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Prashant Paras

Abstract

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Prashant Paras

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जो नया है लोगों में बस गया है

जो नया है लोगों में बस गया है

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जीवन-रथ पर प्रगति के पथ पर

खेरा के सदन से लेकर समर भू पर

अपने मोहपाश से जग को रच गया है

जो नया है लोगों में बस गया है


यह निशान है प्रबल ख्याति का 

कारक है यह रिश्तों में अराती का

माहुर से बाज़ार सज गया है 

जो नया है लोगों में बस गया है


माता-पिता, गुरुजन से जो ज्ञान मिला वो पराया है

दूजे की संस्कृति को सर्वोत्तम मान अपनाया है

मानवता लालसा के उदर में पच गया है

जो नया है लोगों में बस गया है


पंचभूत फँसा शोध जाल में

भविष्य का अंत हो रहा वर्तमान की तीव्र चाल में

हिम् की बेटियों के जगह रसायन-वेग धरा को सींच गया है

जो नया है लोगों में बस गया है


ये चक्र यूँ ही चलता जाएगा

नये-पुराने के खेल में जग छलता जाएगा

समाहार निष्कर्ष न होगा मानव के अधीन

गुफाओं में अपने खिलौनें से डर बसेगा एक दिन


आज हमारा कल इतिहास होने को चल गया है

जो नया है वो लोगों में बस गया है।


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