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Deepak Saxena

Inspirational


5.0  

Deepak Saxena

Inspirational


आत्ममंथन

आत्ममंथन

10 mins 485 10 mins 485

विद्यालय से थकी हारी लौट कर आई प्रिया ने ताला खोला और घर में प्रवेश किया। साथ में ही उसका बड़बड़ाना प्रारंभ हो गया

"चार दिन से छुट्टी लेकर बैठे हैं जनाब और मेरे आने के समय पर घर से गायब! मुझे तो समझ में ही नहीं आता यह छुट्टी ली क्यों गई है कोई कुछ बताए तब ना। मेरी बला से, मैं भी नहीं पूछूंगी।"

  फ्रिज खोल के ठंडे पानी की बोतल को सीधा मुँह में उड़ेला और वहीं सोफे पर पसर गई। कुछ पल आँखें मूँदकर जब खोलीं तो मेज पर कोई तह किया हुआ कागज दिखाई दिया। उत्सुकतावश खोला तो पैरों के नीचे से धरती खिसकती हुई सी प्रतीत हुई। यह अविनाश द्वारा लिखा गया पत्र था। 

'मेरी प्यारी प्रिया! 

    हम दोनों एक सूक्ष्म से उद्गम से फूटे हुए निश्छल झरने की तरह साथ चले थे। तब सोचा नहीं था हमारा निर्मल झरने सा पावन प्यार समय के साथ विशाल नदी में परिवर्तित हो जाएगा, जिसके हम दो किनारे बन के रह जाएँगे, जो आपस में कभी नहीं मिलते। माना कि हमारी जिंदगी में ऐसा बहुत कुछ हुआ जो नहीं होना चाहिए था, पर हम तो साथ थे ना। क्या हम मिलकर चीजों को ठीक नहीं कर सकते थे ? मैं कोई आक्षेप नहीं लगा रहा कि तुम ही गलत थीं, पर जब भी मैंने तुम्हें कुछ समझाने का या कोई बात सुलझाने का प्रयत्न किया तुमने हमेशा झिड़क दिया। तुम्हारा बार-बार दिया गया यह ताना 'इतनी परेशानी है मुझसे तो बाकी सब की तरह तुम भी छोड़ क्यों नहीं देते' मुझे भीतर तक कचोट जाता था। मैंने अपना तबादला मुंबई करा लिया है। हमेशा के लिए नहीं जा रहा शायद यह दूरी हमें फिर से पास लाने में सहायक हो सके। बच्चों की फिक्र मत करना, उनके हॉस्टल का सारा खर्च भेजता रहूँगा और मिलने भी जाता रहूँगा।

     तुम्हारा अविनाश


कुछ पल तक तो ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे ही रह गई प्रिया की। बदहवास सी चिल्लाई वो "यह ऐसे कैसे कर सकता है? यह आदमी मेरे साथ ऐसे कैसे कर सकता है?" अंदर कहीं गहराई से आवाज आती सुनाई दी 'सब ने ऐसा ही तो किया है। माँ-बाप, भाई-बहन सास-ससुर'।

 "लेकिन अविनाश? इसके लिए ही तो दुनिया छोड़ी थी, और यही मुझे छोड़ गया? मुझे कैसे छोड़ सकता है ?" 

और वह फूट-फूट कर रो पड़ी। रोते-रोते शाम हो गई। प्रिया ने उठकर लाइट भी नहीं जलाई। कामवाली बाई दरवाजा खटखटा कर वापस चली गई, प्रिया नहीं उठी। रात के नौ बज गए थे पर भूख प्यास का कोई एहसास ही नहीं था प्रिया को। अब तो अश्रु भी सूख गए थे। सिर दर्द से फटा जा रहा था, अचानक द्वार पर आहट हुई। प्रिया एकदम से उठी 'अविनाश होगा तो कुछ खींच कर सिर पर ही दे मारेगी वह उसके'। पर द्वार पर उसकी सखी नीरजा थी, जो बगल वाले घर में ही रहती थी। प्रिया के घर की एक चाबी उसके पास रहती थी।

 "क्या हुआ?" प्रिया को इस हाल में देखकर घबरा गई नीरजा।

 "मैंने कई बार कॉल किया। तुमने उठाया नहीं। इसलिये तुम्हें देखने आई हूँ। कामवाली भी बता रही थी कि दरवाजा नहीं खुला।"

 अश्रु धारा फिर से फूट पड़ी और उसने वह पत्र नीरजा की ओर बढ़ा दिया एक ही साँस में पढ़ गई नीरजा। कुछ बोलते नहीं बना तो पानी पिलाया प्रिया को, और चाय और मैगी बना लाई। आग्रह करके उसे खिलाया। फिर उसके दोनों हाथ थाम के बैठ गई।

   "मैं तेरी सारी कहानी अच्छी तरह जानती हूँ प्रिया! तूने मुझसे कभी कुछ छुपाया भी नहीं है। पर आज आवश्यकता है आत्ममंथन करने की।"

 एक पल को रुकी नीरजा, प्रिया ने प्रश्नवाचक दृष्टि उस पर डाली तो वह फिर बोली    "जब तू अविनाश से मिली थी तो ऐसी ही थी? मेरा मतलब इतनी कड़वी जुबान? कई बार तो तेरा लहज़ा मेरे सामने भी खराब होता है ,तो अकेले में तो क्या ही करती होगी।" 

नीरजा ने कड़वी बात हँसकर कही। प्रिया कुछ सोच में पड़ गई, फिर अपना बचाव करते हुए बोली 

"अगर ऐसी होती तो क्या अविनाश विवाह करता मुझसे ? यह तो वक्त के थपेड़ों ने ऐसा बना दिया मुझे। मेरे तो अपने माँ बाप ने मेरा साथ नहीं दिया तो सास-ससुर की बात तो क्या ही करूँ? सब मेरे भाग्य का दोष है।"

   "और अविनाश उसने तो साथ दिया हमेशा। फिर उसके साथ यह व्यवहार क्यों?" नीरजा ने फिर पूछा।

   "क्या खाक साथ दिया? देखो चला गया न मुझे छोड़ कर अकेला।" वह फिर फट पड़ी।

   "दो प्यारे बच्चे और एक इतना प्यार करने वाले पति के होते हुए अगर आज तुम अकेली हो तो इसके जिम्मेदार सिर्फ तुम हो प्रिया! हर किसी को भगवान सब कुछ नहीं देता पर हम सिर्फ उसके लिए रोते हैं जो हमारे पास नहीं है। जो हमें मिला है उसकी तो हमें परवाह ही नहीं। प्रशंसा की पात्र तो तब होती जब रुठे हुए को भी मना लेती। अगर यह ना भी हो पाता तो ना सही, पर तुमने तो उन्हें भी गवाँ दिया जो तुम्हारे सही मायनों में अपने थे। इतने बड़े शहर में रहते हुए भी अगर बच्चों को पढ़ाई के लिए हॉस्टल भेज दिया वह भी तब जब उनकी माँ खुद एक शिक्षिका है। बड़े होकर जब यह बच्चे तुम्हारी परवाह नहीं करेंगे तो भी तुम उनका ही दोष निकालोगी, क्योंकि तुम्हारी नजर में तुम्हारा तो दोष कभी होता ही नहीं।"

 इतना कहकर नीरजा उठ खड़ी हुई।

  "रात बहुत हो गई है। चलती हूँ, पर अब आत्ममंथन का समय आ गया है प्रिया! एक-दो दिन का अवकाश ले लो और नए सिरे से रिश्तो में मिठास ढूँढो।" सांत्वना भरे हाथ से उसने प्रिया का सिर सहलाया और दरवाजा बंद करती हुई निकल गई। दोपहर से सोफे पर पड़ी प्रिया उठकर कमरे में आई। कपड़े बदले और निढाल सी बिस्तर पर लेट गई। नींद आँखों से कोसों दूर थी। मन अतीत में हिचकोले लेने लगा। प्रिया और अविनाश कॉलेज टाइम से एक दूसरे को पसंद करते थे। स्नातक तक साथ पढ़ने के बाद प्रिया ने बीएड की पढ़ाई प्रारंभ कर दी। और अविनाश उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहर चला गया। पढ़ाई समाप्त होते ही दोनों को अपने अपने क्षेत्र में नौकरी भी मिल गई। अब दोनों ने विवाह बंधन में बँधने का फैसला किया। उन्हें विश्वास था कि वह अपने घरवालों को मना लेंगे। लेकिन यह क्या, दोनों ही परिवार इस अंतर्जातीय विवाह के सख्त खिलाफ थे। सारे प्रयास व्यर्थ गए तो दोनों ने मित्रों के सहयोग से कोर्ट मैरिज कर ली। आशीर्वाद लेने के लिए दोनों प्रिया के घर पहुँचे तो माता-पिता ने गाली-गलौज से स्वागत किया। यहाँ तक भी ठीक होता पर भाई ने तो दो थप्पड़ भी जड़ दिए प्रिया को। तब अविनाश ने उसका हाथ पकड़कर मरोड़ दिया और प्रिया को लेकर अपने घर पहुँचा प्रिया का मन चीत्कार कर रहा था पर स्वयं को संयत करके वह ससुराल की दहलीज पर खड़ी थी। आरती की थाली की जगह सास ने अपने पैर में चप्पल निकाल कर प्रिया पर फेंकी डायन, चुड़ैल जैसे शब्दों से हृदय को बेध दिया। पिता ने अविनाश को जायदाद से बेदखल करने की धमकी देकर निकाल दिया। तब वह दोनों होटल में कुछ दिन गुजारने के बाद किराए के मकान में अपने जीवन का नया अध्याय शुरू कर सके थे। दोनों को एक दूसरे का साथ पसंद था पर अपनों के दिए हुए घाव पर मरहम ना लग सका। प्रिया चिड़चिड़ी होती चली गई, और अविनाश चुप्पी की चादर ओढ़ता चला गया। दो वर्ष के बाद हँसता खेलता अर्नव गोदी में आया तो दोनों बहुत खुश थे। डेढ़ वर्ष के बाद प्यारी बिटिया नंदिनी का भी जन्म हो गया। अब जीवन खुशहाल होना शुरू हो गया था कि एक दिन द्वार पर दस्तक दी किसी ने। अविनाश ने द्वार खोला तो अविनाश के माता-पिता सामने खड़े थे। माँ ने बाँहे फैला के बेटे को समेट लिया तो अविनाश और माँ दोनों ही रो पड़े। पिता भी आँखों में आँसू लिए खड़े थे।

 "अंदर आने को नहीं कहेगा मैं अपने पोते पोती से मिलने आई हूँ" 

माँ ने कहा तो उसने रास्ता छोड़कर उन्हें आदर से बुला कर बैठाया। बाहर आती आवाजों को सुनकर प्रिया बाहर निकली तो आग बबूला हो गई।

 "आप लोगों की हिम्मत कैसे हुई मेरे घर में कदम रखने की? उठिए और अभी निकलिए यहाँ से।" चुटकी बजाते हुए उसने कहा। 

"प्रिया क्या कर रही हो? यह मेरे माता-पिता हैं।" अविनाश ने समझाने की चेष्टा की।

  "उस दिन भी यही माता-पिता थे ना जब चप्पल से अपनी बहू का स्वागत किया था?"

  " हम अपने पोते पोती से मिलने आए हैं बहू"

 इस बार अविनाश के पिता बोले।

"कौन बहू? कौन से पोता पोती? जब आपका बेटा बहू आपके नहीं तो पोता पोती कहाँ से हो गए? आप लोग सारे अधिकार खो चुके हैं। आप जाइए यहाँ से।"

 "देख रहा है तू अविनाश ? इसी के लिए तूने हमें छोड़ा था? इस से मिलने का तो हमें कोई शौक भी नहीं था। हम तो तेरे और तेरे बच्चों के लिए आए थे।" इस बार माँ ने जहर उगला। अब तो प्रिया आपे से बाहर हो गई और सास का हाथ पकड़ के बाहर छोड़ने चल पड़ी।

माँ के इस कथन के बाद अविनाश प्रिया को समझाने की स्थिति में ही नहीं रहा। इस घटना के बाद भी उन लोगों ने बच्चों से मिलने का कई बार प्रयत्न किया, तो तंग आकर प्रिया ने उन्हें हॉस्टल भेज दिया। अविनाश ने बहुत विरोध किया पर उसकी एक न चली। प्रिया के माता-पिता ने उससे मिलने का कभी प्रयास नहीं किया था पर उड़ती उड़ती खबरें मिलती रहती थीं कि भाई अपनी शादी के बाद अलग हो गया और माता-पिता बुढ़ापे में एकाकी जीवन बिता रहे हैं।

  इन दिनों बच्चों के प्रति अपराध बहुत सुनने में आ रहे थे तो अविनाश बच्चों को वापस घर लाने की जिद करता पर प्रिया का पत्थर होता जा रहा दिल बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा इस अहंकार में था कि मेरे बच्चे मेरा अपमान करने वालों से नहीं मिल सकते। इस लड़ाई में ही अविनाश इस तरह घर से चला गया था। सोचते सोचते प्रिया की आँख लग गई। सवेरे जब उठी तो वो एक निर्णय ले चुकी थी। रात भर के आत्ममंथन के बाद उसे अपनी त्रुटियाँ साफ नजर आ रही थीं। उठ कर नहा धोकर गाड़ी निकाली और सीधा ससुराल पहुँच गई। सास-ससुर उसे देखकर हैरान थे। वह बोली 

   "मैं साफ-साफ बात करने आई हूँ। मेरे और आप लोगों के अहम का जो टकराव है, उससे हमारे सारे परिवार पर कष्ट के बादल हैं। आप अपने बेटे और पोते पोती से दूर हैं तो मैं भी अपने बच्चों से दूर हूँ और अब तो मेरा पति भी रूठ कर चला गया है। कड़वा बोलने वाली उसकी सास की आँखों से झर झर आँसू झड़ रहे थे क्योंकि कड़वे बोलों की कीमत उसने भी खूब चुकाई थी। पल भर में ही सबके दिलों का गुबार आँसुओं में बह गया। अब बारी थी प्रिया के माता-पिता की। प्रिया वहाँ पहुँची तो बिना किसी गिले-शिकवे के सबके मन के मैल आँसुओं में धुल गए। इसके बाद बच्चों की बारी थी देहरादून पहुँच कर बच्चों को भी वहाँ से ले आई प्रिया। इस घटनाक्रम में चार दिन बीत चुके थे। इस दौरान एक बार भी अविनाश को फोन नहीं किया था प्रिया ने। वह मन ही मन बेचैन हो रहा था पर स्वयं पहल नहीं कर पा रहा था। अचानक प्रिया का फोन पहुँचा तो अविनाश ने लपक कर मोबाइल उठाया। उधर से प्रिया की ठहरी हुई आवाज आई।   "बहुत दुख दिया है ना मैंने तुम्हें? कभी तुम्हारे नजरिए से सोचा ही नहीं। क्या तुम मुझे माफ कर सकते हो? बस एक मौका दो मैं सब ठीक कर दूँगी।"

 अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था अविनाश को। अगले ही दिन फ्लाइट पकड़ी और पहुँच गया। एयरपोर्ट पर लेने आई थी प्रिया। वह मंद मंद मुस्कुरा रही थी जब पहुँचकर डोर बेल बजाई प्रिया ने तो अविनाश बोला 

 "कौन खोलेगा ? चाबी क्यों नहीं लगाती? इतने में दरवाजा खुला। अविनाश की माँ आरती की थाली लिये खड़ी थीं। उसके पीछे अविनाश के पापा फिर प्रिया के माँ-बाप भी थे। सबसे आगे खिलखिलाते हुये बच्चे थे। अविनाश का मुँह खुला का खुला रह गया। माँ बोली 

"वहीं बाहर रुको तुम दोनों, आज तो तुम दोनों की आरती उतारूँ। सालों से एक बोझ था मेरे मन पर।"

 सबके चेहरे पर हर्ष उल्लास था और आज अविनाश को अपनी पहले वाली प्रिया मिल गई थी जिससे उसने टूट कर प्यार किया था।


  


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