STORYMIRROR

Deepika Goel

Inspirational Others

4  

Deepika Goel

Inspirational Others

रेल की वो खिड़की

रेल की वो खिड़की

1 min
15

सुबह के उस हल्के जाड़े के एहसास ने जाने मन में कैसे ख़्वाब भर दिए

रोशनी के आने से पहले ही आँखों में उजाले हज़ार भर दिए

थरथराते होंठों और उड़ते हुए बालों में उस हवा ने कुछ भूले हुए से एहसास भर दिए

रेल की उस खिड़की ने चंद घंटों के सफ़र में कई जज़्बात भर दिए

यूँ तो अकसर ही मन में नए नए ख़्याल त्योहार मनाते है

पर कुछ तजुर्बे नए त्योहार ही दे जाते है

हरे रंग के इतने रंग देख कर मन ये मेरा बोला कुदरत रंग बदले तो खूबसूरत इंसान बदले तो मैला??

ये हर रंग जगह जगह अपना वजूद बदल देता है हवा पानी मौसम सबको दोष देता है

यहाँ तो आसमान भी साहेब एक रंग का नहीं कहीं मटमैला कहीं नीला है

दिल के हाल भी कुछ उस आसमान ओर हरे रंग जैसे है पर इसके बदलने के दोषी कोई दूसरे है

रेल की उस खिड़की ने आज मुझे कुछ और ही दिखा दिया

भागती हुई उस गाड़ी ने मुझे आज बहुत कुछ सिखा दिया मैं ठहरी थी फिर भी चल री थी

मेरे मन में क्या है उसकी उस गाड़ी को बिल्कुल ना पड़ी थी ज़िंदगी की तरह वो बस चलती जा रही थी


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational