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dhruvpranay Pandey

Inspirational

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dhruvpranay Pandey

Inspirational

मैंने देखा है

मैंने देखा है

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मैंने देखा है लाखों को सड़कों पर पैदल चलते,

रोज रोज के मरते जीवन में थोड़ी सी जान फूंकते।

भूख से व्याकुल बच्चों का जब रोना सहन नहीं होता,

नैतिकता की शॉल फेंक रातों को माँ को घर से निकलते।

अपनी मैय्यत को खुद अपना कंधा देना होता है,

पता नहीं वो कैसा हो सब शिरकत करने से डरते ।

कल का रोना क्यों रोये जब आज मेरा घर खाक हुआ,

कल के सितमगर छोड़ गए थे मेरे घर अपने सिक्के।

सोना दिल अब कौन खरीदे दुनिया के बाजार में,

दोहरी सूरत सीरत के अब ऊँचे ऊँचे दाम हैं मिलते।

बिच्छू सांप तो ज़हर भरे अब गैरों की क्या बात करें,

आह तलक हम ले न सके अपनों के अमृत के चलते। 



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