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तुलसी पिल्लई

Romance

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तुलसी पिल्लई

Romance

वहां मौजूद हो तुम

वहां मौजूद हो तुम

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सवेरे पहाड़ों पर फैलते है उजाले

मैं समझती हूँ

कहीं न कहीं

वहाँ मौजूद हो तुम

 

पवन की मंद-मंद हिलोर

दोपहर को धूप का तपन घोर

साँझ को रवि जाता बादल छोड़

रात को बंद होता है शोर

माँझी अकेले


अपनी नाव को

कैसे किनारे लगता ?

कहीं न कहीं

वहाँ मौजूद हो तुम

  

तम नाचता है

छत पर धम-धम

होठों पर अँगुली रख

निराशा आती है दबे पाँव

और क्षीण हो जाता है मन

जगाते हो

अँगुली पकड़कर 

जगत की राह पर चलते हो

मैं समझती हूँ

कहीं न कहीं

वहाँ मौजूद हो तुम।


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