हाँ , मैं एक लड़की हूँ
हाँ , मैं एक लड़की हूँ
मैं एक लड़की हूँ,
हाँ बस यही तो मेरा गुनाह है
सुना है मैंने,कई दफा लड़का,
लड़की एक समान,
बेटी पढाओ, बेटी बचाओ।
बहुत मिल गई है मुझे समानता,
पर क्या ये सब काफी है मुझे,
खाली सड़को पर महफ़ूज चलने केे लिए ?
हाँ, माना की मुझे मनपसंद कपड़े पहनने
की आज़ादी मिल गयी है कुछ हद तक,
जी हाँ, मिला है मुझे भी थोड़ा हक की,
मैं घर से बहार निकलू, पढाई करू, काम करू, खुश रहु...!
पर क्या , उसी ख़ुशी से मैं वापिस घर भी लौट आउंगी??
हाँ मैं एक लड़की हूँ,
और बस यही मेरा गुनाह हैं !
ख्याल आया है माँ बाप की जिम्मेदारी का
जी हाँ, जिसे निभाना है उन्हें मेरी शादी करके,
और ख्याल रखना है मुझे,उनकी इज़्ज़त का।
पर, क्या मैं महफ़ूज़ होंगी उस अंजान घर में ?
क्या, मिलेगा मुझे मेरा हर हक़ ?
या मुझे भी मारा पीटा जायगा
जला दिया जायगा उन हज़ारो बहनो की तरह।
डर है, ये मेरे मन में,
मेरे लिए,
मेरी बहनों, माता केे लिए
क्योंकि हाँ मैं एक लड़की हूँ
क्या बस यही मेरा गुनाह है ?
