कुंभ का मेला
कुंभ का मेला
कुंभ का मेला लगा है,
श्रद्धा की लहरें उमड़ रही हैं,
आस्था के घाटों पर भीड़ है,
हर हर गंगे की गूंज है,
पर कहीं बीच में
कुछ चीखें भी दब रही हैं।
कोई बूढ़ी माँ, बेटे का हाथ छोड़ चुकी है,
कोई बच्ची, भीड़ में अकेली खड़ी है,
किसी का पैर कुचला गया है,
किसी की सांस भीड़ ने रोक दी है,
किसी की देह लहरों में खो गई,
तो कोई मलबे के नीचे दबा पड़ा है।
आस्था जब अंधी हो जाए,
तो मेला मातम बन जाता है।
श्रद्धालुओं की लाशें गिनी नहीं जातीं,
बल्कि व्यवस्था के आँकड़ों में छिपा दी जाती हैं।
न्यूज़ चैनलों में बस इतनी सुर्खियाँ आती हैं—
"भगदड़ में कुछ श्रद्धालु हताहत,"
पर नाम कोई नहीं लेता,
कोई नहीं पूछता कि वे कौन थे,
कहाँ से आए थे,
किसके बेटे, किसकी माँ, किसकी बहन थे।
मैं कवि हूँ, कर्ता हूँ,
मैं उन लाशों के चेहरे पहचानता हूँ,
मैं उन चीखों की गूंज सुन सकता हूँ,
जो अख़बारों के पन्नों तक नहीं पहुंची।
मैं एक दिन कुंभ के इस पवित्र जल में,
उनकी आवाज़ घोल दूँगा,
ताकि जब अगली बार कोई
गंगा स्नान करने आए,
तो उसे सिर्फ़ पुण्य नहीं,
उनकी वेदना भी महसूस हो।
