वहां मौजूद हो तुम
वहां मौजूद हो तुम
सवेरे पहाड़ों पर फैलते है उजाले
मैं समझती हूँ
कहीं न कहीं
वहाँ मौजूद हो तुम
पवन की मंद-मंद हिलोर
दोपहर को धूप का तपन घोर
साँझ को रवि जाता बादल छोड़
रात को बंद होता है शोर
माँझी अकेले
अपनी नाव को
कैसे किनारे लगता ?
कहीं न कहीं
वहाँ मौजूद हो तुम
तम नाचता है
छत पर धम-धम
होठों पर अँगुली रख
निराशा आती है दबे पाँव
और क्षीण हो जाता है मन
जगाते हो
अँगुली पकड़कर
जगत की राह पर चलते हो
मैं समझती हूँ
कहीं न कहीं
वहाँ मौजूद हो तुम।

