जीवन मूल्य
जीवन मूल्य
जीवन मूल्य ********** समय-समय की बात है, क्योंकि बदलाव ही प्रकृति का नियम है, जीवन मूल्य भी इससे अछूता कहाँ है। तभी तो आज के जीवन का मूल्य स्वार्थी हो गया है, संवेदनहीन मुर्दों सरीखा हो गया है, अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार का गुलाम होता जा रहा है। सभ्यता, संस्कार, मर्यादा से हीन हो रहा है, अपने सम्मान को ठेस पहुंचाने में भी आज बड़ा गर्व कर रहा है। बेशर्मी से अट्टहास कर रहा है, नीति, नियम, सिद्धांतों से दूर जा रहा है जीवन मूल्यों के अवमूल्यन का नया सिद्धांत प्रतिपादित कर नव आयाम रच रहा है, जीवन मूल्य के नव मापदंड रच रहा है। सुधीर श्रीवास्तव
