रेल की वो खिड़की
रेल की वो खिड़की
सुबह के उस हल्के जाड़े के एहसास ने जाने मन में कैसे ख़्वाब भर दिए
रोशनी के आने से पहले ही आँखों में उजाले हज़ार भर दिए
थरथराते होंठों और उड़ते हुए बालों में उस हवा ने कुछ भूले हुए से एहसास भर दिए
रेल की उस खिड़की ने चंद घंटों के सफ़र में कई जज़्बात भर दिए
यूँ तो अकसर ही मन में नए नए ख़्याल त्योहार मनाते है
पर कुछ तजुर्बे नए त्योहार ही दे जाते है
हरे रंग के इतने रंग देख कर मन ये मेरा बोला कुदरत रंग बदले तो खूबसूरत इंसान बदले तो मैला??
ये हर रंग जगह जगह अपना वजूद बदल देता है हवा पानी मौसम सबको दोष देता है
यहाँ तो आसमान भी साहेब एक रंग का नहीं कहीं मटमैला कहीं नीला है
दिल के हाल भी कुछ उस आसमान ओर हरे रंग जैसे है पर इसके बदलने के दोषी कोई दूसरे है
रेल की उस खिड़की ने आज मुझे कुछ और ही दिखा दिया
भागती हुई उस गाड़ी ने मुझे आज बहुत कुछ सिखा दिया मैं ठहरी थी फिर भी चल री थी
मेरे मन में क्या है उसकी उस गाड़ी को बिल्कुल ना पड़ी थी ज़िंदगी की तरह वो बस चलती जा रही थी
