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Vinamra Jain

Abstract

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Vinamra Jain

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रिहाई - 9-5 ऑफिस लाइफ

रिहाई - 9-5 ऑफिस लाइफ

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इस कोफ़्त से रिहा होना है मुझे ।

जीने का मक़सद ढूंढना है मुझे ।


कहा था किसी ने के दो पैसे मिलेंगे तो ख़ुशी होगी इस चेहरे पे तेरे ।

उन्ही दो पैसों की तलाश में निकलना है मुझे ।।


इन खोखली अठखेलियों के बीच रह कर भी स्वयं में झांकना है मुझे ।

खुद को आईने में देख उस शून्य को मिटाना है मुझे । 


बस अब एक जंग ऐसी है ।

उस में ख़ुद को ख़ुद ही से विज़य बनाना है मुझे ।


इस कोफ़्त से रिहा होना है मुझे ।

इस कोफ़्त से रिहा होना है मुझे ।


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