STORYMIRROR

LAXMIPRIYA SAHU

Abstract Romance

4  

LAXMIPRIYA SAHU

Abstract Romance

क्या होने लगा है

क्या होने लगा है

1 min
267

बेचारा दिल अब जरूरत से जादा धड़कने लगा है

पता नहीं क्यूँ अब भर भर के बातें होने लगा है

मुसाफिर मैं भी हूँ और तुम भी हो

फ़िर क्यूँ दरियाँ छोड़ो तरीका भी बदलने लगा है! 


आज कल सबकुछ है ऐसा महसूस होने लगा है

नफ़रत छोड़ो कुछ तो होने लगा हैं

और हाँ हम शायद जानते नहीं हैं 

पर पानी पी कर भी प्यास होने लगा है! 


मजबूर नहीं हूँ फिर भी ख्वाब होने लगा है

सब जानते हुए भी एक राह होने लगा है

अब पता नहीं किस कदर होना है

न चाहते हुए भी दिल में लगाव होने लगा है ! 


बस ये जानना हैं क्या होने लगा है

जो सोच रही हूँ क्या वो होने लगा है

कुछ नहीं इंतजार ही करती हूँ

जिंदगी खुद मुझे बताएगी की तुझे प्यार होने लगा है! 



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract