अंजान दोस्त

अंजान दोस्त

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वो उसका खामोशी से कुछ भी बिन कहे चले जाना, कोई नहीं लगता था वो मेरा, शायद ही ऐसी अनसुनी ,अनकही दोस्ती अब होती हो, वो लड़कपन था या संजीदगी से निभाया रिश्ता, आज तक समझ नहीं पाए कि क्यूँ वो मेरी ज़िंदगी मे ना होकर भी अब भी दिल के पास है। उसकी सादगी और खामोशी किसी को भी अपना बना ले पर उसकी नैतिकता उसे कभी किसी के साथ ना गलत करने देती थी और ना गलत होता देख सकती थी। 

अब भी याद है उसका अपने लक्ष्य पर डटे रहना सबके लिए प्रेरणा स्रोत था। वो हर किसी के साथ था मगर किसी को अपने पास नहीं आने देता था, अपनी ही दुनिया में अकेला विचरता रहता था।

हम कभी मिले नहीं फिर भी वो मेरी हर खबर रखता था, हमारा मिलना भी बहुत प्यारा संयोग था, उसे कई बार आते जाते देखा था मगर कभी बात तो क्या एक दूसरे को देखा भी नहीं, उस दिन घर पर फोन करने के लिए टेलीफोन बूथ पर गई थी, हाँ वहीं पर मैंने उसे बूथ में आते देखा, लगा शायद उसे फोन करना है तो मैंने फोन जल्दी रख दिया और बाहर आकर बूथ वाले भैया को पैसे देने लगी, मेरे निकलते ही वो भी बाहर निकला और अपनी बुलेट पर बैठ गया, मैं जैसे ही वहां से गुजरी उसने एक छोटी सी चिट मेरी तरफ बढ़ा दी, जब तक मैं कुछ कहती या समझती वो चला गया, बस यही एक पहली और आखिरी मुलाक़ात थी हमारी, उसके जाने के बाद डरते हुए जब वो पेपर देखा तो उसमे अपना मोबाइल नंबर लिख कर दे गया था, ना नाम का पता, ना ये समझ आया कि वो चाहता क्या है। ये हमारी अनकही दोस्ती की बस एक शुरुआत थी।

याद है अब भी कैसे वो मेरे लिए हर सोमवार उसी टेलीफोन बूथ पर शिव मंदिर का प्रसाद चुपचाप रखकर चला जाता था, जहाँ से मैं उसे फोन करती थी। उस वक़्त में मोबाइल पर आउटगोइंग से कहीं ज्यादा तो इनकमिंग लगती थी, फिर भी उसने कभी मुझे जताया नहीं। वो नहीं चाहता था कि कोई मेरे बारे में कुछ गलत कहे शायद इसलिए रास्तों से गुजरते हुए नज़रे झुका लेता था। 

खुश था बहुत, होता भी क्यूँ ना, वो हरियाणा पुलिस में चयन हुआ था उसका, मैं भी खुश थी उसकी खुशी में, आखिरी बार मैंने बस यही कहा था कि शायद अगली बार एक दोस्त से नहीं एक पुलिस अधिकारी से बात होगी, वो कुछ बोला नहीं मगर फोन पर मैंने उसकी मुस्कुराहट सुनी थी।

दो दिन के लिए घर होकर वापिस आई थी, आते ही मेरे लिए लैंडलाइन पर फोन आया था, फोन वही बूथ से था जहाँ से मैं उसे बात किया करती थी, वो भैया थे जिन्होंने बस इतना कहा, कहाँ थी तुम, वो तुम्हारा अनजाना दोस्त अब नहीं रहा।

मैं स्तब्ध थी, निःशब्द थी, बस इतना कहा, आप मज़ाक ना कीजिये, मगर उनकी आवाज़ में नमी थी, क्या उनकी बात सच में सच थी। 

दो पल के लिए जैसे सब कुछ ठहर गया, फिर भी ना जाने क्यों लगा शायद ये खबर झूठी हो। मैं बिना पल गवाए बूथ पर गई, पर हिम्मत नहीं हुई उसके नंबर को डायल करूँ, फिर सोचा क्या, पता वहम हो,और ऐसा कुछ हुआ ही ना हो, काँपते हाथो से कॉल किया तब ,तीसरी घंटी पर उसके नंबर उठा, धड़कते दिल से बस यही दुआ कर रह थी कि जो सुना वो सब झूठ हो और फोन पर उसी की ही आवाज़ हो, मगर ऐसा नहीं हुआ।

 फोन उसके दोस्त ने उठाया था, हाँ वो मुझसे कभी मिला नहीं पर एक दोस्त होने के नाते वही था जो मुझे उसके अपनों में जानता था। वो रो रहा था, कुछ नहीं कहा, उसकी खामोशी ने सब कुछ कह दिया। मैं वही फोन हाथ मे लिए बैठी रही। मुझे नहीं पता कब तक हम दोनों उसके लिए रोए, कुछ देर बाद उसने ही कहा था कि घर पर कोई नहीं था जब वो अपनी तैयारियों में लगा था, उस रोज अपने कुछ कपड़े मशीन में धो रहा था और ईयरफोन पर मुझसे ही बात कर रहा था कि अचानक वो जोर से चीखा था, मैंने पूछा क्या हुआ पर शायद फोन उसके हाथ से छिटक कर दूर गिर गया था। वो मशीन में अचानक आए करंट से पूरा झुलस गया, जब तक मैं भागा उसके पास तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 

मैं अब भी नहीं यक़ीन कर पाई कि वो सच में नहीं है, 

कैसे भूला दू उस दोस्त को, जिससे मैं कभी मिली ही नहीं।


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