STORYMIRROR

Kumar shivesh Jha

Abstract

4  

Kumar shivesh Jha

Abstract

गरीबों का बचपन

गरीबों का बचपन

1 min
624

भरी दुपहरी में मैंने बादल को घिरते देखा है

सभी शहरों में मैंने बचपन को मरते देखा है


किताब वाले कोमल हाथों को काम करते देखा है

भूख के नाम पर बचपन को भी पानी से काम चलाते देखा है


खेलने की इस उम्र में दिमाग उसका कोई खिलौना नहीं जानता 

उसके लिए ये फुटपाथ बहुत बड़ी है वो आराम के लिए कोई बिछौना नहीं जानता 


अपनी बेबसी को छिपाकर , सिसकियों का साथ बड़े अच्छे से निभाता है

वो भोला इतना है कि राह पर चलने वाले हर एक को अपना बताता है


 उन कोमल कंधों पर बैग के बदले ईंट धरते देखा है

अनजाने में ही मैंने उसे एक सपने का भारत बुनते देखा है


धर्म संप्रदाय का उसे कुछ अता-पता नहीं

पर उसे हिन्दू के लिए हिन्दू और मुस्लिम के लिए मुस्लिम बनते देखा है


किसको वो अच्छा कहे किसको वो बुरा कहे, नहीं उसे किसी का नाम लेते देखा है

मैंने इसी बचपन में से अब्दुल कलाम को निकलते देखा है



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract