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Chaitanya Kulkarni

Abstract

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Chaitanya Kulkarni

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मुसाफिर

मुसाफिर

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लहरों पे चलती है नौका ये जीवन की

किनारे पे बैठे मैं राह देखूँ सावन की !


बंद था पिंजरे मे जो अबतक 

पूछे मन ये, कैद है कबतक 

पंखों को अब आस जो लगी है गगन की !


फैला कर देख बाहें अपनी

जीतने की प्यास है कितनी

समझ ना तू इसे बात मनोरंजन की !


गुंज उठी है हर दिशा में

ना रुकना किसी भी दशा में

तूफान ही तो पहचान है पवन की !


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