डॉ प्राची खरे

Inspirational


3.9  

डॉ प्राची खरे

Inspirational


''बहुत खुश हूँ"

''बहुत खुश हूँ"

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अठारह से बीस वर्ष की काम वाली बाई पिंकी आज मेरे घर पर पैर रखते ही रोने लगी। सिसकियाँ भरने लगीI अपनी नियमित दिनचर्या के अनुसार सौम्या बगिया से फूल, दूब तोड़कर पलटी ही थी कि विराट अखबार से नजर हटाकर सौम्या को देखे जा रहे थे। पिंकी बर्तन मांजने बैठी भावना, वेदना, सवेदनाएँ, गर्म अश्रु धारा के साथ घुटनों पर टपक रही थी "पिंकी चाय पियोगी, क्यों रो रही ?"

पिंकी उठी और बोली "मैडम आपका कहना मानती तो आज न रोती। खुद ऑटो चलाता है दिनभर घर नहीं आता, अपने भाई माँ बाप के भरोसे छोड़ रखा। आठ घर का करती हूँ फिर घर का सारा काम मुझे ही करना पड़ता है सब बैठे रहते है, रिश्तेदारों को बैठाए  रहते है, जब घर जाती हूँ भीड़ मिलती है कोई बंदा स्वयँ  पति तक किसी को मेरी चिंता नहीं सबको समय पर नाश्ता खाना  व्यंजन बस। सारे लोग दिन में बातें करते हैं, आलसी कहीं के।कमरे में आता है कुछ नहीं पूछता। फँस  गई पढाई छूटी खुद तो न पढ़ता है न आगे बढ़ता है जीवन थम सा गया। आज तो हद हो गई घर पर सब मुझे ताने मार रहे है पिता के मरने के बाद शादी की कमियां बता रहे I अमावस की रात उस पर ग्रहण लग गया I कहाँ जाऊँ क्या करूँ।"

 विराट चुपचाप स्त्री  वार्तालाप श्रवण कर रहे थे। विराट सिर्फ सौम्या का चेहरा पढ़ रहे। ओजस्वनी,तेजस्वनी, वर्चस्वनी अक्षरा, रूप लावण्य से अलंकृत सौम्या अपने स्वप्न लोक में पहुंच चुकी थी। सौम्या एवं पिंकी बातों बातों में एकाकार हो गई थीं।

विराट के साथ सौम्या का मिलन बीस साल पुराना था I सौम्या का ससुराल आधुनिकता का नकाब ओढ़े था। यथार्थ कुछ और था। सोच का विस्तृत दायरा रखने वाली सौम्या के सपने यथार्थ के कठोर धरातल पर रोज दम तोड़ रहे थे। समाज की निगाह में पति बेहद सरल। तस्वीर के दो रूप I पत्नी के पूंछने पर तुम जानो, जैसा ठीक लगे, जो चाहती हो करो बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी हो, सम झ दार हो I सौम्या दो राहों पर खड़ी  थी I अपने  अस्तित्व की तलाश में खंड खंड बिखर रही थी I अकेलापन उस पर हावी हो चला था। बच्चों में अपने सपने खोजती, एकाकीपन के साथ ममत्व निजी जीवन में अंतर्मुखी बना रहा था कहीं खोई सी अपने मानस पटल पर बीते एक एक दिन को समेट रही थी व् चार चार बार सरकारी नौकरी मिलने पर विराट के शब्द तुम्हें बहुत समझ है, मैं क्या जानूं जैसे वक्तव्य उसे समुद्र की लहरों की भॉँति पीछे धकेल देते थे। पिंकी ने समझदार नारीदेह  को हिलाकर रख दिया समझदारी के दामन ने तो सौम्या को पाषाण प्रतिमा बना दिया था।

पिंकी का काम पूरा हो चला था I विराट से बोली "साहब मुझे किसी स्कूल में आया की नौकरी दिला दो। अब मैं थकने लगी हूँ ।" विराट बोले "बेटा कोशिश करूंगा।" विराट का हृदय बच्ची पर पिघल पड़ा। पिंकी का बचपना इसी घर में काम करते बीता था। वे पिंकी से बोले अपने अस्तित्व की तलाश करो। तुम अभी विवश नहीं हो। अपने कर्तव्यों का निर्वाह करो। मेरी नौकरी। ........ कहती पिंकी चली गई।

सौम्या सोचने लगी वाह! विराट साहब कुछ तो समझ आई आज लगा कि वाकई आप समझदार हो गए हैं। विराट सौम्या से कहने लगे "अपनी प्रतिभा और क्षमता का जब शोषण होता है तब स्त्री सिसकती रह जाती है। उसके स्वप्न गर्म धारा बनकर तकिए में समां जाते हैं। उसके चेहरे पर विद्रोहिणी छवि आ जाती है। वह अपने बच्चों में स्वर्णिम भविष्य को तलाशते हुए कुंठित हो जाती है।" सौम्या बदलते स्वर सुनकर आकण्ठ निमग्न थी। आज उसे भान हुआ कि विराट अनवरत अध्ययन करते रहे। बेटी समान पिंकी की हालत पर स्वर बदल गया विराट सौम्या को आलिंगनबद्ध कर नए आसमान की ओर बढ़कर गले लगा रहे थे। अपनी गलतियों को याद कर सौम्या को समझदार न कह कर निनिर्मेष दृष्टि से देख रहे थे सौम्या बोली आज अच्छा लगा। बहुत खुश हूँ। आपने मेरी पीड़ा को समझा I बोझ था अपनों में अपने के साथ भी अकेली थी पर आज से नहीं सच। ...... अब मैं बहुत खुश हूँ।


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