असली खसम कौन?
असली खसम कौन?
यमुना का तट आज मौन था। कान्हा की बंसी से जब नाम गूँजे—राधा, ललिता, विशाखा—तो वृंदावन की गलियों में जैसे कोहराम मच गया। यह सिर्फ बंसी की तान नहीं थी, यह एक आदेश था।
किसी ने काजल उल्टा लगाया, तो किसी ने अपनी मर्यादा की परवाह नहीं की। जो सखियाँ घर की दहलीज नहीं लाँघ सकती थीं, उन्होंने उसी तड़प में अपने प्राणों का त्याग कर दिया ताकि उनकी रूह कान्हा तक पहुँच सके।
जब वे सब यमुना तट पर पहुँचीं, तो कृष्ण वहाँ खड़े थे। मुरली किनारे रखी थी और चेहरे पर एक कठोरता थी। कान्हा ने तीखे स्वर में कहा, "तुम कुलवधू हो, तुम्हारे घर पर खसम हैं, बच्चे हैं। तुम यहाँ क्यों आई हो? तुम तो मुझे छलिया कहती हो, गैया चराने वाला ग्वाला... भला एक कुलवधू के लिए मेरा क्या काम?"
सखियाँ स्तब्ध थीं, पर उनके प्रेम का वेग इतना तीव्र था कि उन्होंने अपना सत्य रखा। उन्होंने कहा, "कान्हा! जब एक स्त्री का खसम परदेस जाता है, तो वह उसकी फोटो के सामने बैठ पूजा करती है। लेकिन जब असली खसम द्वार पर खड़ा हो, तो क्या वह फोटो पकड़े रहेगी? नहीं! वह फोटो का मोह छोड़कर अपने असली खसम को अपना लेती है।"
सखियाँ रोती हुई बोलीं, "हे कान्हा! हमारे जो सांसारिक पति हैं, वे तो केवल हमारी काया की रक्षा के लिए एक फोटो मात्र हैं। आज हमारी आत्मा का असली खसम हमारे सामने खड़ा है। हम काया के मोह में उस फोटो को क्यों पूजें? हमने अपने उन खसमों को पीछे छोड़ दिया है ताकि हम अपने रूहानी खसम को गले लगा सकें।"
कान्हा की आँखों में वह कठोरता पिघल गई। सखियों के तर्क ने यह सिद्ध कर दिया था कि वे देह के बंधन से मुक्त हो चुकी हैं। यह वह 'एक पल' था, जिसने उनके अस्तित्व और वास्तविकता की परिभाषा को ही बदल दिया था।
मेरा व्यक्तिगत अनुभव:
जब मैंने यह अद्भुत प्रसंग अपने गुरु से सुना और फिर इसे पढ़ा, तो मुझे लगा जैसे मैं कोई कहानी नहीं पढ़ रही हूँ, बल्कि मैं उस पल का हिस्सा हूँ। मुझे इस प्रसंग से एक गहरा अपनापन और जुड़ाव महसूस हुआ। पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगा जैसे मैं भी उस यमुना तट पर खड़ी हूँ, और वहाँ मेरे और मेरे कान्हा के सिवाय कोई नहीं है। यह कहानी मुझे अपनी ही प्रतीत हुई, जैसे यह केवल गोपियों की नहीं, बल्कि मेरी अपनी आत्मा की कान्हा के प्रति पुकार हो।
