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Kavya Sagrika

Others

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बूढ़ी मां

बूढ़ी मां

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अजर अमर रहने वाले, ममता के फल का स्वाद बता ।

रेहड़ी पर तू खुशी भरे, ढलते दिन का चल राज़ बता ।।


जब मां लोगों से सुर में अपने, फल लेने की करे गुहार |

तब जाकर बनता था भाई, हम दोनों का कोई त्यौहार ।।


करूं प्रतीक्षा ठेले पर बैठा, मैं अपने झूले की बारी की।

जब तुझको झूला दे के मां, पूरी करती जिद लौरी की ।।


तुझको मुझ पर तरस नहीं था, जब तक नींद नहीं आती।

तू छोटा था बिठा धूप में मां मुझको ही थी ये समझाती


वही साड़ियों वाला झूला, मां का आंचल भी बनता था।

उस आंचल की गोद में तू, मैं ठेले पर बैठा चलता था ।।


जब भी लाती थी मां किताब, दोनों में बराबर बंटती थी।

रूखा सूखा खुद खाकर मां, हमको मिठाई दे देती थी।।


अब बड़े हुए हैं हम दोनों और मां वृद्ध अवस्था में बैठी।

हम दोनों ही घर से बाहर पर मां किसके सहारे है लेटी ।।


चल अगले हफ्ते हम दोनों, घर पर होकर के आते है।

एहसास हुआ है मुझको ये बूढ़ी मां से मिल आते हैं।।


भाई भी हामी भरकर बोला, सच कहते हो तुम भैया ।

भूल गया था रंग रोगन में अपनी मां का मैं दुःख भैया ।।


पर गए भाई जब दोनों घर तो ताला दरवाज़े डला हुआ।

घृणाभाव में बोली पड़ोसन क्यों चेहरा लाये छला हुआ ।।


माई तुम्हारी तुम दोनों के हिस्से में आंसू अब छोड़ गई।

घर के कागज़ रख लो ये, मां दुनिया तुम्हारी छोड़ गई ।।


कहती थी वो बड़ी अभागन बेटे आए तो कुछ न कहना।

बेटों की खुशियां मेरी खुशियां आएं उनसे तो ये कहना ।।


इतना कहकर मां तुम दोनों के नाम ये साड़ी छोड़ गई।

फटी हुई थी साड़ी पर वो अंतिम तुरपाई इसमें जोड़ गई।।


अजर अमर रहने वाले, ममता के फल का स्वाद बता।

रेहड़ी पर तू खुशी भरे, ढलते दिन का चल राज़ बता ।।



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