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Akash Nekiye

Abstract Tragedy


5.0  

Akash Nekiye

Abstract Tragedy


उलझनें

उलझनें

1 min 346 1 min 346

कुछ सपने हैं

जो सपने रह गये

कुछ लफ्ज़ हैं

जो कहने रह गये

कुछ उलझनें हैं

ऐसा उलझा उनमें

के सुलझे हुए मनमीत भी मेरे

कुछ उलझे हुए रह गये।


कुछ वक़्त है

जो बिताना रह गया

कुछ ज़ख़्म हैं 

जो दिखाना रह गया

कुछ दर्द हैं

जिनको सहने में

ख़ुशी के पलों में भी मेरे

मेरा खिलखिलाना रह गया।


कुछ पल हैं

जो बताने रह गये

कुछ लम्हें हैं

जो सजाने रह गये

कुछ पहर, दो पहर की क्षणदा में

चाँद की चाँदनी की चाह थी

कुछ क्षण, एक क्षण में लेक़िन

सूरज निकलते ही ढह गये।


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