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Subhashree Mohapatra

Abstract


5.0  

Subhashree Mohapatra

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मेरा यार

मेरा यार

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कभी कभी ज़िन्दगी में यार मिले तो अच्छा लगता है

उन बचकाने झगड़ो में उलझना भी अच्छा लगता है,

चाहे लाख सताए वह हमें, वह यार हमें सच्चा लगता है,

कोई है तुम्हारा, सिर्फ तुम्हारा, यह दास्तां भी अच्छा लगता है।


प्यार नहीं तो न सही, एक यार हमने कमाया है,

बेतुके से वक्त ने भी तो इस यारी को आज़माया है,

लोग कहते हैं, सिर्फ दोस्ती नहीं, कुछ और अपना नाता है,

शायद सच है उनका कहना, वह जीना हमें सिखाता है।


अब आप पूछते हैं तो हम बता ही देते हैं कि,

मैं धीमी सी आंच वह सुलघता सा आग है,

मेरे बेसुरे जिन्दगी में वह ख्वाहिशों का राग है,

मैं थमी हुई सी जज्बा तो वह अंदाज़ बेबाक है।


मेरे पतझड़ को वह फूलों से लदा साख है

मैं आइना तो वह परछाई श्रृंगार की,

मैं आवारी तो वह सुकून परिवार की,

मैं समंदर का सीप तो वह समाया सा मोती है।


वह रातो की लोरी, मेरी थकान जिसमें सोती है

वह इतराता महताब है।

कामिल सा ख्वाब है, बिन नसें का शराब है

वह ना-समझ सब समझता है।


वह मिट्टू कुसुर करता हैं

वह थोड़ा पागल, थोड़ा जिम्मेदार है

मेरे पागलपन का हकदार है

वह हसरतों का इनाम है, पसंदीदा महमान है।


वह तारों से भरा शाम है, वह खुशियों का पैगाम है

बस एक आहट से वह मेरे हालात समझ लेता है,

तो खुद को "डाॅन" कहकर "डाॅकीं" सा हरकत करता है,

मगर जैसा भी है !


वह साथ यूं निभाता, हालात मेरे समझता है,

मेरी कदर करता है, परिवार बनकर।

वह ख्यालों में रहता है, सोच में समाता है,

वह धड़कन सा धड़कता है, यार बनकर।


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