Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.
Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.

ANUBHAV PACHAURI

Drama


3.4  

ANUBHAV PACHAURI

Drama


अंधे बाबा

अंधे बाबा

4 mins 257 4 mins 257

सुबह ही खाना खा कर मैं बाबा के साथ गंगाजी की सैर पर निकल गया। गंगाजी के घाट का रास्ता कठिन नहीं था, सीधा था, बस सड़क के किनारे किनारे चलना था। रस्ते में एक दो नहर भी पड़ती, जिनपर पुल बने हुए थे। वो पुल भी कई जगह से टूटे हुए थे। फूटपाथ पर चलते हुए मैं उन टूटे पुलों पर वो छेद ढूंढ़ता था जिनमे से नीचे बहती नहर देख सकूँ। हाँ, डर तो लगता था मगर अगले दिन अगली बार फिरसे उन्ही छेदों की तलाश करता।

बाबा मुझे हमेशा पुल के अंदर की तरफ रखते, पुल की रेलिंग की तरफ।

रस्ते में एक बस्ती भी पड़ती थी जहाँ मेरे जैसे बच्चे, और मुझसे बड़े भी, खेलते रहते थे, नंगे। अक्सर मेरी भी इच्छा होती थी उनके साथ खेलने की। एक बार मैंने किसी से कहा भी था कि मुझे भी खेलना है इनके साथ। जवाब मिला - छी ! भंगियों के साथ नहीं खेलते !

मुझे थोड़ी फरक पड़ता है, मुझे तो बस वो खेल खेलना था जो वो लोग खेल रहे थे। उनके खेल रोज़ नये भी तो होते थे।

बस्ती में कुछ दुकानें भी थी। उनपर मछलियाँ मिलती थीं। हाँ,मछली, वही, जल की रानी, जिसका जीवन पानी होता है। मैं तो छोटी छोटी मछलियाँ बनता था अपनी कॉपी पर, मगर वहाँ तो मेरी कॉपी से भी बड़ी बड़ी मछलियाँ मिलती थीं। जब भी उन दुकानों से गुज़रते, वहाँ कुछ अजीब से खुशबू होती थी। बाद में पता चला, उसे बदबू कहते हैं।

बस्ती के बाद, नहर के पुल से पहले वहाँ दो नाव भी मिलतीं थीं। मैं रोज़ आते जाते गिनता, वहाँ दो नाव ही होती थीं। मेरी हमेशा से इच्छा थी, उनमे बैठ कर गंगाजी के उस किनारे पर जाऊँ जहाँ रात को वो आग छोड़ने वाला आदमी रहता था। पर कभी मौका नहीं मिला, ना ही उन नावों में बैठने का, ना ही उस आग छोड़ने वाले आदमी से मिलने का। वो नाव रोज़ वहीं खड़ी रहती थीं। शयद टूटी हुई थीं।

तो उस दिन जब बाबा का हाथ पकड़ कर सड़क के किनारे चलते चलते, बस्ती और नहरों को पार कर गंगाजी पहुँचे और घाट की तरफ मुड़े, तब एक बाबा मिले। वो रस्ते को लाठी से परख परख कर धीरे धीरे चल रहे थे। शयद गंगाजी नाह कर आ रहे थे, बाल अभी भी गीले थे उनके। कपडे केसरी थे, हाँ, केसरी, बिलकुल झंडे जैसे।

उन्हें देख कर बाबा ने पूछा-

"कहाँ जा रहे हो बाबा ?"

पता नहीं उन दोनों में क्या बात हुई, मगर जब हम थोड़ी देर बाद वहाँ से जाने को हुए तो वो बाबा भी हमारे साथ चलने लगे।

हम पहली बार बिना गंगाजी के दर्शन किये वापस जा रहे थे। बिना जल पिये वापस जा रहे थे।

बाबा ने उनका हाथ पकड़ लिया और मुझे बोले -

"ये अंधे हैं, इन्हे दिखाई नहीं देता।"

फिर शयद बाबा ने उन्हें मेरे बारे में बताया, तो वो अंधे बाबा ने मेरे चेहरे पर हाथ फेरा और सर पर दो बार थप-थपाया।

बाबा बोले -

बेटा संतों का आशीर्वाद सबसे अच्छा होता है। पैर छू लो इनके।

मैंने पैर छू लिए। फिरसे मेरे सर पर हाथ थप थापा कर उन्होंने कुछ आशीर्वाद दिया।

रास्ते भर वो बाबा और मेरे बाबा बातें करते रहे। धर्म, कर्म, मोह, माया, मोक्ष और ना जाने क्या क्या। समझ तो नहीं आ रहा था मुझे कुछ, पर सुनने में मज़ा आ रहा था।

आज तो वापस आते वक़्त मैं ये देखना भूल ही गया की वो दो नाव अपनी जगह पर हैं कि नहीं।

जब घर पहुँचे तो बाबा ने उन अंधे बाबा के पैर धोये और आँगन में खाट बिछा कर उन्हें बिठा दिया। फिर सुबह की बनायीं हुई वो रोटियों में से दो रोटी और सब्ज़ी ला कर उन अंधे बाबा को दे दीं। वो हमारा दोपहर का खाना भी था।

दोनों बाबा फिरसे बातें करने लगे। और मैं फिर से सुनने लगा। मैं उन अंधे बाबा के पास खड़ा था, मगर इतना भी नहीं की वो मुझे पकड़ लें। अम्मा कहती थीं कि बाबा आएगा और पकड़ कर ले जायेगा।

और फिर थोड़ी देर बाद अंदर से अम्मा भी आयीं। उन अंधे बाबा को देख कर वो कुछ चिल्लाने लगीं। बाबा ने चिल्ला कर जब कुछ कहा तब वो अंदर चली गयीं।

अब दोनों बाबा ज्ञान और अज्ञान कि बातें करने लगे।

थोड़ी देर बाद बाबा अंदर अपनी एक किताब से कुछ पैसे निकल कर लाये और मुझे बोले कि - मैं इनको चौराहे तक छोड़ कर आता हूँ, तू रुक यहीं पर।

उन अंधे बाबा का हाथ पकड़ कर जब बाबा उन्हें ले जाने लगे तो मुझे बोले-

बेटा पैर छू लो इनके। संतों की जितनी सेवा करो उतनी मेवा मिलेगी।

मैंने फिर से पैर छू लिए।


Rate this content
Log in

More hindi story from ANUBHAV PACHAURI

Similar hindi story from Drama