हृदय बसे श्री राम
हृदय बसे श्री राम
जो उपस्थित हैं कण- कण में
मानव तन धर जन्म लिया सूर्यवंश में,
बनकर बारह गुणों के स्वामी
किया हर परिस्थिति का सामना।
मानकर गुरु की आज्ञा
पूर्ण की गुरु की कामना
अपना कर सीता का साथ
फिर बने वह जानकीनाथ
दशरथ के वचन में था स्वाभिमान
पालन उसका कर किया उनका सम्मान
चौदह वर्ष फिर उन्होंने वनवास में बिताए
उत्तरदायित्व निभाकर मर्यादापुरुषोत्तम कहलाए
बनाकर वनवास की हर भूमि को तीर्थस्थान
किया उन सब के जीवन का उत्थान
राक्षस राज रावण ने जब लांधी मर्यादा की रेखा
राघव ने दिया सुधरने का मौका, करके उसके व्यवहार को अनदेखा
दंभवश दशानन ने जब किया माता सीता को लौटाने से इंकार
रघुनंदन ने भयंकर रूप धर खत्म किया उसका अहंकार
हर संघर्ष को अपनाते हुए,मानव जाति को दिया संदेश
भयमुक्त कर्तव्य पालन ही था उनका उपदेश
इस प्रकार का उत्तम व्यक्तित्व का होना बात नहीं कोई है आम
क्योंकि ऐसा चरित्र धारण करने वाले केवल है मेरे प्रभु श्री राम।
