आंख की किरकिरी
आंख की किरकिरी
🌺 17. आँख की किरकिरी 🌺
😛 जेठानी और देवरानी की प्रेरणादायक कहानी 😛
✍️ श्री हरि
🗓️ 24.12.2025
एक पुरानी हवेली में रहता था एक संयुक्त परिवार। आँगन के बीचोबीच तुलसी का पौधा था, जिसे हर सुबह कमला जेठानी खुद पानी देतीं। कमला बड़ी बहू थीं – सात साल पहले जब वे इस घर में आई थीं, तब सास जीवित थीं और उन्होंने कमला के हाथों में घर की चाबी सौंपते हुए कहा था, “बहू, अब यह घर तेरा है।” कमला ने उस वादे को दिल से निभाया। सुबह चार बजे उठना, पूजा करना, रसोई संभालना, बच्चों को सुलाना – सब कुछ उनके कंधों पर था।
फिर गोविंद की शादी हुई और घर में आई राधा – शहर में पढ़ी-लिखी, हँसमुख, नई सोच वाली देवरानी। राधा जब पहली बार रसोई में घुसी तो बोली, “जेठानी जी, आइए न, आज मैं नाश्ता बनाती हूँ। नया तरीका आजमाएँगे।”
कमला ने मुस्कुराकर मना कर दिया, लेकिन मन ही मन चुभ गया। धीरे-धीरे राधा के नए-नए विचार घर में फैलने लगे – गैस की जगह इंडक्शन, हाथ से बर्तन माँजने की जगह डिशवॉशर की बात, बच्चों को पुरानी लोककथाओं के साथ अंग्रेजी की कहानियाँ।
कमला को लगा जैसे उनकी सारी मेहनत, उनका सारा त्याग किसी को दिखाई ही नहीं दे रहा। रात को जब सब सो जाते, कमला अकेली रसोई में बैठकर रोतीं और मन ही मन कहतीं,
“यह देवरानी मेरी आँख की किरकिरी बन गई है। मेरे घर में मेरी जगह कोई और ले रहा है।”
एक दिन होली के ठीक पहले भयंकर तूफान आया। आसमान फट पड़ा, बिजली कड़की और नदी उफनकर हवेली की ओर बढ़ने लगी। रात भर बारिश होती रही। सुबह तक पानी घर के आँगन में घुस आया। मर्द बाहर फँसे थे, मदद माँगने गए थे। घर में सिर्फ कमला, राधा और तीन छोटे-छोटे बच्चे थे।
पानी तेजी से बढ़ रहा था। कमला ने बच्चों को गोद में उठाया और ऊँची चारपाई पर चढ़ गई। लेकिन उनका पैर फिसला और वे पानी में गिर पड़ीं। ठंडा पानी, अंधेरा, डर – कमला का दिल बैठ गया। वे चीखीं, “राधा... बचाओ... मैं तैरना नहीं जानती...”
राधा ने एक पल नहीं गँवाया। उसने सबसे छोटे बच्चे को अपनी पीठ पर बाँधा, बाकी दोनों का हाथ पकड़ा और पानी में उतर गई। उसने कमला की बाँह पकड़ी और खींचकर चारपाई पर चढ़ाया। कमला काँप रही थीं, उनका चेहरा सफेद पड़ गया था। राधा ने अपना दुपट्टा उतारा और कमला के काँपते कंधों पर लपेट दिया। फिर खुद बच्चों के बीच बैठ गई और बोली, “जेठानी जी, डरिए मत। मैं हूँ न।”
रात भर पानी बढ़ता रहा। ठंड से सबके दाँत कटकटाने लगे। राधा ने बच्चों को अपनी गोद में लेकर गीत गाने शुरू किए – वही पुरानी लोरियाँ जो कमला बचपन में अपनी माँ से सुनती थीं। कमला चुपचाप सुनती रहीं। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन इस बार दर्द के नहीं – एहसास के।
सुबह जब पानी कुछ उतरा और मर्द लौटे, तो उन्होंने जो दृश्य देखा, उससे उनकी आँखें भर आईं – कमला और राधा एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाए बैठी थीं, बच्चे उनके बीच सुरक्षित सो रहे थे।
कमला ने राधा का हाथ अपने हाथों में लिया और फूट-फूटकर रोने लगीं। “बहू... मैंने तुझसे इतनी जलन की... तेरी हर अच्छाई मुझे अपनी कमी लगती थी। मुझे डर था कि कहीं घर की चाबी मेरे हाथ से छिन न जाए। लेकिन आज तूने मुझे नई जिंदगी दी। अगर तू न होती... तो आज हम सब...”
राधा की आँखें भी भर आईं। उसने कमला को गले लगा लिया और धीरे से कहा, “जेठानी जी, घर की चाबी तो आपके दिल में है। मैं तो बस आपका बोझ हल्का करने आई थी। आपने मुझे माँ का प्यार दिया, मैंने आपको बेटी का।”
उस दिन के बाद हवेली में सब बदल गया। कमला अब राधा से नए तरीके सीखतीं, और राधा कमला से पुरानी परंपराएँ। होली पर दोनों ने मिलकर रंग बनाए – कमला ने पुराने फूलों से, राधा ने नए रंगों से। जब रंग खेला गया तो सबसे पहले कमला ने राधा के माथे पर गुलाल लगाया और कहा,
“मेरी प्यारी देवरानी, अब तू मेरी आँख का नूर है।”
इस कहानी से सीख मिलती है कि जलन तब होती है जब हम किसी की अच्छाई को अपनी कमी समझते हैं। लेकिन जब दिल से दिल मिलता है, तो वही इंसान जो कभी आँख की किरकिरी लगता था, सबसे अनमोल बन जाता है। जेठानी-देवरानी का रिश्ता अगर प्यार और समझ से निभे, तो घर स्वर्ग बन जाता है। ❤️
