STORYMIRROR

Sudhirkumarpannalal Pratibha

Abstract Inspirational Thriller

4  

Sudhirkumarpannalal Pratibha

Abstract Inspirational Thriller

मैंने छोड़ दिया

मैंने छोड़ दिया

1 min
7

तुम

मेरी

कहां

सुनती

हो

मैंने

सुनाना

छोड़

दिया

तुम


मुझे

अब

कहां

देखती

हो

मैने

भी

अब

तुम्हें

देखना


छोड़

दिया

तुम

खुद

की

मालिक

हो

मुझे

झूठे

वादों

में


पसंद 

और

नापसंद

में

बहलाती

और

फुसलाती 

हो

मैने

ऐसा

मलिकाव 

दिखाना

छोड़

दिया


तुम

अपने

मन

का

करती

हो

जो

जी

में

आए

वो

हीं

करती

हो

हर

हाल

में

अपनी

वाली

हीं

करती

हो


मैं

तुम्हारे

बहकावें

में

आना

छोड़

दिया

मैं

अपनी

जिंदगी

तुम्हारे

साथ

लंबे

वक्त

से

बीताया

हैं


तुम्हारे

और

हमारे

बीच

के

रिश्तों

में

अब

विश्वास

हीं

करना

छोड़

दिया

तुम

एक

खुदगर्ज

और

मतलबी

शख्स

हो

अपने

मशरफ

और

हित

के


खातिर

अपना

अभिभावक

हीं

बदल

लेती

हो

मैं

अब

तुम्हारे

और

अपने

बीच

में

टांग

अड़ाना

छोड़

दिया

तुम

मेरी

नहीं

हो


तुम

सिर्फ

और

केवल

सिर्फ

अपनी

हो

मैं

अब

तुम्हे

अपना

कहना

हीं

छोड़

दिया

तुमने

मेरा

दिल

दुखाया

है


मेरा

सपना

तोड़ा

है

मैं

तुम्हें 

बफादार

कहना 

छोड़

दिया

रिश्ते

मन

से

जुड़ते 

है

रिश्ते

विश्वास 

से

मजबूत 

होते

हैं 


लेकिन

आपने

सब

तारतार 

कर

दीं 

मैने

अब

आपको

धर्मपत्नी

हीं

मानना

छोड़

दिया।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract