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YOGITA GOSWAMI

Inspirational

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YOGITA GOSWAMI

Inspirational

पिता

पिता

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पिता बन जाना जैसे एक स्तम्भ हो जाना,

जिस पर टिक कर जीवन क्या क्या

ख़ुशियाँ पा लेती थी, 

जिसने अडिग होने ना दिया विश्वास मेरा,


जाने कैसा होता होगा एक शहजादी का ठाठ,

शायद मेरे पिता ने मुझ को वो सारे दिए थे बांट।


पिता से ही सीखा है मैंने लेना हर घटना से ज्ञान,

चाहे पीड़ा कितनी भी हो पर देना सबको सम्मान,


पिता मेरे विद्यालय ही है और मैं एक शिष्या समान,

मैं वो हूं जिसके होने पर पिता मेरे गर्वित हैं सदा,

एक नन्ही सी बेटी उन्होंने जाने कैसे की थी विदा?


सुनना, बुनना, गुनना सीखा, बातों को मैंने है तमाम,

संस्कार जो लिए हैं तुमसे, आत्मसात हैं लहू समान।

मैं हूं आन पिता की अपनी और पिता है मेरी शान,

मैं उनकी परछाईं लेकर, समझ रही हूं जीवन ज्ञान,


सीख चुकी जीवन की हर कड़वी हाला को पी जाना, 

और अभी कठिनाइयों को हँसते हँसते जी जाना,


कुछ शब्द तुम्हारे भूले नहीं हैं जो पथ को करते आसान, 

होत वही जो राम रची राखा...


हाथ की ले जाए चाहे कोई, किस्मत की ना ले पाए,

कर्मों का फल यहीं मिलेगा, फिर क्यूं व्यर्थ रोया जाए।

ऐसे ही कुछ मूलमंत्र हैं, तुमने मुझे सीखा डाले,

जिसके कारण मन में है संतोष बड़ा, चाहे जो हो जाए।



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