STORYMIRROR

Mahavir Uttranchali

Abstract

4  

Mahavir Uttranchali

Abstract

ज़िंदगी से मौत बोली

ज़िंदगी से मौत बोली

1 min
289

ज़िंदगी से मौत बोली ख़ाक़ हस्ती एक दिन

जिस्म को रह जाएँगी रूहें तरसती एक दिन।


मौत ही इक चीज़ है कॉमन सभी इक दोस्तो

देखिये क्या सर बलन्दी और पस्ती एक दिन।


पास आने के लिए कुछ तो बहाना चाहिए

बस्ते-बस्ते ही बसेगी दिल की बस्ती एक दिन।


रोज़ बनता और बिगड़ता हुस्न है बाज़ार का

दिल से ज़्यादा तो न होगी चीज़ सस्ती एक दिन।


मुफ़लिसी है, शाइरी है, और है दीवानगी

“रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract