ख़याल
ख़याल
जब गर्मियों से मन भर जाए तो जाड़े का ख़याल आ जाता है
जब जाड़े से मन भर जाए तो गर्मियों का ख़याल आ जाता है
सावन की बात हमसे ना किया कीजिए, एक बार जो आता है
वो आँखों मैं काजल की तरह बस जाता है
बसंत के ख़्वाब हमारे नहीं
गुलों की ख़ुशबू जिसकी पहचान है, वो हवा हमें रास नहीं
वो ख़ुशबू ऐ गुल कभी हमारी थी
उनके छूने से हमारी हथेली की पहचान थी
पतझड़ अब अपना सा लगता है
रंग बदलते हुए पत्ते अब समझ आते है
ठंडी हवा के झोंके अब सिर्फ़ इतना काम करते है
दिल के बंद पहलुओं से उनको ढूँढ लाते है

