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Rohit Rai

Abstract

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Rohit Rai

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क़िस्मत

क़िस्मत

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धरती से तू नभ को नाप

तुझ सा ही वो दिखता है,

ऊँचे ऊँचे सपने को

 वह सूरज से ही तो कहता है।


रंग बदलता,

भेस बदलता, यह आकाश

हर पल यह बतलाता है,

कि कितनी भी तू कोशिश कर ले

समय बदल ही जाता है।


सूरज चंदा एक ही घर के

फिर भी देखो अलग अलग हैं,

पर चंदा जब भी है आता 

अंधेरे में उम्मीद है लाता,

बनना है तो चंदा बन 

वरना,

सूरज दादा किसको है भाता ?


समय पटल की चाल को

तू जिस दिन है पहचान गया

उस दिन,

मुट्ठी तेरी बंद होगी,

क़िस्मत तेरे संग होगी,

सूरज चंदा साथ चलेंगे,

बिन बादल बरसात करेंगे,


क़िस्मत ख़ुद की तू ख़ुद लिखेगा

जैसे हो कोई ध्रुव तारा

चमक दिशा पहचान है उसकी

तू भी ख़ुद की पहचान बना।


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