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Ritesh Yadav

Abstract

4.6  

Ritesh Yadav

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सपने अपनों के

सपने अपनों के

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न बाबा आदम के जमाने का जन्मा है वो

न किस्से कहानियों का कोई नग्मा है वो

रफ्तार उसकी भी कुछ कम नहीं है

शतरंज उसे भी खूब आता है

कुछ सपने उसके भी अपने हैं

खुले आसमाँ में सपनों का घर वो भी बनाता है

पर जब बात अपनों की आती है

अपनों की उम्मीदें उसका नया घर बन जाती हैं

कुचल देता है वो सारे सपने अपने

जिम्मेदारियाँ उसका नया सपना बन जाती हैं

ऐसा नही कि कोई सपना बचा नही उसका अपना

उसका हर सपना अब अपनों से होता है

भूल जाता है वजूद अपनी सख्शियत का

ना याद अपना उसको अब कोई फसाना आता है

दर्द थकान हर्ज ही क्या है

जब मुद्दा ही मुद्दतों से औरों को खुशी दिलाना है

न राह आराम देह न चाह रुकने की उसकी है

जो चले हर सफर काट के खुद को

यह किस्सा और कहानी हर माँ बाप की है


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