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Mahavir Uttranchali

Abstract


1.0  

Mahavir Uttranchali

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महंगाई के दोहे

महंगाई के दोहे

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महंगाई डायन डसे, निर्धन को दिन-रात

धनवानों की प्रियतमा, पल-पल करती घात //


महंगाई के राग से, बिगड़ गए सुरताल

सिर पर चढ़कर नाचती, झड़ते जाएँ बाल //


महंगी रोटी-दाल है, मुखिया तुझे सलाम

पूछे कौन ग़रीब को, इज्ज़त भी नीलाम //


आटा गीला हो गया, क्या खाओगे लाल

बहुत तेज इस दौर में, महंगाई की चाल //


आटा-चावल-दाल क्या, सत्तू तक है दूर

महंगाई के खेल में, हिम्मत चकनाचूर //


बच्चे बिलखें भूख से, पिता रहा है काँप

डसने को आतुर खड़ा, महंगाई का साँप //


महंगाई प्रतिपल बढे, कैसे हों हम तृप्त

कलयुग का अहसास है, भूख-प्यास में लिप्त //


महंगाई के प्रेत ने, किया लाल को मौन

मात-पिता हैरान हैं, उनको पूछे कौन //


गपशप में होने लगी, महंगाई की बात

वेतन ज्यों का त्यों रहा, दाम बढे दिन-रात //


महंगाई के दौर में, कटुता का अहसास

बदल दिया है भूख ने, वर्तमान इतिहास //


सदियों से निर्धन यहाँ, होते रहे हलाल

धनवानों के हाथ में, इज़्ज़त रोटी-दाल //


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