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Tarika Singh

Abstract

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Tarika Singh

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प्रकृति तू कितनी सुन्दर है

प्रकृति तू कितनी सुन्दर है

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प्रकृति तू कितनी सुन्दर है

कहीं पक्षियों का कलरव

कहीं इंद्रधनुषी छटा

कहीं खारा समुद्र

कहीं दरिया का मीठा जल है


खेतों की हरियाली मे

ठंडी पुरवाई में

ऋतुओं की अंगडाई में

हर रूप में हर श्रृंगार में

जैसे तेरा ही आंचल है


चांद में सूरज में

तितलियों में भंवर में

झील में नहर में

तू ही बहती कलकल है

तूने इंसानों पर अपनी दौलत लुटायी

इंसानों ने मगर ऐसी निष्ठुरता दिखायी


काटा वन फैलाया प्रदूषण

इस धरा की संपदा चुरायी

देखो अब एक सूक्ष्म जीवाणु से

सारी दुनिया बर्बादी के मुहाने पर है

अब भी वक्त है चेत जाओ


खुद को बचाना है तो पर्यावरण बचाओ

क्योंकि यही हमारी धरती रहना यहीं पर है

प्रकृति तू अब भी कितनी सुन्दर है।


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