ज़िन्दगी
ज़िन्दगी
आ ज़िन्दगी पास में, जरा बैठ हमारे पास में,
तू ये बता कहाँ छुपा आई है, मेरे बचपन की
सब बातें,
वो बेफिक्रे से दिन, वो सपनों भरी रातें।
नंगे पैर खेलती दोपहरी, छत पर कूदती वो
गिलहरी,
वो माँ के संग की हुई पढ़ाई, दादा जी के
हाथ की मिठाई।
दरवाज़े के पीछे से झांकते साथी, वो गली से
निकलता हाथी।
बारिश में छत पर छपछप, देर रात परिवार
में गपशप।
कहाँ छुपा आई वो पल तू, क्यूँ बदल गई है
अब तू।
अचानक बढ़ती जाती है, क्यूँ उम्र निकल
जाती है,
दिल की बढ़ती सी धड़कन कहाँ तब समझ
आती थी,
अरे दिल की आकृति क्या है, बस यही समझ
आती थी,
कोई लग जाता था अच्छा, तो देख कर खुश
होते थे,
ये इश्क विश्क की भाषा तब कहाँ समझ
आती थी।
एक बात बता तू पगली, क्यूँ इतनी जल्दी
बदली,
आ बैठ ज़िन्दगी यहां आकर, सुन बात
अगर जो निकली,
तू पहले तो संग खेली है, क्यूँ अब बन रही
पहेली है,
नासमझ थे तब या अब हम हैं,
कभी खुद मैं खोए होते हैं तो हम उनको
दोहराते हैं,
कभी यूँ ही मुस्काते हैं, कभी मायूस भी हो
जाते हैं,
जो बीत गया कहाँ आएगा,
जो बीत रहा वो भी जाएगा,
तू बस यूँ ही मेरे साथ में , यूं ही बदलती जाएगी,
आ बैठ जरा मेरे पास में,
कुछ पन्ने पलट कर देख लें, कभी तू मुस्का देना
मुझ मे, कभी दिल धड़कन तेज कर, कुछ बूंद
इश्किया डालकर, रंगों में बातें घोल कभी,
बचपन की सी सौंधी खुशबू का केसर भी उसमे
घोल सभी,
आ बैठ ज़िन्दगी पास में,
कुछ हर्फ़ पलट कुछ अर्श पलट
