तुम क्यों पूछते हो प्यार के बारे में मुझसे?
तुम क्यों पूछते हो प्यार के बारे में मुझसे?
तुम क्यों पूछते हो प्यार के बारे में मुझसे,
क्या तुमने धड़कनों का बेवजह बढ़ना नहीं देखा?
किसी की एक आहट पर, अपनी दुनिया का ठहरना नहीं देखा?
ये वो समंदर है जिसका कोई किनारा नहीं होता,
मोहब्बत में दिल किसी और का होता है, अपना नहीं होता।
तुम पूछते हो तो सुनो...
प्यार वो नहीं जो सिर्फ लफ्जों में बयां हो जाए,
प्यार वो है जो खामोशी में भी इबादत बन जाए।
जैसे तपती धूप में किसी नीम की ठंडी छाँव मिले,
या बरसों बाद भटके हुए मुसाफिर को अपना गाँव मिले।
कभी मीरा का जहर बनके ये अमर हो जाता है,
तो कभी रांझे की हीर बनके रूह में उतर जाता है।
जब आँखें बंद हो और चेहरा सिर्फ एक ही नजर आए,
जब सरेआम महफिल में भी बस उसकी कमी सताए।
समझ लेना कि तुम्हें भी इस मर्ज ने घेरा है,
अब जिसे तुम अंधेरा समझो, वही असल सवेरा है।
तो अब मत पूछना प्यार के बारे में मुझसे दोबारा,
क्योंकि ये वो आग है जिसमें जलना ही है सहारा।
मैंने तो इसमें खुद को खोकर ही सब कुछ पाया है,
प्यार को सिर्फ जिया नहीं, अपनी रूह में बसाया है।
लेखक: विनोद सोडा

