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Ajay Singla

Abstract

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Ajay Singla

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रामायण-९ राम जी की बाललीला

रामायण-९ राम जी की बाललीला

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दिया था वर कश्यप और अदिति को 

दशरथ और कौशल्या बने वो 

उन का पुत्र बन के आऊं 

राज करें अयोध्या में जो।


देवता सब वानर थे बन गए 

धरती पर वो रहने लगे 

राह तकते वो रघुनाथ की 

तब फिर उनके भाग्य जगे। 


दशरथ गुणों की खान और ज्ञानी 

तीन रानियां थीं उनकी 

कोई पुत्र नहीं था उनका 

हो एक पुत्र, इच्छा उनकी। 


पुत्रकामेष्ठि यज्ञ की खातिर 

वशिष्ठ बुलाया श्रृंगी ऋषि को 

प्रकट हुए अग्निदेव वहां 

खीर दी, कहा पत्नियों को दो।


एक भाग कौशल्या को दिया 

बचे भाग के दो भाग किए 

उसमें से एक कैकयी को दे दिया 

बाकि बचा सुमित्रा के लिए। 


उस भाग को फिर बांटा दो में 

कौशलया , कैकई के हाथों पर रखा  

फिर वो दोनों भागों को 

बड़े प्यार से था सुमित्रा ने चखा।


प्रभु के प्रकट होने का समय 

नवमी तिथि, महीना चैत्र 

शुक्लपक्ष, अभिजीत महूर्त 

धूप पड़ रही, थी वो दोपहर।


हरी प्रकट जब हुए , देवता 

अपने विमानों में थे आए 

माँ भी आराधना करने लगी 

उनको भी ज्ञान था, प्रभु ही हैं ये। 


भ्रम से बुद्धि बदली माता की 

ताकि पुत्रभाव हो उनको 

रोने लगे थे शिशु के जैसे 

भरमाया था माँ के मन को। 


कैकई और सुमित्रा ने भी 

सुंदर पुत्रों को जनम दिया 

 दशरथ ने दान दिया सबको 

जश्न पूरी अयोध्या में हुआ।


सूर्य रुक गए एक महीना 

पर किसी को न पता चला 

प्रभु के दुर्लभ दर्शन करके 

बोलें सब जय रामलला।


श्री हरि के दर्शन करने 

कैलाश से उतरे पृथ्वी पर 

मनुष्य रूप में थे वो दोनों 

कागभसुंडी और शिवशंकर। 


कुछ दिन बाद नामकरण था 

गुरु वशिष्ठ वहां आए 

सबसे बड़ा लड़का, उसके लिए 

राम नाम उनको भाए।


भरत रखा कैकयी पुत्र का 

और जो दो सुमित्रा नंदन 

एक को नाम दिया लक्ष्मण 

और दूजे को दिया शत्रुघन। 


प्रभु माता की गोद में खेलें 

राम का श्यामवर्ण सुंदर 

पंजरी की ध्वनि सुन,मुनि भी मोहित 

तुतली जुबान उन के लवों पर। 


कमर में करधनी, गले में माला 

बहुत आभूषण वो पावें 

घुंघराले बाल और पीले वस्त्र 

घुटनों के बल चलते जावें।


पालने में सुला कर एक दिन 

नैवैद्य बनाया, की पूजा 

इष्ट देव के लिए रख दिया 

करनें काम लगीं दूजा।


वापिस आईं , देखा तो 

राम ग्रहण करें भोजन 

पालने में भी देखा राम हैं

 विचलित हुआ था उनका मन।


राम ने अद्भुत रूप दिखाया 

सूर्य, चन्द्रमाँ ,उनमें शिव 

उनमें ही ब्रह्मा और धरती 

पर्वत,नदियां और सारे जीव।

 

बाल रूप ले लिया पल में फिर 

अपनी लीला वो दिखलायें 

यज्ञोपवित्त संस्कार हुआ 

जब कुमार अवस्था में आए 


गुरु के घर गए विद्या लेने 

सीख गए जल्दी वो सब 

माता पिता और गुरु कृपा से 

विद्या ख़त्म हो गई थी अब।


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