डर गई और अपनी सीट पर लेट गई। अब अबीर बस उसके पैरों को देख सकता था, जिनमें एक पतली-सी पायल झलक रही थी। हिलते हुए पैर बता रहे थे कि वह सोई नहीं थी। अबीर उठकर शालिनी की सीट के पास जा पहुंचा। शालिनी, जो शायद कुछ लिख रही थी, धीरे से उठकर बैठी और अबीर को देखकर हल्के से मुस्कुरा दी—एक फीकी मुस्कान।
अबीर ने धीरे से कहा, "घबराइए मत, मैं आपकी मदद करूंगा।"
अबीर ने कह तो दिया, पर मन में एक आवाज़ चीख रही थी, रुक जा, नहीं तो आज फंस जाएगा।
अबीर की बात सुनकर शालिनी के चेहरे पर राहत झलकने लगी। उसने एक और कागज़ का टुकड़ा अबीर की ओर बढ़ा दिया।
अबीर ने जैसे ही कागज़ थामा, उसका फोन बज उठा। वह हड़बड़ा गया। जल्दी से कागज़ लिया और दरवाज़े के पास जाकर खड़ा हो गया। फोन की आवाज़ से पास बैठी बुजुर्ग महिला जाग गई थी। उन्होंने चारों ओर देखा, फिर शालिनी को सोते हुए पाकर दोबारा सो गईं।
अबीर ने नव्या को फोन लगाया और चिट्ठी खोलकर पढ़ने लगा।
नव्या ने फोन उठाते ही पूछा, "अबीर, कहां पहुंचे आप?"
"शायद रमा पुरी के आसपास हूं," अबीर ने जवाब दिया।
"अच्छा," नव्या ने कहा।
"आप सोई नहीं? कल दफ्तर नहीं जाना है?"
"नहीं, कल तो मुझे बाजार जाना है। पार्टी के लिए कपड़े खरीदने हैं," नव्या ने बताया।
"आप विनिता और सिया के साथ जाएंगी न?" अबीर ने पूछा।
"नहीं, वो लोग बस से जाएंगी। इतनी गर्मी में मैं तो बस से नहीं जाऊंगी। कार से ही जाऊंगी," नव्या ने साफ कहा।
"ठीक है, कल बात करते हैं।" अबीर ने उदास मन से कहा और फोन रख दिया।
फोन रखते ही अबीर के मन में एक सवाल उठने लगा, नव्या को बस से जाना तक गवारा नहीं। वह मेरे साथ उस घर में कैसे रहेंगी, जहां सिर्फ दो कमरे हैं?
उसे वह सारी बातें याद आने लगीं, जो एक दिन पहले अरनव ने कही थीं। "नव्या तुम्हारे साथ नहीं रह पाएगी। उसके बड़े-बड़े शौक और खर्च तुम नहीं उठा पाओगे।"
और वह दिन भी याद आया, जब नवल कह रहा था, "अमीर लड़कियां किसी गरीब से प्यार तो कर लेती हैं, पर जब निभाने की बात आती है, तब ये कांच की गुड़िया टूट जाती हैं। चली जाती हैं अपनी अमीरी वाली जिंदगी में, और बेचारे लड़के बर्बाद हो जाते हैं।"
अबीर के मन में जो शक का ठहरा पानी था, उसमें किसी ने कंकड़ फेंक दिया था। आज उसका विश्वास डगमगा रहा था।
अपने विचारों को परे रखकर अबीर ने चिट्ठी पढ़ना शुरू किया। उसमें लिखा था:
"ये लोग मेरे सास, ससुर और पति हैं। मुझे जान से मारना चाहते हैं। इसीलिए कहीं दूर ले जा रहे हैं, ताकि मैं लौट न सकूं। मुझे बचा लीजिए। जमुना पुरी में मेरा घर है, और मुझे ट्रेन से उतरना है। लेकिन मैं अपने काले बैग के बिना नहीं जा सकती। उसी बैग में इन सबके काले कारनामों के सबूत हैं। मैं खुद उस बैग को नहीं उठा सकती। आपसे विनती है कि वह बैग, जो जंजीर से बंधा है, उसे दरवाज़े तक पहुंचा दीजिए। आपकी मदद के लिए हमेशा आभारी रहूंगी।
एक अजनबी,
शालिनी।"
अबीर के दिमाग में वो सारी जासूसी किताबें और कहानियां घूमने लगीं, जो उसने कभी पढ़ी थीं। लेकिन उसने अपनी सोच को परे रखकर शालिनी की मदद करने का निर्णय लिया।
वह अपनी सीट से उठकर धीरे-धीरे शालिनी की सीट के पास पहुंच गया। नीचे वाली सीट पर उसके ससुर खर्राटे मारते हुए सो रहे थे। अबीर उनके पैरों के पास ठीक उस यात्री की तरह बैठ गया, जिसके पास टिकट नहीं था और न ही कोई सीट।
ऊपर वाली सीट पर शालिनी थी, जो अबीर को एकटक देख रही थी। अबीर ने अपनी हथेलियों के बीच छुपी छोटी सी छुरी निकाली और नीचे झुककर देखा। काला बैग सीट के नीचे लोहे की जंजीर से बंधा हुआ था। अबीर ने सावधानी से छुरी को जंजीर पर घिसना शुरू किया। ट्रेन की गति और अबीर के हाथों की लय, और उसके दिल की धड़कनें जैसे एक ताल में चल रहे थे। उसे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे वह कोई पेशेवर चोर हो। इस विचार पर वह मन में मुस्कुरा दिया।
छुरी घिसते-घिसते 15 मिनट बीत गए। लेकिन जंजीर पर केवल एक खरोंच भर आई थी। झुंझलाहट और डर के बीच जूझते अबीर ने छुरी दूसरे हाथ में लेकर और तेजी से जंजीर पर चलाना शुरू कर दिया।
शालिनी की अधीरता बढ़ती जा रही थी। उसने इशारे से अबीर को जल्दी करने के लिए कहा। अचानक, एक कड़ी "खट" की आवाज़ के साथ चटक गई। उसी समय शालिनी की धीमी-सी आवाज़ आई, "जल्दी कीजिए, जमुना पुरी आने वाला है।" अबीर को कुछ समझ नहीं आ रहा था, पर भाग्य उसका साथ दे रहा था। तभी, दूसरी पटरी पर एक ट्रेन तेज़ गति से गुज़री। उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि किसी भी अन्य आवाज़ को आसानी से दबा सकती थी।
अबीर ने मौके पर चौंका मारा। जहां से कड़ी चटकी थी, वहां से उसने जंजीर को खींचकर तोड़ दिया। बैग अब आज़ाद था। सबसे पहले अबीर ने सुनिश्चित किया कि कोई उसे देख तो नहीं रहा। फिर उसने मन ही मन कहा, "इतना खतरनाक काम न कभी किया, न कभी करूंगा। प्रभु, बस आज बचा लीजिए।"
शालिनी ने जंजीर चटकती देख राहत की सांस ली। उसने जल्दी से अपनी चूड़ियां, कंगन, और पायल उतारकर अपने छोटे से झोले में रख दिए, ताकि कोई आवाज़ न हो। अबीर ने बैग सावधानी से बाहर निकाला और इधर-उधर नजर दौड़ाते हुए बैग लेकर दरवाज़े के पास खड़ा हो गया।
ट्रेन अब जमुना पुरी की सीमा पार कर स्टेशन की ओर बढ़ रही थी। लगभग दस मिनट बाद, शालिनी अपनी साड़ी संभालते हुए दरवाज़े के पास पहुंची।
अबीर ने उसे देखते ही कहा "शालिनी जी, आप उतर जाइए। मैं बैग प्लेटफार्म पर उतार दूंगा।"
शालिनी मुसकुराते हुए बोली "मेरे पास शब्द नहीं हैं आपका आभार चुकाने के लिए।"
अबीर ने भी मुसकुराते हुए कहा "कोई बात नहीं।"
करीब पांच मिनट बाद, ट्रेन जमुना पुरी स्टेशन पर रुकी। लेकिन स्टेशन पर कुछ अजब-सा सन्नाटा था। जो स्वाभाविक चहल-पहल सामान्यतः किसी स्टेशन पर होती है, वह यहां नहीं थी। स्टेशन छोटा था, और ट्रेन केवल दो मिनट के लिए रुकी थी। शालिनी ने उतरने से पहले कहा, "मैं जिंदगी भर आपका अहसान याद रखूंगी। अगर मौका मिला, तो इसे उतार दूंगी।"
अबीर ने यहां-वहां देखते हुए कहा "कोई बात नहीं, जल्दी कीजिए।"
शालिनी ट्रेन से उतरकर प्लेटफार्म पर खड़ी हो गई। अबीर ने बैग जल्दी से नीचे उतारा और वापस डिब्बे में आ गया। तभी ट्रेन चल पड़ी। शालिनी हाथ हिलाकर उसे विदा कर रही थी।
अबीर जब वापस अपनी सीट की ओर बढ़ने लगा, तभी उसके पैर से कुछ टकराया। उसने झुककर देखा, यह शालिनी की डायरी थी।
अबीर ने डायरी उठाई और उसे पलटना शुरू किया। डायरी में शायरी, गानों के बोल, और रंगीन आकृतियां बनी हुई थीं। तभी एक तस्वीर डायरी से निकलकर गिर पड़ी। अबीर ने झुककर तस्वीर उठाई और जो देखा, उसने उसे झकझोर कर रख दिया।
तस्वीर में शालिनी एक लड़के के साथ खड़ी थी। दोनों के गले में फूलों की वरमाला थी, और उनके पीछे एक छोटी-सी विवाह वेदी नजर आ रही थी। यह तस्वीर मंदिर में हुई शादी की गवाही दे रही थी। अबीर के मन में सवालों का तूफान उठ खड़ा हुआ। अगर यह शालिनी का पति है, तो तरुण कौन है? और शालिनी ने मुझसे झूठ क्यों बोला? क्या मैं ही मिला था, ठगने के लिए?
पहली बार अबीर ने खुद को ठगा और डरा हुआ महसूस किया। उसने चारों ओर देखा और चुपचाप अपनी सीट की ओर बढ़ने लगा।
तभी उसे किसी ने रोका।
एक चचा ने ऊपर की सीट से झांकते हुए पूछा "कौन सा स्टेशन है, बेटा?"
अबीर ने लापरवाही से कहा "पता नहीं।"
वह अपनी सीट पर आकर बैठ गया। उसके हाथ अब भी कांप रहे थे। माथे पर पसीने की बूंदें झलक रही थीं। दिल तेज़ी से धङक रहा था। वह सीट पर लेट गया और तस्वीर को एकटक देखने लगा। साथ ही उसे नव्या की कही बाते भी याद आती रही। रात के किसी थके हुए पल में, जब उसका मन सवालों में उलझा हुआ था, नींद ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
अब क्या होगा, क्या अबीर ने किसी अनजान लड़की की मदद करके कोई ख़तरा मोल ले लिया है? आखिर कौन है शालिनी? और क्या यह घटना उसकी उलझनों को किसी फैसले पर ले जाएगी?
भाग – दस
दुविधा का अंत और अबीर का फैसला
सुबह अबीर की नींद एक शोर से खुली। उसे तुरंत महसूस हुआ कि यह शोर शालिनी के भागने के कारण हो रहा है, जिसमें उसका भी हाथ था। उसने धीरे-धीरे आंखें खोलीं, ठीक उसी तरह जैसे डॉक्टर पट्टी खोलते हैं, ताकि अचानक बेईमान दुनिया को देखकर झटका न लगे।
अबीर उठकर बैठा। सामने देखा, तो उसके मां-पापा उठकर आपस में बातें कर रहे थे। दो सीट छोड़कर जो परिवार बैठा था, वह स्तब्ध था। बुजुर्ग महिला, दूसरी महिलाओं से घिरी हुई, दहाड़ मारकर रो रही थी, "भाग गई करमजली! सब लूटकर भाग गई।"
वह थोड़ी देर चुप हुई, फिर सुबकते हुए बोली, "मन कर रहा है कि पंखे से लटक जाऊं।" जैसे ही वह अपनी बात पूरी करने को होती, दूसरी महिलाएं उसे रोक लेतीं। वहीं, बुजुर्ग व्यक्ति सिर पर हाथ धरे बैठे थे, जैसे किसी बड़े सदमे में हों।
अबीर के मन में घबराहट बढ़ने लगी, लेकिन सच जानने की जिज्ञासा भी बढ़ गई। उसने मूंह धोने का बहाना बनाया और धीरे-धीरे उस परिवार के पास पहुंच गया। बुजुर्ग महिला अब गुस्से में अपने बेटे को बुला रही थी। तरुण गहरी नींद में था और कुछ सुन नहीं रहा था। महिला ने गुस्से में आकर उसके बाल पकड़कर खींचा।
तरुण दर्द से कराहते हुए उठा और स्थिति को समझने की कोशिश करने लगा। महिला चिल्लाई, "सोए रहो! उठना मत!"
तरुण हड़बड़ाते हुए बोला, "अरे हुआ क्या? सुबह-सुबह क्यों आसमान सिर पर उठा लिया है?"
महिला गुस्से से भरी हुई बोली, "तुम्हें क्या फर्क पड़ता है? जाओ, टांग पसारकर सो जाओ!"
तरुण ने इधर-उधर देखते हुए पूछा, "शालिनी कहां है?"
महिला ने मायूसी से कहा, "भाग गई।"
तरुण के मूंह से अनायास ही निकल गया, "कैसे?"
महिला का गुस्सा अब सातवें आसमान पर था। वह गरजते हुए बोली, "जब ध्यान देना चाहिए था, तब घोड़े बेचकर सो रहे थे! अब पूछ रहे हो, कैसे भागी? पता नहीं कहां उतर गई, कैसे भागी। साथ में वह बैग भी ले गई। लुट गए हम! तेरी बहन भाग गई, तरुण।"
अब तरुण पूरी तरह असमंजस में था। अबीर का दिल जैसे धड़कना बंद हो गया। “क्या शालिनी तरुण की बहन थी? लेकिन उसने झूठ क्यों बोला?”
अबीर उठकर बाथरूम गया। वहां उसने चेहरे पर पानी मारा और खुद को संभालने की कोशिश की। उसके दिमाग में एक के बाद एक सवाल उठने लगे। "अगर किसी ने देख लिया होता, तो क्या होता?" एक-एक करके संभावित नतीजे उसे डराने लगे।
लेकिन सवाल था की सच्चाई आखिर थी क्या?
अपने मन में उठते सवालों को लिए अबीर बाहर आ गया। ट्रेन के अंदर माहौल गर्म था। आस-पास के यात्रियों को अच्छा-खासा विषय मिल गया था समय काटने के लिए। लोग खड़े होकर तमाशा देख रहे थे।
जिन्हें सारी घटना के बारे में पता चल गया था, वे अपनी-अपनी सीट पर बैठे, सच्ची-झूठी कहानियां गढ़ रहे थे। अबीर ने सामने देखा, वही बुजुर्ग चचा बैठे पान चबा रहे थे, जिन्होंने रात में उससे स्टेशन का नाम पूछा था। उनके सफ़ेद बाल, सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, और आंखों में काजल उन्हें एक रहस्यमयी व्यक्तित्व दे रहे थे।
अबीर झिझकते हुए उनके पास पहुंचा।
चचा ने उसे देखते ही पूछा, "क्या हुआ बेटा?"
अबीर ने हल्की झिझक के साथ कहा, "चचा, एक बात पूछूं?"
"हां, पूछो," चचा ने उत्तर दिया।
अबीर ने शालिनी के परिवार की ओर इशारा करते हुए कहा, "इतना शोर क्यों हो रहा है? क्या हो गया?"
चचा ने पान खिड़की के बाहर थूका और अबीर को बैठने का इशारा किया। अबीर उनके पास बैठ गया। चचा ने उसे गौर से देखते हुए कहना शुरू किया। जो उसने सुना, उसके बाद पैरों तले की ज़मीन सरक गई।
"वो लड़की, जो रात के अंधेरे में भाग गई थी, वो उन भाई साहब की बेटी है और उस हट्टे-कट्टे लड़के की बहन," चचा ने बताया।
"रात को वो ट्रेन से भाग गई," उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा।
अबीर की उत्सुकता चरम पर थी। "पर वो क्यों भागी?"
चचा ने मुसकुराते हुए जवाब दिया, "ये लोग बड़े अमीर हैं, और उस लड़की को एक गरीब लड़के से प्यार हो गया। लड़की ने अपने घरवालों को शादी के लिए खूब मनाया, पर कोई बात नहीं बनी।"
अबीर की जिज्ञासा और बढ़ गई। "फिर क्या हुआ?"
चचा ने अपनी बात जारी रखी। "फिर लड़के ने लड़की को घर से भगा लिया, और दोनों ने एक मंदिर में शादी कर ली। लेकिन उसके बाप और भाई ने जबरदस्ती उसे वापस घर ले आए। उसके ऊपर बहुत दबाव डाला गया कि वह लड़के से तलाक ले ले। पर लड़की भी कम चतुर नहीं थी। उसने अपनी बात मनवा ही ली।"
अबीर के दिमाग में हज़ारों सवाल घूमने लगे। "चतुर?" उसने पूछा।
चचा हंसते हुए बोले, "हां गुरु, चतुर। काले बैग में जो भी रुपया-पैसा था, सब लेकर भागी।"
अबीर सिहर उठा।
"हां," चचा ने गंभीरता से कहा, "मुझे तो लगता है कि उसने जो किया, सही किया। अपने प्यार के लिए वह हर हद पार कर गई। यही तो है सच्चा प्यार।"
अबीर चुपचाप उठकर खड़ा हो गया। ट्रेन में अब भी शोर हो रहा था। वह दरवाजे के पास जाकर दो कदम पीछे हटकर खड़ा हो गया। उसके मन में जो तूफान चल रहा था, वह अब धीरे-धीरे शांति में बदलने लगा था। यूं समझिए की उसे एक सुकून का एहसास होने लगा था।
अबीर ने खुद से कहा, "शालिनी में कितनी हिम्मत और त्याग था।"
अपने प्रेम को पाने के लिए उसने हर मर्यादा को तोड़ दिया, हर सीमा को लांघ दिया। वह महंगी जंजीरों में कैद नहीं रही। उसने जो चाहा, उसे हासिल किया। अबीर के मन में शालिनी के प्रति एक सम्मान जाग उठा।
वह सोचने लगा, "कितना दिमाग चलाया उसने।"
यह विचार उसे भीतर तक शांत कर रहा था। इसमें एक आश्वासन छिपा था कि हर लड़की एक जैसी नहीं होती। जब कोई निभाने पर उतर आए, तो उसे कोई रोक नहीं सकता।
अब नव्या की छवि उसके मन में उभरने लगी। "नव्या भी मुझसे प्यार करती हैं। वह भी हर परिस्थिति में मेरे साथ खड़ी रहेंगी।"
अबीर का नव्या पर विश्वास, जो कुछ समय के लिए डगमगा गया था, अब और भी मजबूत हो गया। उसने खुद से वादा किया कि वह अब कभी नव्या पर शक नहीं करेगा। वह उसे खुश रखेगा, हर हाल में। ट्रेन की खिड़की से बाहर का दृश्य अद्भुत था। चारों ओर हरियाली फैली हुई थी, और दूर क्षितिज पर धरती और आकाश जैसे एक-दूसरे से मिल रहे थे। जैसे वे दोनों भी एक-दूसरे से माथा सटाए खड़े हों, बेहद करीब। अबीर ने अपना फोन निकाला और सामने दिखते इस खूबसूरत दृश्य को कैमरे में कैद किया। उसने वह तस्वीर नव्या को भेजी और नीचे लिखा:
"गुड मॉर्निंग, नव्या।
आप कैसी हैं? सब ठीक है न?
मैं मां को हमारे रिश्ते के बारे में बताने वाला हूं। और फिर मां-पापा के साथ आपके घर आऊंगा, आपके पापा से, आपको मांगने।
तैयार रहिएगा।"
अबीर ने गहरी सांस ली। उसे एक और उम्मीद मिल गई थी। उसने मन में कहा “अब समय आ गया है की मां-पापा को नव्या के बारे में बताया जाए।“
वह वापस अपनी सीट पर लौट आया, और मां के पास बैठ गया। उसकी मां ने मुस्कुरा कर पूछा – "क्या हुआ?"
अबीर ने भूमिका बांधते हुए कहा "मां, आप कल मेरी पसंद के बारे में पूछ रही थीं न?"
मां ने कहा "हां।"
अबीर आखिर मुद्दे पर आते हुए कहा "तो आज मैं आपको उनके बारे में बताऊंगा, जिनसे मैं प्यार करता हूं।"
मां ने मुसकुराते हुए उसे छेङा "कौन है वो, जो मेरे बेटे के दिल पर राज कर रही है?"
अबीर मां की बात पर झेंप गया और पापा से कहा "पापा आप भी यहां आइए न!"
पापा ठीक उसके पास बैठ गए।
अबीर ने गहरी सांस ली और कहना शुरू किया "मां, पापा, मैं नव्या से प्रेम करता हूं। वो मेरे दफ्तर में काम करती हैं, वो बहुत अच्छी हैं। और मुझे बहुत चाहती हैं।"
मां और पापा के सवाल बिल्कुल स्वाभाविक थे। यही होता है न, कि विवाह में जात-बिरादरी, धन, सामाजिक स्तर का एक होना बहुत जरूरी हो जाता है।
मां ने धीरे से पूछा "अपनी जात की है?"
पापा ने भी अपनी सवाल रखा "घर कहां है उसका?"
अबीर अब असमंजस में था, कैसे बताएं? पर आज वह सब कहना चाहता था। आखिर एक न एक दिन यह सवाल उठने ही थे।
अबीर ने संभलते हुए कहा "मां,पापा वो अपनी जात-बिरादरी से नहीं हैं। और वो प्रताप नगर के संपन्न व्यक्ति “गिरीश कश्यप” की इकलौती बेटी हैं। उनका अपना कारोबार है।"
मां की आंखें सिकुड़ीं, उन्होंने सपाट लहज़े में कहा "यह रिश्ता नहीं हो सकता। ज़मीन-आसमान का अंतर है हम में और उनमें।"
पापा ने भी अपना फैसला सुना दिया "वो कैसे रहेगी, हमारे छोटे से घर में? महलों में पली लड़की, बिना ऐशों-आराम के कैसे रह सकती है?"
अबीर की हिम्मत टूटने लगी पर उसने कोशिश जारी रखी "मां, इससे क्या मतलब है कि उनकी जात कौन सी है? मतलब तो इससे होना चाहिए न कि वो स्वभाव से कैसी हैं? और वो स्वभाव से बहुत अच्छी हैं।"
मां ने सोचते हुए कहा "अच्छा मान ले वो बहुत अच्छी है पर, तेरे पापा भी सही कह रहे हैं। वो तेरे साथ नहीं रह पाएगी।" वह पहले ही नव्या को ज़बान दे चुका था। ज़बान के परे वह उसे खोना नहीं चाहता था। इसीलिए काफ़ी देर तक अबीर अपने मां-पापा को समझाता रहा, और इसी में दोपहर हो गई। बड़ी मेहनत के बाद, आखिरकार मां-पापा ने नव्या को अपनाने के लिए हां कर दी। अबीर बहुत खुश था। उसने मां को नव्या की एक तस्वीर दिखाई। मां ने मुसकुराते हुए कहा, "नव्या सच में बहुत खूबसूरत है।"
पापा भी हल्का-सा मुस्कुरा दिए।
अभी बातचीत चल ही रही थी कि अचानक अबीर का फोन बजा। उसने देखा तो स्क्रीन पर नव्या की तस्वीर उभर आई। मां ने उसे छेड़ते हुए कहा, "जा, जा, उसे तेरी याद आ रही होगी।"
अबीर बस मुस्कुरा दिया और दरवाज़े की ओर बढ़ गया। दरवाज़े के पास खड़े होकर उसने फोन देखा तो पाया कि नव्या के कई मैसेज थे। उसने तुरंत नव्या को वापस कॉल किया।
दूसरी ओर से नव्या की चहकती हुई आवाज़ आई।
अबीर की आवाज चहक थी "हेलो, नव्या!"
नव्या ने चहकते हुए कहा "हां अबीर, कैसे हैं आप?"
अबीर को नव्या के पीछे बहुत शोर सुनाई दिया। उसने जवाब दिया, "ठीक हूं। आप कहां हैं अभी?"
नव्या का जवाब आया "बाज़ार जा रही हूं।"
अबीर ने शोर को अनदेखा करते हुए कहा "आप खुद गाड़ी चला रही हैं? आपके पीछे बहुत शोर है।"
आगे जो नव्या ने कहा वो अबीर को चौंकाने के लिए बहुत था "नहीं, गाड़ी नहीं। बस में हूं।"
अबीर ने चौंकते हुए पूछा "नव्या, आप बस में? गर्मी नहीं लग रही?"
नव्या हल्के से हंस पङी और बोली "मैं सीया और विनिता के साथ हूं। हम सब बस से बाज़ार जा रहे हैं। गर्मी है तो क्या हुआ? रोज़ जाने कितने लोग बस से जाते हैं। आप भी तो बस से ही आते हैं न। और वैसे भी, अगर आपके साथ रहना है तो आपके रंग में खुद को रंगना ही होगा। मैं खुद को तैयार कर रही हूं।"
अबीर मन ही खुशी से झूम उठा और बोला "सच में? अच्छा, आप ध्यान से जाइए। मैं जल्दी आऊंगा।"
नव्या ने "ठीक है।" कहकर फोन रख दिया।
उस शाम अबीर बहुत खुश था। एक तरफ, मां-पापा नव्या को अपनाने के लिए तैयार हो गए थे, और दूसरी तरफ, नव्या खुद को अबीर के रंग में ढालने की कोशिश कर रही थी। दोपहर 3 बजे गाड़ी बिलासपुर स्टेशन पर रुकी। वहाँ से 2 घंटे का बस का सफर तय करके, शाम 5 बजे वह अपने मां-पापा के साथ रिश्तेदार के घर पहुंचा। मां और पापा रिश्तेदारों से मिलने में व्यस्त हो गए, जबकि अबीर अपने हमउम्र भाइयों के साथ हंसी-मज़ाक में गुम था। पर आने वाले ख़तरे से अनजान था।
आने वाले सात दिनों में क्या होगा? क्या कोई नई मुश्किल सामने आएगी?
भाग - ग्यारह
अगले सात दिन और अबीर की वापसी
अगले सात दिन बहुत जल्दी बीत गए। इन दिनों में अबीर, राघव और नव्या के जीवन में बड़े बदलाव आए।
अबीर ने शादी के कार्यक्रमों में अपनी पूरी क्षमता से घर के कामों में सहयोग दिया। हर किसी की बात का मान रखा और सबके साथ घुल-मिल गया। लेकिन, ऐसा एक भी पल नहीं था जब उसे नव्या की याद न आई हो या राघव की चिंता ने उसे न सताया हो। उसका दिल बस प्रताप नगर लौटने की जल्दी में था। इस बीच उसने अरनव के बारे में जानकारी बहुत सी जानकारी जुटाई। इन दिनों में नव्या ने अबीर से कई नई बातें साझा कीं।
उधर, नव्या ने इन सात दिनों में बस से आना-जाना सीख लिया और कमला की मदद से खाना बनाना भी सीखने की शुरुआत कर दी। अब वह दफ्तर जाने के लिए बस का ही इस्तेमाल करने लगी। साथ ही, वह राघव की निगरानी में अरनव से पूरी तरह दूर रही। नव्या जानती थी कि अबीर उससे कितना प्यार करता है। यही वजह थी कि उसने हर वह काम करने की कोशिश की, जो उनके बीच की अमीरी-गरीबी की लकीर को मिटा सके और उन्हें एक कर सके। पर कहीं न कहीं अबीर का संकोच और उसकी कार में साथ न बैठना उसे परेशान करता था। नव्या भी अबीर को पल-पल याद करती। जब भी उसे समय मिलता, वह अपने दिल की बातें किसी न किसी तरह कहने की कोशिश करती। राघव ने उसे अबीर की चिट्ठी दे दी थी।
जिसमें लिखा था
“मेरी प्रिय नव्या”
“आप अपना ध्यान रखिएगा और याद रखिए कि अबीर ने हमेशा सिर्फ नव्या को चाहा है।
मैं जल्दी लौट आऊंगा।“
आपका प्रेमी “अबीर”
हर रात वह उसे पढ़ती और बस अबीर के जल्दी लौटने का इंतजार करती।
इस सब के बीच, राघव ने भी अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। जहां एक ओर उसने नव्या का ध्यान रखा और उसे अबीर की चिट्ठी सौंपी, वहीं दूसरी ओर उसने अरनव के बारे में गहराई से जानकारी जुटाई। जब भी उसे मौका मिलता, वह अबीर से दो मिनट बात कर लेता। दोनों अपनी-अपनी जानकारी एक-दूसरे से साझा करते। किसी तरह पाँच दिन बीत गए।
पांच दिन बाद
सुबह के चार बजे थे। आज अबीर और उसके मां-पापा को प्रताप नगर के लिए निकलना था। रात भर उसे उत्साह के मारे नींद नहीं आई। सूरज उगने से पहले ही अबीर उठ गया और समय से पहले तैयार हो गया। फिर मां-पापा के साथ मिलकर उसने सामान बांध लिया। करीब पांच बजे अबीर, मां और पापा निकलने के लिए तैयार थे। दरवाज़े के पास खड़ी अबीर की बूढ़ी काकी ने तीनों की बलाएं लीं, ढेरों आशीर्वाद दिए और विदा किया।
किराए की गाड़ी से करीब दो घंटे बाद, सुबह सात बजे, अबीर ढेर सारा सामान लेकर मां-पापा के साथ रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर पहुंच गया। मां-पापा आपस में बातें कर रहे थे, और वह फोन पर नव्या से बातें कर रहा था। मां थोड़ी-थोड़ी देर में उसे मुस्कुरा कर देखतीं, तो वह शर्म से सिर झुका लेता।
मां की मुस्कान अबीर के प्रति उनके गर्व को ज़ाहिर कर रही थी। अबीर की शालीनता, उसका मृदु स्वभाव और उनके प्रति उसका प्यार, मां के दिल को गहराई से छू जाता था। उन्हें अबीर हमेशा किसी वरदान सा लगता था। उसकी समझदारी कभी-कभी मां को चौंका देती।
करीब बीस मिनट बाद बड़े स्पीकर से आवाज़ आई,
"यात्री गण कृपया ध्यान दें। गाड़ी संख्या 14001, करीम गंज से चलकर प्रताप नगर को जाने वाली हमसफ़र एक्सप्रेस, अपने निर्धारित समय सुबह 7 बजकर 30 मिनट पर प्लेटफॉर्म संख्या 2 पर आएगी।"
घोषणा सुनकर अबीर ने सामान गिना और उठ खड़ा हुआ। समय देखा तो 7 बजकर 15 मिनट हो गए थे। प्लेटफॉर्म पर भीड़ बढ़ गई थी। लोग इधर-उधर आ-जा रहे थे, और खोमचे वालों ने अपने माथे पर बंधे साफ़े को दुरुस्त किया और जैसे कोई सैनिकों की टोली युद्ध के पहले हथियारों की जांच करता है, उसी तरह वे अपने सामान को सजाने लगे।
अबीर, मां और पापा सामान लेकर डिब्बे के दरवाज़े की निर्धारित जगह के पास पहुंच गए। करीब पांच मिनट बाद तेज़ घोषणा के साथ ट्रेन आई। भीड़ में जैसे एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। धीरे-धीरे सभी लोग ट्रेन में सवार हो गए। अबीर ने पहले मां-पापा को चढ़ाया, सामान रखा, और अंत में खुद भी ट्रेन में चढ़ गया।
ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ने लगी। अबीर ने सामान सीट के नीचे जमाया, मां-पापा को बैठाया और खुद भी बैठ गया। अचानक उसका फोन बजा। उसने देखा, राघव का फोन आ रहा था। फोन उठाते ही राघव ने पूछा "भाई, ट्रेन में बैठ गया?"
अबीर ने तारीफ करते हुए कहा "हां, वैसे बहुत सही अंदाजा लगाया तुने समय का। बड़ा तेज़ है तू।"
राघव ने इतराते हुए कहा "हां, तेज़ तो बचपन से हूं। कल कब पहुंचेगा तू?"
अबीर ने जवाब दिया "अगर देर न हुई तो, कल शाम चार बजे।"
राघव ने राहत की सांस ली "चलो, अब अकेले नहीं जाना पड़ेगा मुझे। बस 24 घंटे और।"
अबीर भी मुसकुराकर बोला "हां, बस 24 घंटे और। वैसे तुझे दफ्तर नहीं जाना?"
राघव ने कहा "नहीं, तबीयत ठीक नहीं है।"
अबीर ने चौंकते हुए पूछा "क्यों, क्या हुआ है?"
राघव ने टालते हुए कहा "यार, बुखार है, थोड़ा सा।"
अबीर ने चिंता में कहा "बस, हो गई तबीयत खराब।"
राघव पल में अबीर की चिंता भांप गया और समझाते हुए कहा "कुछ नहीं हुआ। चिंता न कर"
अबीर ने अचानक फोन देखा। नव्या ने कई बार फोन किया था। वह अचानक बोला,
"रुक, फिर थोड़ी देर बाद बात करता हूं।"
कहकर उसने नव्या को फोन लगाया। फोन उठते ही अबीर बोला, "गुड मॉर्निंग, प्रिय।"
दूसरी तरफ से नव्या ने नकल करते हुए कहा "गुड मॉर्निंग, प्रिय।"
अबीर हंस पड़ा।
अगले ही पल नव्या की आवाज़ में अबीर की चिंता और उससे दूरी का एहसास घुल गया "कितने दिन हो गए, आपको ऐसे हंसते हुए देखे।"
अबीर ने तसल्ली देते हुए कहा "बस, आपका इंतजार खत्म होने वाला है।"
नव्या ने पूछा "ओह हां, आपने ट्रेन समय से पकड़ ली न?"
अबीर ने महसूस किया। नव्या की हर बात में उसकी चिंता थी। उसने कहा "हां। बस 24 घंटे और।"
नव्या ने सकुचाते हुए पूछा "मां-पापा कैसे हैं?"
अबीर ने धीरे से कहा "बिल्कुल ठीक हैं। आपने मेरा मैसेज पढ़ा?"
नव्या की आवाज़ में शर्म घुली, "हां, मैं तैयार हूं।"
अबीर ने ठिठोली करते हुए कहा "सोच लीजिए, नव्या। मैं अमेरिकी कॉफी नहीं पीता। चाय पीनी पड़ेगी मेरे साथ।"
नव्या ने बङी सहजता से कहा "कोई बात नहीं, मैं खुद चाय बनाऊंगी आपके लिए। और बताइए।"
अबीर जवाब सुनकर मन ही मन मुसकुराया। उसने अपनी कोशिश जारी रखी "मैं हर महीने रेस्टोरेंट नहीं ले जा सकता।"
नव्या की सहजता बरकरार थी "मैं नहीं कहूंगी। हम महीने में एक बार ढाबे पर चलेंगे। ठीक है न?"
अबीर एक बार फिर नव्या के साहस और उसकी मासूमियत पर दिल हार गया। उसने मुस्कुरा कर कहा "माफ़ कीजिए, मैं बस आपको छेङ रहा था पर मेरी सारी शंकाएं मिटा दीं आपने।"
नव्या ने गंभीरता से कहा "मैं समझ सकती हूं। आपके मन में प्यार के साथ ढेरों शंकाएं भी होंगी, हज़ारों सवाल होंगे और आपकी झिझक। पर मैं धीरे-धीरे सब सुलझा दूंगी। बस मेरा साथ दीजिएगा"
अबीर ने बात सुनकर कहा "मैं अपनी नव्या को अच्छी तरह जानता हूं। मैं हमेशा आपके साथ हूं। "
नव्या ने माहौल हलका करने के लिए पूछा "अच्छा, कुछ खाया आपने?"
अबीर ने कहा "नहीं, सुबह निकलना था। कुछ खाने का समय नहीं मिला।"
नव्या ने धीरे से कहा "अब खा लीजिए।"
अबीर ने भी उसी सुर में कहा "ठीक है, आप भी समय से खाना खा लीजिएगा। रखता हूं।"
“ठीक है, प्रिय।" कहकर नव्या ने फोन रख दिया। फोन रखकर अबीर सीट पर आ गया। उसके गाल खुशी से गुलाबी हो गए, ठीक उसके नाम की तरह। पर यह रंग नव्या के प्यार का था।
उस पूरे दिन वह बहुत खुश था। पर रह-रहकर उसे शालिनी की याद भी आती। उसने मन ही मन शालिनी की सलामती की प्रार्थना की। रात तो जैसे-तैसे बीत गई, पर अगली सुबह होते-होते अबीर का उत्साह बढ़ रहा था और धैर्य घट रहा था। जैसे-तैसे दिन भी आखिर निकल गया।
करीब पांच बजे शाम को ट्रेन प्रताप नगर रेलवे स्टेशन पर रुकी। अबीर सामान लेकर उतर गया, मां-पापा उसके पीछे उतर गए। दोनों को एक बेंच पर बैठाकर, अबीर पानी पीने के लिए एक कोने में बने नल की ओर बढ़ा। कुछ मिनट बाद, जब वह पानी पी रहा था, तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। अबीर ने चौंककर देखा, सामने राघव मुस्कुरा रहा था।
अबीर ने उसे देखते ही गले लगा लिया। राघव ने भी उसे थाम लिया और उसके स्वागत में एक शायरी कानों में सुनाई "चूहा मर गया, रज़ाई में। मैं पागल तेरी जुदाई में।"
अबीर ने मुसकुराकर पूछा "अच्छा? इतना याद किया तुने मुझे?"
राघव ने अगला शेर पेश कर दिया "हाथी नाली में बह नहीं सकता, और मैं तेरे बिना रह नहीं सकता।"
अबीर खिलखिलाकर हंस पड़ा। उसने हंसी रोक कर कहा "वाह, मेरे शायर।"
राघव मुसकुरा दिया और आगे चल पङा। अबीर ने अचानक राघव पर सवाल की बौछार कर दी "एक बात बता? तू इतनी जल्दी कैसे आ गया? दफ्तर नहीं गया? नव्या ठीक तो हैं न? "
राघव उसके सवालों चौंक गया पर एक-एक करके सब सवालों का जवाब दिया "गया था। वहां से सीधे यहां आ गया! नव्या बिलकुल ठीक है, उसने साथ आने की ज़िद की थी पर मुझे ठीक नहीं लगा इसीलिए मैंने उसे घर जाने के लिए कहा था। चल, चलते हैं।"
करीब पांच मिनट बाद, अबीर और राघव मां और पापा के सामने थे। पापा, राघव को देखते ही मुसकुराए। राघव ने आगे बढ़कर दोनों के पैर छुए और सामान उठाकर आगे बढ़ गया। पीछे अबीर बाकी सामान उठाए, मां का हाथ थामे चल पड़ा। पापा सबके पीछे हो लिए।
जब सब बाहर निकले, तो सामने राघव कार के पास खड़ा था।
अबीर के पहुंचते ही, राघव ने जल्दी से सामान पीछे रखकर चालक वाली सीट संभाली और अबीर को बैठने का इशारा किया। पहले अबीर ने पीछे मां-पापा को बैठाया और फिर खुद आगे, राघव के साथ बैठ गया।
राघव ने गाड़ी सीधे अबीर के घर की ओर मोड़ दी। रास्ते भर दोनों बातें करते रहे। करीब दो घंटे बाद, राघव अबीर को घर छोड़कर चला गया। वहीं नव्या भी राघव के साथ ही दफ्तर से निकलकर सीधे घर चली आई थी। उसने राघव से ज़िद कि थी की वह उसे भी अबीर के पास ले जाए, पर राघव ने उसे घर जाने के लिए कह दिया था। शायद अब समय आ गया था कि वह अपने प्रेम और प्रेमी से अपने मां-पापा को मिलवा दे।
क्या नव्या अबीर के बारे में अपने मां-पापा को बता सकेगी?
भाग - बारह
एक अनहोनी
घर लौटते ही नव्या अपने कमरे में गई। नहाने और कपड़े बदलने के बाद जब वह बाहर आई, तो उसने देखा कि कमला उसके पलंग पर बैठी थी। कमला ने मुसकुराते हुए उसे देखा, और नव्या ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया। लेकिन कमला के चेहरे पर वह उमंग नहीं थी, जो हमेशा हुआ करती थी।
नव्या को किसी अनहोनी का आभास हुआ। उसने खुद को संभालते हुए पूछा “क्या हुआ दीदी?”
कमला ने गंभीरता से कहा “मुझे तुमसे कुछ कहना है।“
नव्या भी अब गंभीर हो गई और धीरे से पूछा “कहिए न, दीदी।
कमला की बात ने नव्या को डरा दिया “नव्या, अब समय आ गया है कि तुम अबीर के बारे में अपने मम्मी-पापा को बता दो। इससे पहले कि...”
नव्या ने कमला के रुकते ही पूछा “इससे पहले क्या?”
कमला ने नव्या के चेहरे के पढ़ते हुए कहा “इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। देखो, दुनिया कितनी भी बदल जाए, लेकिन लड़की की बढ़ती उम्र देखकर मां-बाप की चिंता खत्म नहीं होती। मुझे लगता है की साहब और मेमसाहब तुम्हारी शादी के लिए लड़का ढूंढ रहे हैं।“
नव्या के चेहरे का रंग उङ गया। उसने कुछ सोचते हुए कहा “मैं बात करती हूं।“
नव्या ने मन ही मन संकल्प लिया "आज जो भी होगा, देखा जाएगा। मम्मी-पापा को अबीर के बारे में बताना ही होगा।"
नव्या की भावनाएं उसके चेहरे पर साफ झलक रही थीं। कभी अबीर के प्यार की लाली उसके गालों को रंग देती, तो कभी मम्मी-पापा की प्रतिक्रिया का डर उसे घेर लेता। अचानक वह उठी और कमला से साथ चलने को कहा। रसोई में पहुंचकर नव्या ने चाय बनाने के लिए दूध चढ़ाया। उसका डर उसपर हावी होने लगा। वह अपनी सोच में गुम थी की तभी दूध उबलकर गिरने लगा। कमला ने गैस की आंच कम की और नव्या अपने विचारों बाहर आई। वह ज़मीन पर गिरे दूध को असमंजस में देख रही थी। कमला ने फौरन सफाई की और नव्या को एक तरफ़ बैठा कर उससे पूछा
“डर लग रहा है?”
नव्या ने धीरे से कहा “हां, पर अब डर कर काम नहीं चलेगा। “
कुछ ही देर में उसने चाय बनाई और नमकीन के साथ तश्तरी में सजाई। फिर खुद को संभालते हुए गहरी सांस ली और मम्मी-पापा के कमरे की ओर बढ़ गई। लेकिन कहते हैं, हर दिन एक नया इम्तिहान होता है। आखिर किसकी तैयारी करें? आज नव्या को भी प्यार के इम्तिहान में बैठना था, पर बिना किसी तैयारी और सूचना के।
दरवाजे पर दस्तक देने के बाद उसने अंदर झांका। मम्मी-पापा सोफे पर बैठे बातें कर रहे थे। दोनों ने उसे देखा, और उनके चेहरे के भाव रहस्यमयी थे। मम्मी ने उसे अंदर आने का इशारा किया।
नव्या ने तश्तरी मेज़ पर रखी और खड़ी हो गई। मम्मी ने उसे बैठने के लिए कहा और एक लिफाफा उसकी ओर बढ़ाते हुए पूछा “यह क्या है?”
लिफाफा देखते ही नव्या के होश उड़ गए। उसका डर आँखों में आंसू बनकर उतर आया। यह अबीर का लिखा प्रेम पत्र था जो अब मां के हाथ लग गया था। उसने घबराहट में पूछा
“मम्मी, यह आपको कहां से मिला?”
मम्मी ने धीमे स्वर में कहा “तुम्हारी अलमारी में कपड़ों के नीचे छुपा हुआ था। सूरत से तो यह किसी चिट्ठी जैसा लगता है। “
नव्या की आवाज़ गले में अटक गई और सिर झुक गया।
पापा, जो हमेशा से नव्या की शादी अपने दोस्त के बेटे अरनव से करना चाहते थे, इस नई जानकारी से परेशान हो गए। यह शादी उनके लिए व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने का ज़रिया थी। लेकिन नव्या के कमरे से मिली चिट्ठी उनकी योजनाओं पर पानी फेरती नज़र आ रही थी।
पापा ने गुस्से में चिल्लाते हुए कहा, "नव्या, सच बताओ! ये चिट्ठी किसकी है?"
नव्या पापा की तेज़ आवाज़ से घबरा गई, लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया। उसने धीमे लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा, "पापा, ये अबीर ने लिखी है।"
मम्मी, जो हमेशा से पापा की हर बात का सम्मान करती थीं, इस बार कुछ अलग महसूस कर रही थीं। उन्हें पता था कि यह चिट्ठी कोई साधारण कागज़ का टुकड़ा नहीं है। यह वह कारण था, जिसने नव्या को कुछ न करने से लेकर रसोई तक का सफर तय करवाया। जींस-टी शर्ट पहनने से सलवार,कुर्ती और दुपट्टे में शालीनता से सजना सिखाया। कहीं न कहीं, मम्मी चाहती थीं कि नव्या को अपने पसंद के लङके से शादी करने का मौका मिले।
मम्मी ,पापा के गुस्से से घबरा गई और समझाते हुए बोलीं, "शांत हो जाइए, उसे अपनी बात कहने दीजिए।"
पापा ने मम्मी की बात मान ली और थोड़ी देर के लिए शांत हो गए, लेकिन उनका चेहरा अब भी गुस्से से तमतमा रहा था।
नव्या ने एक बार मम्मी और पापा दोनों को देखा। उसने गहरी सांस ली और पूरी हिम्मत के साथ कहा, "मम्मी-पापा, मैं आपको बताने वाली थी। लेकिन अब जब यह चिट्ठी आपको मिल गई है, तो यही सही मौका है। यह चिट्ठी अबीर ने लिखी है। मैं उनसे प्यार करती हूं और हम दोनों शादी करना चाहते हैं।"
पापा ने उसके गले में झूलती चेन को देखा और पूछा, "यह चेन कहां से आई?"
नव्या ने चेन को अपनी मुट्ठी में कस लिया और कहा, "यह अबीर ने दी है।"
पापा ने गुस्से से पूछा, "वो क्या करता है?"
"मेरे सीनियर हैं दफ्तर में," नव्या ने जवाब दिया।
"मतलब वह गरीब है," पापा दांत पीसते हुए बोले। "पर सपने अमीरों के दामाद बनने के देखता है।"
नव्या को अपमान का अहसास हुआ पर उसने शांत स्वर में समझाने की कोशिश की, "वो बहुत अच्छे इंसान हैं। मुझे बहुत चाहते हैं। पैसे से नहीं, पर दिल से बहुत अमीर हैं। उन्होंने कभी कोई सीमा नहीं लांघी।"
लेकिन पापा का गुस्सा भड़क उठा। यह सामान्य मानव व्यवहार है की जब हमारी कोई योजना विफल होती है, तब सबसे पहली प्रतिक्रिया गुस्सा ही हुआ करता है। पापा की भी यही स्थिति थी, और होती भी क्यों न। आखिर जिस नव्या की शादी वे रईस अरनव से करके अपना मुनाफा चाहते थे उसे किसी निचले स्तर के व्यक्ति से प्यार हो गया था।
उन्होंने चिल्लाते हुए कहा, "तो उस गरीब के साथ रहने के लिए तुम कमला से घर के काम सीख रही थी? महल में पलकर अब झोपड़ी में जाना चाहती हो?"
नव्या ने हिम्मत नहीं हारी और संयमित होते हुए कहा, "पापा, गरीब होना कोई गलती तो नहीं है, न?"
मम्मी ने नव्या की बात सुनी और उसकी आंखों में झलकते आत्मविश्वास को महसूस किया। लेकिन पापा का गुस्सा अभी शांत होने का नाम नहीं ले रहा था।
उनकी तेज़ आवाज़ गूंज उठी, "गरीब होकर एक अमीर लड़की को फंसाना तो गलती है, और उसे इसकी सज़ा मिलेगी।" उनके शब्द और गुस्सा साफ दर्शा रहे थे कि अपने पैसे और ताकत के बल पर वह नव्या की शादी अबीर से किसी भी कीमत पर नहीं होने देंगे।
नव्या की आंखों में आंसू भर आए। कभी न झुकने वाली नव्या अपनी 23 साल की ज़िंदगी में दो बार झुकी थी। पहली बार वह अबीर के सामने अपने प्यार का इज़हार करने के लिए झुकी थी। आज वह दूसरी बार अपने मम्मी-पापा के पैरों में गिर पड़ी अपने प्यार के लिए और गिड़गिड़ाते हुए बोली, "पापा, मैं उनसे बहुत प्यार करती हूं।" वह मम्मी की ओर असहाय नज़रों से देखती हुई बोली, "मम्मी, पापा को समझाइए न।"
मम्मी ने आगे बढ़कर नव्या को उठाया, लेकिन उनकी आंखों में भी असमंजस और डर झलक रहा था। पापा की गरजती आवाज़ गूंजी, "यह शादी नहीं होगी। उसे भूल जाओ।"
मम्मी को डर था कि पापा के हाथों गुस्से में कोई अनर्थ न हो जाए। उन्होंने कमला को आवाज़ लगाई, "यहां आओ, कमला।"
कमला, जो रसोई में काम कर रही थी, आवाज़ सुनकर कमरे के दरवाजे पर आ गई।
"अंदर आओ," मम्मी ने कहा।
कमला झिझकते हुए अंदर आई। कमरे का माहौल चीखकर वहां हुई घटना का हाल सुना रहा था। वह धीरे से बोली, "जी, मेमसाहब?"
मम्मी ने नव्या को कमला के हवाले करते हुए कहा, "इसे ले जाओ।"
पापा ने गुस्से में कहा, "और समझा दो कि अबीर को भूल जाए।"
इससे पहले की कमला आगे बढ़ती की नव्या का संतुलन बिगड़ गया। वह खुद को संभाल नहीं पाई और कमला के पैरों के पास गिर पड़ी। कमला ने झुककर उसे संभाला।
पापा की तेज़ आवाज़ फिर गूंजने लगी, "सुन लो, नव्या। कल तुम्हें देखने के लिए लड़के वाले आ रहे हैं। मुझे कोई तमाशा नहीं चाहिए।"
"पर पापा," नव्या ने रोते हुए कहना चाहा।
पापा ने उसकी बात काटते हुए कहा, "चुप! कोई बहस नहीं। कल से तुम दफ्तर भी नहीं जाओगी।"
नव्या का दिल जैसे टूटकर बिखर गया। कमला किसी तरह उसे संभालकर उसके कमरे में ले आई। दरवाजा बंद करके उसने नव्या को बिस्तर पर बैठाया और खुद भी उसके सामने बैठ गई।
नव्या अब भी रो रही थी। उसका चेहरा आंसुओं से भीग गया था। कपड़े अस्त-व्यस्त हो गए थे, और उसके बाल जो अब तक जुड़े में बंधे थे, अब खुलकर कंधों पर बिखर गए थे। कमला ने नव्या को गले से लगा लिया। नव्या फूट-फूटकर रोने लगी। कमला ने धीरे से पूछा, "क्या हुआ, नव्या?"
"मम्मी-पापा को वो चिट्ठी मिल गई," नव्या सिसकते हुए बोली।
कमला ने चौंकते हुए पूछा, "तो तुमने सब बता दिया?"
नव्या ने जवाब दिया, "हाँ, बता दिया। पर पापा मान नहीं रहे हैं। बस पैसा-पैसा करते हैं। उनके लिए प्यार की कोई अहमियत नहीं है।"
कमला ने चिंतित होकर कहा, "हम्म... होता है। अब क्या? कल तुम्हें लड़के वाले देखने आ रहे हैं।"
नव्या ने रोते हुए कहा, "मैं यहाँ नहीं रहूंगी, भाग जाऊंगी।"
कमला नव्या को हताश देखकर दुखी थी, पर वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी। उसने उसे समझाते हुए कहा, "नहीं, ऐसे नहीं करते। एक बार अबीर को बता दो। अगर वो सच में तुम्हें चाहता है, तो कल जरूर आएगा।"
नव्या को कमला की बात सही लगी। उसने अपना फ़ोन उठाया और अबीर को कॉल किया।
रात के नौ बज चुके थे। बिस्तर पर लेटे अबीर की थकान अभी उतरी भी नहीं थी कि नव्या के फोन ने किसी अनहोनी की आशंका को बढ़ा दिया। करीब एक मिनट बाद अबीर ने फोन उठाया।
"ह...ह...हेलो।"
नव्या की आवाज़ लड़खड़ा रही थी। अबीर को किसी अनहोनी का डर सताने लगा। उसने खुद को संभालते हुए पूछा, "नव्या? क्या हुआ?"
नव्या ने रोते हुए कहा "अबीर, मुझे यहाँ से ले चलिए न।"
अबीर उसकी बात से चौंककर उठ बैठा और पूछा "क्या हुआ? कुछ बताइए तो?"
नव्या संभलते हुए बोली "मुझे यहाँ नहीं रहना। मैं आपके पास आ रही हूँ।"
अबीर का डर बढ़ने लगा था पर उसने संयम रखते हुए पूछा "नव्या, शांत हो जाइए। क्यों रो रही हैं आप?"
कमला ने नव्या के कंधे पर हाथ रखा और शांति से बात करने का इशारा किया। नव्या ने आँसू पोंछते हुए कहा, "अबीर, आपका दिया ख़त मम्मी को मिल गया था। और मैंने उन्हें हमारे बारे में सब बता दिया।"
अबीर ने पूछा "फिर?"
नव्या ने सिसकते हुए कहा "कल मुझे देखने लड़के वाले आ रहे हैं....पापा को अपनी इज़्ज़त...ज़्यादा प्यारी है। वो.... हमें कभी एक नहीं....होने देंगे!" कहते-कहते उसकी रुलाई फुट पङी।
अबीर की चिंता बढ़ गई, वह परिस्थिति से उतना नहीं डरा जितना नव्या की रुलाई से घबराया। फिर भी उसने नव्या को शांत करने की कोशिश की।
"नव्या, ऐसे हार नहीं मानते। मैं कल आता हूँ। मैं बात करूँगा।"
नव्या ने चिढ़ते हुए कहा "कोई फायदा नहीं है। मैं आ रही हूँ। हम भाग जाएंगे। कहीं दूर।"
अबीर नव्या की बात सुनकर चौंक गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि नव्या ऐसी बात करेगी। पर वह नव्या के स्वभाव को अच्छे से समझता था। अचानक जो हुआ उससे नव्या अपनी सुध-बुध खो बैठी थी इसीलिए ऐसी बातें कह रही थी। उसने गंभीरता से कहा,
"मेरी बात ध्यान से सुनिए। अगर मुझे आपको भगाकर ले जाना होता, तो अब तक ले गया होता। लेकिन भागकर कहाँ जाएंगे? हमारे इस कदम से दोनों परिवारों की इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी।"
नव्या ने गुस्से में कहा "तो क्या करें? बैठे रहें, हाथ पर हाथ रखकर? जो हो रहा है, होने दें?"
अबीर ने समझाते हुए कहा "नहीं। मैं कल आऊँगा। हम दोनों मिलकर सबको मना लेंगे। आप मुझे अपने घर का पता भेज दीजिए।"
नव्या को अबीर की बात से थोड़ी हिम्मत बंधी। उसने कहा “जी भेजती हूं, पर आपने वादा किया है। कल आइएगा ज़रूर। मेरी आखिरी उम्मीद मत तोड़िएगा।“
अबीर ने कहा "वादा रहा, कल सुबह मिलते हैं। आप कोई ऐसी-वैसी बात न सोचिए, कोई गलती न कीजिएगा। बस सो जाइए।"
नव्या ने सहमति में जवाब दिया "जी।"
नव्या को अबीर की चिंता उसकी आवाज़ में दिख रही थी। उसका मन ग्लानि से कचोटने लगा। अबीर अब भी फोन पर था क्योंकि उसे लगा की नव्या के मन में कुछ चल रहा था, यह भी पता था की वह ज़रूर कहेगी। और उसकी शंका सही थी। नव्या ने धीरे से कहा
“मुझे माफ़ कर दीजिए, अबीर।“
अबीर ने सोचते हुए पूछा "माफ़ी? किलसिए?"
नव्या धीरे से बोली "आज ही आप लौटे, और आज ही मैंने आपको एक उलझन में डाल दिया।"
अबीर ना चाहते हुए भी मुसकुराया, क्योंकि उसने सही सोचा था। उसने धीरे से कहा "नहीं, उलझन कैसी? आपने वही किया, जो करना चाहिए था। परेशान न हों। मैं तैयारी करता हूँ।"
नव्या ने अनमने ढंग से कहा "ठीक है।"
अबीर ने फोन रख दिया। पर अब एक सवाल था, क्या किया जाए? ऐसे में उसे सिर्फ राघव का ख्याल आया। उसने तुरंत राघव को फोन किया। राघव ने फोन उठाते ही पूछा, "क्या हुआ भाई?"
अबीर ने दुखी होते हुए कहा "यार, बहुत बड़ी मुश्किल में फँस गया हूँ। तू ही कुछ कर।"
राघव ने उसका मन हल्का करने के लिए कहा "हम हैं, तो क्या ग़म है। बता, क्या हुआ?"
अबीर ने सारी बात राघव को विस्तार से समझा दी। राघव पहले थोड़ा परेशान हुआ, फिर कुछ सोचकर बोला "हमें किसी भी हाल में लड़के वालों से पहले पहुँचना है। वैसे, कौन है वो लड़का?"
अबीर ने इंकार कर दिया "पता नहीं।"
राघव ने समझाते हुए कहा "कोई बात नहीं। मैं कल आता हूँ। माँ-पापा को सब बता दिया तूने?"
अबीर ने सहमति में कहा "हाँ।"
राघव बोला "सही किया। हम कल जाएंगे। जो होगा, देखा जाएगा। जा, सो जा।"
अबीर ने धीरे से अपना सिर दबाते हुए कहा "मज़ाक कर रहा है? अब नींद कहां आएगी।"
राघव ने फिर से कहा "परेशान मत हो। सब ठीक होगा।"
अबीर ने कुछ नहीं कहा और फोन रख दिया। रात धीरे-धीरे गहराने लगी। जहां एक ओर नव्या और अबीर की नींद उड़ी हुई थी, वहीं कोई और था, जो इस सब से बहुत खुश था।
अरनव का घर
रात के करीब 1 बज चुके थे। अरनव अपने कमरे में शराब के नशे में चूर, खुद से बड़बड़ा रहा था।
"बहुत गर्व था न तुम दोनों को अपने प्रेम पर? अब देखना, कैसे कल नव्या मेरी हो जाएगी। उसके जिस्म पर बस मेरा अधिकार होगा," उसने घृणित स्वर में कहा।
इसके साथ ही उसने एक और गिलास गटक लिया। नशे में धुत, वह नव्या और अबीर को कोसता रहा। जाने कब तक यह सिलसिला चलता रहा, और रात के किसी पहर वह बड़बड़ाते हुए सो गया।
अगली सुबह
रात बीत गई थी। आसमान में सूरज अपनी गुनगुनी धूप फैला चुका था।
नव्या पूरी रात नहीं सोई थी। वह फर्श पर बैठी, लगातार रोती रही। ज्यादा रोने की वजह से उसका चेहरा सूज गया था और आंखें लाल हो गई थीं। उसकी हालत देखकर कमला की भी नींद उड़ गई थी। सुबह के 7 बजे कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। नव्या अब भी अपने दुख में सुध-बुध खोए बैठी हुई थी। कमला ने उठकर दरवाजा खोला। सामने नव्या के माता-पिता खड़े थे। जहां मां बेबसी के साथ नव्या को देख रही थीं, वहीं पापा के चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था।
दोनों अंदर आए। आहट से नव्या का ध्यान टूटा। उसने देखा कि मम्मी-पापा कमरे में हैं। मां के हाथों में कुछ कपड़े और गहने थे।
पापा ने गहने और कपड़े बिस्तर पर रखते हुए आदेश दिया, "नव्या, ठीक नौ बजे वो लोग आ जाएंगे। ये गहने और कपड़े पहनकर तैयार हो जाना।"
नव्या के गले से आवाज़ नहीं निकली। उसने सिर हिलाकर मना कर दिया। इस पर पापा का गुस्सा भड़क उठा। पहली बार उनका हाथ नव्या को मारने के लिए उठा। लेकिन तभी मां ने उन्हें रोक लिया। "ऐसे जवान लड़की पर हाथ नहीं उठाते। मैं समझाती हूँ नव्या को," मां ने कहा।
पापा ने गुस्से में जवाब दिया, "हां, समझा लो अपनी लाडली को। अब बस अरनव से ही इसकी शादी होगी।" कहकर पापा पैर पटकते हुए कमरे से चले गए।
नव्या अरनव का नाम सुनकर चौंक गई। उसने रोते हुए मां से कहा, "मम्मी, अरनव बहुत बुरा आदमी है। मैं उससे शादी नहीं करना चाहती। वो मेरे दफ्तर में ही काम करता है। कुछ कीजिए न।"
नव्या को रोते देख मम्मी की आंखों में भी आंसू आ गए। उन्होंने बेबसी से नव्या को गले लगा लिया। थोड़ी देर सोचने के बाद, उन्होंने नव्या के आंसू पोंछते हुए कहा,
"बच्चे, तुम एक बार अबीर को बता दो। मैं दुआ करती हूँ कि सब ठीक हो जाए। लेकिन तुम्हारे पापा का फैसला नहीं बदलेगा। तुम्हारा रिश्ता अरनव से तो बचपन में ही तय कर दिया गया था।"
नव्या ने चौंकते हुए पूछा "क्यों? पापा ने ऐसा क्यों किया?"
मम्मी ने उसके बहते आंसू पोंछते हुए कहा "बेटा, उनके परिवार से संबंध बढ़ाने से तुम्हारे पापा का व्यापार बढ़ेगा, इसलिए।"
यह सुनकर नव्या टूट गई। उसने कभी नहीं सोचा था कि वह व्यापार के लिए एक मोहरा थी।
नव्या ने तुरंत अबीर को फोन किया। फोन उठते ही उसने कहा,
"अबीर, जल्दी कीजिए। कहीं देर न हो जाए।"
अबीर ने समझाते हुए कहा "मैं निकल रहा हूँ। चिंता मत कीजिए।"
नव्या ने खुद को संभालते हुए कहा "अरनव ही वो लड़का है, जो मुझे देखने आ रहा है।"
अबीर के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई "क्या?"
नव्या की आंखों में आंसू भर आए। लड़खड़ाती आवाज़ में उसने कहा, "हां, मुझे भी अभी पता चला..... वह मेरे पापा के दोस्त का बेटा है, जिससे मेरी शादी आज से 20 साल पहले तय हो गई थी। मैं मर जाऊंगी.......पर अरनव से शादी नहीं करूंगी।"
अबीर ने उसकी घबराहट को समझते हुए "ऐसा मत कहिए।"
नव्या ने आखिरी बार कहा "आपको नौ बजे से पहले यहां आना ही होगा। जल्दी कीजिए।"
कहकर नव्या ने फोन रख दिया। मां बेबसी से नव्या को देख रही थीं। वह अपनी बेटी की खुशी चाहती थीं, लेकिन पापा के फैसले के सामने मजबूर थीं। उन्होंने नव्या को तैयार होने को कहा और कमरे से बाहर चली गईं।
कमला ने नव्या को समझाया और उसे गुसलखाने में भेज दिया। कमला ने मन ही मन प्रार्थना की,
"हे भगवान, मेरी नव्या को उसके प्यार से मिला दीजिए। अब उसकी ऐसी हालत देखी नहीं जाती।"
करीब 40 मिनट बाद भी जब नव्या बाहर नहीं आई, तो कमला ने दरवाजा खटखटाया। नव्या ने दरवाजा खोला और बाहर आई। उसके चेहरे पर आंसुओं की लकीरें साफ दिख रही थीं।
कमला ने उसे उम्मीद बंधाते हुए कहा "नव्या, विश्वास रखो। अबीर जरूर आएगा।"
नव्या ने बेबसी से कहा "हां, बस यही एक उम्मीद बाकी है।"
कमला ने उसे अपने पास बुलाया "आओ, मैं तुम्हें तैयार कर दूंगी।"
नव्या ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप आईने के सामने बैठ गई।
सुबह की गुनगुनी धूप में
दूसरी तरफ, अबीर और राघव कार से नव्या के घर की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते में अबीर ने राघव को अरनव के बारे में सब बता दिया। राघव ने एक योजना बना ली थी।
अबीर पूरे रास्ते चुप रहा। वह मन ही मन प्रार्थना कर रहा था “हे, ईश्वर नव्या को सलामत रखना।“ करीब डेढ़ घंटे बाद, ठीक 8:40 बजे, राघव ने एक बड़ी-सी कोठी के सामने गाड़ी रोकी।
राघव ने अबीर से कहा "भाई, सामने देख!"
अबीर ने एक नज़र इमारत पर डालते हुए पूछा "यही नव्या का घर है?"
राघव ने हेरानी से कहा "घर नहीं, महल है। तेरी नव्या तो सचमुच राजकुमारी है।"
अबीर ने धीरे से कहा "हां। चल, चलते हैं।"
कहकर अबीर गाड़ी से उतर गया। राघव भी उसके पीछे चल पड़ा। दोनों कोठी के मुख्य द्वार के पास पहुंचे। वहां बैठकर पहरेदारी कर रहे कमल दादा उन्हें देख अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए।
कमल दादा ने पूछा "कौन हैं आप लोग?"
अबीर ने नम्रता से कहा "नमस्ते, दादा। हम गिरीश साहब से मिलने आए हैं।"
कमल दादा ने जवाब दिया "अच्छा, मैं जाकर बता देता हूं।"
राघव ने आगे बढ़ते हुए कहा "दादा, कोई बात नहीं। हम खुद मिल लेते हैं।"
कहकर दोनों मुख्य द्वार की ओर चल पड़े। अबीर के चेहरे पर गंभीरता थी, जबकि राघव के चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था।
अब सवाल यह था कि क्या अबीर गिरीश साहब और नव्या के पिता को मना पाएगा। दूसरी ओर, अरनव के आने का समय करीब था। उसकी मंशा और अबीर के हौसले के बीच यह टकराव किसी नतीजे पर पहुंचने वाला था।
क्या होगा जब अरनव आएगा? अरनव की योजना क्या है? क्या वह अपनी चालों में सफल होगा, या अबीर और राघव उसे टक्कर देने में कामयाब होंगे?
आखिर राघव के दिमाग में क्या चल रहा है?
क्या अरनव और नव्या की शादी तय होगी?
भाग – तेरह
आमने-सामने
करीब पाँच मिनट बाद अबीर और राघव दरवाज़े के पास पहुँच गए। अबीर की हालत ऐसी थी कि एक तरफ उसे नव्या की चिंता खाए जा रही थी, तो दूसरी तरफ यह सवाल था कि वह नव्या के पिता को कैसे मनाएगा। खुद को सँभालते हुए उसने पास लगी घंटी बजा दी।
नव्या की माँ, जो नीचे बैठक में उदास बैठी थीं, दरवाज़े की आवाज़ सुनकर उठीं। उन्होंने दरवाज़ा खोला तो सामने अबीर और राघव खड़े थे। माँ ने अबीर की तस्वीर कभी नहीं देखी थी, इसलिए वह पहचान नहीं पाईं। उन्होंने पूछा, "कौन हैं आप दोनों?"
अबीर और राघव ने आगे बढ़कर नव्या की माँ के पैर छुए। माँ चौंकीं, पर अगले ही क्षण उन्होंने कंधे से पकड़कर दोनों को उठाया।
अबीर ने विनम्र स्वर में अपना परिचय दिया "मैं अबीर हूँ, आंटी। और यह मेरा दोस्त राघव।"
माँ एकदम चौंक गईं, शायद उन्हें अबीर के आने की उम्मीद नहीं थी। तभी भीतर से नव्या के पापा की आवाज़ आई, "कौन है, सुनैना?"
आवाज़ सुनकर माँ समझ गईं कि पापा अभी अपने कमरे में हैं। पिछले एक घंटे में मां ने खुद को नव्या का साथ देने के लिए तैयार कर लिया था। आज वह बस नव्या की खुशी चाहती थीं, जिसके लिए उन्होंने हर कोशिश करने का फैसला कर लिया था। माँ ने मौके का फायदा उठाया।
"अंदर आइए," कहकर वह पलटकर अंदर चली गईं। अबीर और राघव भी उनके पीछे-पीछे चल दिए। वैसे तो अबीर संकोच के कारण कुछ नहीं कह रहा था, पर उसे नव्या की चिंता हो रही थी। माँ सीधे रसोई के दरवाज़े के पास रुकीं।
अबीर का संयम जवाब दे गया। उसने अधीरता से पूछा, "नव्या कहाँ है, आंटी?"
"अपने कमरे में," माँ ने नपा-तुला सा जवाब दिया।
राघव ने कलाई पर बंधी घङी देखते हुए कहा "नौ बज गए।"
यह सुनकर माँ का दिल बैठ गया। उन्होंने सपाट लहजे में अबीर से पूछा, "आप सच में नव्या से प्यार करते हैं?"
अबीर को सोचना नहीं पङा, आखिर वो नव्या को दिल की अथाह गहराइयों से चाहता था। उसने अपनी चाहत का ऐलान कर दिया "जी। उनके लिए ही यहाँ आया हूँ।"
अभी बातें चल ही रही थीं कि दरवाज़े की घंटी बजी। माँ ने अबीर को वहीं रुकने के लिए कहा और दरवाज़ा खोलने चली गईं। अबीर एक बार नव्या को देखकर सुनिश्चित करना चाहता था कि वह ठीक है। पर स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उसने अपनी इच्छा मन में दबा ली और राघव के साथ दरवाज़े के पीछे छिप गया।
माँ ने जबरदस्ती एक मुस्कान चेहरे पर चढ़ाकर दरवाज़ा खोला। सामने अरनव और उसके पिता मुसकुराते हुए खड़े थे। माँ ने उन्हें आदर से अंदर बैठक में बुलाया और अपने कमरे की ओर चली गईं। कमरे में पहुँचकर देखा कि उनके पति आईने के सामने तैयार हो रहे हैं। आहट सुनकर वे पलटे और पत्नी को देखकर पूछा, "कौन आया था?"
माँ ने धीरे से कहा "अरनव और कपूर साहब आ गए हैं। आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"
पापा ने कमीज़ को दुरुस्त करते हुए कहा "मैं जाता हूँ। तुम जाओ, देखो नव्या तैयार हुई या नहीं।"
माँ ने फिर से अपनी बात रखी "नव्या अरनव से शादी नहीं करना चाहती।"
यह सुनकर पापा के चेहरे की मुस्कान गुस्से में बदल गई। वे दबी आवाज़ में दाँत पीसते हुए बोले, "मैंने नहीं पूछा। वह चाहे या न चाहे, यह रिश्ता होगा।"
माँ घबरा गई और दबी आवाज़ में बोली "पर अरनव अच्छा लड़का नहीं है। नव्या उसे जानती है।"
पापा ने चिढ़ते हुए कहा "जो कहा है, करो।"
माँ बेबसी से कमरे से बाहर निकल गईं और नव्या के कमरे में पहुँच गईं। दरवाज़ा खुला था, तो माँ अंदर चली आईं। नव्या आईने के सामने बैठी थी। हरी बनारसी साड़ी, दोनों हाथों में कलाई भर चूड़ियाँ, माथे पर छोटी-सी बिंदी। नव्या बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी। पर चेहरे पर छाया दुख उस खूबसूरती पर ग्रहण बनकर छाया हुआ था।
पीछे कमला खड़ी थी, जो उसके बाल संवार रही थी। कमला और नव्या दोनों को माँ के वहाँ होने का अहसास नहीं हुआ। माँ ने मन ही मन नव्या के लिए प्रार्थना की और उसके पास जाकर खड़ी हो गईं।
उन्होंने बेबसी से उसके कंधे पर हाथ रखा। नव्या ने माँ की ओर देखा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। माँ ने अपनी आँखों के कोर से काजल लेकर नव्या के कान के पीछे काला टीका लगाया और उसका माथा चूम लिया।
नव्या माँ के गले लगकर बोली, "ये टीका कुछ नहीं कर सकता माँ। मेरे प्यार को नज़र लग गई है।"
माँ नव्या की हालत अब और सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया और मुसकुराकर बोलीं, "ऐसे उम्मीद मत हारो। एक बात बताऊँ?"
नव्या ने कुछ नहीं कहा, बस एकटक माँ को देखती रही।
माँ ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा "अबीर आए हैं, राघव भी उनके साथ है।"
यह सुनकर जैसे नव्या के शरीर में प्राण लौट आए। वह उठ खड़ी हुई।
उसने अधीरता से पूछा "माँ, अबीर सच में आ गए? कहाँ हैं? मुझे मिलना है उनसे। "
माँ ने उसके गाल सहलाते हुए कहा "हाँ। अब मुस्कुरा दो। बस भगवान और भाग्य पर सब छोड़ दो।"
माँ ने नव्या के सवाल का जवाब नहीं दिया। नव्या के मन में एक और उम्मीद जग गई थी। तभी माँ ने कहा, "चलो अब नीचे चलें।"
नव्या ने फिर से कहा "माँ, मुझे अबीर से मिलना है।"
माँ ने बेबसी से कहा "अभी नहीं।"
कहकर माँ पलटकर बाहर चल दीं। कमला ने नव्या के माथे को चूम लिया और बोली, "तुम्हारा विश्वास जीत गया। देखना सब ठीक हो जाएगा अब।" नव्या बस मुसकुराई। दोनों माँ के पीछे रसोई में चली गईं। वहीं, रसोई के दरवाज़े के पीछे छुपे अबीर और राघव घबरा गए।
राघव ने दबी आवाज़ में कहा "अरे, अब कौन आ गया?"
अबीर ने उसका मुंह बंद करते हुए कहा "पता नहीं।"
अगले ही पल नव्या, माँ, और कमला के साथ रसोई के अंदर चली आई। अबीर नव्या को देखता ही रह गया। उसने नव्या को इस तरह कभी नहीं देखा था।
नव्या अबीर को किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। आज तो उसकी सुंदरता जैसे उभरकर बाहर आई थी। मन ही मन उसने नव्या की नज़र उतार ली। तभी राघव ने उसे झकझोरकर कहा, "भाई, बाद में निहार लेना। अब मेरी बात सुन।"
अबीर ने कहा "हाँ, बता।"
राघव ने कुछ सोचते हुए कहा "अभी इन सबको जाने दे। फिर बताऊँगा।"
अबीर फिर से नव्या को देखने लगा। उसके चेहरे पर छाया हुआ दुख उसकी मनोदशा का वर्णन कर रहा था। कमला चाय बना रही थी, माँ नाश्ता सजाने में लगी थीं, और नव्या बस मुसकुराने की कोशिश कर रही थी, लेकिन चाहकर भी चेहरे पर मुस्कान नहीं आ सकी। अबीर असहाय सा नव्या को देखते हुए सोच रहा था, "नव्या, घबराइए मत। मैं आ गया हूँ। सब ठीक कर दूँगा।"
तभी बाहर से पापा की आवाज़ आई, "सुनैना, नव्या को ले आओ।"
पाँच मिनट बाद नव्या, कमला, और माँ चाय-नाश्ता लेकर रसोई से निकल गईं।
उनके जाते ही राघव और अबीर दरवाज़े के पीछे से निकले।
राघव हांफते हुए बोला "मुझे तो लगा, मेरा दम घुट जाएगा।"
अबीर सहमति में सिर हिलाते हुए बोला "हाँ। अब बता, क्या बोल रहा था?"
राघव फुसफुसाया "सुन, हम भी बाहर चलते हैं। सीढ़ियों के पीछे छुप जाएंगे और जैसे ही रिश्ते की बात होगी, हम हमला कर देंगे।"
अबीर ने हलके से हंसकर कहा "अरे, लड़ाई नहीं करनी है जो हमला करने की तैयारी कर रहा है।"
राघव में जैसे किसी गुरु की आत्मा प्रविष्ट हो गई। उसने शांत स्वर में कहा "बेटा, यह प्यार पाने की लड़ाई है। और यह तेरा हथियार!"
कहते हुए राघव ने अपने कंधे पर टंगे बैग से एक फाइल निकालकर अबीर को थमा दी।
अबीर ने फाइल को उलटते-पलटते हुए पूछा "ये क्या है?"
राघव मुसकुराते हुए बोला "अरनव की जन्मकुंडली और उसकी कर्म कुंडली। जिसे हमने मिलकर बनाया था।"
अबीर ने राघव को मुसकुराते हुए देखा और कहा, "तू सच में बहुत तेज़ है।"
राघव अपनी तारीफ़ पर इतराते हुए बोला "हाँ, पता है। चल अब।"
दोनों दबे कदमों से रसोई से बाहर निकल आए और सामने सीढ़ियों के पीछे छुप गए। वहाँ से बैठक पूरी दिख रही थी, लेकिन सीढ़ी के पीछे कौन है, यह देख पाना संभव नहीं था। बैठक में एक ओर सोफे पर गिरीश साहब और उनकी पत्नी सुनैना बैठे थे। दूसरी तरफ अरनव और उनके पिता कपूर साहब बैठे थे। नव्या सबको चाय दे रही थी।
अरनव की वहशी आँखें साड़ी से दिखती नव्या की गोरी कमर पर टिकी हुई थीं। स्त्रियों के पास वह विशेष दृष्टि होती है, जो अपनी ओर उठने वाली हर नज़र की नियत को पल भर में पहचान सकती है। नव्या भी अरनव की आँखों में छुपी वासना को महसूस कर रही थी। वह असहज हो उठी और साड़ी के आँचल से खुद को ढकने की कोशिश करने लगी।
अरनव मन ही मन खुश हो रहा था। "आखिरकार, मेरे बीस सालों के लंबे इंतजार का फल आज मुझे मिल रहा है। नव्या मेरी होने वाली है। और अबीर की बहुत बड़ी हार होगी।"
सीढ़ी के पीछे छिपा अबीर नव्या के चेहरे की असहजता को भाँप गया। वह अरनव की हरकत से नाराज़ था। जिसे वह प्यार भरी नज़रों से देखता है, अरनव उसे वासना से देख रहा था।
अबीर नव्या की हर पल बढ़ती असहजता को ज़्यादा सह न सका। वह अचानक सीढ़ी के पीछे से निकला और राघव को पीछे आने का इशारा किया। रसोई से बैठक करीब दस-पंद्रह कदम दूर थी।
अब सवाल यह था: क्या अबीर और राघव के पास मौजूद सच सबके सामने आएगा? क्या नव्या का भाग्य बदलने वाला है?
भाग-चौदह
अरनव का खुलासा
अबीर और राघव दबे पांव रसोई से बैठक की ओर आ रहे थे। वे कुछ ही कदम दूर थे, जब कपूर साहब ने घोषणा के अंदाज में कहा, "हमें नव्या पसंद है।"
नव्या लगभग हार मान चुकी थी। उसे लगने लगा था कि उसकी मां ने केवल उसे खुश करने के लिए अबीर के यहां होने की बात कही थी। नव्या के पापा बेहद खुश थे। बीस सालों का इंतजार अब खत्म होने वाला था।
इसी बीच अबीर और राघव तेज़ कदमों से बैठक में दाखिल हुए। उनकी आहट से सभी चौंक गए। अरनव, अबीर और राघव को देखकर हक्का-बक्का रह गया। नव्या की बिखरती उम्मीद को जैसे सहारा मिल गया, लेकिन उसकी घबराहट कम होने के बजाय और बढ़ गई। आठ दिन बाद दोनों फिर एक बार आमने-सामने थे।
मां किसी तरह अपने आंसू पोंछते हुए खड़ी सब देख रही थीं। अचानक गिरीश साहब की नज़र अपनी बेटी पर पड़ी, जो सामने खड़े लड़के को ही देख रही थी। उन्हें तुरंत समझ में आ गया कि वह अबीर है, जिससे नव्या प्यार करती है। यह देखते ही उनका सपना टूटता हुआ दिखाई देने लगा। गुस्से में उनका पारा चढ़ गया। वे ज़ोर से चिल्लाए, "तुम कौन हो?"
नव्या डर गई और सिर झुका लिया। उसकी आंखों में आंसू भर आए। लेकिन इसके विपरीत, अबीर ने शांत स्वर में जवाब दिया, "मैं अबीर हूं, और यह मेरा दोस्त राघव है।"
अबीर की शांति ने गिरीश साहब के गुस्से की आग को और भड़का दिया। वे आगे बढ़ते हुए बोले, "तुम यहां क्यों आए हो? मैं आज नव्या की शादी अपने दोस्त के बेटे अरनव से तय कर रहा हूं। तुरंत यहां से चले जाओ।"
राघव ने बिना एक पल गंवाए कहा, "अंकल जी, जिसके साथ आप अपनी बेटी की शादी तय कर रहे हैं, उसके बारे में एक बार पूरी तरह जान तो लीजिए। कहीं ऐसा न हो कि आपको बाद में पछताना पड़े। और हां, एक बार अपनी बेटी से भी पूछ लीजिए।"
अरनव, जो अब तक चुपचाप बैठा था, इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सका। वह खड़ा हुआ और गुस्से से बोला, "तुम दोनों गरीब लोग अमीरों की महफ़िल में बिल्कुल नहीं जंचते। आज मेरी और नव्या की शादी तय होगी। बेहतर होगा कि तुम दोनों यहां से चले जाओ।"
गिरीश साहब ने अबीर का मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "जाओ, शादी में तुम्हें भी बुलाऊंगा। आ जाना, अपने प्यार को किसी और का होते देखने के लिए।"
कपूर साहब भी बोल पड़े
"जाते हो या पुलिस को बुलाऊं?"
अबीर ने अरनव की ओर देखते हुए कहा, "आपका होने वाला दामाद एक अपराधी है, जो अब अपनी पहचान बदलकर जी रहा है।"
अरनव इस आरोप से चौंक गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। कपूर साहब भी सकते में आ गए क्योंकि यह राज़ केवल कपूर परिवार को पता था। अचानक सच सामने आने पर अरनव ने खुद को बचाने के लिए आवाज़ ऊंची करते हुए कहा, "क्या सबूत है तुम्हारे पास?"
अबीर ने फाइल खोलकर एक कागज़ निकाला और गिरीश साहब की ओर बढ़ा दिया। गिरीश साहब ने जो पढ़ा, उससे उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। लेकिन वे इसे सच मानने को तैयार नहीं थे।
यह दस्तावेज़ उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय का था। दस्तावेज़ के अनुसार, अरनव का असली नाम समर कपूर था, और छह साल पहले उसने एक लड़की की हत्या की थी।
अरनव जैसे जड़ हो गया। इस बीच, मां की उत्सुकता बढ़ने लगी। उन्होंने हिम्मत करके पूछा, "क्या लिखा है इसमें?"
गिरीश साहब ने सवाल का जवाब देने के बजाय अबीर और राघव पर गुस्से से उबलते हुए कहा, "तुम कैसे साबित करोगे कि इस कागज़ में जो भी लिखा है, वह सही है?"
अबीर ने शांति से कहा, "बात सही हुई तो? आप ही जांच करवा लीजिए।"
गिरीश साहब ने भड़कते हुए कहा, "तो क्या?"
अबीर कुछ कहता, इससे पहले राघव बोल पड़ा, "अगर सभी सबूत सही हुए तो आप नव्या की शादी अबीर से करवा दीजिएगा। ठीक है न?"
अरनव और कपूर साहब यह सुनकर बस दांत पीसते रह गए। इस बीच, नव्या ने सिर उठाकर अबीर को देखा। वह अब भी मुस्कुरा रहा था। उसकी मुस्कान में विश्वास था, जिसने नव्या को हिम्मत दी।
अबीर की मुस्कान जैसे कह रही थी, "चिंता मत कीजिए। जीत हमारी होगी।"
गिरीश साहब ने शर्त स्वीकार कर ली और कहा, "ठीक है, लेकिन अगर तुम गलत साबित हुए तो नव्या को हमेशा के लिए भूल जाना। यह फाइल मेरे पास रहेगी।"
उन्होंने नव्या को एक बार देखते हुए कहा, "तीन दिन बाद इस बात का फैसला होगा। इन तीन दिनों में तुम दोनों एक-दूसरे से नहीं मिल सकते।"
"ठीक है," अबीर ने शांत स्वर में जवाब दिया और राघव को चलने का इशारा किया। गिरीश साहब पैर पटकते हुए कमरे में चले गए।
अबीर और राघव के जाने से पहले, मां ने उन्हें रोकते हुए कहा, "रुको, चाय तो पी लो।"
अबीर ने जवाब दिया, "नहीं आंटी, दफ्तर भी जाना है।"
दोनों ने देहरी पार की और निकल गए। नव्या का मन टूटने की कगार पर था। उस समय उसे अबीर की बाँहें अपने इर्द-गिर्द चाहिए थी।
स्त्री सबके सामने मज़बूत बन सकती है, अपने आंसू छुपा सकती है। पर प्रिय के सामने उसका बस नहीं चलता क्योंकि उसी के सामने खुलकर रो सकती है, हंस सकती है और वो हो सकती है जो असल में है।
नव्या ने मां से मिन्नत करते हुए कहा, "मां, एक बार मिलने दो न?"
“जाओ, मिल लो।“ मां ने मुस्कुरा कर कहा।
सुनते ही नव्या नंगे पांव देहरी पार करके बाहर निकल गई। मां बस उसे देखती रही। आज पहली बार उन्होंने नव्या को किसी के लिए तड़पते देखा था। अब सुबह के 11 बज चुके थे, और धूप से धरती तपने लगी थी। पांव जलने की परवाह किए बिना नव्या अबीर के पीछे दौड़ी।
अबीर अभी बस बड़े दरवाज़े से कुछ कदम ही दूर था, जब उसने राघव से रुकने को कहा। राघव पीछे पलटा तो देखा कि नव्या नंगे पांव साड़ी संभालते हुए अबीर की ओर दौड़ी चली आ रही थी। राघव ने धीरे से कहा
“जा भाई उसे संभाल ले, देख क्या हालत हो गई है उसकी। अबीर फौरन नव्या की ओर चल दिया। जब दोनों पास आए, तो नव्या रुक गई। अबीर मुस्कुरा दिया, पर नव्या की आंखों में आंसू उमड़ आए। आठ दिनों की दूरी, अभी जो हुआ, और जो आगे होने वाला था—इन सबके बारे में सोचकर नव्या बेहद डर गई थी।
"मुझे यहां देखकर खुशी नहीं हुई, नव्या?"
अबीर के कहते ही नव्या के मन का बांध टूट गया। उसके आंसुओं का सैलाब बाहर आ गया, और वह कांच की तरह टूटकर बिखर गई। वह अबीर के सीने से जा लगी और अपना चेहरा उसके सीने में छिपाकर फूट-फूटकर रोने लगी। वैसे तो नव्या बे-आवाज़ रो रही थी पर अबीर को ऐसा लगा जैसे कोई असहनीय पीङा उसकी देह पर जङें जमा रही है, कोई उससे, उसकी सांसे छीन रहा है।
अबीर एक पल को ठिठक गया, लेकिन अगले ही पल उसने नव्या को अपनी बाँहों में समेट लिया। जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिलता है, वैसे ही अबीर ने नव्या के बिखरे मन को संभाल लिया। वह प्यार से उसका सिर सहलाने लगा।
उस समय अबीर को किसी बात की परवाह नहीं थी। न यह कि नव्या की मां देहरी पर खड़ी सब देख रही थीं, न यह कि राघव बड़े दरवाज़े के पास खड़ा था। उसे बस इतना पता था कि नव्या बहुत दुखी है और उसे संभालना बहुत ज़रूरी है।
वह धीरे-धीरे कहता जा रहा था, "नव्या, शांत हो जाइए। कुछ नहीं हुआ।"
अगर कोई स्त्री बिना कुछ सोचे, डरे आपके सीने से लग सकती है। आपके साथ सुरक्षित महसूस करती है तो मुबारक हो, आप इतरा सकते है और खुद पर गर्व कर सकते हैं।
नव्या बिना कुछ कहे बस रोती जा रही थी। उसने नव्या को हल्के से खुद से अलग किया और उसका चेहरा अपनी हथेलियों में भर लिया। नव्या की आंखों से आंसू लगातार छलक रहे थे।
"क्या हो गया, नव्या?" अबीर ने पूछा।
नव्या सिसकते हुए बोली, "मुझे… मुझे लगा कि आप नहीं आएंगे।"
अबीर ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा, "कैसे नहीं आता? आपसे वादा किया था न।"
नव्या एकटक अबीर की कातर आँखों में देख रही थी, जहां उसे दुख और अपने लिए चिंता नज़र आई। सच तो यह था की अबीर, नव्या को यूं रोते देख आहत था। यह भी छिपा न रह सका।
नव्या ने थोड़ा संभलते हुए पूछा, "अब क्या होगा?"
अबीर ने हल्के असमंजस के साथ कहा, "पता नहीं। शायद उस फाइल के सबूतों की जांच होगी।"
नव्या ने गहरी चिंता में कहा, "पर ये तीन दिन कैसे कटेंगे?"
अबीर ने उसका माथा चूम लिया और बड़े प्यार से कहा, "कट जाएंगे। किसी पर नहीं, पर अपने प्यार पर विश्वास रखिए। मुझ पर विश्वास रखिए।"
असहाय सी नव्या ने धीरे से कहा, "बस आप पर ही विश्वास है।"
अबीर मुसकुराया और पीछे हटते हुए बोला, "अब मैं जाता हूं।"
नव्या ने तुरंत अबीर की कलाई पकड़ ली और ना में सिर हिलाया। उस समय वह किसी छोटी बच्ची की तरह अबीर से थोड़ी देर और रुकने की मनोहार कर रही थी। अबीर मुसकुराया और नव्या के माथे को अपने माथे से सटाकर धीरे से पूछा,
"मुझ पर विश्वास करती हैं?"
"हां," नव्या ने जवाब दिया।
"मेरा इंतजार कर सकती हैं आप?"
"हां, हमेशा कर सकती हूं," नव्या ने दृढ़ता से कहा।
अबीर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, "तो अब रोइएगा मत। पापा को अपनी जांच करने दीजिए। तीन दिन बाद मैं फिर आऊंगा। तब तक अपना ध्यान रखिएगा। ठीक है?"
"हां," नव्या ने सिर हिलाया।
अबीर ने आगे कहा, "अगर कभी मुझसे बात करने का मन करे, तो सीधा फोन कीजिए।"
"जी," नव्या ने हल्के से मुसकुराते हुए कहा।
अबीर ने थोड़ा झुकते हुए पूछा, "अब मैं जाऊं?"
नव्या ने फिर से ना में सिर हिलाया और हलकी आवाज़ में गाने लगी
“अभी न जाओ छोड़कर की, दिल अभी भरा नहीं”
अबीर ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया और उसके कान में फुसफुसाया, "हिम्मत रखिए।"
अगले ही पल वह नव्या से अलग हो गया और बड़े दरवाज़े को पार करके बाहर निकल गया। मां यह सब देख रही थीं। वे चुपचाप पलटकर भीतर चली गईं। नव्या, जो अभी तक अबीर को जाते हुए देख रही थी, धीमे कदमों से बैठक में लौट आई। वहां उसने देखा कि अरनव और कपूर साहब वापस जा रहे थे। अरनव की आंखों में गुस्सा था, और कपूर साहब शर्म से सिर झुकाए दरवाज़े से बाहर निकल रहे थे।
अब नव्या के मन में कई सवाल उठने लगे। क्या उसके पापा इन तीन दिनों में सच का पता लगा पाएंगे? जांच के बाद किसकी जीत होगी—अबीर की सच्चाई और प्यार, या अरनव का छल?
आखिरकार, तीन दिन इंतजार का खेल शुरू हो चुका था।
भाग - पंद्रह
फैसला
दिन भर अबीर दफ्तर में रहा, पर काम में उसका मन नहीं लगा। घड़ी-घड़ी उसे नव्या की चिंता होती रही। वहीं, नव्या के घर में गहरी शांति छाई हुई थी। एक ओर नव्या के पिता सारा दिन कमरे में बंद रहे। शाम ढल गई थी। बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने अपने एक विश्वासपात्र आदमी को अरनव के साथ अबीर के बारे में भी पता लगाने के लिए कहा।
दूसरी ओर, नव्या अब बहुत हल्का महसूस कर रही थी। वह अपने कमरे में बैठी आज की घटना के बारे में सोच रही थी। फिर अबीर का उसे सीने से लगा लेना... सब उसे किसी सपने जैसा लग रहा था।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने उठकर दरवाजा खोला। सामने मां हाथ में चाय की दो प्यालियां लिए खड़ी थीं।
"मां, आप दरवाजा न खटखटाया करो! सीधे आ जाया करो," कहते हुए नव्या ने प्यालियां ले लीं।
मां अंदर आ गईं और पलंग पर बैठ गईं। नव्या भी सामने बैठ गई। मां एकटक उसकी आंखों में देख रही थीं।
नव्या को कुछ समझ नहीं आया। उसने पूछ लिया, "क्या देख रही हो, मां?"
मां बोलीं, "देख रही हूं अपनी बेटी को, जो अब बदल चुकी है।"
नव्या के चेहरे पर दिखते भाव और माथे की लकीरें बता रही थीं कि उसे मां की बात समझ नहीं आई। मां मुसकुराते हुए बोलीं,
"जाने वो नव्या कहां चली गई, जिसे कॉफी पसंद थी। जो जींस और टी-शर्ट पहना करती थी। जिसे रसोई का कोई काम पसंद भी नहीं था और आता भी नहीं था।"
नव्या अपनी पुरानी बातें सुनकर मुसकुराने लगी। वह कुछ देर के लिए अपने पुराने दिनों की यादों खो गई, जब वह आज से बिल्कुल अलग थी। फिर उसने पूछा, "क्यों मां, अब मैं जो भी हूं, आपको पसंद नहीं हूं क्या?"
मां ने प्यार से कहा, "बच्चे चाहे जैसे भी हों, मां को वे हमेशा किसी भी चीज़ से ज्यादा प्यारे होते हैं। वो नव्या बस अपने लिए जीती थी। और यह नव्या, यानी तुम, उसके लिए जी रही हो, जिससे तुम प्यार करती हो। उसके साथ रहने के लिए तुमने हर सीमा को पार करते हुए खुद को अबीर के रंग में रंग लिया। मैं प्रार्थना करती हूं कि जिसने मेरी बेटी का सबसे खूबसूरत रूप उभारा है, भगवान उसे हर संकट से बचाएं।"
नव्या की आंखों में आंसू भर आए। उसने धीरे से मां की गोद में सिर रख दिया और बोली, "मां, पापा को समझाओ न।" पिछली पूरी रात रोने के कारण उसका गला बैठ गया था। आवाज़ में हल्की घरघराहट थी।
मां ने उसके माथे को सहलाते हुए कहा, "मैं समझाती हूं। अभी तीन दिन हैं तुम्हारे पास। उन्हें अपनी जांच करने दो। चलो, चाय पी लो। ठंडी हो जाएगी।"
चाय का हर घूंट नव्या के मन से बेबसी को उतारता जा रहा था।
रात गहराने लगी थी।
वहीं दूसरी ओर, पापा अब भी अपने कमरे में किसी से फोन पर बात कर रहे थे। उन्होंने कहा, "सुनो, उस अबीर के बारे में सब पता करो। और जो फाइल मैंने भिजवाई थी, उसे भी देखो। उसके बारे में भी जानकारी निकालो।"
दूसरी ओर से जवाब आया, "सर, मैंने खोज शुरू कर दी है। अबीर एक मध्यम वर्गीय परिवार से है और वहीं काम करता है जहां नव्या मैडम काम करती हैं। मैं वेष बदलकर दफ्तर में गया था। वहां बातों-बातों में अबीर के बारे में सबसे पूछा। सब उसे बहुत पसंद करते हैं और वह अपने काम में माहिर है। अभी तक तो इतना ही पता चला है।"
पापा बोले, "बहुत अच्छे। वो फाइल देखी?"
दूसरी तरफ से जवाब आया, "जी, उस फाइल में अरनव कपूर उर्फ समर के बारे में काफी सारे सबूत हैं। उसकी जांच शुरू हो गई है।"
पापा ने कहा, "ठीक है। जब भी कोई नई बात पता चले, मुझे बताना।"
सामने से सहमति में जवाब आया और पापा ने फोन रख दिया। उनके मन में एक सवाल सिर उठाने लगा था—अगर अबीर सही निकला, तो वे नव्या को क्या मुंह दिखाएंगे?
इस तरह तीन दिन बीत गए। हर घंटे अबीर और अरनव पर नज़र रखी गई। गिरीश साहब का खास आदमी दोनों पर बराबर नज़र रखता और हर खबर उन तक पहुंचाता। हर खबर के साथ गिरीश साहब का अबीर के प्रति गुस्सा कम होता गया और अपने दोस्त कपूर साहब के लिए नाराज़गी बढ़ती गई।
दूसरी ओर, अबीर ने नव्या के घर हुई सारी घटना अपने मां-पापा को बता दी। वह दफ्तर भी जाता रहा और नव्या से भी बराबर जुड़ा रहा। वह जैसे कोई जंग लड़ रहा था। एक तरफ उसकी अपनी चिंताएं और डर थे, दूसरी तरफ नव्या की चिंता, और तीसरी तरफ मां-पापा की।
वहीं नव्या, अबीर से न मिल पाने का दुख समेटे हुए तीन दिन अपने घर से काम करती रही। जब उसका मन घबराता या अबीर की चिंता सताती, वह उससे बात करती। अबीर उसकी हर चिंता को खुद में समेट लेता।
इन तीन दिनों में नव्या और उसके पिता के बीच गहरी नाराज़गी बनी रही। मां ने नव्या को संभालने और अपने पति को समझाने की जिम्मेदारी बखूबी निभाई।
तीसरे दिन की शाम
आज तीसरे दिन की आखिरी रात थी। जब से अबीर नव्या के घर से लौटा था, उसके चेहरे की रंगत बुझ गई थी। उसके मन में लगातार तूफान मचा हुआ था। दफ्तर में भी उसका मन नहीं लग रहा था। राघव के मज़ाक पर भी वह हंस नहीं सका। शाम होते ही वह घर लौट आता।
मां बस उसे देखती रहतीं, लेकिन क्या कहें, यह समझ नहीं पातीं। अबीर आते ही नहा-धोकर काम में लग जाता और देर रात तक काम करता। अक्सर बिना खाए सो जाता।
आज भी वही हुआ। वह आते ही अपने कमरे में चला गया। दिमाग कह रहा था कि काम करे, लेकिन दिल अगले दिन की चिंता में अटका हुआ था। उलझन में वह चुपचाप बिस्तर पर लेट गया। छत पर लगा पंखा घूमता जा रहा था।
ज़िंदगी में एक ऐसा समय भी आता है, जब आप काली गहरी रात में, घुप्प सन्नाटे में बिस्तर पर लेटे हुए छत के पंखे को घूरते हुए किसी की याद में मुसकुराते हैं। अबीर की ज़िंदगी में भी यही पल आ गया था। अंतर बस इतना था कि वह एक पल में नव्या को याद करके मुसकुराता और अगले ही पल कल की चिंता उसकी मुस्कान छीन लेती।
दूसरी तरफ, नव्या के घर में अजब सी शांति थी।
रात ठीक आठ बजे नव्या के कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई। नव्या, जो सिर तकिए में छुपाए रो रही थी, अचानक हड़बड़ा गई। उसने जल्दी से अपने आंसू पोंछे और दरवाज़े की ओर बढ़ी। जाने क्या सोचकर उसने शायद पहली बार पूछा, "कौन है?"
शायद पहली बार वह चाहती थी कि कोई उसके आंसू न देखे, बस उन्हें बहते रहने दे।
बाहर से आवाज़ आई, "नव्या बेटा, दरवाज़ा खोलो।"
आवाज़ में इतनी नर्मी थी कि नव्या ने बिना कुछ सोचे दरवाज़ा खोल दिया। सामने पापा और मां खड़े थे।
नव्या ने उन्हें अंदर आने के लिए कहा और पलंग के एक कोने में जाकर खड़ी हो गई।
दोनों अंदर चले आए और बैठते हुए नव्या को भी बैठने का इशारा किया।
नव्या उसी कोने में सिमटकर बैठ गई।
पापा ने बहुत सपाट लहजे में कहा, "नव्या, अबीर को फोन करो।"
नव्या चौंकी और झिझकते हुए पूछा, "क्या हुआ, पापा?"
पापा ने सीधे कहा, "तुम फोन करो। मुझे उससे बात करनी है।"
हमेशा से ही पुरुष अपने मन की बात रखने में कच्चा रहा है। अगर गलती का एहसास हो भी गया तब भी उसका पौरुष, उसका गर्व उसे स्वीकारने नहीं देता की वह भी गलत हो सकता है। कुछ यही हाल नव्या के पापा का था। अपनी गलती का अहसास तो हो गया था, लेकिन उसे कहने का साहस नहीं जुटा पाए।
नव्या ने बिना कुछ कहे अपने फोन से अबीर को कॉल किया। अबीर अपने ही विचारों में खोया हुआ था। फोन की घंटी सुनते ही उसने स्क्रीन पर देखा—नव्या का नाम चमक रहा था। उसने तुरंत फोन उठाया।
दूसरी तरफ से नव्या की आवाज़ आई, "हेलो, अबीर।"
अबीर ने तुरंत पूछा, "हेलो, नव्या। आप ठीक हैं?"
"हां," नव्या ने जवाब दिया।
अबीर चिंतित होकर बोला, "क्या हुआ? सब ठीक है न?"
नव्या ने धीमे स्वर में कहा, "पापा आपसे बात करना चाहते हैं।"
अबीर का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने गहरी सांस ली और कहा, "अच्छा।"
नव्या ने कहा, "मैं फोन पापा को दे रही हूं।"
नव्या ने कांपते हुए हाथों से फोन पापा की ओर बढ़ा दिया। पापा ने फोन हाथ में लिया। पहली बार उन्हें नव्या के हाथों की कंपकंपी महसूस हुई और यह समझ आया कि नव्या उनके गुस्से से कितनी डरी हुई है।
पापा ने फोन कान पर लगाते हुए अपनी सधी हुई आवाज़ में कहा, "हेलो।"
अबीर ने आदर से जवाब दिया, "हेलो अंकल जी। नमस्ते।"
पापा बोले, "नमस्ते।"
अबीर ने पूछा, "अंकल, नव्या ने बताया कि आप मुझसे बात करना चाहते हैं। क्या बात है?"
पापा ने शांत लेकिन सख्त लहजे में कहा, "तुम्हें अपनी चुनौती तो याद होगी, न?"
अबीर ने तुरंत कहा, "जी, याद है।"
पापा बोले, "कल तीन दिन पूरे हो जाएंगे। सुबह दस बजे तुम मुझे मेरे घर चाहिए।"
अबीर ने हामी भरते हुए कहा, "जी, मैं समय से आ जाऊंगा।"
पापा ने आगे कहा, "अपने मां-पापा को भी साथ लेकर आना, ताकि उनके सामने तुम्हारा फैसला हो सके।"
अबीर ने दृढ़ता से जवाब दिया, "ठीक है।"
पापा ने कहा, "लो, नव्या से बात कर लो," और फोन नव्या को थमा दिया। इसके बाद वह कमरे से बाहर चले गए।
नव्या को कुछ समझ नहीं आया। उसने मां की ओर देखा, लेकिन मां भी बिना कुछ कहे चली गईं।
नव्या ने धीरे-धीरे फोन उठाया। अबीर अब भी फोन पर था।
"नव्या," अबीर ने कहा।
नव्या ने कांपती आवाज़ में पूछा, "अबीर, कल क्या होगा?"
अबीर ने मुसकुराते हुए कहा, "पता नहीं। पर मैं हर हाल में अपनी नव्या को मुसकुराते हुए देखना चाहता हूं।"
नव्या चिढ़ते हुए बोली, "अबीर, छेड़िए मत। मेरा मन घबरा रहा है।"
अबीर ने समझाते हुए कहा "गहरी सांस लीजिए।"
नव्या ने झिझकते हुए गहरी सांस ली और फिर पूछा, "अब?"
अबीर ने धीरे से कहा "बस, कल जो होगा देखा जाएगा। आप परेशान न हों।"
नव्या फिर चिढ़ गई "अरे? ये क्या था? मुझे बात नहीं करनी।"
अबीर ने फौरन मनाते हुए "अरे-अरे, रुकिए न। एक शेर अर्ज़ करूं? आपके लिए!"
नव्या ने इंकार कर दिया "नहीं, मुझे नहीं सुनना।"
अबीर ने मिन्नत करते हुए कहा "एक बार?"
अबीर जिस अंदाज़ में "एक बार" कहता है, नव्या हर बार हार जाती थी। इस बार भी हार गई।
नव्या: "इरशाद।"
"ऐ मेरी जान,
ना कर हिम्मत, आज़माने की।
तेरे कदमों में जान रख दूं,
बस कीमत बता मुसकुराने की।"
अबीर की आवाज़ और उसे मनाने की कोशिश नव्या को सुकून दे रही थी।
नव्या ने मुसकुराकर कहा "वाह, ये शायरी और गाने का शौक कब से है आपको?"
अबीर ने झेंपते हुए कहा "बहुत पहले से।"
नव्या भी हंस दी और बोली "मुझे और सुनना है।"
नव्या की बात सुनकर अबीर को अहसास हुआ कि अब वह ज़्यादा परेशान नहीं है। उसकी मुस्कान में सुकून था। उसने पूछा "क्या सुनाऊं?"
नव्या ने अपनी इच्छा जताई "वो गाना जो आपने मुझे शादी में जाने से पहले सुनाया था।"
अबीर को थोड़ी देर में याद आ गया "ओह, वो। ठीक है, सुनिए।"
अबीर गाना गाने लगा, और नव्या उसकी आवाज़ में खो गई। गाना खत्म होते ही अबीर ने पूछा, "अच्छा लगा?"
नव्या ने खुश होकर कहा "बहुत अच्छा।"
अबीर ने चिंतित स्वर में कहा, "शुक्रिया, पर आपकी आवाज़ में बहुत घरघराहट है। गर्म पानी पी लीजिए और दवा ले लीजिए।"
नव्या ने पूछा, "हां, कल आएंगे न?"
अबीर ने जवाब दिया, "हां।"
नव्या बोली, "ठीक है। आप सो जाइए। मुझे तो पता नहीं, कब से नींद नहीं आई है।"
अबीर ने कहा, "सो जाइए, कल मिलते हैं।"
नव्या मुसकुराई और बोली, "मैं इंतजार कर रही हूं।"
यह कहकर नव्या ने फोन रख दिया।
अबीर कमरे से बाहर आया और देखा कि मां-पापा उसे देखकर मुस्कुरा रहे हैं।
अबीर ने पूछा, "क्या हुआ?"
मां ने मुसकुराते हुए कहा, "मुझे तो पता ही नहीं था कि मेरे बेटे की आवाज़ इतनी मीठी है।"
अबीर बस मुस्कुरा दिया। उसने नव्या के पापा से हुई सारी बातें बताईं और अंत में कहा, "हमें कल नव्या के घर जाना है।"
मां ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा, "ठीक है।"
पापा बोले, "अब खाना खा लो। कल चलेंगे।"
सब खाना खाकर सो गए, लेकिन अबीर को नींद नहीं आ रही थी।
इधर नव्या के घर में कमला ने किसी तरह नव्या को थोड़ा सा खाना खिलाया और दवा दे दी। कुछ ही देर में वह दवा के असर से सो गई। मां और पापा अपने कमरे में थे। मां कुर्सी पर बैठी, पापा को देख रही थी। पापा जाने क्या सोच रहे थे। उनके बीच एक दीवार खड़ी हो गई थी, और कहीं न कहीं इसका कारण नव्या थी। लेकिन दोनों ही नव्या की खुशी चाहते थे, पर तरीका दोनों का अलग था। मां ने आखिरकार उस दीवार को तोड़ने का फैसला किया और कहा, "सुनिए?"
पापा ने पूछा, "हां, बोलो?"
मां ने हिचकिचाते हुए कहा, "एक बात पूछूं?"
पापा ने जवाब दिया, "पूछो।"
मां ने धीरे-से कहा, "आपकी जांच का क्या परिणाम निकला?"
पापा ने सिर झुकाते हुए कहा, "मुझे माफ कर दो।"
मां ने चौंककर पूछा "क्या हुआ?"
पापा ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "तुम सही थीं! अरनव का अतीत बहुत स्याह है। और अबीर... वह तो मेरी सोच से भी ऊपर निकला।"
मां ने शांत स्वर में कहा, "मैंने पहले भी कहा था कि हमारी इज़्ज़त और रुतबा, नव्या की खुशी से ऊपर नहीं है। अबीर बहुत अच्छा लड़का है और वह नव्या से सच्चा प्यार करता है।"
पापा ने झिझकते हुए कहा, "पर मैं किस मुंह से कहूंगा कि मैं ग़लत था? नव्या क्या सोचेगी?"
मां ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा, "कुछ भी नहीं, वह समझदार है।"
पापा दुखी मन से बोले, "तुमने न समझाया होता तो जाने कितनी बड़ी ग़लती हो जाती।"
मां मुसकुराई और कहा, "कोई बात नहीं। अब सो जाइए। कल सुबह जब आप उसे अपना फैसला बताएंगे, तो वह सारा गुस्सा भुलाकर आपके सीने से लग जाएगी।"
रात गहराने लगी। सब तरफ शांति छा गई। सभी अगली सुबह के इंतजार में सो गए।
अगली सुबह
अबीर और नव्या के लिए आज का दिन किसी परीक्षा के परिणाम जैसा था। दोनों के दिलों में घबराहट थी। अबीर सुबह चार बजे ही उठ गया। उठते ही उसने राघव को फोन किया। राघव ने नींद में फोन उठाया और ऊंघती आवाज़ में चिढ़ते हुए बोला, "अरे मुझे आपका तेल नहीं खरीदना है। बार-बार फोन मत करो।"
अबीर चौंका, लेकिन उसकी बात सुनकर मन ही मन हंसने लगा। उसने मस्ती करने का सोचा और आवाज़ बदलकर कहा, "सर, ले लीजिए न।"
राघव ने चिढ़कर कहा, "नहीं लेना। फोन रखो।"
अबीर ने ज़रा ज़ोर से कहा, "राघव, होश में आ जा!"
अपना नाम सुनकर राघव चौंक गया। नींद उड़ी तो फोन देखा। अबीर का नाम देखकर संभलते हुए बोला, "हां भाई, बता।"
अबीर हंसते हुए बोला, "कौन तेल बेच रहा था?"
राघव झेंपते हुए बोला, "अरे छोड़ ना। तू बता।"
अबीर ने गंभीर होकर कहा, "याद है न, आज नव्या के घर जाना है।"
राघव ने झुंझलाते हुए कहा, "अरे भाई, अभी सुबह के चार बजे हैं!"
अबीर ने जवाब दिया, "हां, पता है। पर समय से आ जाना।"
इसके बाद उसने राघव को कल रात की सारी बातें बता दीं। राघव ने समय पर आने का वादा किया।
अबीर ने फोन रखकर तैयारियां शुरू कर दी। उधर, मां-पापा भी उठ चुके थे। घर में सभी तैयार होने में लगे थे।
अबीर को नहाने-धोने और तैयार होने में लगभग एक घंटा लग गया। जब वह कमरे में आया, तो "क्या पहना जाए?" वाला सवाल खड़ा हो गया। कमरे में इधर-उधर घूमते और सोचते हुए उसने कुर्ता-पायजामा पहनने का फैसला किया। उसने अलमारी से नव्या का पसंदीदा नीले रंग का कुर्ता और सफेद पायजामा निकाला और जल्द ही तैयार हो गया।
बाहर आकर उसने देखा कि मां ने चाय बना दी थी। अबीर ने चाय पीने के लिए कदम बढ़ाए। मां ने उसे देखते ही काजल से एक काला टीका उसके कान के पीछे लगा दिया और प्यार से कहा, "अब तो सब अच्छा ही होगा।"
अबीर झेंप गया और धीरे से मुस्कुरा दिया। सब चाय पीने में व्यस्त थे, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। सुबह के 7 बज चुके थे। मां ने दरवाजा खोला तो सामने राघव खड़ा मुस्कुरा रहा था।
मां को देखते ही राघव ने झुककर उनके पैर छुए और अंदर आ गया। मां ने उसे भी चाय दी।
सब बैठकर बातें कर रहे थे। राघव बीच-बीच में अबीर को आंख मारकर चिढ़ा रहा था।
करीब चालीस मिनट बाद पापा ने कहा, "चलिए, सड़क पर जाम होगा।"
सब कमरे से बाहर निकले। मां ने घर में ताला लगाया। राघव ने गाड़ी के पास खड़े होकर सबको बैठने का इशारा किया। सभी गाड़ी में बैठ गए, और राघव ने गाड़ी स्टार्ट कर दी।
दूसरी तरफ
नव्या के घर में भी सभी उठकर अपने-अपने काम में लगे थे। कमल दादा और कमला घर की सफाई कर रहे थे। मां रसोई में चाय बना रही थीं। नव्या अब भी अपने कमरे में थी।
ठीक आठ बजे नव्या का फोन बजा। उसने फोन उठाया और स्क्रीन पर नाम देखते ही उसके होंठों पर मुस्कान फैल गई। क्यों नहीं, प्रेमी का एक मैसेज या कौल दिन बनाने के लिए काफी है। वह अब भी नींद में थी।
"हेलो," उसने धीरे से कहा।
"गुड मॉर्निंग, नव्या," अबीर की आवाज़ में आत्मीयता झलक रही थी।
"गुड मॉर्निंग," नव्या ने जवाब दिया।
"सो रही थीं?"
"हां," नव्या ने हल्की आवाज़ में कहा, "पर अब उठ गई।"
अबीर ने मुसकुराते हुए कहा, "उठ गईं तो तैयार हो जाइए। मैं निकल चुका हूं।"
"और कौन है आपके साथ?" नव्या ने पूछा।
"मां, पापा और राघव," अबीर ने जवाब दिया।
"ठीक है," नव्या ने संक्षेप में कहा और फोन रख दिया।
उसने जल्दी से बिस्तर समेटा और सीधे बाथरूम में चली गई। करीब एक घंटे बाद जब वह बाहर आई, तो कमला सामने पलंग पर बैठी हुई थी।
कमला ने उसे देखते ही पूछा, "तुम कब उठीं?"
"एक घंटे पहले," नव्या ने नपे-तुले स्वर में जवाब दिया।
नव्या की आवाज़ की खनक अब भी गायब थी। वह उदास लग रही थी। शायद वह बाथरूम में भी रो रही थी, क्योंकि उसके गालों पर आंसुओं की सूखी बूंदें साफ नजर आ रही थीं।
कमला ने उसकी उदासी दूर करने के लिए उसके सामने एक रंगीन घेर वाली कुर्ती और सुंदर सा दुपट्टा रख दिया।
मुसकुराते हुए उसने कहा, "ये तुम्हारे लिए है। मुझे पहनकर दिखाओ ना।"
अगर कोई और दिन होता, तो नव्या झट से कमला के गाल चूमकर उसके गले लग जाती। लेकिन आज वह इतनी उदास थी कि उन कपड़ों को देखने की भी इच्छा नहीं हुई। उसने अलमारी से एक सफेद कुर्ती और दुपट्टा निकाला और कमला को कमरे से बाहर जाने के लिए कहा। सफेद कुर्ती पहनकर वह तैयार हो गई।
कमला बाहर आकर रसोई में गई और दो प्याली चाय लेकर लौटी। नव्या चुपचाप बैठी घड़ी को एकटक देख रही थी। सुबह के साढ़े नौ बज चुके थे।
"नव्या, चाय पी लो न!" कमला ने कहा।
"मुझे नहीं पीना," नव्या ने बेमन से जवाब दिया।
कमला ने धीरे से कहा, "पर मुझे तो पीनी है। मेरा साथ देने के लिए पी लो न।"
"आप पी लीजिए," नव्या ने ठंडे स्वर में कहा।
कमला मुंह फेरते हुए बोली, "मत पीना, पर बताओ जब अबीर को पता चलेगा की तुम खाने-पीने में कोताही करती हो, आना-कानी किया करती हो तो कैसा लगेगा। खैर ठीक है, मैं भी नहीं पी रही। जा रही हूं।"
कहकर वह जाने लगी।
नव्या ने तुरंत उसे रोका, "अच्छा, बस! ऐसे गुस्सा मत कीजिए। बैठिए।"
कमला झट से वापस बैठ गई और एक प्याली नव्या को थमा दी।
नव्या ने मुसकुराने की कोशिश की और कमला का मन रखने के लिए चाय पी। चाय खत्म होते ही कमला प्याली उठाकर रसोई में चली गई।
वहीं, मां और पापा नीचे बैठक में बैठे बातचीत कर रहे थे। करीब दस मिनट बाद कमल दादा अंदर आए और बोले, "साहब, अबीर और उनके साथ कुछ लोग आए हैं।"
गिरीश साहब ने सिर हिलाते हुए कहा, "अंदर ले आओ।"
कमल दादा बड़े दरवाजे की ओर चल पड़े। कुछ ही देर में राघव गाड़ी कोठी के अंदर ले आया। गाड़ी की आवाज़ नव्या के कानों तक पहुंची। वह भागते हुए कमरे की बालकनी में आई। नीचे देखा, तो राघव कार चला रहा था और अबीर उसके बगल में बैठा था। नव्या की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए।
गाड़ी को एक तरफ लगाकर राघव और अबीर दोनों बाहर निकले। अबीर ने पीछे का दरवाजा खोला और उसके मां-पापा भी गाड़ी से उतर गए। दोनों उस बड़ी सी कोठी को हैरानी से देख रहे थे।
तभी राघव की नजर बालकनी में खड़ी नव्या पर पड़ी। उसने अबीर को इशारा किया, "वो देख, नव्या।"
अबीर ने ऊपर देखा। नव्या आंखों में आंसू लिए नीचे देख रही थी। अबीर ने मुसकुराकर हाथ हिलाया।
रोते हुए भी नव्या मुस्कुरा दी और फिर अंदर चली गई।
कमल दादा सबको कोठी के दरवाजे के पास छोड़कर वापस लौट गए। अबीर ने आगे बढ़कर दरवाजे की घंटी बजाई। कुछ देर बाद दरवाजा खुला। सामने नव्या की मां खड़ी थीं।
अबीर और राघव ने झुककर उनके पैर छुए। अबीर के मां-पापा ने हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया।
नव्या की मां मुसकुराईं और सबको अंदर ले आईं।
अंदर गिरीश साहब खड़े थे। दोनों ओर हाथ जोड़कर अभिवादन हुआ। अबीर और राघव ने गिरीश साहब के पैर छुए।
नव्या की मां ने सबको बैठने के लिए कहा और फिर कमला को आवाज दी।
कमला आई, तो मां ने उसे नव्या को लाने के लिए कहा।
भाग – सोलह
सर्व-सम्मति और स्वीकृति
कमला नव्या के कमरे में पहुंची। उसने देखा कि नव्या आंखें बंद किए, हाथ जोड़कर मन ही मन कोई प्रार्थना कर रही थी।
कमला ने उसकी प्रार्थना के खत्म होने का इंतजार किया। थोड़ी देर बाद नव्या ने आंखें खोलीं।
"चलो, नव्या," कमला ने कहा।
नव्या ने गहरी सांस ली और खुद से कहा, "लो, आ गई फैसले की घड़ी।" उसने अपने गुलाबी दुपट्टे से सिर ढंक लिया और थोड़ी देर बाद कमला के साथ नीचे चली आई।
नीचे एक तरफ अबीर के मां-पापा बैठे थे और दूसरी तरफ नव्या के। राघव और अबीर चुपचाप एक कोने में खड़े थे। जैसे ही नव्या नीचे आई, अबीर की नज़र उस पर टिक गई। बिना काजल, बिना लाली, बस छोटी-सी बिंदी में भी नव्या बेहद खूबसूरत लग रही थी। लेकिन उसकी आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ रहा था।
गिरीश साहब ने अबीर के मां-पापा की ओर देखते हुए कहना शुरू किया,
"आप दोनों आए, हमें अच्छा लगा। मैं उम्मीद करता हूं कि अबीर ने आपको तीन दिन पहले हुई घटना और मेरी शर्त के बारे में सब कुछ बताया होगा।"
उनकी बात पर अबीर और उसके मां-पापा ने सहमति में सिर हिलाया।
गिरीश साहब आगे बोले,
"अबीर और राघव ने मिलकर मेरे होने वाले दामाद के बारे में सबूत इकट्ठा किए थे। उन्हीं सबूतों के आधार पर मैंने और अबीर ने एक शर्त लगाई थी। शर्त यह थी कि अगर अबीर गलत साबित हुआ, तो नव्या की शादी मेरी पसंद के लड़के से होगी। और अगर अबीर सही निकला, तो मैं खुद अपनी बेटी का हाथ अबीर के हाथों में सौंप दूंगा।"
सभी लोग दिल थामकर उनकी बात सुन रहे थे।
गिरीश साहब ने अपनी बात जारी रखी,
"पिछले तीन दिनों में मैंने उन सबूतों की जांच करवाई और अबीर पर भी नजर रखी। इसके लिए मैं तुमसे हाथ जोड़कर माफी मांगता हूं।"
यह कहते हुए उन्होंने हाथ जोड़ लिए।
अबीर तुरंत आगे बढ़ा और उनके हाथ थामते हुए बोला,
"नहीं, अंकल जी। ऐसा मत कीजिए। आपने जो भी किया, वह सिर्फ नव्या की भलाई के लिए किया।"
गिरीश साहब ने गहरी सांस लेते हुए कहा,
"वो सारे सबूत सही थे। और तुम पूरी तरह सही थे। मेरे मन में बेईमानी आ गई थी। मैं चोरी-छिपे नव्या की शादी किसी और से करने का फैसला कर चुका था। लेकिन नव्या की मां ने मुझे मेरी गलती का अहसास कराया।"
यह सुनकर नव्या की आंखों से आंसू छलक पड़े। राघव भी मुस्कुरा दिया। अबीर के मां-पापा अब भी शांत बैठे थे।
गिरीश साहब ने नव्या और अबीर की ओर देखा और कहा,
"नव्या, अबीर, मेरे सामने आओ।"
नव्या ने अपनी मां की ओर देखा। मां मुसकुराईं और सिर हिलाकर उसे जाने का इशारा किया। अबीर भी थोड़ा चौंका, उसने राघव को देखा। राघव ने आंख मारी और उसे आगे बढ़ने का इशारा किया।
दोनों धीरे-धीरे चलते हुए गिरीश साहब के सामने आकर खड़े हो गए। गिरीश साहब ने बड़े प्यार से अबीर का हाथ पकड़कर उसमें नव्या का हाथ रख दिया और अपनी दोनों हथेलियों से उनके हाथों को ढक लिया।
नव्या के होश उड़ गए। उसे यह सब किसी खूबसूरत सपने जैसा लग रहा था। उसकी मुस्कान लौट आई, और अबीर ने इन कुछ दिनों में पहली बार राहत की सांस ली।
गिरीश साहब ने मुसकुराते हुए कहा,
"शायद नव्या के लिए इतना अच्छा और सच्चा जीवनसाथी मैं भी नहीं ढूंढ सकता था।"
फिर उन्होंने अबीर के मां-पापा की ओर मुड़कर हाथ जोड़ते हुए कहा,
"मेरी नव्या को अपनी बहू बना लीजिए।"
अबीर के पापा ने आगे बढ़कर गिरीश साहब के हाथ थामते हुए कहा,
"हमने तो उसी दिन नव्या को अपना लिया था, जिस दिन अबीर ने हमें सब कुछ बताया था।"
दोनों ने झुककर उनके पैर छुए, तो उन्होंने दोनों को गले लगा लिया। राघव अपनी आंखें पोंछते हुए बोला, "अब देर किस बात की, आज शगुन कर ही दिया जाए।"
सब उसकी बात पर सहमत हो गए। नव्या और अबीर ने सबके पैर छुए। तभी अबीर के पापा बोले, "शगुन तो कर देते, पर सामान तो लाए ही नहीं।"
अबीर की मां बोलीं, "हमें पता होता तो ले आते।"
नव्या की मां मुसकुराते हुए बोलीं, "इसमें कोई दिक्कत नहीं है। मैं सामान मंगा लेती हूं। ठीक है न?"
सबने सहमति में सिर हिलाया। राघव ने अबीर को छेड़ते हुए कहा, "सामान आने में तो समय लगेगा। आप लोगों को दिक्कत न हो तो लड़का-लड़की आपस में दो बातें कर लें?"
अबीर और नव्या चौंककर उसे देखने लगे, जैसे कह रहे हों, "अरे, ये क्या बोल दिया।" राघव दांत दिखाते हुए मुस्कुरा दिया। दोनों के पिता आपस में बातें करने लगे, तो उनकी मां ने सहमति जताई और नव्या और अबीर को एक कमरे में भेज दिया।
दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। हल्की शर्म की लाली दोनों के चेहरे पर थी। अबीर एक कुर्सी पर बैठ गया और नव्या को हाथ पकड़कर अपने सामने बैठा दिया। बड़ी देर से दोनों अपने को रोके हुए थे। अचानक नव्या की आंखों से एक बूंद अबीर के हाथों पर गिरी। अबीर उठ खड़ा हुआ। नव्या भी उठी और अचानक उसके सीने से लग गई। अबीर ने बिना देर किए उसे अपनी बाँहों में समेट लिया। वह उसके साथ ही रो दिया। जाने कितनी देर तक दोनों एक-दूसरे से लिपट कर रोते रहे। नव्या बीच-बीच में सिसकते हुए कुछ कहती, तो अबीर उसे अपने और करीब खींच लेता।
कुछ देर बाद दोनों अलग हुए। नव्या मुसकुराकर बोली, "आप पर ये नीला रंग कितना अच्छा लगता है।"
अबीर ने उसके गालों पर लुढ़कते आंसू पोंछते हुए पूछा, "सच में?"
नव्या ने कहा, "हां।"
अबीर मुसकुराया, "आपकी पसंद मुझ पर अच्छी लगती है।"
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। दरवाज़ा बंद नहीं था। राघव ने थोड़ा सा दरवाजा खोलकर झांकते हुए पूछा, "मैं अंदर आऊं क्या?"
अबीर अपनी आंखें पोंछकर हंसते हुए बोला, "आजा, भाई।"
राघव अंदर आया और दोनों को ध्यान से देखते हुए कहा, "बात कम और रोए ज्यादा हो तुम दोनों।"
अबीर झेंपकर बोला, "चुप।"
राघव ने मजाक में कहा, "हां, ठीक है। चलो, शगुन की तैयारी हो गई है। तुम दोनों को बुलाने आया था।"
यह कहकर वह आगे चला और दोनों उसके पीछे-पीछे कमरे से निकलकर बैठक में पहुंच गए।
सामने मेज पर आरती की थाली, मिठाई और भी बहुत कुछ रखा था। अबीर की मां ने दोनों को बैठाया। नव्या के सिर पर एक लाल दुपट्टा डाला और उनकी आरती उतारकर तिलक किया। फिर दोनों का मुंह मीठा कराया। यही विधि सबने दोहराई।
राघव ने इस पवित्र क्षण को अपने फोन में कैद कर लिया। लेकिन अपनी बारी में उसने अबीर को तिलक लगाकर उसकी नाक खींच ली।
अबीर हल्के दर्द से कराह उठा और राघव को घूरते हुए बोला, "अरे, इतनी ज़ोर से कौन नाक खींचता है?"
राघव हंस पड़ा, "मैं! और वैसे भी यह तो रस्म है।"
अबीर ने मुसकुराते हुए कहा, "हां, मेरा भी समय आएगा।"
अंत में यह तय हुआ कि कल ही पंडित जी से मुहूर्त निकलवाया जाएगा, फिर विधिवत रूप से विवाह होगा। पर जितना हो सके, शादी सामान्य ही होगी।
सभी बातें पूरी हुईं। दोपहर भर वहां रहने के बाद, शाम को अबीर अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी घर लौट आया।
क्या अबीर और नव्या की शादी हो सकेगी? अरनव कहां है आखिर?
भाग – सत्रह
तारीख और तैयारियां
उस रात देर तक नव्या और अबीर फोन पर बात करते रहे और अपने आने वाले खुशहाल जीवन के सपने बुनते रहे। दोनों ही दफ्तर से दो दिन की छुट्टी पर थे, और राघव भी इस मौके का फायदा उठाकर उनके साथ था। क्योंकि अगली सुबह विवाह की तिथि निकलनी थी, वह इस बड़ी खुशी में अपने दोस्त के साथ रहना चाहता था।
अगली सुबह 7 बजे अबीर की नींद फोन की घनघनाहट से टूटी। उसने देखा, नव्या का मैसेज था - "आप दस बजे तक पहुंच जाइएगा। पंडित जी भी तब तक आ जाएंगे।"
अबीर ने लिखा - "ठीक है। पर मुझे आपसे कुछ चाहिए।"
नव्या का जवाब फौरन आया - "क्या चाहिए?"
अबीर ने जवाब दिया - "कल आपको देखकर बहुत बुरा लगा। इतने अच्छे समय पर आप सफ़ेद कपड़ों में थीं।"
नव्या - "पर मुझे क्या पता था कि क्या होगा। खैर, आपको क्या चाहिए?"
अबीर - "आज आप अच्छे से तैयार हों। मेरे लिए।"
नव्या - "ठीक है, मैं तैयार होती हूं। आपके लिए।"
अबीर उठकर अपने काम में लग गया। जल्द ही नहा-धोकर वह तैयार हो गया। मां और पापा ने भी खुद तैयार होकर नव्या के घर जाने की तैयारी शुरू कर दी। अबीर ने राघव को समय से आने के लिए कहा और रसोई में चाय बनाने लगा।
करीब आधे घंटे बाद मां रसोई में आईं तो देखा कि अबीर कुर्ते की बाजुओं को कोहनी तक चढ़ाए, अपने आगे गिरते बालों को पीछे किए चाय बना रहा था। मां मुसकुराईं।
"अभी से नव्या के रंग में रंग गया," मां के कहने पर अबीर हंस पड़ा। वह कुछ कहता, तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मां ने रसोई से निकलकर दरवाज़ा खोला। सामने राघव ढेर सारी मिठाइयां और एक बैग लिए खड़ा था। मां ने उसे अंदर बुला लिया। राघव ने घर में इधर-उधर देखते हुए पूछा "आंटी, मेरा दोस्त कहां है?"
मां ने मुसकुराकर रसोई की ओर इशारा कर दिया।
राघव रसोई के दरवाज़े के पास पहुंचा। पहले वह अंदर जाने वाला था, लेकिन कुछ सोचकर उसने फोन निकाला और अबीर की तस्वीर ले ली। उसने वह तस्वीर नव्या को भेज दी। पर तब तक अबीर को कैमरे के शटर की आवाज़ सुनाई दे गई। उसने सीधे दरवाज़े की ओर देखते हुए राघव को अंदर बुला लिया।
अबीर ने सीधे पूछा "क्या कर रहा था तू?"
राघव ने सकपकाते हुए बात टाली "नहीं, कुछ नहीं। अच्छा हुआ कि मैं समय से पहले आ गया, वरना तेरे हाथों की चाय कैसे पीता?"
अबीर मुसकुराया और बोला "ऐसे नहीं मिलेगी चाय। चल, पहले सामान गाड़ी में रखवा।"
राघव मूंह बनाते हुए बोला "चल।"
दोनों ने सारा सामान गाड़ी में रख दिया। आधे घंटे बाद सब चाय पीकर निकल गए।
दूसरी ओर, नव्या अब तक नहा-धोकर तैयार हो चुकी थी। कमला की ज़िद पर उसने रंगीन घेर वाली कुर्ती और दुपट्टा पहन लिया। बाल खुले छोड़कर माथे पर छोटी सी बिंदी लगा ली। समय देखने के लिए जब उसने फोन उठाया, तो राघव की भेजी तस्वीर देख वह मुस्कुरा दी।
मां और कमला ने मिलकर नाश्ता तैयार किया। करीब साढ़े नौ बजे अबीर, राघव, और उसके मां-पापा नव्या के घर पहुंच गए। थोड़ी देर बाद सब बैठक में बैठकर बातें करने लगे। नव्या और अबीर को भी साथ ही बैठाया गया। राघव बराबर दोनों से हंसी-मजाक करता रहा।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। कमला ने दरवाज़ा खोला और पंडित जी को अंदर ले आई। सबने एक-एक करके पंडित जी का आशीर्वाद लिया। थोड़ी देर इधर-उधर की बातें हुईं, फिर गिरिश साहब ने पंडित जी को नव्या और अबीर की कुंडली देते हुए कहा -
"पंडित जी, ये दोनों बच्चों की कुंडली है। आप इन्हें देखकर शादी का सबसे शुभ मुहूर्त निकालिए।"
पंडित जी ने कुंडली का मिलान किया और दस मिनट बाद बोले -
"जजमान, वर और कन्या की कुंडली बहुत अच्छी है। 36 में से 32 गुण मिलते हैं।"
यह सुनकर सबके चेहरे खिल उठे।
"विवाह की सबसे अच्छी तिथि आज से एक माह बाद, 22 दिसंबर है," पंडित जी ने कहा।
पंडित जी के ये शब्द सुनते ही अबीर ने शर्म से सिर झुका लिया और नव्या की ओर देखा। नव्या भी अबीर की ओर देखते हुए मुस्कुरा दी। अबीर ने धीरे से कहा
"मिस नव्या कश्यप, मुबारक हो। एक महीने बाद आप मिसेज नव्या अबीर वर्मा हो जाएंगी।"
नव्या के गाल गुलाबी हो उठे।
जल्द ही पंडित जी ने दो लग्न पत्रिकाएं बनाकर दोनों के पिता को दे दीं और कहा -
"आप दोनों यह पत्रिकाएं एक-दूसरे को दीजिए।"
पत्रिका का आदान-प्रदान हुआ। गिरीश साहब और अबीर के पापा एक-दूसरे के गले मिले। उस समय जाति, धर्म, सामाजिक स्तर और धन सब मौन दर्शक बनकर देखते रह गए। आखिरकार अबीर और नव्या की शादी तय हो गई। राघव बहुत खुश था, लेकिन उसके मन में एक सवाल था। बड़ी देर से खुद को रोकने के बाद आखिर राघव ने गिरीश साहब से कहा -
"अंकल जी, एक बात पूछूं?"
गिरीश साहब ने राघव की गंभीरता को ताङते हुए कहा- "हां, राघव, पूछो।"
राघव ने धीरे से पूछा "अरनव का क्या हुआ?"
उसकी बात ने सबको चौंका दिया क्योंकि इस सब के बीच अरनव की कोई खबर नहीं थी। गिरिश साहब मुसकुराए और बोले "मैं बताना भूल गया था कि अरनव उस दिन की घटना के बाद बहुत गुस्से में था। कपूर साहब ने भी मुझसे सच नहीं बताया। जब जांच पूरी हुई, तो मैंने उनसे बात की, और तब मुझे असली सच पता चला। देर रात यह खबर मिली कि अरनव शहर छोड़कर चला गया है।"
यह सुनकर राघव ने राहत की सांस ली "अच्छा हुआ।"
इसके बाद लंबी चर्चा हुई, और यह तय किया गया कि अगले बीस दिन तक नव्या और अबीर अपने-अपने दफ्तर जाएंगे। शादी से पांच दिन पहले, दोनों अपने दफ्तर से सात दिन की छुट्टी लेंगे। इन्हीं सात दिनों में शादी की सभी तैयारियां पूरी होंगी और अबीर और नव्या हमेशा के लिए एक हो जाएंगे।
"मेरे प्रिय पाठकों, विवाह में शामिल होना न भूलें!"
भाग – अठारह
विवाह की शुरुआत
दिन बीतने लगे। नव्या और अबीर हर दिन दफ्तर जाते। पहले की ही तरह, अब भी दोनों साथ ही खाना खाते और बातें करते। राघव बस दूर खड़ा मुसकुराता रहता। इसी बीच, नव्या और अबीर के शादी के जोड़े तैयार करवाए गए, निमंत्रण पत्र छपवाए गए, और दोनों परिवारों में तैयारियां जोरों पर थीं।
करीब सत्रह दिन बाद, नव्या और अबीर ने मिलकर तय किया कि अब दफ्तर में सबको निमंत्रण देंगे और मालिक ललित से छुट्टी के लिए बात करेंगे। इसी सोच के साथ, आज दोनों अपने-अपने घर से मिठाई और निमंत्रण पत्र लेकर आए थे। राघव भी उनके साथ था।
तीनों ने कुछ देर काम किया और करीब ग्यारह बजे, अबीर, राघव, और नव्या अपने केबिन से निकले। सबसे पहले, वे ललित के केबिन में जाने को तैयार हुए। केबिन के बाहर पहुंचते ही राघव ने अंदर जाने से मना कर दिया और समझाकर दोनों को अंदर भेज दिया। अबीर और नव्या अंदर चले गए। ललित कागजों और फाइलों में व्यस्त था।
दोनों ने एक साथ कहा, “गुड मॉर्निंग!”
ललित ने उन्हें देखकर बैठने को कहा।
ललित: “क्या बात है, आप दोनों एक साथ?”
अबीर: “जी, सर।”
ललित: “सब ठीक है?”
नव्या: “जी, सर। आपको निमंत्रण देने आए हैं।”
ललित: “किस बात का?”
दोनों ने एक साथ कहा: “हमारी शादी का।”
ललित को यह सुनकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि वह पहले से ही जानता था कि नव्या और अबीर एक-दूसरे को पसंद करते हैं। उसने मुसकुराते हुए कहा:
“बधाई हो, अबीर और नव्या!”
“धन्यवाद,” दोनों ने मुसकुराते हुए कहा और मिठाई का डिब्बा व निमंत्रण पत्र उसकी ओर बढ़ा दिया।
ललित मुसकुराया और बोला “मैं आप दोनों के लिए बहुत खुश हूं।”
दोनों मुस्कुरा दिए। छुट्टी की अर्जी पर मंजूरी लेकर वे केबिन से बाहर आ गए।
अगले दो घंटों में, दफ्तर में अबीर और नव्या की शादी की चर्चा जंगल की आग की तरह फैल गई। सभी लोग खुश थे। दोनों को ढेरों शुभकामनाएं और आशीर्वाद मिले। इसके बाद, दिन में खाना खाने के बाद, दोनों ने अपने काम पूरे किए और हर दिन की तरह शाम को घर पहुंच गए।
अगले दो दिन सब कुछ सामान्य रहा। दोनों घरों में आने वाले दिनों की तैयारी चल रही थी। एक तरफ तैयारियां हो रही थीं, तो दूसरी ओर, जैसे-तैसे दिन बीत रहे थे। नव्या और अबीर का प्यार और खुशी परवान चढ़ रहे थे।
दो दिन बाद अबीर का तिलक होना था।
नव्या के घर में जोर-शोर से तैयारियां चल रही थीं। पापा और मां ने मिलकर रस्मों की तैयारी की। सभी करीबी लोगों को निमंत्रण भेजा गया। अबीर को तिलक में देने के लिए अंगूठी, चेन, और कपड़े नव्या ने खुद पसंद किए। साथ ही, अपने लिए शादी के जोड़े के साथ बाकी चीजें भी तैयार कीं।
दूसरी ओर, अपनी ही शादी की तैयारियों में अबीर व्यस्त था। राघव उसका पूरा साथ दे रहा था। इन दो दिनों में दोनों ने मिलकर सभी करीबी लोगों को निमंत्रण देकर आने का न्योता दिया। समय पाकर, अबीर ने नव्या के लिए एक खास तोहफा भी खरीद लिया।
अन्य सभी तैयारियां, जैसे सजावट, रस्मों के लिए जरूरी सामान और बाकी व्यवस्थाएं, पापा और मां ने पूरी कर दी थीं। अब सभी को तिलक के दिन का बेसब्री से इंतजार था।
भाग-उन्नीस
तिलक का दिन-19 दिसंबर
आज नव्या के घर पर अबीर का तिलक होने वाला है। सुबह जल्दी उठकर अबीर ने सबसे पहले नव्या से बात की। फोन पर दोनों ने कुछ मीठी बातें कीं, फिर अबीर ने राघव को फोन किया।
जैसे ही राघव ने फोन उठाया, वह मजाक में बोला:
राघव ने अबीर को छेङा "ओहो! होने वाले दूल्हे राजा! क्या बात है?"
अबीर राघव की बात पर झेंप गया और बोला "राघव, छेड़ मत।"
राघव - "अच्छा ठीक है, मुझे पता है तू क्या कहने वाला है! हो जाएगा सब। बस तू तैयार हो जा, बाकी सब मैं देख लूंगा।"
अबीर - "अब क्या ही कहूं। तु है न।"
राघव - "जा, औघड़ प्रेमी, तैयार हो जा!"
अबीर के चेहरे पर मुस्कान खिल गई। तभी उसकी मां कमरे में आ गईं।
मां ने एक डिब्बा सामने रखते हुए कहा: "ये पहन लेना।"
अबीर ने डिब्बे को गौर से देखा और पूछा: "ये क्या है, मां?"
मां ने उसके माथे पर हाथ रखते हुए कहा "तुने सबके लिए कपड़े खरीद लिए, पर अपने लिए कुछ लिया नहीं। आज तिलक है तेरा। ये मैंने खरीदा था।"
अबीर ने मन में कहा: "मां तो आखिर मां है।" फिर बोला: "ठीक है, मां। आप भी तैयार हो जाओ। पापा को उनके कपड़े दे देना।"
मां मुसकुराते हुए कमरे से बाहर निकल गईं। आधे घंटे बाद सब तैयार होकर बैठक में इकट्ठा हो गए। अबीर हल्के गुलाबी रंग के कुर्ते और नीली जींस में बहुत जंच रहा था। पापा भी पीले कुर्ते में बहुत अच्छे लग रहे थे, और मां ने उनके कुर्ते से मिलती हुई पीली साड़ी पहनी थी। अबीर उनकी पसंद देखकर मुस्कुरा दिया और उनकी तस्वीर अपने फोन में कैद कर ली।
मां ने अपने काजल के कोर से अबीर के कान के पीछे काला टीका लगाया और उसका माथा चूम लिया। पापा मुसकुराते हुए बोले: "हमारी तस्वीर हो गई, अब दूल्हे राजा की बारी।"
तभी राघव खुले दरवाज़े से अंदर आया और बोला बनावटी गुस्से में बोला "मेरे बिना ही तस्वीर खिंच गई!"
राघव नीले कुर्ते और पायजामे में, आंखों पर चश्मा लगाए बड़ी अदा से चलता हुआ अबीर के पास आया और उसके कुर्ते की बाजू ऊपर चढ़ा दी। अबीर मुस्कुरा दिया। करीब दस मिनट तक तस्वीरें लेने के बाद, सारा सामान गाड़ी में रखकर राघव ने गाड़ी नव्या के घर की ओर मोड़ दी।
उधर नव्या के घर में तिलक की तैयारियां जोरों पर थीं।
नव्या भी तैयार होकर रसोई में कमला की मदद कर रही थी। दोनों के बीच हंसी-मजाक चल रहा था।
कमला ने हंसते हुए कहा: "नव्या, अब तुम अबीर से शादी तक नहीं मिल सकोगी।"
नव्या के माथे पर बल पड़े। उसने चौंककर पूछा "क्यों?"
कमला ने समझाते हुए कहा "देखो, रिवाज के हिसाब से, आज तिलक के बाद तुम दोनों न तो घर से बाहर जा सकते हो, न ही एक-दूसरे से मिल सकते हो। समझी, होने वाली दुल्हन?"
कमला ने मजाक में नव्या के गाल छू लिए। नव्या के चेहरे पर मिले-जुले से भाव आए, और दोनों काम में लग गईं।
इसी बीच, नव्या के पापा तिलक की तैयारियों में व्यस्त थे। उन्होंने पहले ही शुभ मुहूर्त निकलवा लिया था। करीब ग्यारह बजे, अबीर अपनी मां, पापा, और राघव के साथ नव्या के घर पहुंच गया। उनके पीछे-पीछे पंडित जी भी आ गए।
मिलने-जुलने के बाद सब बैठक में रस्म की तैयारी में व्यस्त हो गए। अबीर एक ओर खड़ा, नजरें घुमाते हुए किसी को खोज रहा था। तभी राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा, और अबीर चौंककर पलटा।
राघव ने उसे एकटक देखते हुए पूछा "क्या हुआ? क्या ढूंढ रहा है?"
अबीर सकपकाते हुए बोला "नहीं... कुछ नहीं।"
राघव ने उसे चिकोटी काटी और बोला "अरे, तेरी रग-रग को जानता हूं। नव्या को खोज रहा है, न?"
अबीर राघव की बात सुनकर झेंप गया और सिर हिलाकर हामी भर दी।
राघव ने उसे आदतन छेङा "हां-हां, अब तो नव्या को ही ढूंढ। लेकिन सुन, आज तुम दोनों की आखिरी मुलाकात होगी!"
अबीर ने सोचते हुए कहा "हां, पता है। आज तिलक के बाद अब सीधे शादी के दिन ही देख पाऊंगा उन्हें।"
तभी राघव ने देखा कि नव्या सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी। उसने शरारती मुस्कान के साथ कहा:
"जा, जी भर के देख ले। आ गई नव्या!"
अबीर की नजरें नव्या पर टिक गईं। नव्या हल्के नीले रंग के कुर्ते-सलवार में, सिर पर दुपट्टा डाले, बड़ी अदा से नीचे उतर रही थी। अबीर मुस्कुरा रहा था, और नव्या भी उसे देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ आगे बढ़ी।
नव्या ने चारों ओर नजर दौड़ाई। उसे अबीर के साथ कुछ पल अकेले चाहिए थे। उसने राघव से कहा:
नव्या ने कहा "राघव, शायद बाहर कोई है। आप देखिए न।"
नव्या के शब्द और उसके चेहरे के भाव कहीं मेल नहीं खा रहे थे। राघव को तुरंत समझ आ गया कि नव्या अबीर के साथ कुछ समय अकेले रहना चाहती है। मुसकुराते हुए उसने कहा:
"नव्या, दरवाजे पर कोई नहीं है। ठीक है, मैं जा रहा हूं। आप दोनों बात कर लीजिए।"
प्रेम का एक बेहद खूबसूरत सा पहलू है, अपने प्रिय से छुप-छुपकर मिलना और एकांत में एक-दूसरे को नज़र भर देखना। ताकि आने वाले समय के लिए मन को संबल मिले।
राघव पंडित जी के पास चला गया। इधर नव्या ने अबीर का हाथ थामा और उसे सीढ़ियों के पीछे ले आई। अबीर को नव्या की इस हरकत पर हंसी आ गई। उसने मुसकुराकर पूछा: "आप कैसी हैं?"
नव्या ने यहां-वहां देखते हुए कहा "बिल्कुल ठीक हूं।"
अबीर ने पूछा "आपने राघव से झूठ क्यों बोला?"
नव्या यह सुनकर शर्म से लाल हो गई। उसने सिर झुका लिया और धीमे स्वर में कहा:
"मुझे पता चला कि आज के बाद हम शादी तक मिल नहीं सकते। इसलिए सोचा, आपके साथ कुछ देर अकेले रहूं। पर..."
अबीर मुसकुराया। उसे एहसास हुआ कि नव्या भी उसकी ही तरह बेचैन है।
अबीर ने उसके रुकते ही पूछा "पर क्या?"
नव्या ने सिर पर हाथ रखा और बच्चों की तरह मुंह फुलाते हुए कहा:
"पर मेरी चाल मुझपर ही उल्टी पड़ गई।"
अबीर ने उसे देखते हुए हल्के से हंस दिया। नव्या धीरे-धीरे अबीर के और करीब आ गई। अबीर ने धीरे से कहा: "कोई आ जाएगा, नव्या।"
नव्या ने मुसकुराते हुए अपनी आंखों के कोर से काजल लिया और अबीर के कान के पीछे काला टीका लगा दिया। अबीर मुसकुराया और बोला: "आप बिल्कुल मेरी मां की तरह ही मुझे काला टीका लगाती हैं।"
नव्या ने हंसते हुए कहा: "बहुत अच्छे लग रहे हैं आप। अच्छा, मैं कैसी लग रही हूं?"
अबीर ने अपने कान पर लगे काजल से थोड़ा काजल लिया और नव्या के कान के पीछे लगा दिया। फिर हल्के मुस्कान के साथ बोला: "बहुत खूबसूरत। बिल्कुल मेरी लग रही हैं।"
नव्या ने शरमाकर सिर झुका लिया। तभी पीछे से आवाज़ आई: "बस भी करो तुम दोनों।"
दोनों ने पलटकर देखा तो सामने राघव और कमला खड़े मुस्कुरा रहे थे। कमला आगे बढ़ी और नव्या के कान में फुसफुसाते हुए बोली: "चलो कमरे में।"
नव्या ने हैरानी से कहा "क्यों? मैं तिलक की रस्म देखना चाहती थी।"
कमला ने समझाते हुए कहा "पहले चलो तो।"
कमला ने नव्या का हाथ थामा और उसे साथ लेकर चली गई। इधर अबीर राघव के साथ बैठक में लौट आया।
तिलक की तैयारी
बैठक में सफेद गद्दे चौकोर आकार में बिछाए गए थे। एक छोटी सी मेज़ पर तिलक की रस्म के लिए ढेर सारा सामान रखा था। परिवार के सभी सदस्य गद्दों पर बैठे आपस में बातें कर रहे थे। पंडित जी पूजा की तैयारी कर रहे थे। हवन की वेदी के पास पूजा की सामग्री करीने से रखी हुई थी।
अबीर गद्दे पर बैठ गया, और राघव उसके पास ही बैठ गया। तभी अबीर की मां ने नव्या की मां से पूछा: "नव्या कहां है?"
नव्या की मां ने कहा "वो कमरे में है।"
अबीर की मां ने कहा: "उसे भी बुला लीजिए।"
नव्या की मां ने कमला को आवाज़ देकर नव्या को लाने के लिए कहा। थोड़ी देर बाद नव्या आई। उसे देखकर अबीर की मां ने मुसकुराते हुए कहा:
अबीर की मां ने कहा "नव्या बेटी, अबीर के पास बैठ जाओ।"
नव्या को यह सुनकर कुछ समझ नहीं आया। वह अपनी जगह पर खड़ी रही। इस पर अबीर के पापा ने मुसकुराकर कहा: "बैठो, नव्या। यह रस्म का हिस्सा है।"
नव्या के पापा ने यह सुनकर थोड़ा सोचते हुए कहा: "पर तिलक तो अबीर का है न?"
इस पर अबीर की मां ने जवाब दिया:
अबीर की मां - "हां, लेकिन यह रस्म दोनों के लिए है। इससे आशीर्वाद दोनों को मिलेगा।"
नव्या की मां ने भी सहमति जताते हुए नव्या को बैठने के लिए कहा। नव्या धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए अबीर के पास आकर बैठ गई। अबीर और नव्या के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। हवन और तिलक की रस्म शुरू हुई, और हर कोई उस पवित्र पल का गवाह बन रहा था।
मां और पापा ने एक स्वर में कहा: "अबीर और नव्या दोनों का तिलक होगा।"
पंडित जी ने मुसकुराते हुए कहा:
पंडित जी - "सही कह रहे हैं जजमान। बैठो बेटी।"
नव्या ने सिर पर दुपट्टा ठीक करते हुए धीरे-से सिर झुका लिया और अबीर के पास आकर बैठ गई।
तभी राघव ने हल्की मुस्कान के साथ सबका ध्यान खींचते हुए कहा:
"मुझे पता है कि आप सब थोड़ा चौंक गए हैं। मैं समझाता हूं। भारत में ज्यादातर जगहों पर केवल लड़के का तिलक होता है। लेकिन कुछ जगहों पर लड़का और लड़की दोनों का तिलक होता है। अबीर के घर में भी यही परंपरा है।"
नव्या के मां-पापा ने राघव की बात पर सहमति में सिर हिलाया।
तभी पंडित जी ने कहा: "शुभ मुहूर्त शुरू हो चुका है। आप सब बैठ जाइए, विधि शुरू करते हैं।"
सबने हाथ जोड़कर बीच में सजी हुई हवन वेदी के चारों ओर अपनी-अपनी जगह ले ली। पंडित जी ने वेदी में अग्नि प्रज्वलित की और मंत्रोच्चार शुरू कर दिया। गंगा जल का छिड़काव करते हुए पंडित जी ने नव्या और अबीर से कहा: "आप दोनों अपना दाहिना हाथ आगे कीजिए।"
नव्या और अबीर ने अपने दाहिने हाथ आगे बढ़ाए। पंडित जी ने अबीर की हथेली पर नव्या का हाथ रखा और उनके हाथों में गंगा जल भरते हुए कहा: "आप दोनों भगवान से प्रार्थना कीजिए और ध्यान रहे कि जल नीचे न गिरे। प्रार्थना के बाद इस जल को यहां रखी आरती की थालियों में समान मात्रा में डाल दीजिए।"
दोनों ने पंडित जी के निर्देशानुसार अपने हाथ जोड़कर प्रार्थना की। जल को थालियों में डालने के दौरान दोनों के चेहरे पर शांत और भावुक अभिव्यक्ति थी।
प्रार्थना पूरी होने के बाद जल को आरती की थालियों में डाल दिया गया। वेदी के पास बैठे सभी लोग इस पवित्र रस्म को देखकर प्रसन्न और संतुष्ट नजर आ रहे थे। पंडित जी ने अगली रस्म की तैयारी करते हुए कहा: "यह शुभ कार्य आज आपके परिवार के लिए सुख और समृद्धि का प्रतीक होगा। अब आगे की विधि पूरी करते हैं।"
पंडित जी ने कहा, "अब लड़के की मां वधू का तिलक करेंगी और लड़की के पिता वर का।"
अबीर की मां ने पूजा की थाली में रोली और सिंदूर को गंगाजल में मिलाकर दोनों थालियां तैयार कीं। एक थाली उन्होंने नव्या के पिता को दी। राघव ने तुरंत अपना फोन निकाला और विधि के हर क्षण को कैमरे में कैद करने के लिए एक ओर खड़ा हो गया।
अब अबीर की मां नव्या के सामने खड़ी थीं, और नव्या के पिता अबीर के सामने। विधि के अनुसार, दोनों ने तिलक किया, आरती उतारी, और मूंह मीठा कराया। नव्या के पिता ने अबीर को भेंट स्वरूप वे चीजें दीं जो नव्या ने स्वयं उसके लिए चुनी थीं, और अबीर की मां ने नव्या को वे चीजें भेंट कीं जो अबीर ने खासतौर पर नव्या के लिए पसंद की थीं।
तिलक की विधि पूर्ण होने के बाद नव्या और अबीर ने सभी बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
थोड़ी देर बाद सभी ने साथ मिलकर दोपहर का भोजन किया। भोजन के बाद थोड़ी हल्की-फुल्की बातचीत और हंसी-मजाक हुआ। शाम होते-होते अबीर अपने माता-पिता और राघव के साथ वापस लौट गया।
भाग-बीस
20 दिसंबर- अबीर और नव्या की हल्दी
तिलक की रस्म के बाद अबीर अपने घर लौट गया, और नव्या भी अपने कमरे में बैठी अबीर के ख्यालों में कहीं गुम थी। उधर घर की बैठक में हल्दी की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी। रिश्तेदार और घरवाले रस्म को यादगार बनाने में लगे हुए थे।
थोड़ी देर बाद नव्या के कमरे के दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। "अंदर आइए," नव्या ने कहा। दरवाज़ा खुला, और कमला दीदी चाय और नाश्ते की ट्रे लेकर अंदर आईं।
"नव्या, नाश्ता कर लो," कमला ने कहा।
"आप भी बैठिए, दीदी," नव्या ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
कमला ट्रे रखकर नव्या के पास बैठ गईं। दोनों चाय की चुस्कियों के साथ बातें करने लगीं। लेकिन नव्या का ध्यान कहीं और था। वह चुपचाप अबीर के बारे में सोचते हुए मुस्कुरा रही थी।
कमला उसे ध्यान से देख रही थीं। नव्या के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, जो उसे बहुत खास और खुश बना रही थी।
कमला ने उसे छेड़ते हुए पूछा, "नव्या, एक बात पूछूं?"
"हां, दीदी, पूछिए," नव्या ने चाय की प्याली रखते हुए कहा।
कमला शरारत भरे लहजे में बोलीं, "ये जो तुम्हारे चेहरे पर चमक है, ये अबीर के बारे में सोचने से आई है या शादी की खुशी से?"
नव्या का चेहरा शर्म से गुलाबी हो गया। वह मुसकुराते हुए बोली, "दोनों का असर है, दीदी।"
कमला हंसते हुए बोलीं, "हो भी क्यों न, आखिर जिससे प्यार करती हो, अब उसकी होने वाली हो।"
नव्या खिलखिलाते हुए बोली, "दीदी, बस अब और मत छेड़िए।"
कमरा दोनों की हंसी से भर गया। इस हल्की-फुल्की बातचीत ने नव्या के दिल में उमंग और भी बढ़ा दी, और हल्दी की रस्म के इंतजार में वह और भी खुश नज़र आने लगी।
कमला भी हंस दी और थोड़ी देर बाद बोली, "ठीक है, पर कल क्या पहनना है? तुमने सोच लिया?"
नव्या ने मुसकुराते हुए कहा, "नहीं।"
इसी बीच उनकी मां कमरे में आ गईं। उनके हाथों में एक कागज का थैला था। मां नव्या और कमला के पास बैठ गईं और मुसकुराते हुए पूछने लगीं, "क्या बातें हो रही थीं?"
मां को आते देख कमला तुरंत खड़ी हो गई। मां ने हल्की मुस्कान के साथ कमला को बैठने का इशारा किया। कमला थोड़ा झिझकते हुए फिर से बैठ गई।
मां ने थैला नव्या की ओर बढ़ाते हुए कहा, "ये हल्दी के लिए कपड़े हैं। कल तुम यही पहनना।"
नव्या ने थैला हाथ में लेते हुए सहमति में सिर हिला दिया।
"ठीक है, मां," उसने कहा।
इसके बाद मां कमरे से बाहर चली गईं, और नव्या और कमला फिर से अपनी बातों में खो गईं। हल्की-फुल्की हंसी और बातचीत से कमरा खुशियों से भर गया।
दूसरी ओर, देर शाम अबीर और राघव अपने मां-पापा को घर छोड़कर रेलवे स्टेशन गए।
स्टेशन से लौटते समय उनके साथ अबीर के कुछ रिश्तेदार भी थे। हालांकि लोग ज्यादा नहीं थे, लेकिन एक ही गाड़ी में सबका आना संभव नहीं था। इसलिए दो गाड़ियों में सब लोग घर पहुंचे।
घर आते ही अबीर के मां-पापा मेहमानों के स्वागत-सत्कार में लग गए। राघव और अबीर अपने कमरे में जाकर कल होने वाली हल्दी की तैयारियों पर चर्चा करने लगे।
रात काफी देर हो चुकी थी। सबने साथ बैठकर खाना खाया और फिर आराम करने चले गए।
उधर, नव्या और अबीर दोनों अपने-अपने घरों की हल्दी की तैयारियों और माहौल के बारे में फोन पर बातें कर रहे थे।
देर रात होने की वजह से अबीर ने राघव को अपने घर रुकने के लिए कहा। राघव ने सहमति जताई, और दोनों एक ही कमरे में सो गए।
भाग-इक्कीस
20 दिसंबर – हल्दी
सुबह नौ बजे, माँ के उठाने पर अबीर और राघव की नींद खुली। अबीर के चेहरे से लग रहा था कि वह अभी और सोना चाहता है। माँ दोनों को उठकर नहाने के लिए कहकर चली गई।
राघव ने नींद खुलते ही अबीर को छेड़ा,
"आज तो मेरे भाई की हल्दी है!"
अबीर आँखें मलते हुए मुसकुराया और बोला,
"तेरी भी होगी।"
राघव ने आह भरते हुए कहा,
"पता नहीं कब होगी।"
अबीर ने उसे छेड़ते हुए कहा,
"बड़ी जल्दी है! लगता है, अब तेरे लिए खोज शुरू करने का समय आ गया है।"
राघव हँसते हुए बोला,
"हाँ, तू ही खोज लेना। चल, वरना पहले माँ जगाने आई थी, अब पापा आ जाएंगे!"
दोनों हँसते हुए आंगन की ओर चल पड़े। वहाँ रिश्तेदारों का जमघट लगा था। अबीर ने चारों ओर नजर घुमाई तो एक पल के लिए स्तब्ध रह गया। पहली बार उसे अपने घर का आंगन इतना सुंदर लग रहा था। मामा, फूफा और उसके हमउम्र भाइयों ने मिलकर आंगन के बीच में मचिया लगाई थी और चारों ओर फूलों से सुंदर सजावट की थी। पीछे दीवार पर एक लकड़ी की तख्ती टंगी थी, जिस पर लाल महावर से लिखा था—
"अबीर की हल्दी"
एक ओर मासियाँ और दूसरी ओर घर की औरतें सिलबट्टे पर हल्दी पीसते हुए हल्दी गीत गा रही थीं। अभी र के चेहरे पर हल्की मुस्कान फैल गई। इतने में माँ बाहर आईं और प्यार से बोलीं,
"जा, नहा ले। विधि का समय होने वाला है।"
अबीर सिर हिलाते हुए बाहर चला गया। इस बीच, राघव रसोई में जाकर सबके लिए चाय बना लाया।
करीब आधे घंटे बाद, अबीर नहा कर हाथ में सफ़ेद गमछा लिए बाहर आया। पीली धोती और सफेद बनियान में उसकी कद-काठी उभरकर सामने आ रही थी। राघव ने तुरंत उसकी तस्वीर खींची।
अबीर ने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा,
"यार, अच्छी फोटो ले न! क्या खाली बनियान में खींच रहा है? नव्या को भेजनी है।"
राघव ने शरारत से कहा,
"अरे हाँ! ये बनियान वाली फोटो नव्या को कैसे भेजेगा? चल, सीधे खड़ा हो जा!"
अबीर ने कंधे पर गमछा डाला, और राघव ने उसकी एक और तस्वीर ली। तभी अबीर की भाभी ने उसके गाल खींचते हुए छेड़ा,
"देवर जी, देखिएगा, कहीं आपकी दुल्हन आपकी तस्वीर देखकर शरमा न जाए!"
अबीर झेंप गया। तभी उसकी दादी की आवाज़ आई—
"चलो, बहुत ठिठोली हो गई। अब हल्दी लगाओ!"
अबीर मचिए पर बैठ गया, और जैसे ही घरवालों ने हल्दी लगानी शुरू की, सबने खुशी-खुशी गाना शुरू कर दिया।
संशोधित संस्करण:
तभी किसी ने सवाल किया,
"वैसे यह हल्दी की रस्म क्यों होती है?"
राघव ने धीरे से कहा,
"ताकि दूल्हे के चेहरे पर चमक आए और क्या!"
सब हँसने लगे। तभी दादी बोलीं,
"वो तो है, पर इसके पीछे एक और कारण भी है।"
सबने एक साथ पूछा,
"क्या?"
चारों ओर शांति छा गई। बस अबीर को हल्दी लगाती माँ की चूड़ियों की हल्की खनक सुनाई दे रही थी। दादी ने कहना शुरू किया,
"कहते हैं कि हल्दी लगाने से शरीर पवित्र होता है। साथ ही, हर बुरी नज़र से वर और वधू की रक्षा के लिए हल्दी लगाई जाती है। और हाँ, अगर किसी कुंवारे लड़के को हल्दी लग गई, तो उसका लग्न पक्का! और कुछ लोग यह भी कहते हैं की शादी के बाद बीवी के गुस्से और मार को झेलने की ताकत आती है।"
पहली बात सुनकर सारे कुंवारे लड़के एक-दूसरे को देखने लगे। दूसरी पर सब हंस पङे और अबीर ने मुसकुराकर राघव को देखा और उसके गालों पर हल्दी लगा दी। राघव ने झेंपते हुए अपनी कमान संभालते हुए पूरी रस्म को अपने फोन में कैद करना शुरू कर दिया। उसने अबीर की ढेरों तस्वीरें लीं।
दूसरी ओर, नव्या के घर में भी हल्दी की रस्म शुरू हो गई थी।
बैठक में ही हल्दी की रस्म होनी थी। रिश्तेदार सुबह-सुबह ही पहुँच गए थे। सबने कुछ देर आराम किया और फिर रस्म की तैयारियों में जुट गए।
दूसरी तरफ, कमरे में नव्या तैयार हो रही थी। पीली साड़ी, गले में फूलों की माला, और खुले बालों में वह किसी परी सी लग रही थी। कमला उसके साथ थी।
तभी नव्या को कुछ याद आया। उसने कमला को अपना फोन देकर कहा,
"दीदी, फोटो लीजिए न!"
कमला मुसकुराई और फोन ले लिया, पर उसे कुछ समझ नहीं आया। माथे पर हल्की शिकन उभर आई। नव्या पास आकर उसे समझाने लगी। फिर कमला ने नव्या की ढेरों तस्वीरें लीं। कुछ देर बाद दोनों नीचे चली आईं। नीचे बैठक में रिश्तेदारों का जमघट लगा था। सभी औरतें पीली साड़ियों और सलवार-कुर्तों में सजी हुई थीं, और पुरुष पीले-सफेद कुर्ते-पजामे में जँच रहे थे। बैठक की दीवारों पर गेंदे के फूलों की लड़ियाँ सजी थीं।
नव्या के नीचे पहुँचते ही माँ ने उसे रस्म के लिए बैठने को कहा। नव्या के बैठते ही कमला जाने लगी। नव्या को अचानक कमला का जाना अच्छा नहीं लगा। उसने सबके सामने ही आगे बढ़कर कमला को रोक लिया "आप कहाँ जा रही हैं?"
कमला का मन तो बहुत था की वह सबकी तरह पीली साङी पहनकर हल्दी में शामिल हो। उसने सिर झुकाते हुए कहा, "रसोई में काम है न।"
नव्या ने झट से कहा "नहीं, आज नहीं। मेरी हल्दी है। मेरी एक ही दोस्त है, वो भी रस्म में शामिल नहीं होगी?"
कमला ने समझाने की कोशिश की,
"देखो, हम दोस्त हैं, पर इन रिश्तेदारों की नजर में मैं बस एक नौकरानी हूँ। मेरा यहाँ रहना किसी को अच्छा नहीं लगेगा।"
नव्या ने कुछ सोचकर तेज आवाज़ में सबका ध्यान खींचते हुए कहा,
"आप सब लोग यहाँ आए हैं, मुझे बहुत अच्छा लगा। उम्मीद करती हूँ कि सबको पता है कि मेरी कोई सहेली नहीं है। लेकिन आज, मैं आप सबको अपनी एक खास दोस्त से मिलवाना चाहती हूँ।"
यह कहकर उसने कमला के कंधे पर हाथ रखा।
सभी लोग आपस में खुसर-पुसर करने लगे। तभी किसी की तेज आवाज़ गूंज उठी—
"क्या एक नौकरानी भी हमारे साथ हल्दी में शामिल होगी?"
नव्या का संयम जवाब दे गया और कमला की आंखों में नमी उतर आई। नव्या ने सीधा कहा, "क्यों, वो इंसान नहीं हैं? वो जो भी हैं, मेरे लिए मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं। उनके बारे में मैं कुछ नहीं सुनना चाहती।"
सभी अचानक चुप हो गए। माँ-पापा बस खड़े मुस्कुरा रहे थे। वे अपनी बेटी को सामाजिक मर्यादाएँ तोड़ते देख रहे थे, वो भी अपनी दोस्त के लिए।
नव्या ने माँ से कहा, "माँ, मेरे कमरे में एक और थैला रखा है। उसमें कमला दीदी के कपड़े हैं। उन्हें दे दीजिए।" फिर उसने कमला से मिन्नत करते हुए कहा, "आप जाइए और तैयार होकर आइए। आप आएंगी, तभी रस्म होगी।"
कमला की आँखों से आंसू बह निकले। पहली बार किसी ने उसके लिए सबसे लड़ने की हिम्मत दिखाई थी। उसने भावुक होकर कहा, "ऐसा मत कहो, तुमने जो किया, वो बहुत है।"
नव्या ने सीधे-सपाट लहजे में कहा, "मैं इंतज़ार कर रही हूँ।"
माँ जानती थी की अभी नव्या कुछ न सुनेगी इसीलिए कमला को अपने साथ ले गईं। करीब आधे घंटे बाद कमला भी पीली साड़ी में तैयार होकर बैठक में आ गई। रस्म शुरू हो गई। सभी ने एक-एक करके नव्या को हल्दी लगाई। नव्या के कहने पर उसके मौसेरे भाई ने उसकी बहुत सारी तस्वीरें लीं।
दिन ढलते ही दोनों तरफ हल्दी की रस्म पूरी हो गई। नव्या ने अपनी सारी तस्वीरें अबीर को भेजीं। जवाब में अबीर ने भी उसे अपनी ढेर सारी तस्वीरें भेजीं।
अब दोनों ओर कल होने वाली मेहँदी की रस्म का इंतज़ार था। रात में देर तक बातें करने के बाद नव्या और अबीर सो गए।
भाग – बाईस
21 दिसंबर
नव्या और अबीर की मेहँदी
अबीर का घर
सुबह सभी जल्दी उठ चुके थे। कल रात ही घर के आंगन में शामियाना और सजावट का सामान रख दिया गया था। तड़के सुबह से ही तैयारियों का काम शुरू हो गया था। सभी पुरुष शामियाना सजाने में लगे थे, जबकि घर की स्त्रियाँ रसोई में खाने-पीने का इंतज़ाम कर रही थीं। हर ओर हलचल और भागदौड़ मची थी, पर इस शोरगुल के बीच एक शख्स चैन की नींद सो रहा था—दूल्हे राजा, अबीर!
देर रात तक नव्या से बातें करने के चलते वह सो ही नहीं पाया था। घरवालों को लगा कि यह थकावट की वजह से हो रहा है, पर असली कारण सिर्फ राघव जानता था, जो उसके ठीक बगल में सोया था। करीब नौ बजे राघव की नींद खुली। उसने दीवार घड़ी पर नज़र डाली और हड़बड़ाकर उठ बैठा—"अरे यार, बहुत देर हो गई!"
खुद से बड़बड़ाते हुए उसने अबीर को झकझोरकर उठाने की कोशिश की—"भाई, उठ जा!"
अबीर गहरी नींद में था और उसकी बात अनसुनी कर दी। राघव ने फिर कहा—
"भाई, उठ जा!"
अबीर ने तकिए से कान ढंक लिए और उनींदे स्वर में बोला "यार, बस थोड़ी देर और!"
राघव मुसकुराया। उसे समझ आ गया कि अबीर इतनी आसानी से उठने वाला नहीं है। उसने सोचा, अगर अभी माँ आईं और हमें यूँ सोया पाया, तो मुझे ही सुननी पड़ेगी। लेकिन मैं अकेला क्यों डाँट खाऊँ?
तभी उसे एक शरारत सूझी। उसने अबीर का फोन उठाया, उसका नंबर डायल किया और अबीर को हिलाते हुए बोला—"भाई, उठ जा! नव्या का फोन आया है!"
अबीर ने जैसे ही नव्या का नाम सुना, वह झट से उठ बैठा और फोन देखने लगा।
"कहाँ है फोन?" उसने हड़बड़ाते हुए पूछा।
राघव हँसते हुए बोला "तू उठ नहीं रहा था, तो मैंने चाल चल दी!"
अबीर ने गुस्से से राघव को घूरा, तभी माँ कमरे में आ गईं। अबीर को अब भी बिस्तर पर देखकर माँ ने प्यार से कहा "अब बस कर, कितना सोएगा?"
अबीर सकपका गया "माँ, बस उठ ही गया!"
माँ ने प्यार से झिड़कते हुए कहा— "जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो जाओ। सब काम कर रहे हैं, तुम दोनों भी हाथ बँटाओ!"
"हाँ माँ, बस अभी करते हैं," दोनों ने एक साथ कहा।
माँ के जाने के बाद अबीर ने फिर से अपना फोन खोला। नव्या का संदेश आया था—
"गुड मॉर्निंग, प्रिय!
उठ जाइए।
आज मेहँदी है। मुझे तो लगेगी ही, पर आपको भी लगवानी होगी!"
अबीर ने जवाब में लिखा— "पर मुझे मेहँदी पसंद नहीं है, ये सब लड़कियों पर अच्छा लगता है।"
फिर वह सीधा कमरे से बाहर निकल आया। राघव भी उसके पीछे-पीछे आ गया। माँ ने दोनों को घूरकर देखा, तो वे बाथरूम की ओर भागे। करीब आधे घंटे बाद अबीर नहा-धोकर बाहर आ गया। घर में लोगों की चहल-पहल थी। हर कोई किसी न किसी काम में व्यस्त था। मेहँदी की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। तभी राघव भी बाहर आ गया और अबीर को छेड़ते हुए बोला, "आज तो तेरे हाथों में कलाई भर मेहंदी रचेगी!"
अबीर ने भौंहें चढ़ाते हुए जवाब दिया, "तुझे पता है न, मुझे मेहंदी पसंद नहीं है? नहीं लगवाऊंगा, चाहे जो हो जाए।"
पीछे से आ रही माँ ने यह सब सुन लिया था। मुसकुराते हुए उन्होंने अबीर के कान पकड़कर उसे अपनी ओर घुमाया, "क्या कह रहा था तू?"
राघव को जैसे मौक़ा मिल गया। वह तुरंत तोते की तरह बोल पड़ा, "आंटी, कह रहा था कि मेहंदी नहीं लगाएगा!"
माँ ने भौंहें उठाकर कहा, "अच्छा?"
अबीर ने गुस्से से राघव को घूरा, लेकिन राघव हमेशा की तरह हंसने लगा। आखिरकार, अबीर ने माँ की ओर देखा और बोला, "माँ, आप जानती हैं न कि मुझे मेहंदी पसंद नहीं है।"
माँ ने शांत स्वर में कहा, "शगुन के लिए लगानी पड़ेगी।"
अबीर ने तुरंत ना में सिर हिला दिया। माँ ने मुसकुराते हुए उसके कान छोड़ दिए और बोलीं, "ठीक है, मत लगाओ। लेकिन बाकी सब तो लगाएंगे। जा, उनके लिए मेहंदी लेकर आ।"
कहकर माँ अंदर चली गईं। राघव ने अबीर को कोहनी मारी और साथ चलने का इशारा किया।
कुछ ही देर बाद, दोनों बाइक पर बाज़ार की ओर जा रहे थे। अबीर बाइक चला रहा था और राघव पीछे बैठा था।
राघव ने फिर छेड़ते हुए कहा, "भाई, लगवा ले न।"
अबीर चिढ़ गया, "मैंने कहा न, बिल्कुल नहीं!"
राघव ने गहरी सांस ली, "तूने आंटी का मन खराब कर दिया।"
अबीर थोड़ा झुंझला गया, "पर...?"
राघव ने उसकी बात काटते हुए कहा, "पर क्या? नव्या को लगेगी, तू भी बस हथेलियों में थोड़ा सा लगवा लेगा तो क्या चला जाएगा? रस्म ही तो है।"
अबीर ने कोई जवाब नहीं दिया, उसे कहीं न कहीं राघव की बात सही लगी। थोड़ी देर बाद अबीर ने एक दुकान के सामने बाइक रोक दी। दोनों उतरकर दुकान में चले गए। सामने एक आदमी बैठा झपकी ले रहा था। राघव ने उसे झकझोर कर उठाया और बोला - "क्या भाई, काम करते-करते सो गए!"
कच्ची नींद से उठने के कारण वह ज़रा चिड़चिड़ा हो गया और ज़ोर से बोला "क्या चाहिए?"
अबीर और राघव उसके बर्ताव से हतप्रभ रह गए। अबीर ने संभलते हुए कहा "हाथ में लगाने वाली मेहंदी दे दीजिए।"
दुकानदार ने मेहंदी का लिफाफा उसे पकड़ा दिया। अबीर ने पैसे चुकाए और दोनों वहां से बाइक लेकर भागे। अबीर ने घर का रास्ता लिया। वह बाइक चला रहा था कि उसका फोन बज उठा। उसने एक तरफ बाइक रोकी और फोन उठाया। दूसरी तरफ नव्या थी।
अबीर: "गुड मॉर्निंग, नव्या।"
नव्या: "गुड मॉर्निंग।"
अबीर को एहसास हुआ कि नव्या की आवाज़ की खनक गायब थी। उसने पूछा - "क्या हुआ? नाराज़ हैं आप?"
नव्या ने बुझी सी आवाज़ में कहा "नहीं, बस यूं ही।"
अबीर को याद आया कि सुबह नव्या का मैसेज आया था, फिर माँ का भी चेहरा उतर गया था। उसने फिर पूछा "मेरी बात से नाराज़ हैं आप?"
नव्या ने स्पष्ट कर ही दिया "हाँ। क्योंकि मैं तो मेहंदी लगवाऊंगी। अगर आपको पसंद नहीं, तो जब तक मेरी मेहंदी नहीं छूटती, मुझसे दूर रहिएगा।"
अबीर को नव्या की बातों में सच्चाई दिख रही थी। वह जानता था कि नव्या थोड़ी ज़िद्दी है। उसने उसे मनाया और कहा "आप क्या चाहती हैं?"
नव्या ने सीधे-सीधे कह दिया "यही कि आप मेहंदी लगवाएं और मुझे तस्वीर भेजें।"
अबीर लगभग खुद को मेहंदी लगवाने के लिए तैयार कर चुका था। "जी हुज़ूर," कहकर उसने फोन रखा और दोनों घर आ गए। माँ ने उससे बिना कुछ कहे मेहंदी ले ली और एक कटोरी में रखकर उसका घोल बनाने लगीं। अबीर को अपनी गलती का अहसास हुआ। माँ की चुप्पी उससे सहन नहीं हुई। उसने कहा "माँ, अब तक नाराज़ हो?"
माँ ने बस 'न' में सिर हिलाया। अबीर ने मेहंदी की कटोरी लेकर घोल बनाते हुए कहा "अच्छा, गुस्सा मत हो। मैं लगवाऊंगा मेहंदी, अब खुश?"
माँ ने सिर उठाकर देखा, तो अबीर मुस्कुरा दिया और कहा "पर बस हथेलियों में!"
माँ ने सहमति जताई और सबको तैयारी करने के लिए कहा।
दिनभर कल की तैयारियाँ करने में निकल गया। शाम करीब सात बजे मेहंदी की रस्म शुरू हो गई।
अबीर की चचेरी बहनों ने उसके मना करने पर भी दोनों हाथों में कलाई भर मेहंदी लगा दी। राघव ने मौका पाते ही उसे छेङा “भाई बिल्कुल दुल्हन लग रहा है तू।“ अबीर ने एक पल को उसे घुरा और खिलखिलाकर हंस पङा। हंसी-मजाक अपने चरम पर था। फिर एक-एक करके सबको मेहंदी लगाई गई। देर तक नाच-गाना और हंसी-मज़ाक चलता रहा। रात दस बजे तक अबीर के दोनों हाथों में कलाई भर मेहंदी रच चुकी थी। राघव ने उसे अपने हाथों से खाना खिलाया और नव्या को अबीर की तस्वीरें भेज दीं। बाकी सबने भी सभी स्त्रियों को खाना खिलाया।
देर रात सब सो गए थे।
नव्या की मेहंदी
अबीर को मेहंदी के लिए मनाने के बाद नव्या झटपट नहा-धोकर तैयार हो गई। उसके कमरे में उसकी बहनें बैठी उससे हंसी-मज़ाक कर रही थीं। तभी माँ कमरे में चली आईं और सबको देखते हुए बोलीं "चलो सब, मेहंदी की तैयारी करो।" सब एक-एक करके बाहर चले गए। माँ ने दरवाज़ा बंद कर दिया और नव्या के पास बैठ गईं। उनकी आँखों में आँसू थे।
नव्या ने चिंता में पूछा "माँ, क्या हुआ?"
माँ बैठी उसका सामान सहेज रही थीं। आँखें पोंछते हुए बोलीं "अपना सामान संभाल कर रख लो, वरना फिर कहोगी कि कुछ खो गया।"
नव्या ने सामान एक ओर रखा और उठकर माँ के गले में बाँहें डाल दीं। उसने फिर पूछा "माँ, बोलो न?"
माँ ने उसकी बाँहों को थाम लिया और बोलीं "कुछ नहीं, आज इस घर में तुम्हारी आखिरी रात है। कल तुम अपने प्रेमी के साथ चली जाओगी।"
नव्या ने मुसकुराकर कहा "माँ, मैं जब कहूँगी तब अबीर मुझे यहाँ ले आएंगे।"
माँ: "तब तुम बस कुछ देर के लिए आओगी, फिर चली जाओगी।"
नव्या की मेहंदी
नव्या का मन भी डूबने लगा, पर माँ को भी संभालना ज़रूरी था। वह माँ को समझाते हुए बोली - "माँ, यह तो हमेशा से होता आया है न? अच्छा बताओ, मैं अपनी मेहंदी में क्या पहनूँगी? आप जो कहोगे, वही पहनूँगी।"
कहकर उसने एक हरा सलवार-कमीज़ और एक हरी साड़ी निकालकर रख दी।
माँ ने आँखें पोंछते हुए कहा "दोनों में से कोई नहीं।"
नव्या चौंकी और माँ को देखते हुए बोली "फिर क्या?"
माँ उठीं और उसकी अलमारी में रखी हरी बनारसी साड़ी निकालकर सामने रख दी।
"यह पहनो," कहकर माँ ने उसका माथा चूम लिया।
नव्या मुसकुराते हुए माँ के गले लग गई।
देखते ही देखते करीब डेढ़ घंटे बीत गए।
माँ ने उठते हुए कहा "अच्छा, अब मैं चलती हूँ। देखूँ तो, क्या हो रहा है। तुम खाना खा लो, कुछ देर आराम करो। फिर जब कमला आएगी, तो उसके साथ नीचे आ जाना।"
नव्या ने सहमति में सिर हिला दिया। माँ कमरे से बाहर चली गईं।
नव्या जाने कब सो गई थी। उसकी नींद तब टूटी जब देर शाम दरवाज़े पर दस्तक हुई।
नींद में ही उसने उठकर दरवाज़ा खोला। सामने कमला खड़ी थी, जो नव्या को देखकर मुस्कुरा रही थी। नव्या ने कमला को अंदर बुला लिया। कमला पलंग पर बैठ गई और नव्या फिर से नींद में झूलती हुई बिस्तर पर लुढ़क गई।
कमला ने उसे जगाते हुए कहा "नव्या, उठो! कितना सोओगी?"
नव्या ने नींद में ही कहा "थोड़ी देर और।"
कमला "शाम के पाँच बज गए, एक घंटे बाद नीचे रस्म शुरू होगी। तुम्हें तैयार नहीं होना?"
नव्या तुरंत उठ बैठी और बाथरूम की ओर जाते हुए बोली "आपके कपड़े बिस्तर के कोने पर रखे हैं, तैयार हो जाइए।"
कमला बस मुस्कुरा दी।
करीब आधे घंटे बाद नव्या बाहर आई। कमला ने कपड़े पहन लिए थे। नव्या के आते ही कमला ने उसे साड़ी पहनाई और तैयार कर दिया। दोनों साथ में नीचे आ गईं। बैठक में सिर्फ लड़कियाँ और महिलाएँ थीं। सभी लड़के और बाकी पुरुष घर के बाहर सजावट में लगे थे। नव्या के आते ही रस्म शुरू हो गई। एक मचिया पर उसे बैठाकर लड़कियों ने उसे मेहंदी लगानी शुरू कर दी।
अगले दो घंटों में नव्या के दोनों हाथों में कलाई तक मेहंदी रचाई गई। मेहंदी में उसके होने वाले पति का नाम पूछकर छुपाया गया। दोनों पैरों में भी मेहंदी लगाई गई।
अंत में, दोनों हाथों और पैरों में मेहंदी लगाए नव्या इधर-उधर देखते हुए कमला को ढूँढ रही थी।
वहीं उसके चचेरे भाई उसकी तस्वीरें ले रहे थे, पर उसका ध्यान वहाँ नहीं था।
माँ ने उसे देखकर पूछा "क्या ढूँढ रही थी?"
नव्या ने यहां-वहां देखते हुए कहा "माँ, कमला दीदी?"
माँ ने धीरे से कहा "रसोई में होगी। कल जो भी हुआ, उससे दुखी होगी। इसीलिए नहीं आई।"
नव्या ने ऐलान करते हुए कहा "माँ, उन्हें बुलाओ। मैं पहले ही कह रही हूँ, कल बहनों की सारी विधियाँ कमला दीदी करेंगी। कोई कुछ नहीं कहेगा।"
माँ ने नव्या का कमला के प्रति लगाव और प्यार देखा था। वह जानती थी कि अगर किसी ने कमला को कुछ कहा, तो नव्या को सहन नहीं होगा। आखिर, कमला उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी।
अगले ही पल, कमला नव्या के सामने खड़ी थी। नव्या को देखकर वह मुस्कुरा दी और अपनी आँखों के काजल से उसके कान के पीछे काला टीका लगाकर उसकी नज़र उतार ली। नव्या ने कमला को भी मेहंदी लगवाने के लिए कहा, जिस पर कमला ने इंकार कर दिया। पर नव्या ज़िद पर अड़ गई, तो कमला की एक न चली। आखिर में, लड़कियों ने कमला को भी मेहंदी लगा दी।
इसके बाद, नाच-गाना और हंसी-मज़ाक जो शुरू हुआ, तो कहीं रात ग्यारह बजे जाकर खत्म हुआ।
कमला ने मेहंदी सूखते ही नव्या को खाना खिलाया। और उस रात, वह नव्या के सो जाने के बाद भी उसके पास ही बैठी रही।
कमला मन ही मन सोच रही थी—
"नव्या, तुमसे ही यह घर गुलज़ार है, और मेरी ज़िंदगी भी। पता नहीं, तुम्हारे जाने के बाद मेरा मन कैसे लगेगा? इन दो दिनों में तुमने जो किया, वह मेरे लिए सबसे बढ़कर है। तुमने हमारी दोस्ती के लिए हमारे बीच की नौकर-मालिक वाली हर मर्यादा को तोड़ दिया। भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।"
भाग – तेईस
२२ दिसंबर
शुभ विवाह - बारात
रात बीत चुकी थी। आज, आखिर एक साल के लंबे इंतजार के बाद, अबीर और नव्या के मिलन का दिन आ गया था। दोनों ओर तैयारियां ज़ोर-शोर से चल रही थीं।
अबीर के घर में सुबह से ही बारात की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। हलवाई स्वादिष्ट पकवान बनाने में लगे थे, घर के बाकी सदस्य गाड़ियों की व्यवस्था में व्यस्त थे। वहीं, अबीर अपने कमरे को खुद ही संवारने और सजाने में लगा था। राघव, जो हमेशा उसे छेड़ता रहता था, अब भी मज़ाक करने से पीछे नहीं हटा। उसने हंसते हुए कहा,
"वाह, बेटा! अब नव्या आ रही है, तो कमरा भी चमकाया जा रहा है!"
अबीर मुस्कुरा दिया और बोला, "भाई, हम लड़के जैसे भी रह लें, लेकिन लड़कियां हर जगह सहज महसूस नहीं करतीं। इसलिए, मुझे कुछ तो करना ही था!"
कमरे को पूरी तरह सजाने-संवारने के बाद, वह थककर सो गया। उधर, राघव बाहर जाकर सारी तैयारियों का मुआयना करने लगा। दिनभर सभी ने मिलकर शाम की तैयारियां पूरी कीं।
दूसरी ओर, नव्या के घर का नज़ारा भी किसी उत्सव से कम नहीं था।
बड़े दरवाज़े को फूलों से भव्य रूप से सजाया गया था। बगीचे के पेड़ों पर रंग-बिरंगी बिजली की लड़ियां जगमगा रही थीं। जयमाला के लिए एक भव्य मंच तैयार किया गया था, जिस पर मखमली कालीन बिछा था और दो आलीशान कुर्सियां रखी गई थीं। मंच की पिछली दीवार पर खूबसूरत फूलों की सजावट की गई थी।
विवाह मंडप, जयमाला स्थल से ठीक बीस कदम की दूरी पर था। गुलाबी और सफ़ेद शामियाना नव्या की पसंद के फूलों से सजा था। मुख्य द्वार पर तोरण और बंदनवार लगे थे, और पूरे घर में फूलों की लड़ियां झूल रही थीं। हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त था।
अपने कमरे में बैठी नव्या अपना सामान करीने से बैग में रख रही थी। पास बैठी कमला भी उसकी मदद कर रही थी। लगभग आधे घंटे बाद, जब सारा सामान व्यवस्थित हो गया, तो नव्या को ऐसा महसूस हुआ जैसे वह कुछ भूल गई हो।
उसी समय, कमला ने मुसकुराते हुए कहा, "तुम अपनी बनाई तस्वीर नहीं रखोगी?"
नव्या ने माथे पर हाथ रखते हुए कहा, "ओह हां!" फिर अलमारी से वह तस्वीर निकाली, जिसे उसने बड़े जतन से छुपाकर रखा था, और उसे अपने सामान में रख लिया।
कमला उसे गौर से देख रही थी। उसके मन में कुछ चल रहा था। आखिर, वह पूछ ही बैठी—
"नव्या, कुछ पूछूं?"
नव्या, जो अपने फोन पर कुछ देख रही थी, बोली, "हां पूछिए न।"
कमला ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा, "तुमको मेरी याद आएगी?"
नव्या ने फोन से नजरें हटाकर कमला को देखा और मुसकुराते हुए कहा, "हां, बहुत आएगी।"
कमला का चेहरा एक पल को बुझ-सा गया। वह धीमे स्वर में बोली, "मुझे भी आएगी... तुम्हारे बाद मैं इस कमरे में नहीं आऊंगी।"
इतना कहते-कहते कमला की आंखों में आंसू उमड़ आए।
नव्या ने तुरंत आगे बढ़कर उसे अपनी बाँहों में भर लिया और प्यार से बोली, "अरे, अभी से रोने लगीं?"
कमला ने झिझकते हुए उसे थाम लिया और हल्की मुस्कान के साथ बोली, "नहीं, बस यूं ही…"
नव्या ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा, "अगर मेरी याद आए, तो फोन कर लेना।"
कमला ने उदास होकर सिर हिलाया, "तुम्हें तो पता है, मुझे फोन चलाना नहीं आता।"
नव्या ने हल्की हंसी के साथ कहा, "जानती हूं, कोई बात नहीं, मैं आपको कुछ छोटी-छोटी बातें समझा देती हूं।"
कमला ने फिर से सिर झुका लिया और धीरे से बोली, "फोन नहीं है मेरे पास।"
यह सुनकर नव्या ने अपने बैग से दो लिफाफे निकाले और कमला की हथेलियों पर रख दिए। उसने इशारे से कहा, "खोलिए।"
कमला ने पहला लिफाफा खोला—उसमें एक फोन था। वह चौंक गई। हैरानी से नव्या को देखते हुए बोली, "ये क्यों?"
नव्या ने मुसकुराकर कहा, "ताकि जब भी मेरी याद आए, तो आप मुझसे बात कर सकें।"
कमला की आंखें नम हो गईं। उसने कांपते हाथों से दूसरा लिफाफा खोला। उसमें एक खूबसूरत लहंगा-चोली और कुछ गहने थे।
वह असमंजस में पड़ गई। नव्या की ओर देखते हुए उसने पूछा, "ये कपड़े किसके हैं?"
नव्या ने उसका हाथ थाम लिया और बेहद स्नेह से कहा, "आपके। मेरी शादी में आप यही पहनेंगीं।"
कमला की आंखें छलक पड़ीं। उसने नव्या को कसकर गले लगा लिया।
पर कमला का संयम जवाब दे गया। यह उसके लिए असामान्य था—वह तो बस एक नौकरानी थी, फिर भी नव्या ने उसके लिए इतना सोचा था। उसकी आंखों में नमी थी, आवाज़ भर्रा गई।
"क्यों करती हो तुम ये सब?" कमला ने सिसकियों को संभालते हुए कहा।
"मुझे ऐसे मान-सम्मान की आदत नहीं है। पर तुमने मेरी आदतें बिगाड़ दी हैं। आज तुम हो, तो सोचती हो… कल कौन सोचेगा? जो दो दिन में हुआ, वह बहुत था। अब बस करो… मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता।"
कमला के मन का गुब्बार फूट पड़ा था। नव्या मुस्कुरा दी। उसने कमला के गालों पर ढुलक आए आंसू को अपने कोमल हाथों से पोंछा और प्यार से बोली,
"मैंने ये सब अपनी दोस्त के लिए किया है। एक ही दोस्त है, उस पर प्यार न लुटाऊं तो और क्या करूं?"
कमला की आंखें फिर भर आईं। "कोई आदत नहीं बिगड़ी," नव्या ने हंसकर कहा। "मेरे बाद आपको अपना और मां-पापा का ध्यान रखना है। और हां, ये कपड़े पहनकर तैयार हो जाइएगा शाम को… बहनों की सारी विधियां आप ही करेंगी।"
कमला ने कोई जवाब नहीं दिया, बस नव्या का माथा चूम लिया।
दोपहर में कमला ने खुद नव्या को खाना खिलाया और सुला दिया। उधर, अबीर भी गहरी नींद में सो गया था।
बारात की तैयारी
शाम करीब चार बजे राघव कमरे में आया और बोला, "चल, बस उठ जा! तैयार होना है।"
अबीर ने आलस्य से आंखें मलीं और बाथरूम की ओर बढ़ गया।
घर में सभी लोग तैयारियों में जुट चुके थे। जहां एक तरफ पुरुष—कुर्ता-पायजामा और कोट-पैंट में सहजता से तैयार हो गए थे, वहीं दूसरी तरफ महिलाएं और लड़कियां साड़ी और लहंगे में उलझी हुई थीं। किसी की चूड़ियां गुम हो गई थीं, तो किसी की बालियां। कोई साड़ी संभालने में जुटा था, तो कोई बाल संवारने में। कोई किसी से पिन मांग रहा था, तो कोई किसी की प्लेटिंग ठीक कर रहा था।
कहते हैं, स्त्रियों को सजने-संवरने के लिए कितना भी समय मिल जाए, वह कम ही पड़ जाता है।
खैर, अगले डेढ़ घंटे में सब तैयार हो गए।
अबीर अपने कमरे में सफ़ेद-सुनहरी शेरवानी पहन चुका था। वह खुद तैयार होकर अब राघव की मदद कर रहा था। तभी मां अपनी साड़ी संभालते हुए कमरे में आईं।
अबीर और राघव ने जैसे ही उन्हें देखा, एक साथ बोले "बहुत सुंदर!"
मां मुसकुराईं और बोलीं, "अबीर, बाहर आओ। सेहरा सजाना है।"
कहकर मां चली गईं। अबीर ने जल्दी से अपने बाल ठीक किए और बाहर निकल आया।
बारात की रस्में
आंगन में लोगों का सैलाब उमड़ आया था। ठीक शाम साढ़े पांच बजे, सभी लोग आंगन में घेरा बनाकर खड़े थे। मां-पापा और अबीर उस घेरे के बीच में थे। सामने खड़ी औरतें हाथों में आरती की थाली, सेहरा और कृपाण लिए खड़ी थीं। सबसे आगे दादी थीं।
मां ने सेहरा दादी को दिया। अबीर ने मुसकुराते हुए सिर झुका लिया।
दादी ने प्यार से उसके माथे को चूमा और सेहरा बांध दिया। मां ने उसकी आरती उतारी, तिलक लगाया और फिर कान के पीछे काजल का टीका लगाकर उसकी नज़र उतारी। अंत में, पापा ने उसके हाथ में कृपाण सौंप दी।
राघव ने फिर से एक सवाल किया “ये कृपाण क्यों दी जाती है?”
दादी ने कहा जवाब दिया ये कृपाण ज़िम्मेदारी और समन्वय का प्रतीक है।
जैसे ही रस्म पूरी हुई, बैंड-बाजे बजने लगे। पूरा माहौल खुशी और उत्साह से भर उठा।
दादी और घर के कुछ बड़े बुजुर्गों को छोड़कर बाकी सभी लोग धीरे-धीरे बाहर आ गए। बैंड वाले आगे बढ़ने लगे। तभी, फूलों से सजी कार घर की चौखट पर आकर रुकी।
राघव कार से उतरा और अचानक अबीर को अपनी गोद में उठा लिया। सब चौंक गए, फिर हंसने लगे।
अबीर का चेहरा झेंप से लाल हुआ और वह अचानक हड़बड़ा गया, लेकिन अगले ही पल संभलते हुए बोला "क्या कर रहा है तू?"
राघव ने शरारती मुस्कान के साथ कहा, "दूल्हे राजा को गोद में उठाने का भी एक अलग ही मज़ा है!" और आज मेरा जिगरी यार ज़िंदगी के नए पङाव पर जाएगा तो उसे सहारा देना तो बनता है।
सब हंस पड़े। बारात का माहौल और भी जीवंत हो उठा।
"हां, बिल्कुल!" सबने एक साथ सहमति में कहा।
राघव ने अबीर को आंख मारते हुए मज़ाक किया, "देखा? अब हिलना मत, वरना गिर जाएगा!"
अबीर मुस्कुरा दिया।
राघव आगे बढ़ा और कार के पास रुका। पास खड़े एक लड़के ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला, और राघव ने अबीर को आराम से यात्री सीट पर बैठा दिया। फिर दरवाज़ा बंद कर दिया।
किसी की ज़ोरदार आवाज़ गूंजी, "अब निकला जाए?"
सबने एक साथ कहा, "हां, चलो!"
राघव ने कार स्टार्ट की, और धीरे-धीरे बारात का कारवां कच्ची सड़क पर आगे बढ़ने लगा।
दूसरी ओर, नव्या के घर में हलचल चरम पर थी।
रिश्तेदार तैयार हो चुके थे, पर नव्या अभी तक अपने काम में लगी थी। वह अपनी शादी के लिए खुद दुल्हन बनने वाली थी—क्योंकि अबीर की यह इच्छा थी कि वह अपने असली रूप में तैयार हो। वैसे तो कोई भी उसे सजाने के लिए था, लेकिन नव्या को खुद संवरने में मज़ा आता था।
ठीक पाँच बजे, कमला ने नव्या को जगा दिया और खुद काम में लग गई।
जल्द ही नव्या नहा-धोकर वापस आ गई और कमला का इंतजार करने लगी। तभी कमला हाथों में एक थाली लिए अंदर आई, जिस पर कपड़ा ढंका हुआ था।
नव्या मुसकुराकर कमरे में चली गई, और कमला भी उसके पीछे-पीछे आ गई।
"चलो, जल्दी से लहंगा पहन लो," कमला ने कहा।
दस मिनट में ही नव्या ने लाल रंग का लहंगा-चोली पहन लिया। वह आईने के सामने खड़ी होकर मेकअप करने लगी। इस बीच, कमला ने उसके बालों का सुंदर सा जुड़ा बनाया और उसमें गुलाब के फूल लगा दिए।
करीब एक घंटे बाद, नव्या पूरी तरह तैयार हो चुकी थी।
आखिर में, कमला ने उसके माथे पर दुपट्टा डाला। नव्या ने आईने में खुद को सिर से पैर तक देखा और मुस्कुरा दी। बारात आने में अभी समय था, इसलिए वह बिस्तर पर बैठ गई। तभी उसे ध्यान आया—"कमला दीदी तैयार हुई या नहीं?"
उसने फोन उठाया और देखा—अबीर का मैसेज था, "नव्या, मैं निकल चुका हूँ।"
वह मुसकुराई और कमला से बोली, "अब आपकी बारी, जाइए जल्दी से तैयार हो जाइए।"
जब कमला तैयार होकर आई, तो नव्या ने खुद उसके बाल संवारे और हल्का मेकअप किया। कमला ने जैसे ही आईने में खुद को देखा, उसे यकीन नहीं हुआ कि वह इतनी सुंदर लग सकती है!
नव्या ने मुसकुराकर उसकी तस्वीर खींच ली।
बारात का आगमन
शाम के सात बज चुके थे। तभी मां ने दरवाज़ा खटखटाया। कमला ने दरवाज़ा खोला, और मां अंदर आईं। नव्या को शादी के जोड़े में देख उनकी आंखें छलक पड़ीं।
नव्या तुरंत उठी और मां को गले लगा लिया। जाने कितनी देर तक दोनों एक-दूसरे से लिपटी रहीं।
आधे घंटे बाद पापा भी कमरे में आए। नव्या को दुल्हन के रूप में देख उनकी स्थिति भी मां जैसी ही थी। उन्होंने अपनी छलकती आंखों को छिपाते हुए काजल से नव्या को काला टीका लगा दिया।
तभी उनका फोन बजा। पापा ने फोन रखते हुए कहा, "नव्या, बारात पहुंचने वाली है। मैंने नीचे वाला कमरा खाली करवा दिया है, तुम वहां बैठ जाना।"
नव्या ने सिर हिलाया और अपना बैग उठाकर मां और कमला के साथ नीचे चली गई।
नीचे, बड़ी-सी खिड़की के पास नव्या बैठी थी।
बाहर, बगीचे में रिश्तेदार और मेहमान जमा हो चुके थे। हल्की आवाज़ में गाने बज रहे थे, और नव्या उन धुनों में खोकर मन ही मन झूमने लगी। कमला पास खड़ी स्वागत की तैयारियों में व्यस्त थी। तभी अचानक ढोल की तेज़ आवाज़ गूंज उठी।
कमला ने हंसकर नव्या को छेड़ा, "लगता है, बारात आ गई! बस कुछ ही देर में तुम अपने अबीर को देखोगी!"
नव्या के गाल गुलाबी हो उठे।
कमला ने आरती की थाली सजाकर नेहा को दी, पर नव्या ने तुरंत कहा, "थाली कमला दीदी को दो।"
कमला चौंक गई, "क्यों? उसे करने दो ना!"
नव्या मुसकुराकर बोली, "आप भूल गईं क्या? बहनों की सारी विधियां आप ही करेंगी। चलिए, आगे बढ़िए!" कमला असमंजस में मां की ओर देखने लगी। मां ने सहमति में सिर हिलाया और उसे आगे बढ़ने का इशारा किया।
रात आठ बजे, बारात बड़े दरवाज़े के बाहर पहुंच चुकी थी।
बैंड-बाजे की धुन पर सभी झूम रहे थे। मां और कमला दरवाज़े पर खड़े अबीर की आरती उतारने के लिए तैयार थीं। मां ने अबीर की आरती उतारी, तिलक लगाया और कान के पीछे काजल का टीका लगाया। पापा और अन्य रिश्तेदारों ने मिलकर बारात का स्वागत किया। स्वागत के बाद, कमला राघव और अबीर को मंच तक ले गई। मेहमान कुर्सियों पर बैठने लगे। अबीर हल्की मुस्कान लिए बैठा था, जबकि राघव पास में खड़ा था।
फिर, वह घड़ी आ गई जिसका सबको इंतज़ार था।
हवा में गुलाब की पंखुड़ियां बिखर गईं, और सामने से नव्या धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़ रही थी।
वह घूंघट में थी, और उसके भाई चुनरी के चारों कोनों को थामे उसके साथ चल रहे थे।
सबकी नज़रें नव्या पर टिक गईं। अबीर उठ खड़ा हुआ और उसकी ओर बढ़ा।
फोटोग्राफर हर पल को अपने कैमरे में कैद कर रहा था।
जैसे ही अबीर नव्या के पास पहुंचा, कमला ने नव्या का हाथ छोड़ दिया।
अबीर ने धीरे से नव्या का हाथ थामा और उसे मंच की ओर ले चला। मंच पर, अबीर ने नव्या को अपनी दाईं ओर बैठाया।
तभी नव्या की मां और अबीर के पापा अंगूठी लेकर आए।
दोनों ने एक-दूसरे को अंगूठी पहनाई, और सारा माहौल तालियों की गूंज से भर उठा।
फिर, कमला ने वरमाला की थाली दोनों के सामने रखी। अबीर और नव्या ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई, और एक बार फिर तालियां गूंज उठीं। रस्म पूरी होते ही, फोटोग्राफर ने हर एंगल से तस्वीरें लेना शुरू कर दिया। अगले एक-दो घंटे तक नाच-गाना चलता रहा। सभी ने जमकर खाना खाया, और रात का माहौल हंसी-खुशी से भर उठा।
कुछ देर बाद, सब लोग मंडप में जमा हो गए थे। अबीर और नव्या पंडित जी के ठीक सामने बैठे थे। विवाह की वेदी में अग्नि प्रज्वलित कर, पंडित जी ने शुभ मुहूर्त शुरू होने की घोषणा की और विधियां प्रारंभ हुईं। पंडित जी ने मंत्रोच्चार शुरू किया, और सभी हाथ जोड़कर ध्यानमग्न हो गए।
मंत्रोच्चार पूरा होते ही कन्यादान की रस्म शुरू हुई। नव्या के माता-पिता ने अपने हाथों में पवित्र जल, फूल और अक्षत लेकर दान को स्वीकृति दी। फिर, उन्होंने नव्या का हाथ अबीर के हाथ पर रख दिया। पंडित जी ने दोनों के ऊपर-नीचे रखे हाथों पर अक्षत, रोली और नारियल रखा, और दोनों से अपने भावी जीवन के लिए प्रार्थना करने को कहा। दोनों ने मन ही मन प्रार्थना की।
पंडित जी के निर्देशानुसार, नव्या के पिता ने अबीर के गले में गुलाबी साफा डाला। वहीं, नव्या की मां ने साफे का एक छोर नव्या के दुपट्टे से बांध दिया। दोनों ने एक-दूसरे को हल्की मुस्कान के साथ देखा। अब, वे सात जन्मों के अटूट बंधन में बंध चुके थे। जैसे-जैसे रस्में पूरी होती गईं, रात सुबह की ओर बढ़ चली। कुछ अन्य विधियों के बाद, आखिर वह घड़ी भी आ गई जब पंडित जी ने कहा— "वर और वधू फेरों के लिए खड़े हो जाएं।"
नव्या और अबीर उठ खड़े हुए। तभी, अचानक नव्या का पैर उसके लहंगे में उलझ गया। वह गिरने ही वाली थी कि अबीर ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया और धीरे से कहा, "ध्यान से... अभी गिर जातीं न!"
नव्या हल्के से मुसकुराई और धीरे से बोली, "आप हैं न?"
अबीर ने मुसकुराते हुए कहा “हां हमेशा हूं।“ उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
नव्या के मां-पापा को यह दृश्य देखकर मन ही मन अपने निर्णय और नव्या की पसंद पर गर्व हुआ।
पंडित जी ने मंत्रोच्चार करते हुए फेरे शुरू करवाए। अबीर और नव्या ने एक-दूसरे का हाथ थामे, वेदी की पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लिए। हर फेरे के साथ, दोनों ने एक-दूसरे की खुशियों और जन्मों तक साथ निभाने की कामना की। फेरे पूरे होने के बाद, जो नव्या अब तक अबीर की दाईं ओर बैठी थी, अब बाईं ओर, उसके वामांग में बैठ गई।
अंततः, पंडित जी ने सिंदूर की थाली अबीर को देते हुए कहा, "कन्या की मांग भरिए।"
अबीर ने कांपते हाथों से चुटकी भर सिंदूर लिया और नव्या की मांग भर दी। करीब डेढ़ साल के इंतजार और ढेरों मुश्किलों के बाद, आखिरकार आज उनका सपना पूरा हो गया था।
भावनाओं के वेग में अबीर की आंखें नम हो आईं। उसका हाथ हल्का कांपा, जिससे सिंदूर उसकी नाक पर भी लग गया। नव्या सिर झुकाए बैठी थी, मगर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान बिखर गई। आखिर वह भी कुछ ऐसी ही मनःस्थिति में थी।
पंडित जी ने मंगलसूत्र उठाकर अबीर को नव्या के गले में पहनाने का संकेत दिया। अबीर ने श्रद्धा और प्रेम से मंगलसूत्र नव्या के गले में डाल दिया। नव्या की पलकें झुकी थीं, लेकिन उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
आखिर में, पंडित जी ने घोषणा की—
"विवाह संपन्न हुआ! आप दोनों आज से पति-पत्नी हुए। अब अपने बड़ों का आशीर्वाद लें।"
सभी ने तालियां बजाईं, माहौल में खुशी और उल्लास घुल गया। विवाह की रस्में संपन्न होते-होते सुबह की लालिमा आसमान पर बिखरने लगी थी। हल्की ठंडी हवा चल रही थी, मानो प्रकृति भी इस पवित्र बंधन की साक्षी बनकर उन्हें आशीर्वाद दे रही हो। अबीर और नव्या ने अपने माता-पिता, और परिवार के अन्य बड़ों के चरण स्पर्श किए। सभी ने उन्हें ढेरों आशीर्वाद और सुखद दांपत्य जीवन की शुभकामनाएं दीं।
अब, वे केवल दो लोग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के जीवनसाथी बन चुके थे—सात जन्मों के लिए।
भाग – चौबीस
विदाई- 23 दिसंबर
विवाह की सभी रस्में पूरी हो चुकी थीं। अब विदाई का समय आ गया था। अबीर और नव्या एक कमरे में अपने रिश्तेदारों से घिरे बैठे थे। नव्या की बहनें अबीर को छेड़ते हुए हंस रही थीं, और अबीर बस मुस्कुरा कर रह जाता। उसकी जगह राघव उन लड़कियों के साथ हंसी-मज़ाक कर रहा था।
तभी, घड़ी ने आठ बजाए और गिरीश साहब कमरे में आए। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, "विदाई का समय हो गया है, दोनों को बाहर ले आओ।"
मां ने सिर हिलाया और गिरीश साहब बाहर चले गए। अगले ही पल, मां अबीर और नव्या को लेकर बाहर बगीचे में आ गईं, जहां पहले से ही सभी जमा थे।
कमला हाथों में खील से भरी थाली लिए खड़ी थी। वह नव्या के पास आई और प्यार से समझाने लगी, "इस थाली से पाँच बार खील दोनों हथेलियों में भरकर दरवाज़े तक चलते हुए पीछे की ओर उछालना है। और मन में मायके के सुख और ससुराल की खुशहाली की प्रार्थना करनी है।"
नव्या ने सहमति में सिर हिलाया और अपनी हथेलियां जोड़ लीं। कमला ने उसकी हथेलियों में खील भर दी और इशारा किया। अबीर और नव्या आगे बढ़े और बाकी सब उनके पीछे-पीछे। नव्या ने हाथ उठाकर खील को हवा में उछाल दिया, जो बगीचे में चारों ओर बिखर गई। दरवाज़े तक पहुंचते हुए उसने यह विधि पूरी की।
अब सब बड़े दरवाज़े के पास रुक गए। नव्या की आंखों में आंसू छलकने को थे। आज वह इस दहलीज़ से आखिरी बार एक बेटी की तरह बाहर जा रही थी।
उसका मन नहीं माना, वह पलटी। मां और पापा पीछे खड़े थे। उनकी आंखें नम थीं, लेकिन वे खुद को किसी तरह रोक रहे थे। आखिरकार, मां आगे बढ़ीं और नव्या को सीने से लगा लिया। जैसे ही मां का स्नेही स्पर्श मिला, नव्या खुद को रोक नहीं पाई—वह जोर-जोर से रो पड़ी। मां की भी सिसकियां निकल आईं। पापा ने खुद को संभाला और नव्या का सिर सहलाते हुए उसके आंसू पोंछ दिए। फिर उन्होंने उसका माथा चूम लिया। एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे पूरा समय वहीं ठहर गया हो—मां, पापा और नव्या, तीनों एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे थे।
अबीर चुपचाप खड़ा यह दृश्य देख रहा था। वह उन तीनों की वेदना को समझ रहा था। उसने धीरे-धीरे आगे बढ़कर एक-एक कर तीनों को संभाला। कुछ देर बाद, नव्या ने खुद को थोड़ा संभाला तो उसकी नज़र कमला पर पड़ी, जो बिना आवाज़ किए रो रही थी। कमला ने आगे बढ़कर नव्या को गले से लगा लिया। फिर उसके आंसू पोंछते हुए मुसकुराकर कहा—
"अब मत रो। आखिर तुम्हारे प्यार की जीत हुई है। अब तो खुश हो जाओ।"
फिर उसने अबीर को इशारा किया कि वह नव्या को संभाले, और खुद घर के अंदर चली गई।
गिरीश साहब ने आगे बढ़कर अबीर और नव्या का हाथ थामा और उन्हें दरवाज़े तक ले आए, जहां गाड़ी खड़ी थी। अबीर के पिता ने गिरीश साहब के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा—
"बेटी की चिंता मत कीजिए। अब वह सिर्फ आपकी नहीं, मेरी भी बेटी है।"
गिरीश साहब की आंखें भर आईं, लेकिन उन्होंने सिर हिलाकर खुद को संभाला। नव्या ने एक आखिरी बार अपने मायके को देखा और भारी कदमों से गाड़ी में बैठ गई।
गिरीश साहब मुसकुराकर आगे बढ़े, हाथ जोड़कर बोले,
"नव्या अभी नादान है। हो सकता है कि आपके परिवार में ढलने में उसे थोड़ा समय लगे। अगर उससे कोई गलती हो जाए, तो उसे माफ़ कर दीजिएगा।"
अबीर के पापा ने गिरीश साहब को गले लगा लिया, और उनके कंधे पर स्नेह से हाथ रखते हुए बोले,
"चिंता मत कीजिए। अब वह सिर्फ आपकी बेटी नहीं, हमारी भी बेटी है।"
राघव गाड़ी में बैठ चुका था। उसने शीशे से झांककर कहा, "तो... चले?"
अबीर ने पीछे वाला दरवाज़ा खोला और नव्या को अंदर बैठा दिया। वह खुद भी बैठने ही वाला था कि राघव ने हंसते हुए टोका, "भाई! जूते कहां हैं?"
अबीर चौंक गया। उसे खुद भी याद नहीं था कि उसने जूते कहां उतारे थे।
तभी, एक चिर परिचित चंचल आवाज़ गूंजी—"जूते यहां हैं, राघव जी!"
सबका ध्यान आवाज़ की ओर गया। कमला एक हाथ से अपना लहंगा संभालते हुए, दूसरे हाथ में अबीर के काले जूते लिए चली आ रही थी।
राघव झट से गाड़ी से उतर आया और मुसकुराकर बोला, "अच्छा आपके पास थे, रख दीजिए!"
कमला ने शरारती अंदाज़ में आंखें मटकाते हुए जवाब दिया, "ऐसे कैसे रख दूं?"
अबीर मुसकुराया। उसे याद आया कि जब वह मंडप में बैठा था, तब कमला भी वहीं थी। शायद जब विवाह की रस्में चल रही थीं, तभी कमला ने उसके जूते उठा लिए थे।
अबीर उसके पास आया और हाथ जोड़कर विनम्रता से बोला, "कमला जी, दे दीजिए न! पहले ही देर हो रही है।"
कमला ने शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा “ऐसे कैसे रख दूँ?” अब तो तय था कि बिना नेग लिए वह जूते वापस नहीं करेगी।
अबीर ने हंसकर पूछा "अच्छा, जूतों के बदले में क्या चाहिए?"
कमला मुसकुराई और बोली "हम सब सालियों का नेग नहीं देंगे आप?"
अबीर ने शेरवानी की जेब टटोलते हुए कहा "कितना चाहिए?"
कमला के पीछे खड़ी लड़कियों ने एक साथ कहा "पूरे पच्चीस हज़ार!"
अबीर ने मुसकुराते हुए कहा "अभी तो बस 15 ही मिल सकते हैं।"
कमला ने अबीर की नाक खींचते हुए कहा "ठीक है।"
राघव ने कुछ सोचकर कहा हंसते हुए कहा "एक काम करें? मैं आपको पचास हज़ार दूंगा, पर आप मेरे साथ चलिए।"
कमला ने हंसकर कहा "ना। बिल्कुल नहीं।"
अबीर ने आगे नोटों की गड्डी कमला की ओर बढ़ा दी। कमला ने मुसकुराकर जूते नीचे रख दिए। वह अबीर के पैर छूने ही वाली थी कि अबीर ने उसे रोकते हुए कहा "नहीं। आप मेरे पैर नहीं छू सकतीं।"
कमला को एक पल में याद आ गया कि वह नव्या की खास दोस्त है, पर अबीर को तो कुछ नहीं पता। उसके लिए तो वह नौकरानी है। अचानक ही उसके चेहरे पर दुख उभर आया। उसने हाथ जोड़कर अबीर से माफ़ी मांगना चाहा।
अबीर पहले से सब जानता था। उसने कमला का हाथ पकड़कर कहा "दीदी, आप माफ़ी मत मांगिए।"
कमला की आंखों में आंसू उमड़ आए। वह मुसकुराकर बोली "आपने मुझे दीदी कहकर बहुत बड़ा सम्मान दिया है।"
अबीर ने झुककर कमला के पैर छुए, जिस पर कमला चौंकी। अबीर मुस्कुरा दिया और कहा - "आप नव्या की खास दोस्त हैं, जिनको नव्या बहन का दर्जा देती हैं। मेरी कोई बहन नहीं है, दीदी। आप बड़ी हैं, आशीर्वाद दीजिए।"
कमला ने अबीर के सिर पर हाथ रख दिया। अबीर पलटकर गाड़ी में बैठ गया। नव्या के पापा और उसके भाइयों ने कार को धक्का लगाया। कार चली और धूल उड़ाती आंखों से ओझल हो गई। उसके पीछे-पीछे वे सारी गाड़ियां थीं, जिनमें बाराती आए थे, और वे भी निकल गईं।
नव्या के घर में अब गहरी शांति पसर गई थी। चारों ओर लोग ही लोग थे—कुछ वापसी के लिए सामान बांध रहे थे, तो कुछ गिरीश साहब और उनकी पत्नी को संभाल रहे थे।
बेटियों की विदाई घर का संगीत, सुख और खुशी सब छीन लेती है। कुछ यही स्थिति थी।
दूसरी तरफ, कार प्रताप नगर की सड़कें नापते हुए अबीर के घर की ओर चल रही थी। राघव आगे बैठा कोई गीत गुनगुनाते हुए गाड़ी चला रहा था। पीछे नव्या एकटक खिड़की के बाहर देख रही थी, और अबीर उसे। सारे रास्ते सब चुप रहे।
दो घंटे बाद गाड़ी घर के बाहर रुकी। आसपास की सब औरतें और लड़कियां कौतूहल से कार में बैठी नव्या को देख रही थीं। राघव और अबीर कार से उतर गए। सामने चौखट पर मां और दादी आरती की थाली और चावल से भरा कलश लिए खड़ी थीं। अबीर ने आगे बढ़कर कार का दरवाज़ा खोला और अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया। घूंघट में भी नव्या मुस्कुरा दी और अबीर का हाथ थामकर उतर गई। अब दोनों चौखट के बाहर खड़े थे और बाकी सब लोग उन्हें घेरकर खड़े थे।
मां ने नव्या का घूंघट उठाकर दुपट्टा उसके सिर पर रखा। दादी ने नव्या के कान के पीछे काला टीका लगाया। मां ने दोनों की आरती उतारी और कलश नीचे रख दिया।
भाभी आगे आईं और बोलीं - "देवरानी जी, इस कलश को अपने दाएं पैर से मारकर घर के अंदर गिराइए और अंदर आइए।"
तभी वर्मा साहब ने कहा "रुको बच्चों।"
सब चौंक गए और चारों ओर सन्नाटा छा गया। वे आगे आए और नव्या के सामने खड़े हो गए। नव्या ने संकोच से सिर झुका लिया। वर्मा साहब ने नोटों की एक गड्डी उसके सिर के इर्द-गिर्द घुमाई। नव्या ने धीरे से सिर उठाया तो सामने अबीर के पापा को मुसकुराते पाया।
वर्मा साहब ने वही प्रक्रिया पाँच बार दोहराई और बोले "आज मेरे घर लक्ष्मी आई है, उसका स्वागत करना था, इसीलिए रुकने के लिए कहा था। अब अंदर आओ, आज से यह घर तुम्हारा है।"
सब लोग मुसकुराते हुए तालियाँ बजाने लगे।
भाभी के इशारे पर नव्या ने कलश गिराया और दोनों एक साथ घर के अंदर आ गए। आगे एक बड़ी परात में आलता रखा था। माँ ने उसे परात में दोनों पैर रखने के लिए कहा। नव्या ने ठीक वैसा ही किया। अबीर भी उसके साथ चल रहा था। माँ मंदिर की ओर बढ़ चलीं और नव्या और अबीर को आने का इशारा किया। आलता में सने पैरों से अपने निशान बनाती नव्या अबीर के साथ मंदिर के पास पहुँच गई। माँ ने दोनों का तिलक किया। कुछ और विधियाँ संपन्न हुईं।
आखिर में नव्या और अबीर को दो अलग-अलग कमरों में बैठाया गया। दोनों अपने को सँभाले हुए, सोच में डूबे रहे।
भाग – पच्चीस
पहली रात
दोपहर में सबने खाना खाया। शाम तक सब महिलाओं ने मिलकर अबीर के कमरे को फूलों और लड़ीयों से सजाया। देर शाम, अबीर की भाभी ने नव्या को उसकी पहली रात के लिए तैयार कर दिया। वह लगातार नव्या को छेड़ रही थी। वह हँसकर बोली "देखो नव्या! पति को अपने बस में रखना चाहिए, वरना यहाँ-वहाँ फिरते हैं।"
नव्या ने बहुत विश्वास से कहा "भाभी, औरों का तो पता नहीं, पर अबीर ऐसे नहीं हैं।"
भाभी मुसकुराई "वाह इतना विश्वास! पर कुछ समय बाद ऐसा हो सकता है।"
नव्या ने मुस्कान का जवाब मुसकुराकर दिया "भाभी, मैं अबीर को कोई कारण ही नहीं दूँगी कि वे यहाँ-वहाँ फिरें।"
तभी कमरे का दरवाज़ा खुला, और एक लड़की अंदर आते हुए बोली "नव्या भाभी तो भैया को अपने आँचल से बाँधकर रखेंगी।" नव्या का चेहरा लाज से गुलाबी हो उठा।
इन सब बातों के परे, दूसरे कमरे में अबीर भी तैयार हो गया था। सफेद कुर्ता और सफेद पाजामा पहने, वह आईने के सामने अपने बाल सँवार रहा था। राघव वहीं पलंग पर बैठा अबीर को छेड़ते हुए बोला "आज तो भाई सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा।"
अबीर ने उसे घूरते हुए कहा "चुप कर।"
दोनों तरफ बातें हो रही थीं। बातों-बातों में दोनों तैयार हो गए।
आखिर में, राघव शरमाते अबीर को साथ लेकर कमरे के बाहर पहुँचा। अबीर को हल्की घबराहट होने लगी थी। चेहरा शर्म से लाल हो गया था। मन उमंगें और घबराहट दो एक ताल से चल रही थीं। राघव ने कमरे का दरवाज़ा खोला और अबीर को धक्का देकर दरवाज़ा बंद कर दिया। अबीर अब भी अंदर से तैयार नहीं था। कमरे में, पलंग पर नव्या घूँघट में चेहरा छिपाए बैठी थी। अबीर की घबराहट और शर्म पर वह मंद-मंद मुसकुराने लगी।
दरवाज़ा बंद होने पर अबीर चिल्लाया "अरे राघव?"
राघव ने हँसकर बाहर से कहा “जा नव्या से बात कर, मैं कौन-सा भागा जाता हूँ।"
अबीर हारकर पलंग के पास चला आया। उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा। नव्या भी सीने पर हाथ रखकर खुद को सँभाल रही थी। वैसे तो जाने कितनी ही बार दोनों अकेले रह चुके थे, पर आज दोनों ही उलझे हुए थे। पहली रात की उथल-पुथल अपने चरम पर थी।
आखिर में, नव्या के पास बैठते हुए अबीर ने चुप्पी तोड़ी और बोला "नव्या, आप ठीक हैं न?"
नव्या ने अपनी धड़कनें सँभालते हुए कहा "जी, और आप?"
अबीर मुसकुराया और झेंपते हुए बोला "सब ठीक है।“
नव्या धीरे से हंस पङी और बोली "अच्छा! वैसे, मैं आपके लिए एक तोहफ़ा लाई हूँ।"
अबीर ने नव्या का घूँघट उठाया और मुसकुराते हुए बोला "मेरा तोहफ़ा तो बहुत खूबसूरत है।"
नव्या के गाल गुलाबी हो उठे। उसने अपने पास रखा एक कागज़ अबीर की ओर बढ़ा दिया।
अबीर ने उत्सुकता से पूछा "ये क्या है?"
नव्या ने कहा "खोलकर देखिए।"
अबीर ने कागज़ खोला और वह चौंक गया। यह वही तस्वीर थी, जो नव्या ने बनाई थी।
अबीर ने पूछा "कब बनाया आपने ये?"
नव्या ने धीरे से कहा "यह तब बनाया था, जब मैं बस आपको दूर से ही देखती थी। बात करने की हिम्मत नहीं होती थी, पर मन चाहता था कि आपसे ढेर सारी बातें करूँ।"
अबीर ने गाते हुए कहा
"एक जैसा हाल, मेरा-तेरा।
इश्क बेमिसाल, मेरा-तेरा।"
"खैर, आगे क्या हुआ?"
नव्या ने बात जारी रखी "फिर एक दिन सोचा कि तस्वीर बनाई जाए। जब आपसे बात नहीं कर पाती थी, तो इस तस्वीर से बातें करती थी।"
अबीर मुसकुराया और बङे लाङ से नव्या का हाथ थाम कर कहा "अरे! अब तो मैं हमेशा के लिए आपका हो गया। अब आप ढेर सारी बातें कीजिएगा।"
नव्या मुसकुराई और अबीर के करीब सरक आई।
अबीर मन ही मन सोच रहा था, "आज पहली ही रात है, मुझे खुद को संभालना होगा ताकि नव्या असहज न हों।" वह बहुत देर तक उस तस्वीर को देखता रहा और कुछ देर बाद बोला, "वाह! बहुत अच्छी तस्वीर बनाई है। अब मेरी बारी है!"
अचानक ही नव्या ने अबीर के चेहरे को हथेली में भर लिया और उसकी बात उसी पर पलटते हुए कहा "मेरा तोहफ़ा तो बहुत खूबसूरत है, बहुत प्यारा सा।"
अबीर खिलखिलाकर हँस दिया, नव्या भी उसके साथ हँस पड़ी। अबीर ने अपनी जेब में रखा डिब्बा नव्या को दे दिया। नव्या ने चहकते हुए पूछा "क्या है इसमें?"
अबीर ने धीरे से कहा "खोलकर देखिए न।"
नव्या ने डिब्बा खोला, जिसमें एक मोतियों वाली करधनी थी। वह करधनी को उलट-पलटकर देखने लगी। अबीर ने किसी अपराधी की तरह सिर झुका लिया कहा "नव्या, मैं चाँदी की करधनी खरीदना चाहता था, पर पैसे ही नहीं बचे। और मुझे लड़कियों के साज-श्रृंगार की कोई विशेष समझ नहीं है।"
नव्या ने करधनी को आँखों से लगाकर चूम लिया और अबीर के कंधे पर सिर रखते हुए बोली "कोई बात नहीं। ये आपका प्यार है और प्यार जिसमें बसे वो तो अनमोल होता है।"
अबीर ने असमंजस में पूछा "आपको पसंद आई?"
नव्या ने अबीर को गले लगा लिया और बोली, "हाँ, बहुत पसंद आई।" अबीर ने उसे बांहों में समेट लिया। दोनों अलग हुए तो एक साथ उनकी आँखें खिड़की के बाहर चमकते चाँद पर टिक गईं, जो अपनी पूरी सुंदरता से धरती को रोशन कर रहा था। रात धीरे-धीरे गहराने लगी।
नव्या ने धीरे से कहा, "पता है, हर पूर्णिमा को मैं देर रात तक चाँद को देखती रहती हूँ। जब आप ज़िंदगी में आए, तब से चाँद को नहीं देखा।"
अबीर के चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान आई। उसने कहा, "कोई बात नहीं, आज से हर पूर्णिमा की रात हम दोनों साथ में चाँद देखेंगे।"
यह कहकर वह उठा और कमरे में रखी दो कुर्सियाँ खिड़की के पास रख दीं। फिर नव्या के पास आया और बोला, "आप कपड़े बदल लीजिए।"
नव्या ने उठते हुए बाथरूम का रास्ता पूछा और अपने सामान में से हल्की कुर्ती-पायजामा निकालकर कमरे से चली गई। उतने में अबीर ने रात को खूबसूरत बनाने की तरकीब सोच ली। करीब दस मिनट बाद, जब वह लौटी, तो अबीर ने कमरे की सारी बत्तियाँ बुझा दी थीं और खिड़की के पास खड़ा था। अबीर उसके पास आया, उसका हाथ थामा और खिड़की के पास ले जाकर कुर्सी पर बैठा दिया। फिर वह खुद भी उसके पास बैठ गया। नव्या ने देखा कि अबीर के हाथों में खाने की थाली थी। अबीर ने उसे एक निवाला खिलाया, और फिर खाने-खिलाने का क्रम दोनों ओर से चल पड़ा।
इसके बाद, दोनों वहीं खिड़की के पास ही बैठे एक-दूसरे से बातें करते हुए एक-दूसरे में खो गए।
आखिरकार, नव्या और अबीर का प्रेम हर सीमा को लाँघकर, हर बंधन तोड़ते हुए अपनी मंज़िल तक पहुँच गया था।
भाग – छब्बीस
उपसंहार
उस रात के बाद दोनों की ज़िंदगी में बहुत बड़ा बदलाव आया। नव्या को उस वातावरण में ढलने में थोड़ा समय लगा, लेकिन उसकी लगातार कोशिशें कारगर साबित हुईं। अबीर के परिवार ने उसे इस तरह अपना लिया जैसे वह हमेशा से उसी परिवार का हिस्सा थी। अब नव्या, अबीर और राघव साथ ही दफ़्तर जाते, पहले की तरह साथ ही खाना खाते। माँ सुबह का सारा काम निपटातीं, और शाम को नव्या और अबीर लौटकर मिलकर खाना बनाते और बाकी काम करते। अबीर कभी-कभी नव्या को उसके घर भी ले जाता।
धीरे-धीरे नव्या अपने नए परिवार में घुल-मिल गई, जिसमें अबीर ने उसका पूरा साथ दिया। वह न सिर्फ़ एक अच्छा दोस्त, प्रेमी और बेटा था, बल्कि एक अच्छा पति भी सिद्ध हुआ। उसने नव्या की हर कमी, शौक और बात को स्वीकार किया। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि नव्या ने अपनी पुरानी ज़िंदगी से नई ज़िंदगी तक का सफर तय कर लिया था, जिसमें उसका प्यार, अबीर, हमेशा उसके साथ था।

