Kulwant Singh Bhatia

Inspirational


3.3  

Kulwant Singh Bhatia

Inspirational


अवसर ना मिलेगा दोबारा

अवसर ना मिलेगा दोबारा

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इस सदी में पहली बार हुआ है कि लगभग पूरा विश्व आज अपने घरों में कैद है, शायद यह प्रकृति कहना चाहती है अजहुँ चेत गंवार या सन्देश देना चाहती है कि अस्तित्व में जितना प्रदुषण है पूरा मनुष्य कि ही देन है आज वायु, ध्वनि प्रदूषण लगभग नहीं केबराबर है केवल बढ़ा है तो विचारों का प्रदूषण यह समय है  प्रण करने का कि हम नकारत्मकता से सकरात्मकता कि ओर बढ़ेंगे अंग्रेजी कि कहावत है कुछ ना करने से बेहतर है कुछ करना किन्तु आचार्य रजनीश कहते हैं कुछ ना करना बेहतर है कुछ भी करने सेकुछ समय मौन बैठो अकर्ता बनो अपने साथ रहो और क्रांति घाट जाएगी, आज लगभग सभी मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे के कपाट बंद हैं शायद ईश्वर कहना चाहता हो अपने घर को ही मंदिर बना  लो  खोजो अपने बच्चों कि तुतलाहट में अपने मां बाप कि आँखोंमें झांको , अपने मुखौटे को द्वार के बाहर उतारो जैसे हो वैसे ही घर में प्रवेश करो सहज सरल बनो कुछ दिन त्याग के देखो अपने अहंकार, झूठ, लालच एवं बनावटी चरित्र को त्यागें विचारों को निर्विचार रह कर अनुभव करें अपने भीतर के शून्य को बजने दें अपनेभीतर संगीत को होने दें वर्षा आनंद कि हो जाएँ अस्तित्व के प्रति प्रेमपूर्ण और एक बार हमने पा लिया आनंद सीख लिया मौन रहना निर्विचार रहना तो धीरे धीरे यह हमारा स्वाभाव बन जायेगा और जो सुगंध हमसे उठेगी उस से हमारे आस पास कोई रूपांतरितहो सके यअवसर ना मिलेगा दोबारा हम विचार करें हम क्या उपयोग कर रहे हैं इस लॉक डाउन का क्या हमने कुछ अशुभ को छोड़ा क्या कुछ शुभ हमारे जीवन में घटा या हम यूँ ही एक वायरस से अपने शरीर को तो बचा रहे हैं किन्तु दूसरा वायरस जो लोग हमें देरहे हैं अपने विचारों से उस से अपने चित्त को ग्रसित कर रहे हैं,  कोई हमारे घर में कचरा  फेंके तो हम उस से झगड़ा कर लेते हैं पर कोई लगातर हमारे दिमाग में कचरा फेंके चला जा रहा है और हम ग्रहण किये जा रहे है बल्कि यदि किसी दिन कोई ना फेंके कचड़ातो हम बड़े विचलित हो जाते हैं और झांकते हैं यंहा वंहा कंही तो कोई हो जो हमें अपना वैचारिक कचरा दे सके भले वो मीडिया से हो या शोसल मीडिया से हम लिए चले जाते हैं

दरिया दस कहते मत चुके ओ उल्लूआ, काल सुनहरा चीन्ह यानि अरे उल्लू चूकना मत, सुनहरे समय को पहचान.

यही अवसर है समय के सदुपयोग का आओ कुछ शुभ करें कुछ सृजनात्मक करें एवं पुरे समाज को प्रेरित करें बह जाने दें तरंगे घट जाने दें क्रांति।


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