मैं धरती मां की बेटी हूं
मैं धरती मां की बेटी हूं
पुष्टों का मैं बना बिछौना, पत्थर पर ही लेटी हूं।
वक्त की मारी बड़ी अभागी,मैं गरीब की बेटी हूं।।
मुझे बीनना आता है, पन्नी, खाना, बोतल, रद्दी।
नंगे पैर भटकती हूं मैं, गाली मिलती मुझको भद्दी।।
नहीं ठिकाना रहने का ,कोई रिश्ता नहीं है कहने का।
कड़ी धूप से आंख मिचौली,यही बहाना सहने का।।
पिता मेरे है खुले गगन और धरती मेरी माता है।
जो देती है खा लेती हूं,मुझे कहां कुछ आता है।।
चंद लोग कहते हैं मुझको, कि मैं गरीब की बेटी हूं।
लगा मुझे कि शायद मैं,इन लोगों से कद में छोटी हूं।।
तभी गरीब कहते हैं लोग, पिता गगन और धरती मां को।
पर बेटी उनकी बड़ी जो होगी, तो कह देगी लोगों से देखो।।
मैं पिता गगन को दूंगी बादल, मां धरती को बारिश बूंदें।
तब खूब करूंगी नृत्य झूमकर,लूंगी चैन की तब नीदें।।
और मिलूंगी उनसे फिर, जो कहते मुझे गरीब की बेटी थे।
जो पानी भी पीने न देते,खुद बुद्धि विचार से छोटे थे।।
पर हुनर उन्हें दिखलाऊंगी, तब सपनों का महल बनाऊंगी।
छोटे विचार रखने वालों को, बनकर मैं बड़ा दिखलाऊंगी।।
एक दिन फिर दिन बदलूंगी मैं, कद, नाम से ही मैं छोटी हूं।
हल्के में तो लेना न मुझको, मैं धरती मां की बेटी हूं।।
