विरह
विरह
उद्दगिन मन
सूनी निगाहें
शून्य में झांकती
घोर निराशा में
अपने को भूल
उम्मीद खोकर
नाउम्मीदी में जीती
न खुशी, न दुःख
बस पीड़ा को पीती
बोझिल समय यात्रा
क्रूर समय चक्र का
शिकार हो विरह वेदना को
स्वर की प्रतीक्षा में
पल पल उधार की साँसों सा
जीवन के कटीले पथ पर
बेबस होकर चलते जाना
न जीने का मोह
न मृत्यु का खौफ
फिर भी जीते जाना
मुर्दों सरीखा
बस दो दो हाथ करना
विरह के संग हर रोज।
