STORYMIRROR

Sudhir Srivastava

Abstract

4  

Sudhir Srivastava

Abstract

दोहा मुक्तक

दोहा मुक्तक

1 min
6

दोहा मुक्तक  ******* ऋतु  परिवर्तन  पर्व  है, सूर्य  चाल  आधार। आहट  सुनो बसंत की, खिचड़ी का त्योहार। रंग-रूप  बदलाव  का,  अद्भुत  उत्सव  पर्व- भारत की पहचान को, नमन  करे  संसार।। बहुनामी  ये  पर्व  है,   मकर   पर्व भी  नाम। जप-तप, गंगा स्नान कर, दान पुण्य का काम। पोंगल दक्षिण हिन्द में, उत्तर  खिचड़ी  जान- हरियाणा  पंजाब  में,  मने  लोहड़ी  शाम।।   मृत्यु  कहाँ  देती  हमें, थोड़ी  सी  भी  छूट। चाहे  जितनी शेष  हो, हमको  करनी  लूट। सूदक का जिनको नहीं, रहता इतना ध्यान- कुर्सी की इस दौड़ में,  सदा  डराती  फूट।। सत्ता  कुर्सी  कर  रही, धर्म  कर्म  से  दूर। पति या पत्नी के लिए, नहीं रहा अब नूर। मरने  वाला  मर  गया, माना  देकर  दर्द- अवसर देकर ही गया, मजे करो भरपूर।। जीवन  है  इक  आइना, देख  सको  तो  देख। लिखा हुआ दिख जाएगा, तव पूरा अभिलेख। अलग बात है यह मगर, अनपढ़ बने हैं आप- मान स्वयं को निज रहे,   हम हैं चिल्ली शेख।। जल जीवन को मानिए, प्राणी का आधार। करिए  नहीं  उदंडता, पड़े  न  खानी  मार। बुद्धिमान हो आप सब, बड़े  बहुत हैं ख्वाब- नाहक  ठाने  क्यों भला,  बैठे - ठाले  रार।।  सुधीर श्रीवास्तव 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract