Poonam Singh

Inspirational


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Poonam Singh

Inspirational


" बागवां

" बागवां

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"तरुण ! इस बार भी तुम्हारी फूलों की खेती हर साल की तरह खूब रंग लाई है। "

"हम्म..... ये सब तुम्हारी मेहनत और हाथों का जादू है दीदी ! पर अब आगे ना जाने .. इतनी अच्छी फसल हो भी कि नहीं।" तरुण ने उदासी भरी आवाज़ में कहा।

"क्यों नहीं होगी ? नया मैनेजर भी अच्छा है। उसकी देखरेख में सब मजदूर मन लगाकर काम कर रहे हैं। मैंने देख, परख लिया है।" अपर्णा ने भाई की तरफ मुखातिब होते हुए कहा।


 "एक बार और अच्छे से सोच लो दीदी ! कितने वर्षों से इस काम को तुम ही संभाल रही हो और इसमें निपुण भी हो चुकी हो। साथ ही आमदनी भी तुम्हें अच्छी हो जाती है। दूसरे नये काम को जमने में न जाने कितना वक्त लगे, कब तक तरक्की हो, क्या पता? इसलिए हर पहलू पर सोच समझकर ही कदम उठाना।" तरुण ने अपनी बात रखते हुए कहा। 

अपर्णा पिछले कई वर्षों से अपने भाई के फूलों के व्यापार में हाथ बंटाती आ रही थी। कई एकड़ में फैले हुए फूलों के बग़ीचे की एक एक क्यारी में उसके हाथों का स्पर्श महसूस होता था। ऐसा प्रतीत होता था कि वहाँ की मिट्टी उसके हाथों के स्पर्श मात्र से खिल उठती है और बेजान मिट्टी में उर्वरा शक्ति उत्पन्न हो जाती है। 


पैसे तो दोनों भाई बहन के बीच महज एक औपचारिकता थी। तरुण का एक ही उद्देश्य था कि अपर्णा का अपने काम के प्रति मनोबल को बढ़ाना और साथ ही उसे आर्थिक रूप से मजबूत भी करना ताकि निकट भविष्य में किसी भी तरह की अनहोनी के दौरान वह मजबूती से खड़ी हो सके। कभी किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। 

अपर्णा को भी मेहनताना लेना पसंद नहीं था। किन्तु आगामी भविष्य के लिए उसने अपनी आँखों में जो सपने संजो रखे थे उसे पूरा करने में ये आमदनी ही सहायक बनती । इसलिए उसने भाई को इसके लिए स्वीकृति दे दी थी। 

भाई और फूलों की बगिया को इस तरह छोड़ कर जाना उसके मन को बहुत अखर रहा था । गर्मी की ताप और सर्दी की ठंड इन सबसे बचाते हुए वर्षों बीत गए थे और ये उसके हर सुख - दुःख के साथी भी रहे थे। ऐसे में अपर्णा के बिछोह के दर्द को समझा जा सकता था । किंतु समय पखेरू की तरह ना उड़ जाए इससे पहले वो उसे पकड़ अपने सपने को पूरा कर लेना चाहती थी।

यही सोचकर आज उसने खुरपी छोड़कर हाथ में कलम उठा लिया और अपने गांव की पगडंडी से उस राह पर निकल पड़ी थी जहां उसे अपने सपनों को साकार करने की रोशनी की किरण नजर आ रही थी। बांसों से छनती हुई तेज दिवाकर की रोशनी भी आज उसे शीतलता प्रदान कर रही थी। वहाँ से आगे बढ़ती हुई सरसों के फूलों की खेती को पार करती झील के किनारे अपनी पसंदीदा स्थान पर पहुँच गई जहाँ प्रकृति की गोद में उसे असीम शांति और सुख की अनुभूति होती थी।

 बचपन में ही माँ-बाप का साया सिर से उठ जाने के कारण घर की सारी जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ पड़ी थी। उस वक़्त अपर्णा महज अठारह वर्ष की थी और बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। चार भाई बहनों में वो सबसे बड़ी थी। घर की जिम्मेदारी में पढ़ाई को बीच में ही स्थगित करना पड़ा और एक माँ की भाँति उसने अपने सभी भाई बहनों की देखभाल की। उसने अपने फसल वाली खेतों में फूल उगाने का साझा व्यापार शुरू किया, ताकि मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बनी रहे और आमदनी भी होती रहे। अपने ही गाँव से सटे शहर में फूलों की अच्छी खपत से सुनिश्चित आमदनी की भी उम्मीद थी। अपर्णा को बचपन से ही फूलों से लगाव भी बहुत था।


साझा व्यापार में आमदनी उतनी नहीं थी फिर भी संतोष जनक था। इतना कि कम से कम भाई बहन की पढ़ाई लिखाई ना रुके। अपर्णा से ही छोटा भाई तरुण भी अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके साथ ही काम में जुड़ गया और अपनी मेहनत और लगन से साझा व्यापार एकल कर लिया। धीरे धीरे इसमें उन्हें सफलता मिलती गई । तरुण और बाकी के दो छोटी बहनों की भी तालीम पूरी होने के पश्चात समय आने पर सबका शादी ब्याह भी करवाया।


 अपर्णा इस बात से भली भांति वाकिफ थी कि भले ही वो सारा काम संभाल रही थी पर मालिकाना हक सिर्फ उसके भाई का ही था। इसलिए तरुण बदले में उसे जो भी देता उसे चुप चाप रख लेती। 

 इन्हीं जिम्मेदारियों के तहत अपनी पढ़ाई पूरी ना कर पाने का अफसोस हमेशा ही रहा। ..दूसरा उसका प्यार भी ,जो कि इन्हीं जिम्मेदारीयों के तले कहीं दब कर दम तोड़ चुका था। उसी प्रेम की शक्ति के बल पर आज वो अपने उस सपने को पूरा करने निकली थी जो उसने बचपन से ही अपनी आँखों में संजो रखे थे।

... सांझ की सिंदूरी बेला, ऊपर आसमान में उड़ते पंछी.. अपने नीड़ में वापसी के लिए पंख फैलाए चले जा रहे थे। ..काश कि अपर्णा का भी अपना कोई नीड़ होता ! यह सोचकर उसकी आंखे नम हो गई। ..अपने जीवन में एक घर परिवार की तलाश तो हर किसी को रहती है जिसके साथ वह अपना सुख दुख बाँट सके, अपने मन की कह सके। किंतु समय की कसौटी पर वह अपने उस प्रेम की अनुभूति से वंचित रह गई थी। ..प्रेम ना सही पर अपनी वो दूसरी ख्वाहिश तो पूरी कर ही सकती है। उसी एक कतरा रोशनी की तलाश में डूबते हुए सूरज में नये सहर की तलाश पर निकली थी वो और मन ही मन बुदबुदा रही थी, ' हे सूर्य देव ! हे माँ प्रकृति ! मैं तो तुम्हारी ही गोद में पली-बढ़ी हूँ ! मेरी सारी शिक्षा तो तुम से ही प्राप्त हुई है। आज आप मुझे आशीर्वाद दो कि जिस रोशनी की तलाश में निकली हूँ उसमें सफलता मिले। अपनी शिक्षा के अधूरे सपने को मैं एक विद्यालय निर्माण में परिवर्तित करना चाहती हूँ।'


 अपर्णा ने फूलों के बिजनेस में अच्छा पैसा इकट्ठा कर लिया था। शेष उसे अपने राज्य सरकार से मदद की पूरी उम्मीद थी। आज प्रकृति की मनोरम गोद में अपने इस नए कदम के लिए आशीर्वाद और साक्ष्य बनाने आईं थी।


अपर्णा आज जल्दी उठ गई और घर का काम संपन्न कर आँखों में आशा की किरण लिए अपने ही गाँव के मुखिया से मिलने निकल पड़ी। 

"आपका ख्याल तो बहुत अच्छा है अपर्णा जी, पर आ.. आप ...!" मुखिया ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा.. । अपर्णा समझ गई कि मुखिया क्या कहना चाहते हैं । उसने बीच में ही टोकते हुए कहा , "मैं आपकी दुविधा समझ रही हूँ, पर आप मुझ पर विश्वास रखें । आप बस मुझे विद्यालय के लिए गाँव के बीच थोड़ी ज़मीन दिलवा दीजिए। कुछ पेशगी तो मैं आपको पहले ही दे दूंगी बाकी मैं मैं धीरे - धीरे चुका दूँगी। आप तो मुझे कई वर्षों से जानते हैं मेरे हाथों पर भी थोड़ा भरोसा रखिए। " 


"मैं आपके जज्बे को समझ रहा हूँ अपर्णा जी और मुझे आपकी काबिलियत पर भी भरोसा है। घर परिवार से लेकर फूलों की खेती को प्यार, मेहनत और लगन से सींचते हुए उनकी खुशबू को महसूस किया है और सफलता को देखा है । मुझे आपकी कुशाग्र बुद्धि और इमानदारी पर पूरा भरोसा है। ...मै कोशिश करता हूँ कि आपको एक छोटा सा ज़मीन का टुकड़ा दिलवा सकूँ ।" मुखिया ने धैर्य दिलाते हुए कहा।

कुछ समय पश्चात अपर्णा को अपने मन माफिक जगह मिल गई और उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । वो अपने सपने की पहली सोपान चढ़ चुकी थी। उसने उस जगह पर जल्दी ही पाँच कमरों का विद्यालय बनवाकर खड़ा कर लिया । यह विद्यालय था तो छोटा पर अपर्णा की अच्छी शुरुआत के लिए सही था। खपरैल छत तथा कमरों को पुताई, रंगाई करवाया और बच्चों के लिए आकर्षक बेंच और कुर्सियां लगवाई। साथ ही हर कमरे में पंखा, एक- एक अलमारी भी रखवाया। 


अपर्णा अपने सपने को सच होते हुए देखने के बहुत करीब थी। विद्यालय में बच्चों के लिए अनेक प्रकार के झूले , खेल कूद के अनेक साधन भी मुहैया करवाया। विद्यालय के चारों तरफ स्वयं अपने हाथों से फूलों की बागवानी की। आखिर में शिक्षकों की बहाली की जिम्मेदारी भी उसने स्वयं ही ले लिया। हालाँकि यह काम उसके लिए इतना आसान नहीं था, फिर भी उसने किसी और से सहायता की अपेक्षा ना करके स्वयं ही करने का सोचा। अपनी समझदारी व सूझबूझ से कुछ शिक्षकों की बहाली भी कर ली और बच्चों का विद्यालय में भी आना शुरू हो गया। सब बहुत खुश थे। 

अपर्णा स्वयं हर एक- एक कक्षा में जाकर हर एक बच्चे से मिलती और सब से बातचीत करती। इससे बच्चे उससे खूब हिल मिल गए थे और उनमें एक उत्साह बना रहता था। इन सबके बीच उसे अपने भाई तरुण की भी बहुत याद आती थी...।


 कहते हैं ना अगर काम अपने पसंद का हो तो बहुत तरक्की होती है। देखते ही देखते उसके विद्यालय की अन्य गाँवों में भी चर्चा होने लगी। धीरे धीरे बच्चों की भीड़ भी बढ़ने लगी। उसकी तरक्की देख राज्य सरकार ने अपर्णा की आर्थिक सहायता हेतु हाथ बढ़ाया । सरकार की मदद से उसका विद्यालय 5 कमरों के मकान से 30 कमरे में तब्दील हो गया । 

अपर्णा ने कभी भी अपने आपको एक प्रधानाध्यापिका या मालकिन के रूप में नहीं देखा।

वह बस यह समझती थी जिस तरह उसने अपने परिवार में भाई बहन की एक माँ बनकर सेवा की थी उसी प्रकार यह बच्चे भी उसके अपने ही हैं। 


 विनम्रता व सबके साथ सहृदयता का भाव..., यही कारण था कि अपर्णा के विद्यालय को अनेक राज्यों में ख्याति प्राप्त हुई। 

आज उसके स्कूल में सालाना जलसे का दिन और राखी भी थी। स्कूल में आमन्त्रित प्रतिनिधियों के खास देखभाल के साथ साथ उसे अपने भाई के आवभगत की तैयारी भी करनी थी । 


सारा काम संपन्न कर वह भाई की बाट जोह रही थी। बार बार उसकी नजर अपनी कलाई की घड़ी पर जाकर रुक जाती। सोचती पहले भाई को टीका व भोजन अपने हाथों से करा दूँ फिर सभा समारोह में जाऊँगी। घड़ी की सुई टिक टिक करती आगे बढ़ती जा रही थी किन्तु तरुण के आने की उम्मीद नहीं दिख रही थी। 'कहीं वो मुझसे नाराज़ तो नहीं।' समय निकलता देख उसके विचारों को भ्रम के साए ने घेरना शुरू कर दिया था। 'नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। वो जरूर आएगा। वो भली भांति जानता है कि मेरे जीवन का आधार वही तो है। हर साल समय पर पहुँच जाता था इस बार ...!' सोचती हुई अतीत के ख़यालो में पहुँच गई।


'ये दिन हम दोनों भाई बहन के लिए कितना खास है। हम दोनों दिन भर अच्छी खट्टी मीठी यादों के सुनहरे पलों को याद कर खूब हँसते खुश होते । ऐसा लगता काश कि ये पल हमेशा के लिए यहीं रुक जाता। किन्तु ऐसा होता कहाँ है ? समय बीतता और वो मुझे फिर से एक बार अकेला छोड़कर चला जाता। उससे कई दफा कहा कि 'तरुण तुम भी अपनी बगिया का काम समेटकर यहीं स्कूल को संभालने में ही हाथ बंटाते तो नेक कार्य होता।' जवाब में वह हर बार यही कहता 'मालूम नहीं क्यों... दीदी ! उन फूलों में तेरी मौजूदगी का अहसास होता है। बचपन से ही उसी मिट्टी में खेलते कूदते तेरे आँचल के साए में पला बढ़ा हूँ और इसी कड़ी को मैं तोड़ नहीं पाता । '


अचानक दरवाजे की घंटी से अपर्णा की तंद्रा भंग हुई और जाकर देखा तो सामने स्कूल में काम करने वाली सहायिका खड़ी थी ," दीदी सभी मेहमान पहुँच चुके हैं आप ही की प्रतीक्षा हो रही है । जल्दी चलिए। "


 .".. हम्म ठीक है तू चल मै भी आ रही हूँ ! "


आज शहर भर के तमाम स्कूलों के प्रतिनिधि अपर्णा के विद्यालय में आयोजित इस भव्य समारोह में उपस्थित हुए थे । अपनी गुणवत्ता व नतीजे के आधार पर कई स्कूल कलेक्टर द्वारा पुरस्कृत किये जाने थे । अपर्णा के विद्यालय को भी सर्वश्रेष्ठ नतीजे व साफ - सफाई के विशेष प्रबंधन के साथ ही अर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए अपर्णा द्वारा विशेष प्रावधान किए जाने के लिए पुरस्कृत किया जाना था। विद्यालय में हर साल होने वाले जलसे में गाँव और राज्य के मुख्य पदाधिकारी आमंत्रित होते थे। पर वह तरुण को आमंत्रित करना नहीं भूलती थी । तरुण अपनी बहन की तरक्की से बहुत खुश था और अपर्णा भी भलीभांति इस बात से परिचित थी। एक दूसरे से दूर रहकर भी उनके प्रेम की प्रगाढ़ता में कोई कमी नहीं आईं थी।


स्टेज पर उपस्थित सभी अतिथि गण अपने अपने भावों को अपर्णा के लिए प्रकट कर रहे थे कि तभी अचानक पीछे से उसके भाई ने स्टेज पर प्रवेश किया। भाई को यूँ अचानक सामने देखते ही अपर्णा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने भी अपनी बहन की मेहनत और ईमानदारी के तारीफों के पुल बाँध दिए। 

उसने वहाँ उपस्थित सभा को संबोधित करते हुए कहा , " यहाँ उपस्थित सभी गण मान्य अतिथि गण को मेरा सादर प्रणाम। आज मुझे अपनी दीदी, अपर्णा की तरक्की देखकर अपार हर्ष हो रहा है। इन्होंने अपनी लगन और ईमानदारी से एक छोटे से विद्यालय को एक बड़े विद्यालय में तब्दील कर लिया है । यहाँ की उच्चस्तरीय शिक्षा तथा सुविधा आज इस क्षेत्र में चर्चा का विषय है । मुझे आज अपनी बहन पर कितना गर्व हो रहा है मैं बता नहीं सकता। आज एक बात और कहना चाहूँगा.. मैंने अपने फूलों के व्यापार से सिर्फ पैसे बनाए और मेरी उपलब्धि सिर्फ मुझ तक ही सीमित रही। पर अपर्णा दीदी ने अपनी बगिया में फूल जैसे बच्चों के रूप में जो फूल खिलाया है वह इस देश का भविष्य हैं।" कहते हुए उसकी आँखें नम हो गई और पूरी सभा तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठी।


 तरुण ने अपर्णा को भावावेश में गले से लगा लिया और कहा ," मेरी भगवान से प्रार्थना है दीदी कि तुम खूब तरक्की करो और खुश रहो मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ। और ... आज मैं हमेशा के लिए तुम्हारे पास आ गया हूँ ..!" सुनते ही अपर्णा कुछ बोल ना सकी उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।

 "अब चलो मेरी कलाई पर राखी बाँध दो दीदी ! " तरुण ने अपनी कलाई आगे करते हुए कहा।

 " हाँ हाँ क्यों नहीं ..! " उसने मन ही मन सोचा आज सचमुच राखी पर भाई ने कितना अनमोल तोहफ़ा दिया है।

समारोह समाप्त होने के बाद दोनों भाई बहन एक दूसरे का हाथ थामे खुशी पूर्वक घर की ओर निकल पड़े।



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