दोहा - कहें सुधीर कविराय
दोहा - कहें सुधीर कविराय
कूड़ा कचरा खा रही, गौमाता जी आज।
कब किस को आता भला, सच बतलाओ लाज।।
माता गौ को बोलते, करते हो अपमान।
कुत्ते बिल्ली पालते, ,सांसत में है जान।।
समय चक्र का खेल है, हम सब हैं लाचार।
आज लगत माँ बाप हैं, हम सबको बेकार।।
सुख दुख जीवन चक्र है, मत हो यार अधीर।
आ करके चल जायेगा,कभी रहा नहि थीर।।
मत हो दुःख में दुःखी तुम,सुख पा भाव बिभोर।
इक आवत इक जात है,इस जीवन के दौर।।
किसमें ताकत है भला, सुख दुख सकता रोक।
दुखी न होना चाहिए, मत करना तुम शोक।।
पति है हिंसक शेर यदि, पत्नी होती गाय।
पडती यदि वह सामने,दिखत बहुत असहाय।।
